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Wednesday, 12 August 2026

सावित्री बाई फुले को सिर्फ अतीत में नहीं बल्कि वर्तमान में देखने की जरूरत है डॉ. अनीश कुमार

        शिक्षा समाज के जागरण में मुख्य भूमिका निभाती है । वास्तव में शिक्षा किसी भी देश या समाज के विकास का आधारभूत ढांचा होता है । यह विदित है कि जिस समाज या देश की शिक्षा प्रणाली उच्च कोटि की होती है या यूं कहें कि जिस समाज या देश की शिक्षा उस समाज के सापेक्ष होती है, उस समाज के तत्व निहित होते हैं, उस देश का विकास बहुत तेज गति से होता है । आज दुनिया भर में यह प्रमाणित हो चुका है कि शिक्षा हर एक नागरिक का सम्पूर्ण विकास करती है । शिक्षा हमें जहां एक ओर स्कूली पाठ्यक्रमों से मिलती है वहीं दूसरी ओर सामाजिक परम्पराओं से भी मिलती है । समाज का ढांचा जैसा होगा शिक्षा उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है । मतलब यह कि समाज का ढांचा यदि निम्न वर्ग का है तो उस समाज के शिक्षा कि महत्ता और अधिक बढ़ जाति है । गौरतलब है कि जिस समाज के भीतर स्त्रियाँ अधिक जागरूक होती है वह समाज कहीं अधिक विकसित हो रहा होता है । स्त्रियों के भीतर एक प्रशासक की क्षमता पुरुषों की अपेक्षा अधिक बेहतर होता है । भारत देश में ऐसी कई नायिकाएँ हैं जिन्होंने अपना योगदान देकर समाज को एक नयी दिशा प्रदान की है ।  इनमें सावित्री बाई फुले का नाम अग्रणीय है । इन्हें क्रांतिज्योति भी कहा जाता है । क्रांति सिर्फ राजनीतिक रूप में नहीं होती बल्कि समाज के भीतर फैली विभेदता, अंधविश्वास आदि को दूर करने के लिए विचारों कि क्रांति भी होती है । सावित्री बाई फुले के द्वारा जलायी गयी ज्योति आज के समय में और अधिक प्रासंगिक है ।

            आज देश की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले के योगदान को जिस तरह याद करना चाहिए, वैसे नहीं किया जाता । 19वीं सदी में जब देश में राजनैतिक गुलामी के साथ-साथ सामाजिक गुलामी का भी दौर था, तब सावित्री बाई फुले ने शिक्षा के महत्व को जाना, समझा और महिलाओं की आज़ादी के नए द्वार खोलकर उनमें नई चेतना का सृजन किया । स्त्रियों को उनके अधिकारों के प्रति चेतना से लैस किया । यदि दूसरे पक्ष से देखें तो हम पाते हैं कि संविधान लागू होने बाद स्त्रियों को उनका अधिकार कानूनी रूप से मिला है किन्तु सावित्री बाई फुले इस अधिकार की बात स्वतन्त्रता के पहले ही कर रही थीं । इस लिहाज से आज के समय में उनके द्वारा किए गए योगदान को समझना और जानना और भी जरूरी हो जाता है कि कैसे उन्होंने उस दौर में स्त्रियों के अधिकारों, अशिक्षा, छुआछूत, सतीप्रथा, बाल या विधवा-विवाह जैसी कुरीतियों पर आवाज उठाई होगी? कैसे उन रूढ़िवादी परंपराओ को तोड़कर महिलाओं को पढ़ने व आगे बढ़ने की राह दी होगी और देश की आधी आबादी महिलाओं को शिक्षा के माध्यम से मुख्यधारा में ला खड़ा किया होगा । उनका यह कार्य उनके स्त्री होने के कारण कहीं अधिक दुरूह था जबकि पूरा समाज पितृसत्ता कि जड़ों से लैस था । ऐसे में दांत के भीतर जीभ बनकर उन्होंने न केवल स्त्रियों के बारें में सोचा बल्कि एक नया रास्ता भी तैयार किया ।  

