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Thursday, 30 August 2018

अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की सामाजिक स्थिति और मण्डल कमीशन : कल और आज

          दुनिया में आरक्षण (प्रतिनिधित्व) से बढ़कर ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनी, जिसने इतने कम समय में अहिंसक क्रान्ति के ज़रिये समाज के इतने बड़े तबके को गौरवपूर्ण व गरिमापूर्ण जीवन जीने में इससे ज़्यादा लाभ पहुँचाया हो । भारत में ये काम दुबारा मण्डल कमीशन के माध्यम से होने जा रहा था । प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने अनुच्छेद 340 के तहत नए पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की घोषणा की । आयोग की विज्ञप्ति 1 जनवरी, 1979 को जारी की गई, जिसकी रिपोर्ट 31 दिसंबर 1980 को दी जिसे राष्ट्रपति ने अनुमोदित किया । 30 अप्रैल 1982 में इसे सदन के पटल पर रखा गया, जो 10 वर्ष तक फिर ठंडे बस्ते में रहा । वी.पी. सिंह की सरकार ने 7 सितंबर 1990 को सरकारी नौकरियों में पिछड़ों के लिए 27% आरक्षण लागू करने की घोषणा की । सरकार की क़ुर्बानी देकर आने वाली पीढ़ियों की परवाह करने वाले जननेता वी.पी. सिंह जैसी शख़्सियतों के बारे में ही राजनीतिक चिंतक जे. एफ. क्लार्क कहते हैं कि “A politician thinks of the next election. A statesman, of the next generation” अर्थात् एक राजनीतिज्ञ अगले चुनाव के बारे में सोचता है, पर एक दूरदर्शी राजनेता अगली पीढ़ी के बारे में। इस परिभाषा में फिट बैठने वाले बहुत कम राजनेता मिलते हैं । वीपी सिंह ने साबित किया कि यदि दूरदृष्टि, सत्यनिष्ठा व इंटेग्रिटी हो, तो अल्पमत की गठबंधन सरकार भी समाजहित व देशहित में ऐतिहासिक व ज़रूरी फ़ैसले ले सकती है । जो काम उनके पहले के प्रधानमंत्री अपने पाँच साल के कार्यालय में भी नहीं कर पाये, उसे उन्होंने साल भर के अंदर कर दिखाया । इसी संदर्भ में भारत में आजादी के बाद सामाजिक न्याय के प्रणेता बी.एन.मंडल द्वारा राज्यसभा में सन 1969 में दिया गया भाषण याद आता है, ‘जनतंत्र में अगर कोई पार्टी या व्यक्ति यह समझे कि वह ही जब तक शासन में रहेगा, तब तक संसार में उजाला रहेगा, वह गया तो सारे संसार में अंधेरा हो जाएगा, इस ढंग की मनोवृत्ति रखने वाला, चाहे कोई व्यक्ति हो या पार्टी, वह देश को रसातल में पहुंचाएगा। हिंदुस्तान में (सत्ता) से चिपके रहने की एक आदत पड़ गयी है, मनोवृत्ति बन गई है । उसी ने देश के वातावरण को विषाक्त कर दिया है ।

          ओबीसी जातियाँ अपने इतिहास को गर्व करती हैं सिर्फ इसलिए कि उसका इतिहास ऐसे कई विभूतियों के महान कार्यों से भरी पड़ी हैं जो समाज के सर्वस्व न्योछावर कर दिये थे । शुरू से ही अतिपिछड़ा राज्य की श्रेणी में रहा बिहार राज्य के पहले यादव अर्थात ओबीसी मुख्यमंत्री के तौर पर बीपी मण्डल ने शपथ ली थी । उनके शपथ लेने के साथ ही बरौनी रिफायनरी में तेल का रिसाव गंगा में हो गया और उसमें आग लग गयी । इस प्रकरण को मुद्दा बनाकर बिहार विधानसभा में पंडित बिनोदानंद झा ने कहा कि शुद्र मुख्यमंत्री बना है तो गंगा में आग ही लगेगी । ये प्रकरण उस समय में काफी चर्चित था । सवर्ण तबका इसको ज़ोरशोर से मुद्दा बना दिया था ।

          भारत जैसे विशाल देश को आजादी मिलने के बाद समाज में व्यापक बदलाव की संभावनाओं के रूप में देखा जा रहा था । भारतीय समाज और राजनीति लगभग दोनों ही देश को बांटने में लगे हुए थे लिहाजा समाज को जाति, धर्म अथवा राजनीतिक बाहुबल को कम नहीं किया जा सका । इसका खामियाजा आज भी भारतीय समाज भुगतने को अभिशप्त है । आजादी मिलने के कुछ वर्षों बाद भारत में जनसंख्या के हिंसाब से भागीदारी सुनिश्चित करने की माग पुनः उठने लगी थी । इसके पीछे कारण यह था आजादी के बाद भारत की सम्पूर्ण सत्ता भारतीय नेताओं व समाज सुधारकों के हाथ में आ गई थी किन्तु उसके बाद भी समाज के सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व नहीं हो पा रहा था ।

          भारत को मुख्यतया कृषि प्रधान देश के रूप में जाना जाता है । लेकिन इसके पीछे यह कभी नहीं जानने की कोशिश की गई कि ये मुख्यतः कृषि पर आश्रित लोग किस समुदाय अथवा समाज से आते हैं । निश्चय ही ये लोग निचले तबके से आते हैं । वास्तव में भारत जाति-प्रधान और विभिन्न समुदायों और संप्रदायों में विभाजित एक गणतन्त्र है । यहाँ जाति सबसे अहम है । जो जिस जाति में पैदा हुआ वह उसी का होकर रह जाता है । डॉ. अंबेडकर इस संदर्भ में कहते हैं कि हिन्दू धर्म में जातियों की जड़े इतनी मजबूत हैं कि जो जिस जाति में एक बार पैदा हो गया वह उसी जाति में मरेगा चाहे वह कितना भी अच्छा कार्य क्यों न कर ले । यह एक ऐसा बहुमंजिला भवन है जिसमें एक तल से दूसरे तल तक जाने के लिए सीढ़ी ही नहीं है । इसमें जाति के आधार पर भारत का वर्गीकरण करें तो ओबीसी अर्थात अन्य पिछड़ा वर्ग में सम्मिलित जातियाँ सबसे ज्यादा हैं ।

