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Wednesday, 12 August 2026

शिक्षा का लोकतान्त्रिक मूल्य और डॉ. भीमराव अम्बेडकर- डॉ. अनीश कुमार

 डॉ. भीमराव अंबेडकर एक ऐसे नेता रहे हैं जिन्हें भारत में सभी विचारधाराओं के लोग मानते रहे हैं । यह उनका कद ही तो है जो उन्हें अखिल भारतीय स्तर पर ख्याति दिला रहा है । आज उन्हें संपूर्णता में देखने की जरूरत है ।


शिक्षा देश की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक क्रांति का आधार है । डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा दिया गया सूत्र ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’ इस सूत्र में ही उनके संघर्षपूर्ण जीवन का व उनके शैक्षिक विचारों का सारांश छिपा हुआ है । इसलिए डॉ. अम्बेडकर ने स्पष्ट कहा कि ‘शिक्षा शेरनी का वह दूध है जो पियेगा वह दहाड़ेगा ।’ उनका मानना था कि यदि दलित समाज की महिलाएं शिक्षित होंगी तो वे अपनी संतानों को भी शिक्षित व संस्कारवान बना सकती है तथा जीवन में आने वाली कठिनाइयों को हल कर सकेंगी । डॉ. अंबेडकर ने केवल अनुसूचित समाज की शिक्षा पर ही बल नहीं दिया अपितु प्रत्येक वर्ग के सभी महिला व पुरुषों को सामान रूप से शिक्षा मिले, इस पर उनके विचार एक दम स्पष्ट थे । डॉ. अंबेडकर किसी भी समाज के विकसित होने पैमाना यह मानते हैं कि उस समाज की स्त्रियाँ कितनी शिक्षित हैं । उनका मानना था कि जितनी शिक्षा पुरुषों के आवश्यक है उतनी ही महिलाओं के लिए । स्त्रियाँ किसी भी समाज की मूल आधार होती हैं । यह कुल जनसंख्या की आधी आबादी हैं । ऐसे में उन्हें हाशिये पर रखकर किसी भी परिवार, समाज का वास्तविक विकास नहीं हो सकता ।

आगे चलकर ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’ का यह नारा डॉ. अंबेडकर का सबसे अमूलचूल परिवर्तन लाने वाला नारा बन गया । कालांतर में इसका प्रभाव खासकर वंचित समुदायों के सामाजिक परिष्करण में दिखाई दिया । डॉ. भीमराव अंबेडकर ने देश के निर्धन और वंचित समाज को प्रगति करने का जो सूत्र दिया था, उसकी पहली इकाई शिक्षा ही थी । इससे अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि वे गतिशील समाज के लिये शिक्षा को कितना महत्व देते थे । पढ़ो और पढ़ाओ । इस सूत्र का अर्थ स्पष्ट है कि संगठित होने और न्याययुक्त संघर्ष करने के लिये प्रथम शर्त शिक्षित होने की ही है । इस मामले में डॉ. अंबेडकर की दृष्टि एकदम साफ़ है । साधन सम्पन्न समाज के बच्चों के लिये जीवन में प्रगति के अनेक रास्ते हैं । शिक्षा से भौतिक जगत में गतिशील होने की क्षमता तो प्राप्त होती ही है, बौद्धिक विकास भी होता है । शिक्षा व्यक्ति के आंतरिक एवं बाह्य गुणों का विकास कर उसके व्यक्तित्व निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है । वास्तव में लोकतन्त्र के निर्मित होने की पहली कड़ी शिक्षा ही है ।


