इस समय भारत
में आम चुनाव हो रहे हैं । इस चुनाव में चुने हुए प्रतिनिधि भारत की तकदीर बदलते हैं
। वे भारत की सर्वोच्च विधायिका ‘संसद’ के सदस्य चुने जाते हैं । भारत को
मुख्यतः कृषिप्रधान देश कहा जाता है । और इसे सबसे अधिक युवाओं का देश भी कहा जाता
है । भारतीय लोकतन्त्र को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र भी कहा जाता है । एक लोकतान्त्रिक
देश में सभी राष्ट्रीय मुद्दे लोकतान्त्रिक होते हैं । शिक्षा, स्वस्थ्य, पर्यावरण, भूमि, समाज, कानून, रक्षा, राष्ट्रवाद आदि प्रमुख मुद्दे हैं
जिनपर बात की जानी चाहिए । 2019 का आम चुनाव में चुनावी यात्रा दो खेमों में बंटा हुआ
दिख रहा है । यह विभाजन विचारधारा के आधार पर स्वतः हो गया है । एक वर्ग ऐसा है जो
संवैधानिक दायरे में रहकर अपनी बात करता है । संविधान उसके लिए सर्वोच्च है । वहीं
दूसरा वर्ग ऐसा है जो व्यक्तिकेंद्रित हो गया है । सारे आम संविधान की धज्जियां उड़ाई
जा रही हैं । कानून को तोड़ा जा रहा है लेकिन वह खेमा बिलकुल चुप है । लोकतन्त्र की
रक्षा के लिए संविधान का सुरक्षित रहना बहुत जरूरी होता है । भारत जैसे विभिन्नताओं
वाले देश में संविधान की महत्ता कितनी है यह बताने की जरूरत नहीं है । भारत का संविधान
एक मनुष्य को उसके मनुष्यता की दृष्टि से ही देखता है । वह किसी प्रकार का भेदभाव नहीं
करता है । एक वर्ग संविधान को बचाने की बात कर रहा है तो दूसरा वर्ग उसे बदलने व जलाने
का कार्य कर रहा है । एक वर्ग देश के असल मुद्दे शिक्षा, स्वस्थ्य, समाज आदि की बात कर रहा है तो वहीं
दूसरा वर्ग देश के गौंड़ मुद्दे जैसे धर्म, मंदिर, सांप्रदायिक राजनीति आदि में उलझाने
का प्रयास करा रहा है ।
इस समय चुनाव सिर्फ जीतकर संसद पहुँचने का जरिया मात्र
बनकर रह गया है । इसके लिए तरीका चाहे जो भी हो । धनबल, बाहुबल का चारोओर बोलबाला है । यही
कारण है कि चुनाव जीतने कि जिद में देश का असली मुद्दा गायब हो गया है । आज का ग्रेजुएट
कभी आपको शिक्षा, स्वस्थ्य, समाज, पर्यावरण, कानून, संविधान आदि पर बात करता हुआ नहीं
मिलेगा । आम जनता इन मुद्दो से अनभिज्ञ रहती है वह कभी अपने नेता से इन मुद्दों को
लेकर सवाल नहीं खड़े करती ।
“घोषणा पत्र” नामक अलादीन की चिराग में राजनीतिक
पार्टियां परस्पर प्रतिस्पर्धात्मक रवैया अपनाती जा रही हैं । चुनाव के समय में लोकतन्त्र
और उसके असली मुद्दे गायब होते जा रहे हैं ।
महिला सुरक्षा के नाम पर लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां चुप
ही हैं । जातिगत राजनीति, ध्रुवीकरण कि राजनीति आज की मुख्य
राजनीति बन गई है । पिछले 5 वर्षों में बेरोजगारी बेतहासा बढ़ी है लेकिन कभी नौकरियों
को लेकर कोई मुद्दा नहीं बनाया जाता ।
पर्यावरण का तो राजनीति से दूर दूर तक कोई नाता ही नहीं
है । किसी राजनीतिक पार्टियों के मुख्य मुद्दों में यह शामिल नहीं होता ।
सत्ता से सवाल पूछने पर कार्यकर्ता मारपीट पर उतारू हो
जाते हैं । आखिर सत्ता सवालों से इतना क्यूँ डरती है ।
------------ शेष अगले भाग में --- क्रमशः