          भारतीय समाज और राजनीति को मुख्यतया दो भागों में विभाजित करके इसके स्थितियों का अध्ययन किया जा सकता है । पहला मण्डल कमीशन के पहले का भारतदूसरा मण्डल कमीशन के बाद का भारत। इन दोनों कालखण्डों को ध्यान में रखकर भारतीय समाज और राजनीति में आए बदलाओं का अध्ययन करने पर हमें भारत की असली तस्वीर दिखाई देती है । यह आश्चर्यजनक है कि मण्डल कमीशन को बहुत कम लोगों ने पढ़ा व समझा है । इसका मुख्य कारण यह है कि इसका प्रचार-प्रसार करना भी सरकार ने उचित नहीं समझा लिहाजा यह फाइलों और दफ्तरों तक सिमटकर रह गई । इसका सबसे कारण इसके अनुवाद को लेकर थी । यह मुख्यतया अँग्रेजी में था जिसका अनुवाद अभी तक नहीं हुआ था ।

          संविधान लागू होने के समय भारत कि ओबीसी जातियों को कोई आरक्षण नहीं दिया गया । (यहाँ आरक्षण का तात्पर्य प्रतिनिधित्वसे है । कुछ लोग आरक्षण शब्द की गलत व्याख्या करके उसका समाज के बीच भ्रम पैदा करते हैं ।) आजादी के बाद भी सत्ता सिर्फ सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक रूप से सशक्त समुदाय के पास रही । दलितों व पिछड़े वर्गों की स्थिति में कोई सुधार नहीं दिख रही थी । अपना दल के संस्थापक का एक कथन है अभी सिर्फ अंग्रेजों से आजादी मिली है । समान भागीदारी और स्वाभिमान के लिए कमेरा समाज दूसरी आजादी कि जंग के लिए मैदान में आए । उठो शोषितों, उठो कमेरों । राजसत्ता पर कब्जा करो ।

          आजादी के समय ज्यादातर ज़मीनें जमींदारों के पास थी और ज्यादातर जमींदार उंची जाति से थे । जिसके पास धन होता है, वो आसानी से आगे बढ़ जाता है । ऐसा ही हो रहा था । दलित समुदाय के लोग पिछड़ रहे थे । भारत में जमींदारी प्रथा भी एक बहुत बड़ी समस्या के रूप में सामने आई है । इससे समाज के बीच में असमानता की खाईं को बढ़ाने का काम किया है । भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 29 जनवरी, 1953 को काका कालेलकर की अध्यक्षता में पिछड़ा वर्ग आयोगका गठन किया । उनकी अगुवाई में लगभग दो साल के बाद आयोग ने 30 मार्च, 1955 को अपनी रिपोर्ट भारत सरकार को सौंपी । इस रिपोर्ट का कुछ खास असर नहीं हुआ । क्योंकि तत्कालीन नेहरू सरकार ने इस रिपोर्ट पर संसद में चर्चा करने से ही मना कर दिया और इसे खारिच कर दिया । काका कालेलकर आयोग ने अपने सिफ़ारिशों में उन सभी पक्षों को नहीं ला पाई जो तत्कालीन समय और भविष्य में एक समतामूलक समाज निर्माण के लिए आवश्यक था ।

          इन सभी कमी को पूरा करने के लिए तत्कालीन मोरार जी देसाई सरकार ने अपने ओबीसी सांसद बिंदेश्वरी प्रसाद मण्डल (बी.पी.मण्डल) की अगुवाई में मण्डल आयोग का गठन किया । मण्डल आयोग ने अपने सदस्यों के साथ ओबीसी जातियों को चिन्हित करने के लिए पूरे देश का दौरा आरंभ किया । लेकिन बड़ी बिडम्बना यह रही की मण्डल कमीशन तब पूर्ण हुई जब मोरार जी देसाई सरकार गिर चुकी थी । 

मंडल आयोग की कुछ सिफ़ारिशें :

          मंडल आयोग के रिपोर्ट में पिछडे़ वर्गों के लोगों के लिए सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की बात की गई । भारत में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को पहले से 22.5 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा था । इसी कारण तत्कालीन इंदिरा गांधी की सरकार इस सिफारिश को लागू करने से बचती रही । मंडल आयोग की सिफारिश को लागू करने का मतलब था 49.5 प्रतिशत सीटें आरक्षित कर देना । लेकिन इंदिरा गांधी सरकार इसे लागू नहीं कर सकी ।

          सरकारी नौकरियों में आरक्षण के अलावा मंडल आयोग की अन्य सिफारिश भी थी । जो मण्डल कमीशन की प्रमुख सिफ़ारिशों में शामिल थी । मुख्य सिफ़ारिश कुछ निम्न हैं -

·       जमींदारी प्रथा को खत्म  करने के लिए भूमि सुधार कानून लागू किया जाये क्योंकि पिछड़े वर्गों का सबसे बड़ा दुश्मन जमींदारी प्रथा थी ।

·       सरकार द्वारा अनुबंधित जमीन को न केवल ST/ST को दिया जाये बल्कि OBC को भी इसमें शामिल किया जाये ।

·       केंद्र और राज्य सरकारों में ओबीसी के हितों की सुरक्षा के लिए अलग मंत्रालय/विभाग बनाये जाये ।

·       केंद्र और राज्य सरकारों के अधीन चलने वाली वैज्ञानिक, तकनीकी तथा प्रोफेशनल शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए ओबीसी वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए 27% आरक्षण लागू किया जाये । जैसे अनुसूचित जाति और जनजातियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में 22.5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है ।

·       समाज की मुख्य धारा से पीछे छूट गई आबादी के सांस्कृतिक उन्नयन के लिए पिछड़े वर्गों की सघन आबादी वाले इलाकों में शिक्षा की विशेष व्यवस्था होनी चाहिए । इसमें व्यावसायिक शिक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए । तकनीकी और व्यावसायिक संस्थानों में आरक्षण कोटे से आए छात्रों के लिए कोचिंग की विशेष व्यवस्था की जाए । ओबीसी की आबादी वाले क्षेत्रों में वयस्क शिक्षा केंद्र तथा पिछड़ें वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए आवासीय विद्यालय खोले जाए वहीं ओबीसी छात्रों को रोजगारपरक शिक्षा दी जाये ।

·       ग्रामीण कामगारों के कौशल को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजना चला कर उन्हें रियायती दरों पर ऋण मुहैया कराना ज़रूरी है । औद्योगिक और व्यावसायिक कारोबार में पिछड़े वर्गों की भागीदारी बढ़ाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा वित्तीय और तकनीकी संस्थानों का नेटवर्क विकसित किया जाए ।

·       आयोग ने कहा कि समाज का पिछड़ा तबका गुजर बसर करने के लिए धनी किसानों के ऊपर निर्भर है क्योंकि इस वर्ग के पास खेती के लिए बड़े भूखंड नहीं है । इसलिए देश भर में क्राँतिकारी भूमि सुधार लागू करने की ज़रूरत है ।