    पारम्परिक शिक्षा व्यवस्था के स्थान पर लोकतान्त्रिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करने वाले विचारकों में ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु एवं डॉ. भीमराव अम्बेडकर का नाम अग्रणी है । महात्मा फुले ने हंटर कमीशन को भेजे ज्ञापन में शिक्षा के जिन लोकतान्त्रिक मूल्यों की तरफ ध्यान आकृष्ट किया था, डॉ. अम्बेडकर इसी विरासत को आगे बढ़ाने वाले उल्लेखनीय विचारक हैं । अपने लेखन से राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान प्राप्त डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने शिक्षा विषयक विचार स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त किये जो उनके भाषणों, लेखों, संपादकीयों एवं पुस्तकों में परिलक्षित होते हैं । शिक्षा लोकतंत्र के लिए सदैव सबसे बड़े सहारे तथा एक स्थायी साथी के रूप में रही है । शिक्षा के बिना लोकतंत्र का औचित्य तथा इसका प्रभाव बड़ी सीमित रह जाती है । दूसरी ओर लोकतंत्र के बिना शिक्षा अर्थहीन है । वास्तव में लोकतंत्र और शिक्षा में एक अन्योन्य या पारस्परिक संबंध होता है, तथा वे एक दूसरे के बिना पनप नहीं सकते ।

डॉ. अंबेडकर प्राथमिक स्‍तर से ही वैज्ञानिक शैक्षणिक विधियों के पक्षधर थे । उनका मानना था कि अच्‍छे स्‍वास्‍थ्‍य के लिए सफाई की आदत और शारीरिक शिक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए । समाज के वंचित तबकों के बच्‍चों के बारे में उन्‍होंने कहा, “ऐसे बच्‍चों के लिए पहला पाठ नहा-धोकर स्‍वच्‍छ रहना होना चाहिए, दूसरा पाठ साफ-सुथरा संतुलित भोजन होना चाहिए और जो ऐसा करते हैं उन्‍हें विद्यालय में प्रोत्‍साहित करना चाहिए ताकि बाकी बच्‍चे सबक ले सकें ।” इसके साथ ही डॉ. अंबेडकर ने शुरू से ही बच्‍चों में अच्‍छे संस्‍कार व अच्‍छी आदतें डालने की वकालत की । उनके अनुसार “अच्‍छे संस्‍कार लंबी कोशिश व क‍ठोर संयम का नतीजा होते हैं, जो दूसरों की सहूलियतों का भी ध्‍यान रखते हैं । अच्‍छे संस्‍कार प्राथमिक रूप से मां-बाप व अध्‍यापकों से सीखते हैं लेकिन बाद में खुद इनकी जांच-पडताल कर इन पर अपना विश्‍वास दृढ करते हैं । अच्‍छी आदतें बहुत मुश्किल से आती हैं जबकि बुरी आदतें बच्‍चे तेजी से ग्रहण करते हैं, इस तथ्‍य को हमेशा ध्‍यान में रखना चाहिए । बुरी आदतें ही व्‍यक्ति और समाज का पतन करती हैं । शांत व्‍यवहार, मीठी बोली, सभ्‍य तरीका आदि ही तो अच्‍छी संस्‍कृति का निर्माण करते हैं ।”

शिक्षा पर विचार करते वक्‍त तमाम भारतीय शिक्षाशास्त्रियों का बल प्राथमिक शिक्षा पर रहा है । डॉ. अंबेडकर इससे थोडे अलग ढंग से सोचते हैं । उन्‍होंने आंकडों द्वारा इस बात को रेखांकित किया कि अस्‍पृश्‍य जातियों में प्राथमिक शिक्षा के स्‍तर तो विद्यार्थी आ रहे हैं लेकिन वे उच्‍च शिक्षा तक नहीं पहुंच पाते । इसकी वजहों के तौर पर डॉ. अंबेडकर ने रेखांकित किया कि दलित वर्गों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होती इसलिए वे उच्‍च शिक्षा तक नहीं पहुंच पाते । वास्तव में डॉ. अंबेडकर एक दूरद्रष्टा विचारक थे । वे दलितों के लिए उच्‍च शिक्षा की वकालत तो करते ही थे, साथ ही भारत में शिक्षण संस्‍थाओं की दयनीय हालत को देखते हुए वे दलितों को विदेशी विश्‍वविद्यालयों तक की पहुंच संभव बनाना चाहते थे । तत्‍कालीन भारतीय और ब्रिटिश सरकारों के बारे में डॉ. अंबेडकर की स्‍पष्‍ट आलोचना थी कि वे दलितों के लिए उच्‍च शिक्षा मुहैया कराने हेतु पर्याप्‍त प्रयास नहीं कर रही हैं।