तत्कालीन प्रतिकूल परिस्थितियों में समाज सुधारक सावित्री बाई फुले एक युग नायिका बनकर उभरीं । उन्हें सिर्फ समाज सुधारक कहकर उनके द्वारा किए गए कार्यों को सीमित नहीं किया जा सकता । अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, निर्भीक व्यक्तित्व, सामाजिक सरोकारो से ओत-प्रोत ज्योतिबा फुले के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दकियानूसी समाज को बदलने हेतु इन्होंने अपने तर्कों के आधार पर बहस किया । आज की स्त्री अभी भी इन तर्कों को अपने विषय वस्तु में शामिल करने से कतराती है । वे स्त्री जीवन को गौरवान्वित किया एवं सामाजिक न्याय को लक्षित किया । दरअसल आज देखिये तो सावित्री बाई फुले को सिर्फ दलित वर्ग की समाज सुधारक के तौर पर ही देखा जाता है । कहा जाता है कि स्त्रियाँ जन्म से ही शूद्र होती हैं हालांकि वर्णव्यवस्था के अनुसार शूद्र सबसे निचले पायदान पर रखा गया है इसलिए स्त्रियाँ भी समाज में सबसे निचले पायदान पर ही मानी गई हैं चाहें वह किसी वर्ग/जाति की हों । ऐसे में यदि सावित्री जी स्त्री हितों की बात करती हैं तो वह सिर्फ दलित स्त्रियों की ही बात नहीं करती हैं । उनकी पाठशाला और विधवा आश्रमों में सभी वर्गों की महिलाओं का प्रवेश होता था । किन्तु आज के समय में हम यह देखते हैं कि ज़्यादातर गैर दलित स्त्रियाँ सावित्री बाई को अपनी नायिका नहीं मानती हैं ।

            सावित्री बाई फुले को सिर्फ इस लिहाज से न देखा जाए कि वह एक दलित महिला थीं और उन्होंने कुछ स्कूलों की स्थापना की । उनका योगदान सिर्फ कुछ जातियों के विकास तक नहीं सीमित है । सावित्री बाई फुले अपने आपको एक मनुष्य की दृष्टि से देखती थीं । उनके समय में किसी भी जाति की महिलाओं को पढ़ने का अधिकार न के बराबर था । उन्होंने सभी वर्ग की महिलाओं के लिए स्कूल खोले और उसमे बिना किसी भेदभाव के सभी उपस्थिती सुनिश्चित किया । इस कार्य में उनके जीवन साथी ज्योतिबा फुले जी का पूरा योगदान मिला । फुले दंपति शिक्षा को बेहद महत्व देते थे । ज्योतिबा फुले के द्वारा चलाये गए शिक्षा के आंदोलन को सावित्री बाई फुले ने बखूबी आगे बढ़ाने में पूरा सहयोग दिया । ज्योतिबा फुले विद्या के महत्व धार्मिक किताबों से कहीं अधिक महत्व देते थे उनका मानना था कि -

विद्या बिना मति गयी, मति बिना नीति गयी

नीति बिना गति गयी, गति बिना वित्त गया

वित्त बिना शूद्र गये !

इतने अनर्थ एक अविद्या ने किये ।

महात्मा फुले ने जीवन में शिक्षा के अभाव से पड़ने वाले प्रभाव को रेखांकित करते हुए ये पंक्तियां किसानों का कोड़ानामक किताब में लिखी है । ज्योतिबा फुले ने समय रहते शिक्षा के महत्व को पहचाना । उन्होंने महसूस किया कि बहुजन समाज और उनके आसपास की महिलाएं शिक्षा की कमी के कारण गुलामी में हैं । इस आधार पर उन्होंने सुझाव दिया है कि ज्ञान की कमी के चलते बहुजन समाज को दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का जीवन भर सामना करना पड़ता है । उन्होंने निदान बताते हुए कहा है कि इस दुर्भाग्य की जड़ अज्ञानता है ।