·       पिछड़े वर्गों के लिए कल्याणकारी कार्यक्रम चलाने के वास्ते राज्यों को केंद्रीय सहायता की ज़रूरत है ।

          भारतीय समाज को दिशा देने कार्य आजादी के पहले डॉ. बी.आर.अंबेडकर द्वारा किया गया था वहीं आजादी के बाद ये दूसरा महत्वपूर्ण कार्य बी.पी. मण्डल के द्वारा होने जा रहा था । इसी के साथ मान्यवर कांशीराम के नेतृत्व में बहुजन आंदोलन भी जोर पकड़ रहा था । उस समय एक नारा भी अपने चरम पर था ब्राह्मणवाद का फूटा कमंडल, जय भीम मण्डल जय भीम मण्डल। ये नारा ओबीसी और दलितों को एक साथ आने को प्रेरित कर रहा था । लम्बे समय तक पिछड़ों का क़ानूनी अधिकार समाजवादियों के नारों में सोशलिस्ट पार्टी बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठगूंजता रहा । ये वो दौर था जब मण्डल कमीशन अपने सिफ़ारिशों को सरकार को सौंप दिया था । लेकिन सरकार ने इसे लागू करने में हिला-हवाली कर रही था । इसके रिपोर्ट को सौंपे जाने के साथ समर्थन और विरोध दोनों में आंदोलन शुरू हो गए थे । बी.पी.मण्डल अपने गहन अध्ययन व पड़ताल के द्वारा ओबीसी जतियों की असली समस्याओं को पता लगाकर उसे अपने सिफ़ारिशों में शामिल किया । मण्डल कमीशन की मुख्य सफारिशों को करने में ही सरकार के पसीने छूट रहे थे ।

          मंडल आयोग ने पिछड़ी जातियों, वर्गों के निर्धारण के लिए सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक मानकों के आधार पर 11 सूचकांक तय किए थे -

सामाजिक स्थिति :

·       वैसी जाति या वर्ग जिन्हें अन्य जाति या वर्गों द्वारा सामाजिक रूप से पिछड़ा समझा जाता है ।

·       वैसी जाति या वर्ग जो आजीविका के लिए मुख्य रूप से शारीरिक श्रम पर निर्भर है ।

·       वैसी जातियाँ या तबका जिनमें 17 साल से कम आयु की महिलाओं का विवाह दर ग्रामीण इलाकों में राज्य औसत से 25 प्रतिशत और शहरी इलाकों में दस प्रतिशत अधिक है और इसी आयु वर्ग में पुरुषों का विवाह दर ग्रामीण इलाकों में दस प्रतिशत और शहरी क्षेत्र में पाँच प्रतिशत ज्यादा है ।

शैक्षिक आधार :

·       वैसी जातियाँ या वर्ग जिनमें पाँच से 15 साल की आयु वर्ग में स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की संख्या राज्य औसत से कम से कम 25 प्रतिशत अधिक हो ।

·       इसी आयु वर्ग में जिन जातियों या वर्गों के बच्चों के स्कूल छोड़ने का प्रतिशत राज्य औसत से कम से कम 25 प्रतिशत है ।

·       वैसी जातियाँ, वर्गों जिनमें मैट्रिक परीक्षा पास करने वाले छात्र-छात्राओं का प्रतिशत राज्य औसत से 25 प्रतिशत कम है ।

आर्थिक आधार :

·       वैसी जातियाँ, वर्गों जिनमें औसत पारिवारिक संपत्ति मूल्य राज्य औसत से 25 प्रतिशत कम है ।

·       ऐसी जातियाँ, वर्ग जिनमें कच्चे घरों में रहने वालों की संख्या राज्य औसत से कम से कम 25 प्रतिशत कम है ।

·       ऐसे इलाकों में रह रही जातियाँ, वर्ग जिनमें 50 फीसदी परिवारों को पेयजल के लिए आधा किलोमीटर से दूर जाना पड़ता है ।

          आज की स्थिति थोड़ा और दयनीय है । आजादी के बाद समाज निर्माण की सबसे बड़ी पहल में शामिल मण्डल कमीशन राजनीतिक दावपेंच में फंस कर रह गई है । जिसकी संख्या सबसे ज्यादा है वही आज हाशिये पर जीने को अभिशप्त है । मण्डल कमीशन के आने के बाद कई ओबीसी नेताओं का उदय हुआ जिनमें कुछ तो अपने मिशन के प्रति सफल भी हुए वहीं कुछ सत्ता के हाथों बिक गए । नतीजा ये है कि आज तक मण्डल कमीशन कि सिर्फ तीन सिफ़ारिशें ही लागू हो पाई है । बाकी अमल में नहीं पाया । वर्तमान में मोदी सरकार जो अपने को पिछड़ी जाति कि बताते हैं वही आज इसके गला घोटने के प्रयास में लगे हुए हैं ।

          वास्तव में मंडल कमीशन कि सिर्फ कुछ ही सफारिशों के लागू होने से ही सौ प्रतिशत भारत जाग गया । उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह के बाद कोई भी अगड़ी जाती का व्यक्ति मुख्यमंत्री नहीं बना । राष्ट्रीय स्तर पर उमा भारती जैसे सरीखे नेता भाजपा में उभरकर आए । सन 1990 से आज तक बिहार में भी कोई भी अगड़ी जाती का व्यक्ति मुख्यमंत्री नहीं बना । मध्यप्रदेश, राजस्थान में भी क्रमशः शिवराज सिंह चौहान और अशोक सिंह गहलोत सत्ता में आए ।

          वास्तविक स्थिति इससे इतर थी । ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण देने के साथ ही उसमें क्रीमीलेयर लगाकर उसे दो भागों में बाँट दिया गया । क्रीमीलेयर ओबीसी के ऊपर आरक्षण को जिंदा लाश बना देने के समान था । ये बात सौ प्रतिशत सत्य है कि मंडल कमीशन के बाद भारत की राजनीती में एक टर्निंग पॉइंट आया । जिससे राजनीति और समाज की दशा तथा दिशा दोनों ही बदल गई । आरक्षण की मांग कर रहे हैं वो लोग और जो नहीं कर रहे हैं वो लोग, जिन्हें ये समझना चाहिए कि जब तक इस देश में कास्ट सिस्टम की लड़ाई चल रही है तब ऐसा मामला तूल पकड़ता रहेगा। शायद कास्ट सिस्टम ख़त्म हो जाये तो इस देश में जाति अंतर का भाव ख़त्म हो जायेगा ।