डॉ. अंबेडकर के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण भी होना चाहिए । समाज के विकास के लिए उसके सदस्यों का चरित्रवान होना आवश्यक है क्योंकि चरित्रवान व्यक्ति ही अपने ज्ञान का उपयोग समाज के कल्याण के लिए करेगा । वहीं वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना भी शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए । जिससे की विद्यार्थी अपनी समस्याओं का समाधान अनुसंधान पूर्ण ढंग से कर सकें तथा ही तथ्य विचारों की तह तक जाकर उनका विश्लेषण कर सके तथा साथ ही तथ्य दे सके ।

डॉ. अंबेडकर विद्यालय को एक सामाजिक संस्था मानते हैं । समाज अपने सदस्यों की शिक्षा के लिए इनका निर्माण करता है । वे विद्यालयों को ऐसा बनाना चाहते थे जो समाज को नया रुप देने में सहायक हो । इसलिए वे परम्परागत विद्यालयों के स्वरुप को स्वीकार नही करते क्योंकि उनमें बच्चों को पूर्व निश्चित परम्पराओं व आदर्शों का ज्ञान कराया जाता है जो कि सामाजिक समता व विकास में बाधक है । डॉ. अंबेडकर ने कहा कि “विद्यालयों की स्थापना बच्चों को बारहखड़ी पढ़ाने के लिए नहीं बल्कि उनके मन को सुसज्जित कर समाज हितोपयोगी बनाने के लिए होनी चाहिए । विद्यालय श्रेष्ठ नागरिक तैयार करने के कारखाने हैं अर्थात् कारखाने का मिस्त्री जितना होशियार होगा, वहां से निकलने वाला माल भी उतना ही उत्तम होगा ।

दरअसल डॉ. अंबेडकर विद्यालय को समाज का लघुरुप मानते थे, इसलिए उन्होंने विद्यालय में सामूहिक शिक्षा पद्धति पर बल दिया तथा विद्यालय में स्वतंत्रता, समता और भ्रातृत्व के वातावरण पर बल दिया । उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को आत्मानुभूति व आत्मोन्नति करना व नैतिक विकास करना है । इस सबके लिए सामाजिक आदर्शों मूल्यों व नैतिकता से पूर्ण उच्च सामाजिक पर्यावरण की आवश्यकता है जो कि विद्यालयों में ही सम्भव है । विद्यालय में विद्वान शिक्षक के द्वारा शील का निर्माण किया जाता है और बालकों का नैतिक विकास होता है ।


 - डॉ. अनीश कुमार

लेखक गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन करते हैं । 

Sunday, 24 August 2025

शिक्षा और विश्वविद्यालयों को समावेशी बनाना होगा - डॉ. अनीश कुमार

             भारत की शिक्षा व्यवस्था को देश की रीढ़ कहा गया है, क्योंकि शिक्षा ही वह माध्यम है जिससे एक व्यक्ति न केवल ज्ञान प्राप्त करता है, बल्कि समाज, संस्कृति, मूल्य, और उत्तरदायित्व को भी समझता है। शिक्षकों की भूमिका इस संपूर्ण व्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाते, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों का निर्माण करते हैं। किंतु आज शिक्षा व्यवस्था अनेक चुनौतियों से जूझ रही है और विशेष रूप से शिक्षक वर्ग अनेक समस्याओं का सामना कर रहा है।

            भारत की शिक्षा व्यवस्था में बीते दशकों में कई सुधार हुए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 जैसे प्रयासों ने नई दिशा देने की कोशिश की है। डिजिटल शिक्षा, कौशल-आधारित पाठ्यक्रम, और मूल्य शिक्षा को बढ़ावा देने के प्रयास हो रहे हैं। फिर भी वास्तविकता यह है कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच भारी असमानता है। स्कूलों की अवस्थापना सुविधाएँ, शिक्षकों की संख्या, डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता आदि क्षेत्रों में भारी अंतर है।