स्त्री और दलितों की शिक्षा के प्रति फूले दम्पत्ति की प्रतिबद्धता किसी जूनून से कम नहीं थी । लगातार पैसे की कमी के बावजूद भी वे समर्पित भाव से इस काम में लगे रहे । उनका समर्पण इस रूप में स्पष्ट दिखाई देता है कि उन्होंने पूणे शहर और उसके आसपास कुल 18 स्कूल खोले जहां सभी विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा दी जाती थी । सावित्रीबाई द्वारा पढ़ाए गए न जाने कितने ही छात्रों के जीवन में उससे भारी परिवर्तन आया । लेकिन उनके इस योगदान को भारतीय महिलाएं या तो भूल गईं या जानबूझकर भुला दी गई । हम जब भी सावित्री बाई को याद करते हैं तो उन्हें सिर एक इतिहास की पात्र होने नाते याद करते हैं या उनके कार्यों को एक कहानी के तौर पर याद करते हैं । उनके विचारों को हम आत्मसात नहीं करते हैं । जबकि कहीं अधिक जरूरी यह होता है । सावित्री बाई फुले सिर्फ स्कूल खोलकर शिक्षा देने का कार्य नहीं किया बल्कि एक ऐसे समय में शिक्षा दे रही थीं जब उन्हें खुद पढ़ने का समय नहीं था । इसके बावजूद वह स्त्रियों को समाज, संस्कृति आदि के बारे में बता रही थी । उनकी कविताओं के एक-एक शब्द चिल्ला-चिल्लाकर स्त्रियों, दलितों को उनके अधिकारों के प्रति इंगित कर रहे हैं । इसे सिर्फ क्रांतिकारिता कह कर करके सीमित नहीं किया जा सकता । उन विचारों का समाज भीतर प्रभाव को भी देखना चाहिए और उनके विचारों को आत्मसात करना चाहिए ।    

दरअसल स्त्रियों उनका सम्मान से जीवित रहना बड़ी चुनौती है इसके लिए उनका आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना ही एकमात्र उपाय है जिसके लिए उन्होंने कई धार्मिक मान्यताओं को तोड़ा और स्त्रियों को अपने बुनियादी अधिकारों के लिए जागरूक किया । यही बात आगे चलकर प्रभा खेतान भी कहती हैं कि स्त्रियों कि आजादी उनके पर्स से शुरू से होती है । सावित्री बाई फुले ने स्त्री की सदियों पुरानी शारीरिक और मानसिक रूप से गुलाम छवि को ध्वस्त कर उसे स्वतंत्र इंसान के रूप में जीने के लिए प्रेरित किया । यह सत्य है कि स्त्री केवल श्रम और देह ही नहीं बल्कि स्वतंत्र विचार रखने वाली पुरूष के सामान इंसान है । उसे इसी रूप में देखने की जरूरत है । यह सोचने पर समाज को विवश कर ज्योतिबा के परिवर्तनवादी आंदोलन में पूरा सहयोग दिया ।