          आज स्थिति और मण्डल कमीशन कि सिफ़ारिशों को देखते हुए सरकार उसे पुनः लागू करने की नाकाम कोशिश में लगी हुई है । अन्य पिछड़ी जातियों को मंडल कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर दो दशक पहले सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण दिया गया । हालांकि हाल ही में आरटीआई के जरिए केन्द्र से जानकारी मिली कि 1 जनवरी 2015 तक केन्द्रीय कर्मचारियों में महज 12 फीसदी लोग अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) से आते हैं । आंकड़ों के मुताबिक केन्द्र सरकार ने ग्रुप ए, बी, सी और डी श्रेणी में कुल मिलाकर 79,483 पद हैं और इनमें महज 9,040 कर्मचारी अन्य पिछड़ी जातियों से आते है । वहीं केन्द्र सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग के आंकड़ों के मुताबिक इसके मंत्रालय में 12.91 फीसदी अनुसूचित जाति, 4 फीसदी जनजाति और 6.7 फीसदी ओबीसी कर्मचारी हैं जिन्हें मंडल के तहत आरक्षण का लाभ मिला है । मंत्रालय में कुल कर्मचारियों की संख्या 6,879 है ।

          मण्डल कमीशन की सिफ़ारिशें राष्ट्र निर्माण की एक महत्वाकांछी सपनों के समान थी । जिसमें भारत सम्पूर्ण तस्वीर बदलने की शक्ति थी । यदि प्रारम्भ में ही पूरी सिफ़ारिशों को लागू कर दिया गया होता आज भारत की तस्वीर इतनी भयावह नहीं होती । सामाजिक व राजनीतिक रूप से सशक्त समाज ही एक नए और दृढ़ राष्ट्र का निर्माण करता है । सत्ता में स्थापित सरकारें अपने निजी स्वार्थ के लिए मण्डल कमीशन का वोट बैंक मजबूत करने के लिए भी प्रयोग करती रही हैं और सफल भी हो रही हैं । एक तरफ आरक्षण का विरोध वही दूसरी तरफ उन्हीं ओबीसी जातियों को हिन्दू के नाम पर छद्म रूप से संगठित करने की कोशिश भारतीय समाज में असमानता की खाईं को और मजबूत कर रहा है ।

          ओबीसी जातियाँ अपने आज अपने अस्तित्व को भूलने लगी हैं । मण्डल कमीशन उनमें ये अलख जगाने का कार्य कर रहा था । मण्डल कमीशन को पढ़ते समय मान्यवर कांशीराम जी के योगदान को कुछ लोग भुला देते हैं । जिस समय सिफ़ारिशें लागू हो रही थी उस समय मान्यवर कांशीराम पूरे ज़ोर-शोर से मण्डल कमीशन को लागू करवाने में अपनी पूरी ताकत लगा दी थी । जगह जगह संगोष्ठियाँ करके मण्डल कमीशन के बारें में लोगों को जागरूक कर रहे थे ।

          तामिलनाडू के आरटीआई कार्यकर्ता मुरलीधरन जी ने केंद्र सरकार के लगभग सभी विभागों से जानकारी मांगी थी और वह जानकारी 27 दिसंबर 2015 को टाइम्स ऑफ इंडियाने पहले पन्ने पर छापी । इस जानकारी के अनुसार मंडल आयोग की अनुशंसायें लागू होने के बाद के 25 वर्षों में ओबीसी के हिस्से में मात्र 12 प्रतिशत नौकरियां आई हैं । यानी जिस ओबीसी की जनसंख्या 52 प्रतिशत से भी अधिक है, उन्हें सिर्फ 27 प्रतिशत आरक्षण और उसमें से भी उसे सिर्फ 12 प्रतिशत ही प्राप्त होने देना साजिश ही तो है । कालांतर में यह स्थिति और भवायव ही होती जा रही है । नौकरियों व अन्य क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व धीरे-धीरे लगभग समाप्त हो रहा है ।

          बी.पी. मंडल ने सामाजिक न्याय के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है वह पिछड़े समाज के आखिरी पायदान पर रहने वाले व्यक्ति के बारे में सोचते थे । बी.पी. मंडल की देन है कि आज पिछड़ा और दलित को सामाजिक न्याय मिल पाया है । पिछड़े वर्ग के मामले में आज डॉ. भीमराव अंबेडकर कहीं पीछे रह गए हैं, जिन्होंने पिछड़ों की समृद्धि का सपना तो देखा था, लेकिन इस रूप में नहीं जैसा आज है । यह बी.पी. मण्डल की देन है । अतिपिछड़े अपने उन साथियों की ज़्यादतियों का शिकार हैं जो सिर्फ नाम के पिछड़े रह गए हैं । सामाजिक और आर्थिक रूप से वे अगड़ी जातियों से कहीं आगे हैं ।

           मण्डल कमीशन के लागू होने के बाद ओबीसी की सामाजिक व राजनीतिक स्थितियों में कमोबेश सुधार हुआ । आर्थिक क्षेत्र में यह समाज सशक्त होने लगा । जमींदारी प्रथा को हटाकर चकबंदी का कानून लाये जाने से निचले तबके ऐसे वर्गों का फायदा हुआ जो पूर्णतः भूमिहीन थे । विगत कुछ वर्षों से ओबीसी समुदाय अपने हक और अधिकार के लिए लड़ाई तेज कर दी है । जगह जगह जनसभाएं करके मण्डल कमीशन की पूरी रिपोर्ट को लागू करवाने पर भारत सरकार पर दबाव कर रही है । वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र पी एस ने मण्डल कमीशन की पूरी रिपोर्ट का हिन्दी अनुवाद मण्डल कमीशन : राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी पहलशीर्षक से करके सामाजिक न्याय के क्षेत्र में क्रांतिकारी काम किया है । इसे अब हिन्दी में आसानी से पढ़ा जा सकता है । धीरे-धीरे ओबीसी समुदाय अपने अधिकारों को समझ रही है । बी.पी. मण्डल के योगदान को अब भुलाया नहीं जा सकता । इनके नाम पर सामाजिक न्याय दिवस घोषित करके सरकारी छुट्टी की भी मांग चल पड़ी है ।                     । । ।  जय मण्डल, जय भीम, जय कांशीराम, जय भारत   । । ।

Tuesday, 5 June 2018

आदिवासी नेता गोविन्द गुरु का जीवन परिचय


वागड़ क्षेत्र डूंगरपुर बाँसवाड़ा में गोविन्द गुरु ने भीलों के सामाजिक एवं नैतिक उत्थान के लिए अथक प्रयास किये. वे महान समाज सुधारक थे. गोविन्द गुरु का जन्म 20 दिसम्बर 1858 डूंगरपुर राज्य के बसियाँ गाँव में हुआ था. 1880 में स्वामी दयानन्द सरस्वती जब उदयपुर आए, गोविन्द गुरु उनके विचारों से प्रभावित हुए और उन्होंने भील समाज में सुधार एवं जन जागृति के लिए महत्वपूर्ण कार्य शुरू किया.
मद्यपान एवं माँस सेवन त्याग किया. उन्होंने बनवासी बन्धुओं के मध्य एक बड़ा स्वाधीनता आंदोलन शुरू किया. यह आंदोलन इतना प्रभावशाली था. कि इससे अंग्रेज, राजे महाराजे, जंगलों में फैले हुए विदेशी पादरी घबरा गये. भीलों को सामाजिक दृष्टि से संगठित करने एवं मुख्य धारा में लाने के लिए गोविन्द गुरु ने सम्प सभा की स्थापना की.