            बहुत से राज्यों में शिक्षकों को समय पर वेतन नहीं मिलता। संविदा शिक्षकों की स्थिति और भी दयनीय है। उन्हें स्थायी नौकरी की गारंटी नहीं होती और वे न्यूनतम वेतन पर कार्य करते हैं। साथ ही
, महँगाई के इस दौर में वेतन संरचना अपर्याप्त सिद्ध हो रही है। शिक्षकों से पढ़ाने के अलावा अनेक गैर-शैक्षणिक कार्य करवाए जाते हैं, जैसे जनगणना, चुनाव ड्यूटी, मध्यान्ह भोजन की निगरानी आदि। इससे उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता और शिक्षण में समय प्रभावित होता है। नई तकनीक और शैक्षिक पद्धतियों के अनुरूप शिक्षकों का पुनः प्रशिक्षण (retraining) नहीं हो रहा है। बहुत से शिक्षक डिजिटल उपकरणों के प्रयोग में दक्ष नहीं हैं, जिससे ऑनलाइन शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

            पहले शिक्षक को 'गुरु' का दर्जा प्राप्त था, परंतु आज समाज में शिक्षकों का सम्मान धीरे-धीरे घट रहा है। विद्यार्थी, अभिभावक और प्रशासन तीनों से अपेक्षित सहयोग और सम्मान का अभाव है। विद्यालयों में कई बार शिक्षकों को ऐसे छात्रों से जूझना पड़ता है जो अनुशासनहीन होते हैं। इसके अलावा परीक्षा परिणाम, बोर्ड के दिशा-निर्देश और सरकारी लक्ष्य प्राप्ति का अतिरिक्त दबाव भी शिक्षक पर पड़ता है। अत्यधिक परीक्षा केंद्रित शिक्षा: सोचने-समझने की स्वतंत्रता की जगह अंक पाने की होड़ ने शिक्षा को रटंत प्रणाली बना दिया है। कई बार सरकार की योजनाएँ अच्छी होती हैं, पर उनका क्रियान्वयन कमजोर होता है।

            भारत की शिक्षा व्यवस्था और शिक्षक दोनों समाज के विकास के मूल स्तंभ हैं। यदि शिक्षक को उचित सम्मान, सुविधाएँ, और स्वतंत्रता दी जाए, तो वह अपने कर्तव्यों का निर्वहन अधिक प्रभावी ढंग से कर सकेगा। हमें यह समझना होगा कि एक सशक्त शिक्षक ही सशक्त राष्ट्र का निर्माता होता है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था की मजबूती का पहला कदम शिक्षकों की समस्याओं का समाधान ही होना चाहिए।

            शिक्षक किसी भी समाज की आत्मा होते हैं। वे न केवल ज्ञान का संचार करते हैं, बल्कि समाज की दिशा और दशा को भी निर्धारित करते हैं। शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह मानवता, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध कराने वाला माध्यम भी है। इस संदर्भ में शिक्षक की भूमिका एक युगनिर्माता की होती है, जिसका प्रभाव पीढ़ियों तक बना रहता है। प्राचीन भारतीय संस्कृति में शिक्षक को "गुरु" कहा गया है, जो अज्ञान रूपी अंधकार से मुक्ति दिलाने वाला होता है। एक शिक्षक समाज की बुनियाद मजबूत करता है। वह विद्यार्थियों को केवल किताबी ज्ञान नहीं देता, बल्कि उन्हें सोचने, समझने और समाज के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देता है। शिक्षक एक ऐसा दीपक है जो स्वयं जलकर दूसरों के जीवन को प्रकाशमय बनाता है।

             आज का समाज जिस नैतिक संकट से गुजर रहा है, उसमें शिक्षक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। वह विद्यार्थियों में सत्य, करुणा, अहिंसा, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा जैसे मूल्यों का विकास करता है। शिक्षक का कर्तव्य है कि वह अपने आचरण से नैतिकता का उदाहरण प्रस्तुत करे और विद्यार्थियों को भी उस मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करे।