आज भारतीय समाज के जो हालात हैं उससे यह दिखाई देता है कि भारतीय समाज फिर से उन्हीं सामाजिक बुराइयों कि तरफ लौट रहा है । जिसका सावित्री बाई आजीवन विरोध करती रहीं । स्त्रियों और दलितों को सावित्री बाई गुलामी से मुक्त कर उन्हें सम्मान के साथ जीने के लिए जिन्दगी भर संघर्ष करती रहीं उनको फिर गुलाम बनाए रखने की साज़िश होने लगी है । उनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पहरा लगाया जा रहा है । उन्हें उनके मानवाधिकारों से वंचित किया जा रहा है । समाज कि आधी आबादी महिलाओं/लड़कियों को ऐसे माहौल में शिक्षा के साथ-साथ स्वाभिमान से जीने के लिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना बहुत ज़रूरी है । उनका अपने हक़-अधिकारों के लिए जागरूक होना जरूरी है । महिलाएं अपने आपको एक मनुष्य की दृष्टि से देखें । उनके मनुष्य बनने के रास्ते में जो भी आए उससे संघर्ष करना जरूरी हो गया है । और जब उनके अधिकारों का हनन हो तो उसके लिए संघर्ष करना, लड़ना बहुत जरूरी है । यदि आज लड़कियां और महिलाएं सावित्री बाई फुले की शिक्षा को अपनाएं और उनको अपना रोल मॉडल बनाएं तो कोई उनका किसी भी प्रकार का शोषण नहीं कर सकता । कोई उन पर हिंसा नहीं कर पायेगा । कोई उन पर पितृसत्ता व्यवस्था नहीं थोप पायेगा । जब महिलाएं शत-प्रतिशत आत्मनिर्भर बनेगीं तो इससे देश का भी विकास होगा और देश प्रगतिशील बनेगा । सावित्री बाई फुले से प्रेरणा लेकर शिक्षित-जागरूक लड़कियां अन्य लड़कियों और महिलाओं को शिक्षित, जागरूक कर समाज और देश के विकास प्रगति में अपना योगदान कर सकती हैं । जब स्त्रियाँ पढ़-लिख कर शिक्षित होकर, सावित्री बाई के संघर्ष को जानकार जितना जागरूक होंगी समाज का विस्तार उतना ही अधिक होगा । समाज से पितृसत्ता धीरे-धीरे खत्म होने लगेगी ।

 

शिक्षा का लोकतान्त्रिक मूल्य और डॉ. भीमराव अम्बेडकर- डॉ. अनीश कुमार

 डॉ. भीमराव अंबेडकर एक ऐसे नेता रहे हैं जिन्हें भारत में सभी विचारधाराओं के लोग मानते रहे हैं । यह उनका कद ही तो है जो उन्हें अखिल भारतीय स्तर पर ख्याति दिला रहा है । आज उन्हें संपूर्णता में देखने की जरूरत है ।


शिक्षा देश की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक क्रांति का आधार है । डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा दिया गया सूत्र ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’ इस सूत्र में ही उनके संघर्षपूर्ण जीवन का व उनके शैक्षिक विचारों का सारांश छिपा हुआ है । इसलिए डॉ. अम्बेडकर ने स्पष्ट कहा कि ‘शिक्षा शेरनी का वह दूध है जो पियेगा वह दहाड़ेगा ।’ उनका मानना था कि यदि दलित समाज की महिलाएं शिक्षित होंगी तो वे अपनी संतानों को भी शिक्षित व संस्कारवान बना सकती है तथा जीवन में आने वाली कठिनाइयों को हल कर सकेंगी । डॉ. अंबेडकर ने केवल अनुसूचित समाज की शिक्षा पर ही बल नहीं दिया अपितु प्रत्येक वर्ग के सभी महिला व पुरुषों को सामान रूप से शिक्षा मिले, इस पर उनके विचार एक दम स्पष्ट थे । डॉ. अंबेडकर किसी भी समाज के विकसित होने पैमाना यह मानते हैं कि उस समाज की स्त्रियाँ कितनी शिक्षित हैं । उनका मानना था कि जितनी शिक्षा पुरुषों के आवश्यक है उतनी ही महिलाओं के लिए । स्त्रियाँ किसी भी समाज की मूल आधार होती हैं । यह कुल जनसंख्या की आधी आबादी हैं । ऐसे में उन्हें हाशिये पर रखकर किसी भी परिवार, समाज का वास्तविक विकास नहीं हो सकता ।