इसके साथ ही भीलों का हिन्दू धर्म के दायरे में रखने के लिए भगत पन्थ की स्थापना की. गोविन्द गुरु ने सम्प सभा के माध्यम से इडर, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा व गुजरात के भीलों में सामाजिक जागृति का संचार किया. इससे प्रशासन सशंकित हो गया और भीलों को भगत पंथ छोड़ने के लिए दवाब बनाया जाने लगा.
तत्कालीन शासन ने भीलों का कृषि कार्य एवं बेगार करने के लिए विवश किया जाने लगा और जंगल में उनके अधिकारों से वंचित किया गया तो वे आंदोलन करने के लिए विवश हो गये. गोविन्द गुरु ने शिक्षा का प्रसार एवं सामाजिक सुधार का संदेश दिया. अंग्रेजो को यह आंशका थी. कि इन सुधारों व संगठन का मुख्य उद्देश्य भील राज्य की स्थापना करना था. अप्रैल 1913 में डूंगरपुर राज्य द्वारा गोविन्द गुरु को गिरफ्तार किया गया, फिर उन्हें रिहा कर दिया गया.
रिहा होने के बाद गोविन्द गुरु मानगढ़ पहाड़ी पर चले गये जो बाँसवाड़ा राज्य की सीमा पर स्थित है. अक्टूबर 1913 में उसने भीलों को पहाड़ी पर पहुचने का संदेश भिजवाया. भील भारी संख्या में हथियार लेकर उपस्थित हो गये. बाँसवाड़ा राज्य के सिपाहियों की पिटाई कर दी, पहाड़ी पर हमला कर दिया, मानगढ़ पहाड़ी पर भीलों का पहला सम्मेलन हुआ. आशिवन शुक्ल पूर्णिमा को प्रतिवर्ष सम्प सभा का अधिवेशन होने लगा.
इसी क्रम में 17 नवम्बर 1913 को सम्प सभा का सम्मेलन मानगढ़ पहाड़ी पर हुआ, बड़ी संख्या में लोग उपस्थित हुए. बाँसवाड़ा, इडर, डूंगरपुर की सरकार चौकन्नी हो गई. LGG की स्वीकृति के साथ ही 6 से 10 नवंबर के मध्य मेवाड़ भील कोर को दो कम्पनिया, बेलेजली राइफल की एक कम्पनी तथा जाट रेजिमेंट पहाड़ी पर पहुच गई. जाते ही गोलिया बरसानी शुरू कर दी.
सरकारी आंकड़ो के अनुसार मानगढ़ हत्याकांड में 1500 भील मारे गये. भगत आंदोलन कुचल दिया गया. गोविन्द गुरु को 10 वर्ष का कारावास हुआ. यदपि इसमे भीलों की बहुत बड़ी राजनैतिक महत्वकांक्षा नही थी. लेकिन अंग्रेजों और शासकों ने इसे एक चुनौती माना, उन्हें बहाना मिल गया और निर्दोष लोगों को गोलियों से भुन दिया गया.
मानगढ़ हत्याकांड की यह घटना राजस्थान इतिहास में जलियावाला बाग़ हत्याकांड के नाम से जानी जाती है. गोविन्द गुरु अहिंसात्मक आंदोलन के पक्षधर थे इस आंदोलन के भीलों के साथ साथ समाज के अन्य वर्गो में भी जागृति उत्पन्न हुई, इसके बाद भीलों ने शासकीय अत्याचार एवं अनावश्यक करों के विरुद्ध आवाज उठाना प्रारम्भ कर दिया. अंग्रेजों व रियासत दोनों को इसका सामना करना पड़ा.

साभार http://hihindi.com/%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6-%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81-introduction-the-life-of-govind-guru/

Wednesday, 2 May 2018

बाबासाहेब ने संविधान द्वारा महिलाओं को वो सारे अधिकार दिए, जो मनुस्मृति ने नकारे थे


14 अप्रैल पूरे देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में बड़े ही उत्साह व जुनून से मनाया जाता है। इस वर्ष बाबा साहब की 127 वीं जयंती मनाई जा रही है। दक्षिण भारत से लेकर उत्तर भारत तक और पश्चिम भारत से पूर्वी भारत में डॉ. अंबेडकर जयंती की रौनक देखते ही बनती है। डॉ. अम्बेडकर के कार्यों व चिंतन के बारे में बात करें तो अक्सर बात दलित वर्गों तक आकर, यहाँ तक कि बात आरक्षण पर आ कर रुक जाती है। आज़ाद भारत में डॉ. अम्बेडकर को दलितों का मसीहा कहा जाता है। जबकि डॉ. अम्बेडकर के समस्त कार्यो का मूल्यांकन करें तो हम पाएंगे कि वे एक कुशल अर्थशास्त्री, समाजवैज्ञानिक, कानून विशेषज्ञ, मजदूर नेता थे। पत्रकारिता में प्रखर विद्वान् और महिलाओ के अधिकार के चैम्पियन थे। उनके पहले महिलाओं से संबन्धित उन तमाम अधिकार उन्हें प्राप्त नहीं थे जो आज कानून के दम पर मिल रहा है। इसका श्रेय उन्हीं को जाता है।

 

पूरा आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिये गए लिंक को फालों करें ...