            शिक्षक समाज में व्याप्त असमानताओंजैसे जातिवाद, लिंग भेद, आर्थिक विषमता आदिके विरुद्ध जागरूकता फैलाने वाला साधन बन सकता है। वह शिक्षा को समावेशी बनाकर विद्यार्थियों में समानता, सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों की भावना का विकास करता है। इससे समाज अधिक संतुलित और न्यायपूर्ण बनता है। एक शिक्षक की भूमिका केवल विद्यालय तक सीमित नहीं होती। वह समाज के व्यापक कार्योंजैसे महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण सुरक्षा, स्वच्छता अभियान, स्वास्थ्य जागरूकता आदिमें भी सक्रिय भाग ले सकता है। ऐसा करके शिक्षक समाज में एक आदर्श और प्रेरणास्रोत के रूप में स्थापित होता है। शिक्षक को बाल अधिकारों के प्रति भी जागरूक रहना चाहिए। उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके विद्यार्थियों को किसी प्रकार का शोषण या भेदभाव न सहना पड़े। बाल श्रम, बाल विवाह और लैंगिक असमानता जैसे मुद्दों पर शिक्षक की सजग दृष्टि और सक्रिय भूमिका समाज में बड़े परिवर्तन ला सकती है।

            शिक्षक विद्यार्थियों को उनके सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं से जोड़ने का कार्य करता है। वह भाषा, लोककला, त्योहारों, और ऐतिहासिक परंपराओं को सम्मान दिलाता है। इससे समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहता है और वैश्वीकरण की दौड़ में अपनी पहचान नहीं खोता। भारत एक लोकतांत्रिक देश है और इस व्यवस्था की रक्षा के लिए नागरिकों में लोकतांत्रिक मूल्यों की समझ होना आवश्यक है। शिक्षक विद्यार्थियों को समानता, स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और भाईचारे जैसे संविधानिक सिद्धांतों से परिचित कराता है और उन्हें व्यवहार में उतारने की प्रेरणा देता है। शिक्षक अपने विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता, निर्णय लेने की शक्ति, संवाद कौशल और समस्या समाधान की क्षमता का विकास करता है। यह गुण उन्हें भविष्य में समाज का नेतृत्व करने और उसमें सकारात्मक परिवर्तन लाने की दिशा में समर्थ बनाते हैं।

            शिक्षक का कार्य केवल पढ़ाना नहीं है, बल्कि समाज को जागरूक, संवेदनशील, नैतिक और सशक्त बनाना भी उसका दायित्व है। यदि शिक्षक अपने सामाजिक कर्तव्यों को निष्ठा, संवेदनशीलता और समर्पण के साथ निभाए, तो समाज न केवल शिक्षित होगा, बल्कि संस्कारित और समृद्ध भी बनेगा। ऐसे शिक्षक ही एक सशक्त राष्ट्र और समतामूलक समाज के वास्तविक निर्माता होते हैं। "एक शिक्षक की समाज में भूमिका किसी दीपक की तरह है, जो स्वयं जलता है और दूसरों के जीवन में उजाला करता है।"