आगे चलकर ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’ का यह नारा डॉ. अंबेडकर का सबसे अमूलचूल परिवर्तन लाने वाला नारा बन गया । कालांतर में इसका प्रभाव खासकर वंचित समुदायों के सामाजिक परिष्करण में दिखाई दिया । डॉ. भीमराव अंबेडकर ने देश के निर्धन और वंचित समाज को प्रगति करने का जो सूत्र दिया था, उसकी पहली इकाई शिक्षा ही थी । इससे अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि वे गतिशील समाज के लिये शिक्षा को कितना महत्व देते थे । पढ़ो और पढ़ाओ । इस सूत्र का अर्थ स्पष्ट है कि संगठित होने और न्याययुक्त संघर्ष करने के लिये प्रथम शर्त शिक्षित होने की ही है । इस मामले में डॉ. अंबेडकर की दृष्टि एकदम साफ़ है । साधन सम्पन्न समाज के बच्चों के लिये जीवन में प्रगति के अनेक रास्ते हैं । शिक्षा से भौतिक जगत में गतिशील होने की क्षमता तो प्राप्त होती ही है, बौद्धिक विकास भी होता है । शिक्षा व्यक्ति के आंतरिक एवं बाह्य गुणों का विकास कर उसके व्यक्तित्व निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है । वास्तव में लोकतन्त्र के निर्मित होने की पहली कड़ी शिक्षा ही है ।


    पारम्परिक शिक्षा व्यवस्था के स्थान पर लोकतान्त्रिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करने वाले विचारकों में ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु एवं डॉ. भीमराव अम्बेडकर का नाम अग्रणी है । महात्मा फुले ने हंटर कमीशन को भेजे ज्ञापन में शिक्षा के जिन लोकतान्त्रिक मूल्यों की तरफ ध्यान आकृष्ट किया था, डॉ. अम्बेडकर इसी विरासत को आगे बढ़ाने वाले उल्लेखनीय विचारक हैं । अपने लेखन से राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान प्राप्त डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने शिक्षा विषयक विचार स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त किये जो उनके भाषणों, लेखों, संपादकीयों एवं पुस्तकों में परिलक्षित होते हैं । शिक्षा लोकतंत्र के लिए सदैव सबसे बड़े सहारे तथा एक स्थायी साथी के रूप में रही है । शिक्षा के बिना लोकतंत्र का औचित्य तथा इसका प्रभाव बड़ी सीमित रह जाती है । दूसरी ओर लोकतंत्र के बिना शिक्षा अर्थहीन है । वास्तव में लोकतंत्र और शिक्षा में एक अन्योन्य या पारस्परिक संबंध होता है, तथा वे एक दूसरे के बिना पनप नहीं सकते ।

डॉ. अंबेडकर प्राथमिक स्‍तर से ही वैज्ञानिक शैक्षणिक विधियों के पक्षधर थे । उनका मानना था कि अच्‍छे स्‍वास्‍थ्‍य के लिए सफाई की आदत और शारीरिक शिक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए । समाज के वंचित तबकों के बच्‍चों के बारे में उन्‍होंने कहा, “ऐसे बच्‍चों के लिए पहला पाठ नहा-धोकर स्‍वच्‍छ रहना होना चाहिए, दूसरा पाठ साफ-सुथरा संतुलित भोजन होना चाहिए और जो ऐसा करते हैं उन्‍हें विद्यालय में प्रोत्‍साहित करना चाहिए ताकि बाकी बच्‍चे सबक ले सकें ।” इसके साथ ही डॉ. अंबेडकर ने शुरू से ही बच्‍चों में अच्‍छे संस्‍कार व अच्‍छी आदतें डालने की वकालत की । उनके अनुसार “अच्‍छे संस्‍कार लंबी कोशिश व क‍ठोर संयम का नतीजा होते हैं, जो दूसरों की सहूलियतों का भी ध्‍यान रखते हैं । अच्‍छे संस्‍कार प्राथमिक रूप से मां-बाप व अध्‍यापकों से सीखते हैं लेकिन बाद में खुद इनकी जांच-पडताल कर इन पर अपना विश्‍वास दृढ करते हैं । अच्‍छी आदतें बहुत मुश्किल से आती हैं जबकि बुरी आदतें बच्‍चे तेजी से ग्रहण करते हैं, इस तथ्‍य को हमेशा ध्‍यान में रखना चाहिए । बुरी आदतें ही व्‍यक्ति और समाज का पतन करती हैं । शांत व्‍यवहार, मीठी बोली, सभ्‍य तरीका आदि ही तो अच्‍छी संस्‍कृति का निर्माण करते हैं ।”