http://www.hastakshep.com/hindiopinion/dr-ambedkar-by-anish-kumar-17125






Thursday, 8 March 2018

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2018

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मायने
आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है तो इस अवसर पर पूरे विश्व में इसे सेलिब्रेट किया जा रहा है। अभी हाल में कुछ घटनाओं पर नजर डाले तो महिलाओं की सुरक्षा और उनकी प्रतिनिधित्व पर बड़ा सवाल खड़ा होता है। उनकी भागीदारी व सहमति न के बराबर आज भी दिखती है। भारत के स्तर पर देखे तो ये स्थिति दलित व पिछड़े समुदाय की महिलाओं को लेकर ज्यादा खराब है। अगर शिक्षा की बात करें तो ये स्थिति इसलिए खराब है क्योंकि ज्यादातर महिलाओं व महिला संगठनों को अपनी नायिकाओं का नाम ही नहीं पता होता है। और पता भी है तो वे उसे सामने नहीं लाना चाहती। अक्सर कहा जाता है कि महिलाएं सूद्र होती हैं किन्तु जब किसी बड़े मंच से प्रतिनिधित्व व सहभागिता की बात आती है तो वहाँ "जातिवाद" का जिन्न तुरंत सामने आ जाता है। यह जिन्न सभी जागरूकता व शिक्षा के आगे निकल जाता है। दलित महिलाओं की स्थिति इन्हीं वजहों से खस्ताहाल है। सावित्री बाई फुले, फातिमा शेख, फूलन देवी, उदा देवी पासी, आदि ऐसी बहुत सी बहुजन नायिकाएं हैं जो महिलाओं के हक और न्याय के लिए संघर्षरत थी। लेकिन आज बिडम्बना यह है कि आज के दिन भी मंच से इन सभी नायिकाओं का नाम लेने से महिला संगठन बचती हैं। आदिवासी चिंतक  डॉ सुनील कुमार सुमन अपने फेसबुक वॉल पर भी ये चिंता व्यक्त करते हैं।
सभी को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं
जोहार

Sunday, 4 February 2018

दलित-क्रांति के कवि अण्णा भाऊ साठे


         दीपक प्रकाश देता है. मगर, इसके लिए उसे तिल-तिल जल कर मरना होता है; इसे बहुत कम लोग जानते हैं.यही बात महाराष्ट्र के दलित शाहिर अन्ना भाऊ साठे पर लागु होती है.अण्णाभाऊ पूरा नाम तुकाराम भाऊ साठे था. आपका जन्म 1 अग. 1920 को सांगली जिले के वाटेगाँव में हुआ था.इनके पिता का नाम भाऊराव और माता का नाम वालूबाई था.आपका विवाह जयवंती बाई से हुआ था. शुरू में आप बम्बई के घाटकोपर के चिराग नगर की एक चाल में रहा करते थे.
        आपका जन्म मांग जाति में हुआ था जिसे अंग्रेजों ने अपराधी जाति घोषित कर रखा था.हिन्दू वर्णाश्रम धर्म में मांग जाति के लोगों का कार्य गाँव की पहरेदारी करना होता है.उनके घरों की दीवारों पर तलवारे लटकती रहती है मगर, घर में खाने को नहीं रहता. अण्णा भाऊ भी इससे अलग नहीं थे.
           देश में उस समय अंग्रेजी राज्य के खिलाफ जबर्दस्त आन्दोलन हो रहे थे.अण्णाभाऊ ने सन 1947  के दौरान नाना पाटिल आदि क्रांतिकारियों के साथ अंग्रेजों के विरुध्द बगावत में डट कर भाग लिया था.उस समय अण्णाभाऊ कम्युनिस्ट पार्टी के साथ जुड़े थे.उनके जिम्मे पार्टी का प्रचार कार्य था.अण्णाभाऊ दलित-शोषितों के बीच एक लोकप्रिय जन-कवि के रूप में प्रसिध्द थे.वे विनोदी स्वभाव के थे.वे अपनी क्रांतिकारी शाहिरी के बीच जब विनोद की बातें करते तो पब्लिक में हँसी के फव्वारे छूटते थे.वे एक बड़े ही दिलचस्प कलमकार थे.उन्होंने अपनी कविता,कहानी और नाटकों से दलित-शोषितों को उनके अस्मिता की जुबान दी थी.
       उन्होंने 'लोकयुध्द' के साप्ताहिक रिपोर्टर के तौर पर भी काम किया था.अण्णाभाऊ के क्रन्तिकारी काव्य  की शोहरत रूस,जर्मनी,पोलेंड आदि देशो तक पहुंची थी.उनकी किताबों के वहां अनुवाद वहां हुए थे.इन मुल्कों में वे शोषितों के साहित्यकार के रूप में पहिचाने जाने लगे थे.उन्हें इन देशों से निमंत्रण आते थे.सन 1948  में उन्हें विश्व साहित्य परिषद् का निमंत्रण मिला था. मगर, भारत सरकार ने उन्हें इजाजत नहीं दी थी.
              डा. बाबा साहेब आम्बेडकर के अण्णाभाऊ बड़े प्रशंक थे.बाबा साहेब के निधन पर दलित-शोषितों के लिए अण्णाभाऊ ने शाहिरी की थी -
                          "जग बदल घालूनी घाव-सांगुनी गेले मला भीमराव.
                           गुलामगिरिच्या  चिखलात- रुतूनी  बसला  एरावत.
                           अंग   झाडुनी   निघ   बाहेरी-  घे   बिनीवरती  घाव." *