            शिक्षक केवल ज्ञान का दाता नहीं होता, बल्कि वह समाज के निर्माण का प्रमुख स्तंभ होता है। उसका कर्तव्य न केवल विद्यार्थियों को पढ़ाना है, बल्कि उन्हें एक उत्तरदायी नागरिक बनाना भी है। एक अच्छा शिक्षक समाज में नैतिक मूल्यों, सहिष्णुता और समानता की भावना का बीजारोपण करता है। भारतीय संस्कृति में शिक्षक को "गुरु" कहा गया है, जो माता-पिता के बाद सबसे अधिक सम्मान का पात्र होता है। सामाजिक दृष्टि से शिक्षक वह दीपक है जो अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर समाज को प्रकाशमान करता है। उसके विचार, व्यवहार और कार्य समाज पर गहरा प्रभाव डालते हैं। आज के यांत्रिक और प्रतियोगितात्मक युग में नैतिक मूल्यों का ह्रास होता जा रहा है। शिक्षक का सामाजिक कर्तव्य है कि वह विद्यार्थियों को सत्य, अहिंसा, करुणा, और अनुशासन जैसे गुणों से परिचित कराए। एक शिक्षक की शिक्षा केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं होनी चाहिए। एक शिक्षक को समाज में व्याप्त असमानता, जातिवाद, लिंगभेद आदि के खिलाफ जागरूकता फैलानी चाहिए। उसका दायित्व है कि वह अपने विद्यार्थियों को समावेशी और न्यायप्रिय दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा दे ताकि वे सबके लिए समान अवसर के पक्षधर बनें।

            शिक्षकों को स्कूल की चारदीवारी से बाहर निकलकर ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण, स्वच्छता अभियान, पर्यावरण संरक्षण जैसे सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय भाग लेना चाहिए। इससे वे समाज में प्रेरक व्यक्तित्व के रूप में उभरते हैं। शिक्षक का सामाजिक कर्तव्य यह भी है कि वह बाल श्रम, बाल विवाह, लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर आवाज़ उठाए और विद्यार्थियों को उनके अधिकारों के प्रति सजग करे। वह बच्चों की आवाज़ बनकर उनके सर्वांगीण विकास के लिए प्रयत्न करे। शिक्षक स्थानीय और राष्ट्रीय संस्कृति, परंपरा तथा भाषा को जीवित रखने में सहायक होता है। वह विद्यार्थियों को उनकी सांस्कृतिक पहचान से जोड़ता है और विविधता में एकता की भावना को बल देता है, जिससे सामाजिक समरसता को बढ़ावा मिलता है।

            एक शिक्षक को विद्यार्थियों में लोकतंत्र, समानता, स्वतंत्रता, और धर्मनिरपेक्षता जैसे संविधानिक मूल्यों का विकास करना चाहिए। इससे विद्यार्थी न केवल अच्छे छात्र बनते हैं, बल्कि समाज के जागरूक नागरिक भी बनते हैं। शिक्षक समाज को ऐसे नेतृत्वकर्ताओं की नई पीढ़ी देता है जो राष्ट्रहित में सोचते हैं। वह विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता, संवाद कौशल, और निर्णय लेने की योग्यता विकसित करता है जिससे वे सामाजिक बदलाव के अग्रदूत बन सकें। इस प्रकार, शिक्षक का कार्य केवल विद्यालय में सीमित नहीं है। उसका व्यापक सामाजिक कर्तव्य है समाज में नैतिकता, संवेदनशीलता और विवेक को बनाए रखना। यदि शिक्षक अपने सामाजिक दायित्वों को पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से निभाए, तो न केवल शिक्षा व्यवस्था सशक्त होगी, बल्कि समाज भी स्वस्थ, समतामूलक और उन्नतिशील बनेगा।

 

संपर्क

डॉ. अनीश कुमार 


लेखक गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन करते हैं ।

जनसंदेश टाइम्स, सुबह सबेरे, जनवाणी, युवा शक्ति, अचूक संघर्ष समेत कई अखबारों में लगातार लेखन कार्य । इसके साथ ऑनलाइन पोर्टल यूथ की आवाज, जनपथ, दलित दस्तक आदि पर भी विभिन्न लेख प्रकाशित ।

इसके साथ द पर्सपेक्टिव अंतर्राष्ट्रीय जर्नल तथा हिन्दी विभाग, गुरु घासीदास (केंद्रीय) विश्वविद्यालय, बिलासपुर की संस्थागत त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका स्वनिम के सह-संपादक का निर्वहन ।  

ईमेल anishaditya52@gmail.com तथा मोबाइल नंबर 9198955188 है ।

 

 

Sunday, 28 February 2016

उच्च शिक्षा में संवर्धन में समस्याएँ

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