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Thursday, 5 October 2017

नोबेल विजेता कैलाश सत्यार्थी जी का व्याख्यान

        आज दिनांक 05 अक्टूबर 2017 सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय, बारला, रायसेन, मध्य प्रदेश में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित माननीय कैलाश सत्यर्थी जी का आगमन हुआ । विश्वविद्यालय के विशेष आतिथ्य पर वह विशिष्ट व्याख्यान में शरीक हुए । व्याख्यान का विषय “वर्तमान परिप्रेक्ष्य में करुणा, दया और बालक” रखा गया था । अपने एक घंटे के व्याख्यान में उन्होने अपनी स्पष्टवादिता व करुणा का परिचय दिया । गौरतलब है कि कैलाश सत्यार्थी जी कन्याकुमारी से “भारत यात्रा” निकाल रहे हैं । उनका उद्द्येश्य भारतवासियों को बाल-यौन हिंसा, मानव तस्करी, महिला सुरक्षा, दैहिक शोषण, बाल श्रम जैसे समस्याओं से अवगत करना है । समय के साथ हम आधुनिक जरूर होते जा रहे हैं किन्तु उतनी ही सामाजिक बुराइयाँ भी हमारी पीछा करती हुई चली आ रही हैं । और इस तरीके कि घटनाओं को अंजाम देने वाला कोई और नहीं बल्कि हमारे ही बीच से कोई होता है । 

           भारत सरकार और यूनिसेफ कि रिपोर्ट के अनुसार भारत में 53 प्रतिशत बच्चे बाल यौन अपराध के शिकार हैं । उन्होने कहा कि यदि आज के बाद बाल अपराध होना बंद हो जाये तो लंबित केसों के निपटारें में ही 10 से 40 साल लग जाएंगे । बाल अपराध कि स्थिति को समाज के लिए भद्दा मज़ाक बताते हुए उन्होने कहा कि 1992 के बाद से दुनिया में बाल मजदूरी कि संख्या 26 कारों से घटकर 15 करोड़ हुई है । लेकिन इसके बाद भी समाज में बाल यौन अपराध बढ़ रहा है ।
          ये हमारे समाज कि वर्तमान स्थिति है जिस पर हम सभी को मिलकर विचार करना चाहिए । कैलाश जी का कथन सभी को कुछ नया सोचने को मजबूर करता है । उन्होने कहा कि हमने नोबेल पुरस्कार को सम्पूर्ण देशवासियों को समर्पित कर दिया है । अब यह पुरस्कार सिर्फ मेरा न होकर सम्पूर्ण राष्ट्र का है इसलिए इन सभी सभी समस्याओं से लड़ने कि नैतिक जिम्मेवारी हम सभी हो गई है, तो आइए हम सभी इस समस्या को समाप्त करने में अपना योगदान दें । व्याख्यान के बाद सभी से संकल्प दिलवाए ।
          कैलाश सत्यार्थी जी का व्याख्यान सभी को सुनना चाहिए और ऐसी होने वाली समस्याओं को रोकने में मदद करनी चाहिए । भारत के स्वतंत्र हुए लगभग 70 वर्ष हो गए है किन्तु ऐसी समस्याएँ मुंह बाए खड़ी हैं । तो आइए साथ मिलकर जो जिस स्थिति में है और जहां है वहीं अपना सहयोग दे ।
जय भीम । । । हूल जोहार । । । जय संविधान

-         अनीश कुमार 

Monday, 2 October 2017

भूख का उत्सव

भूख की आवाज 

सुबह-सुबह ज्यादा भयावह होती है

उस भूख का इंतजार करना

और अधिक दुष्कर हो जाता है

देहरी के ऊपर बैठे बच्चों

की भूख की आवाज सुनकर

ऐसा लगता है कि

जैसे उसकी माँ भूख

का उत्सव मना रही हो

सुबह-सुबह उठकर जाएगी

वह किसी पन्तिपावन

ब्राह्मण के यहाँ

बर्तन साफ करेगी,

गंदे कपड़े व पखना साफ करेगी

अपनी नियति मानकर

नित्य की तरह

तब उसे कहीं मिलेगी रात्रि की बची हुई

सूखी रोटियाँ

ये रोटियाँ वह कपड़े में छुपाते हुए लाएगी

देहरी पर रखते ही

निढाल पड़े बच्चों की छीनाझपटी

देखकर किसी उत्सव से

कम नहीं लगता

शायद उसकी जिंदगी भी

इसी तरह एक उत्सव बन कर रह गई है भूख की

शायद यह भूख

आज के मनुष्य की सबसे बड़ी पिपासा बन गई है ।

दुनिया बदल गई--- कविता

दुनिया बदल गई--- कविता

काली रात के 
अतल गहराइयों में
टिमटिमाता छोटा सा दिया
उसके झुरमुट में
बेनाम शख्स
एक अदद रोटी के इंतजार में 
देहरी से सटकर बैठा है।
काली स्याह रात में 
कुत्तो की आवाज
भूख के आगे बौनी हो गई है।
आंख लगातार बंद होने का इंतजार कर रही है
तभी कुछ हलचल होती है
आंख तुरंत उसी ओर गई
शायद कोई रोटी लेकर 
सामने खड़ा था
वह शख्स जोर से उठ खड़ा हुआ
आवाज गायब थी
सामने कोई नहीं था
पेट लाचार था
आंखें बेबस थीं
सुबह हुई
दुनिया जैसे बदल गई
मौसम बदल गया
उसके सामने 
अब नहीं थी समस्या
खाने की 
क्योंकि आंखे बंद थी 
पेट शांत था 
वह अब इस दुनिया में 
नहीं था।।।

- अनीश कुमार