       नि:संदेह, डा. आम्बेडकर के कार्यों ने दलित समाज के लेखक, कवि और नाटककारों में सामाजिक जागरूकता के लिए काम करने की प्रेरणा दी थी.सन 1935 में जब उन्होंने धर्मान्तरण करने का एलान किया तो सामाजिक चेतना के इन कलमदारों ने उनके पैगाम को दलित झोपड़ियों तक पहुँचाया.मांगरुलकर,तातुबा,गणू नेर्लेकर,पेठकर,बाबाजी मलवनकर,नाना गिरजकर, अप्पा,यलप्पा,कराळकर और गुंड्या आदी जन-कवियों को दलित-क्रांति  का इतिहास लंबे अर्से तक याद रखेगा.सन 1959 में अण्णा भाऊ ने अपनी मशहूर किताब 'फकीरा' लिखी.यह ग्रन्थ सन 1910 में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत करने वाले मांग समाज के क्रांतिवीर फकीरा के संघर्ष पर था. इस पुस्तक को अण्णाभाऊ ने डा. आम्बेडकर को समर्पित किया था.
      अण्णाभाऊ वास्तव में, कलमकार थे.वे सिर्फ कवि ही नहीं थे,उन्होंने अपनी बात को लोगों तक पहुँचाने के लिए कई विधाओं का सहारा लिया था.उन्होंने 40  के ऊपर उपन्यास लिखे. 300 के आस-पास कहानियां  लिखी.उनके कई काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए.उन्होंने कई नाटक लिखे.यहाँ तक कि उन्होंने कई चित्र-पट कथाएं भी लिखी.उनकी रचनाओं का अनुवाद अंग्रेजी,फ्रेंच आदि कई विदेशी भाषाओँ में हुआ.इसके अलावा  हिंदी,गुजराती,बंगाली,तमिल,मलियाली,उड़िया आदि देशी भाषों में भी हुआ.अण्णाभाऊ को 'इंडो-सोवियत कल्चर सोसायटी' की और से  रूस आने का निमंत्रण मिला था.इस यात्रा का जिक्र उन्होंने अपने सफरनामा 'माझा रशियाचा प्रवास' में किया है.
         अण्णाभाऊ के कलम की शोहरत महाराष्ट्र के सिने-जगत में तो थी ही, हिंदी सिने-जगत भी इससे अछूता नहीं था.उनकी 10 से अधिक कहानियों पर फिल्मे बनी जिसमे 'फकीरा' भी है. याद रहे, अण्णाभाऊ ने इस फिल्म की न सिर्फ पट-कथा लिखी थी वरन, फिल्म के एक किरदार ' सावळया' का रोल भी किया था.
         मगर, ये सब अण्णाभाऊ साठे की जिंदगी की शोहरत का एक हिस्सा था. असल में ये कलम की शोहरत कभी उनके घर की माली हालत की हिस्सेदार नहीं बनी.वे गरीब परिस्थिति के तो थे ही,उनके दलित-कलमकार और जाति-गत स्वाभिमान ने कभी उन्हें अपनी जमीन से ऊपर उठने नहीं दिया. दूसरे, उंच-नीच की घृणा पर आधारित हिन्दू समाज-व्यवस्था में दलित कवि या लेखक का जीना बड़ा दूभर होता है.
         एक बार, उनके एक मित्र ने उनसे कहा कि अण्णा भाऊ, आपकी कई किताबों का अनुवाद विदेशों में हुआ है.मास्को में आपके अनुवादित किताबों के रकम की भारी रायल्टी वहां इकठ्ठा हुई होगी. आप उसे हासिल करके बड़ा-सा बंगला क्यों नहीं बनवा लेते और फिर वहां लिखने का कार्य जारी रख सकते हैं ? इस पर, पता है अण्णा भाऊ ने क्या जवाब दिया था ? उन्होंने कहा था कि बंगले में मजे से आराम कुर्सी पर बैठ कर लिखने से सिर्फ कल्पनाएँ सूझ सकती है.लेकिन, गरीबी का दर्द और पीड़ा भूखे पेट रह कर ही महसूस की जा सकती है ! उनके ये ख्याति-प्राप्त मित्र कलाकार विठ्ठलराव उपम थे. 
         अण्णाभाऊ की ख्याति के साथ-साथ उनके दुश्मन भी पैदा हुए थे.ब्राम्हण कम्युनिस्ट तो हाथ धोकर  कबके उनके पीछे पड़े थे.उनकी कविता, कहानी और नाटकों पर 'स्थापित राष्ट्रिय साहित्कारों' को खासी आपत्ति थी.उनके लिखे नाटकों के मंचन में भारी रूकावट पैदा हो रही थी. अंतत: अण्णाभाऊ को नाटकों से अपने को अलग करना पड़ा. यह उनके लिए बड़ा आघात था. आघात इतना बड़ा था कि वे उसे बर्दास्त नहीं कर पाए और उन्होंने अपने-आप को शराब के हवाले कर दिया.
         जिस शख्स के घर के सामने से शराबी जाने से डरता था, वह अब शराब का दास बन गया. धीरे-धीरे अण्णाभाऊ मौत के मुंह में समाने लगे.उनके प्रकाशकों ने उनके साथ दगा किया.उनके अपने रिश्तेदारों ने उनके पास जो भी था, उसे हजम कर लिया.और फिर, 18 जुलाई 1969  को यह लोक शाहिर सदा के लिए मौत के मुंह में समां गया.
         सोचता हूँ कि आखिर, ऐसे क्रन्तिकारी जन-कवि की मौत यूँ क्यों होती है ? जो  शख्स जन-चेतना की अलख जगाने अपनी जिन्दगी कुर्बान कर देता हो, सामाजिक-क्रांति की बात करते-करते सीने पर गोली खाने का माद्दा रखता हो,उसके खुद्दारी की इन्तहा इस कदर क्यों होती है ? मुझे लगता है कि विश्व-विद्यालयों में पढने वाले जिन बच्चों ने अण्णा भाऊ के संघर्ष पर पी.एच. डी. और डाक्टरेट किया है, आज नहीं तो कल जरुर वे इस पर गौर करेंगे.

