राष्ट्र की परिभाषा किसी बंधन व स्वतन्त्रता से परे
होती है । जिस प्रकार कोई बालक अपने माँ-बाप के सबसे नजदीक रहते हैं । वहीं
माँ-बाप उस उस बालक के प्रथम गुरु व अन्य भूमिकाओं में सबसे पहले आते हैं ।
माँ-बाप उसकी पूरी दुनिया के समान होते हैं । राष्ट्र उस देश में रहने वालों के
किए माँ-बाप के समान होता है । माँ-बाप कभी अपने बच्चों के बीच असमानता का भाव
नहीं लाते हैं । उसी प्रकार कोई भी राष्ट्र कभी भी किसी व्यक्ति से अलग नहीं हो
सकता है । उसकी दृष्टि में सभी मनुष्य समान हैं । राष्ट्र हमारे सामने कई रूपों
में सामने आता है । जैसे प्रकृति, जल, जमीन, हवा या अन्य रूपों में । ये सारी
चीजें कभी भी कसीस के साथ भेदभाव नहीं करती हैं ।
राष्ट्र के
निर्माण में सभी मनुष्यों की अपनी-अपनी भूमिका अलग-अलग रूपण में सामने आती है ।
किसी राष्ट्र का गौरव उस राष्ट्र में निवास करने वाली समस्त जनता के संपूर्णता व
एकता तथा अखंडता पर निर्भर करता है । पिछले कुछ महीनों से राष्ट्रवाद पर एक बहस
छिदी हुई है । भिन्न-भिन्न लोगों के भिन्न-भिन्न मत हैं । कुछ लोग सतही ज्ञान के
द्वारा दिशाहीन व्याख्या करने में लगे हुए हैं । मनुष्यों के राष्ट्र की सीमा व
गौरव सर्वोपरि होता है । आज के समय में राष्ट्रवाद कई रूपण में बादल गया है । जैसे
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, भाषाई राष्ट्रवाद, साहित्यिक राष्ट्रवाद, राजनैतिक राष्ट्रवाद, क्षेत्रीय राष्ट्रवाद इत्यादि ।
इसी बीच
शिक्षा के विभिन्न संस्थानों में एक नए प्रकार की बहस व मुद्दा हमारे सामने दिखाई
दे रहा है । इसकी गूंज धीरे-धीरे बढ़ते जा रहे हैं । इसे हम शैक्षिक राष्ट्रवाद का
नाम दें तो बेमानी न होगी । पिछले कई वर्षों में विश्वविद्यालय व अन्य शैक्षिक
संस्थानों में इसकी चर्चा व उसका असर देखने को मिल रहा है । भिन्न-भिन्न क्षेत्रों
व भाषा प्रदेशों के विद्यार्थी या शोधार्थी इस पर एकमत नहीं दिखाई दे रहे हैं ।
इसे राजनीति से जोड़कर देखने की कवायद जारी है । राष्ट्र के भीतर रहते हुए हम बिना
राजनीति के ऊपर बात किए रह ही नहीं सकते । आज शैक्षिक संस्थानों में राजनीतिक
मुद्दों व समकालीन मुद्दों को लेकर परिचर्चाएं व संगोष्ठियाँ आयोजित की जा रही हैं
। किसी ने तो यह भी कह दिया कि आज विश्वविद्यालय के छात्र सरकार के साथ विपक्ष कि
भूमिका निभा रहे हैं ।
इन सभी
क्षेत्रों में हिन्दी पत्रकारिता का भी महत्वपूर्ण योगदान है । पत्रकारिता
अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम होता है । कहा भी जाता है कि जब आपकी बात कोई न
सुने तो पत्र या अखबार निकालो । भारतीय संविधान के अनुसार सभी को अखबार, पत्र-पत्रिकाए निकालने व अपनी बात कहने का अधिकार
पूरा अधिकार है । हम अतीत में जाकर देखें तो पत्रकारिता का असर व्यापक तौर पर
दिखाई देता है । सभी बड़े क्रांतिकारियों ने अपने-अपने पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से
समाज में क्रांति लाने का कार्य कर रहे थे ।
“हो सकता है आप में
प्रतिभा दूसरों से कम हो
पर हार न मानने की सोच
आपको उनसे अलग बनाती है ।”