शिक्षा पर विचार करते वक्‍त तमाम भारतीय शिक्षाशास्त्रियों का बल प्राथमिक शिक्षा पर रहा है । डॉ. अंबेडकर इससे थोडे अलग ढंग से सोचते हैं । उन्‍होंने आंकडों द्वारा इस बात को रेखांकित किया कि अस्‍पृश्‍य जातियों में प्राथमिक शिक्षा के स्‍तर तो विद्यार्थी आ रहे हैं लेकिन वे उच्‍च शिक्षा तक नहीं पहुंच पाते । इसकी वजहों के तौर पर डॉ. अंबेडकर ने रेखांकित किया कि दलित वर्गों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होती इसलिए वे उच्‍च शिक्षा तक नहीं पहुंच पाते । वास्तव में डॉ. अंबेडकर एक दूरद्रष्टा विचारक थे । वे दलितों के लिए उच्‍च शिक्षा की वकालत तो करते ही थे, साथ ही भारत में शिक्षण संस्‍थाओं की दयनीय हालत को देखते हुए वे दलितों को विदेशी विश्‍वविद्यालयों तक की पहुंच संभव बनाना चाहते थे । तत्‍कालीन भारतीय और ब्रिटिश सरकारों के बारे में डॉ. अंबेडकर की स्‍पष्‍ट आलोचना थी कि वे दलितों के लिए उच्‍च शिक्षा मुहैया कराने हेतु पर्याप्‍त प्रयास नहीं कर रही हैं।

डॉ. अंबेडकर के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण भी होना चाहिए । समाज के विकास के लिए उसके सदस्यों का चरित्रवान होना आवश्यक है क्योंकि चरित्रवान व्यक्ति ही अपने ज्ञान का उपयोग समाज के कल्याण के लिए करेगा । वहीं वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना भी शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए । जिससे की विद्यार्थी अपनी समस्याओं का समाधान अनुसंधान पूर्ण ढंग से कर सकें तथा ही तथ्य विचारों की तह तक जाकर उनका विश्लेषण कर सके तथा साथ ही तथ्य दे सके ।

डॉ. अंबेडकर विद्यालय को एक सामाजिक संस्था मानते हैं । समाज अपने सदस्यों की शिक्षा के लिए इनका निर्माण करता है । वे विद्यालयों को ऐसा बनाना चाहते थे जो समाज को नया रुप देने में सहायक हो । इसलिए वे परम्परागत विद्यालयों के स्वरुप को स्वीकार नही करते क्योंकि उनमें बच्चों को पूर्व निश्चित परम्पराओं व आदर्शों का ज्ञान कराया जाता है जो कि सामाजिक समता व विकास में बाधक है । डॉ. अंबेडकर ने कहा कि “विद्यालयों की स्थापना बच्चों को बारहखड़ी पढ़ाने के लिए नहीं बल्कि उनके मन को सुसज्जित कर समाज हितोपयोगी बनाने के लिए होनी चाहिए । विद्यालय श्रेष्ठ नागरिक तैयार करने के कारखाने हैं अर्थात् कारखाने का मिस्त्री जितना होशियार होगा, वहां से निकलने वाला माल भी उतना ही उत्तम होगा ।

दरअसल डॉ. अंबेडकर विद्यालय को समाज का लघुरुप मानते थे, इसलिए उन्होंने विद्यालय में सामूहिक शिक्षा पद्धति पर बल दिया तथा विद्यालय में स्वतंत्रता, समता और भ्रातृत्व के वातावरण पर बल दिया । उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को आत्मानुभूति व आत्मोन्नति करना व नैतिक विकास करना है । इस सबके लिए सामाजिक आदर्शों मूल्यों व नैतिकता से पूर्ण उच्च सामाजिक पर्यावरण की आवश्यकता है जो कि विद्यालयों में ही सम्भव है । विद्यालय में विद्वान शिक्षक के द्वारा शील का निर्माण किया जाता है और बालकों का नैतिक विकास होता है ।


 - डॉ. अनीश कुमार

लेखक गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन करते हैं ।