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साभार अमृत लाल के ब्लाग से 

स्वामी अछूतानन्द हरिहर : संक्षिप्त परिचय

स्वामी अछूतानन्द हरिहर, आदि-वंश  आन्दोलन के प्रणेता थे. उन्होंने उ.प्र. में इस सामाजिक-धार्मिक आन्दोलन की स्थापना की थी. उनका असली नाम हीरालाल था. अछुतानंद नाम तो उनके गुरु ने उन्हें प्रदान किया था.
        स्वामी जी जन्म 6 मई 1869 को उ.प्र. के फरुखाबाद जिले के सौरिख नामक छोटे-से गाँव में हुआ था. उनकी माता का नाम राम पियारी और पिता का नाम मोतीराम था. बालक हीरालाल के माता-पिता ने काफी समय पहले से ही सवर्ण हिन्दुओं की जातिगत-घृणा और कलह से तंग आ कर पैत्रिक गाँव छोड़ दिया था. वे जिला मैनपुरी के उमरी गाँव में आ बसे थे. बाद में हीरालाल के पिता जी ने आर्मी ज्वाइन कर लिया था. बालक हीरालाल बचपन से ही तीव्र बुद्धि के थे. उन्होंने 14 वर्ष की उम्र में स्कूल छोड़ दिया था. आपका ब्याह हिराबाई से हुआ था. संतान के नाम पर इनको चार पुत्रियाँ थी.
           शुरू में स्वामी जी ने आर्य समाजियों के साथ थे।   मगर, जल्दी ही हिन्दू आर्य-समाजियों से इनका भ्रम टूट गया. तब स्वामी जी ने जाति-पांति और छुआ-छूत के विरुद्ध स्वत्रंत रूप से आन्दोलन चलाया. उन्होंने गाँव-गाँव भ्रमण कर अपनी बात को लोगों के सामने रखा.
           स्वामी जी सन 1917 में दिल्ली आये. आपने अपने लोगों को जगाने के लिए यहाँ से आदि-हिन्दू नामक हिंदी मासिक पत्रिका का सम्पादन किया था.स्वामी अछुतानंद हरिहर के अनुसार आदि-हिन्दू जातियां अर्थात अनार्य इस भारत-भूमि के मूल निवासी थे.आर्यों जातियों ने यहाँ आकर छल-कपट से उनको दास बनाया और बाद में कई तरह की निर्योग्यताएं उन पर लाद दी. आर्य जातियों का यह षड्यंत्र यहीं तक सीमित नहीं रहा बल्कि, आगे चलकर अनार्य जातियों को पशुओं से भी बदतर जीवन जीने को बाध्य किया.
        स्वामी  अछूतानंद हरिहर ने दिल्ली में अछूत नेता वीररतन दास और जगतराम जाटिया के साथ मिल कर अखिल भारतीय स्तर पर अछूत महासभा का गठन किया. सन 1922 के दरम्यान दिल्ली में ही स्वामी जी ने अछूत जातियों का एक बड़ा सम्मेलन आयोजित कर उस में प्रिंस आफ वेल्स को आमंत्रित किया था. वहां आपने प्रिंस आफ वेल्स को अछूत जातियों के उत्थान से सम्बन्धित 17 बिन्दुओं का मेमोरेंडम दिया था. इस मेमोरेंडम के मांग की गई थी कि आदि-हिन्दू (दलित जातियों) के लिए पृथक चुनाव और प्रतिनिधित्व का प्रावधान हो. इसके साथ ही छुआ-छूत के उच्छेद के लिए कड़े नियम बनाये जाये. इन जातियों के शिक्षित बच्चों को नौकरी और व्यवसाय में प्राथमिकता मिले. बलात-श्रम पर पाबंदी लगे और गाँव के कोटवार इन जातियों के हो आदि आदि।
         सन 1927 में स्वामी जी ने एक पब्लिक मीटिंग में हिन्दू और मुसलमानों की तर्ज पर आदि हिन्दुओं(दलित जातियों) के लिए पृथक स्वत्रंता की मांग की थी. आपने कहा कि दलित जातियां इसकी सही हकदार है. 30 नव. 1930 को स्वामी जी ने सायमन कमीशन से मुलाकात की थी, जिसके सदस्य बाबा साहेब डा. आम्बेडकर थे.
डा. आम्बेडकर ने स्वामी जी को को गुरु माना है।  स्वामीजी को जब मालूम हुआ कि डा. आम्बेडकर, जो अछूत समाज के हैं और देश की दबी-कुचली जातियों के लिए कार्य कर रहे हैं तो उन्होंने डा. आम्बेडकर से मिलने की ठानी. सन 1928 में संपन्न 'आदि हिन्दू' महा सभा के एक अधिवेशन में उनकी पहली मुलाकात हुई थी. बाद में इन दोनों महापुरुषों ने देश के आजादी के साथ-साथ दबी-पिछड़ी जातियों के अधिकारों के लिए, जो उनके शोषकों को सुनाई दे , ऐसी आवाज बुलंद की.
      राउंड टेबल कन्फेरेंश के दौरान स्वामी अछूतानन्द हरिहर ने भारत में अछूतों के सर्व मान्य नेता के तौर पर डा. आम्बेडकर और राव बहादूर श्रीनिवासन को सपोर्ट के लिए देश के कई कोनों से टेलीग्राम कराये थे.यह स्वामी जी का प्रयास था की ब्रिटिश भारत में अछूतों को संसद और विधान सभाओं में प्रथक प्रधिनिधित्व और दलित जातियों वाले अधिसंख्यक सीटों पर दोहरे मत का अधिकार मिला था. किन्तु गाँधी जी के आमरण अनशन ने इन दोनों मांगों की मिटटी-पलीद कर दी. किसी तरह 24 सित. 1932  को पूना पेक्ट हुआ जिसके साक्षी स्वामी जी थे.
       स्वामी अछुतानंद हरिहर ने हिन्दू धर्म की काट के तौर पर 'आदि-हिन्दू धर्म'  इजाद किया था. आदि-हिन्दू धर्म की 7 मान्यताएं थी-1. इस देश के मूल निवासी होने से वे 'आदि-हिन्दू' हैं. आदि-हिन्दू  होने के नाते उनका कर्तव्य है कि वे अपनी इस मात्र- भूमि पर सत्य और न्याय का शासन स्थापित करे.2. आर्यों के आने  के पहले यहाँ के मूल-निवासियों की जो आस्था और मान्यताएं थी, वही उनका 'आदि-धर्म' है. 3. यह कि ईश्वर है और  ईश्वर सर्व शक्तिमान और सच्चा है. ईश्वर अवतार नहीं लेता. 4. सभी मनुष्य बराबर है और वे आपस में भाई-भाई है. वर्ण, जाति और वंश/कुल के आधार पर उन में किसी तरह के उंच-नीच का भेद गलत है. 5.क्रोध,मोह,लोभ और काम वासना से अलिप्त रहना मन का धर्म है. वेश्यागमन,जुआ, हिंसा और मद्य-पान से अलिप्त रहना शरीर का धर्म है.6. संत कबीर का कथन सत्य है कि सब ब्राहमण-ग्रन्थ झूठे, अन्यायी और उनके वर्ग हित को साधने वाले हैं. हिन्दुओं के धर्म-शास्त्र ही उनके अधोगति के कारण है और इसलिए वे ब्राह्मण देवताओं, ईश्वर के अवतारों, ब्रह्मनिक धार्मिक उपदेशों को त्यागने की शपथ लेते हैं.यह भी शपथ लेते हैं कि न तो वे कोई ब्राहमनिक-संस्कार करेंगे और न ही अपने किसी सामाजिक-धार्मिक संस्कार को संपन्न कराने ब्राह्मण पंडित को बुलाएँगे.7. वे अपने पूर्वजों के उच्च चरित्र और आदि-वंश के गर्व भरे इतिहास को प्रचार-प्रसार करेंगे.
      देश की शोषित-पीड़ित जातियों के लोग जो हिन्दुओं से भयाक्रांत थे और जिनके लिए अंग्रेजों से आजादी पाने का कोई अर्थ नहीं था, हिन्दुओं से अपनी आजादी के लिए संघर्षरत थे. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जो तब, बड़े जोर-शोर से आजादी का आन्दोलन चला रहा था, के कर्ता-धर्ताओं के  सामने स्वामी अछुतानंद हरिहर ने जमीदारी उन्मूलन की मांग रखी थी. स्वामीजी के पत्र के उत्तर में मोतीलाल नेहरू ने लिखा था- पहले आजादी के आन्दोलन में सहयोग करे. जमीदारी उन्मूलन के सम्बन्ध में स्वराज प्राप्त होने पर विचार किया जा सकता है.
        भारत के इस महान सपूत की मृत्यु  20  जुला. 1933 को 54 वर्ष की आयु में कानपूर के पास बेना झाबर में हुई थी. देश के कोने-कोने से आये दबे-कुचले लोगों ने उनकी शव-यात्रा में शरीक हो अपने नायक को नमन किया था.
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साभार अमृत लाल के ब्लाग से