जूठन : समाज के वीभत्स स्वरूप का
जीवंत दस्तावेज़
- अनीश कुमार
ओम प्रकाश वाल्मीकि एक महत्त्वपूर्ण
दलित साहित्यकार हैं । दलित साहित्य की एक विशिष्ट ‘आत्मकथा’ जूठन दलित जीवन
और पीड़ा का ऐतिहासिक दस्तावेज है । ‘जूठन’ जातिगत उत्पीडऩ और अतिदलित समाज व्याप्त कुरीतियों,
अंधविश्वासों आदि के खिलाफ संघर्ष का आख्यान है । यह सिर्फ आत्मकथा ही नहीं वरन अतीत
की मानवीय संवेदनाओं को तार-तार करती हुई वीभत्स घटनाओं और पीड़ादायी अनुभवों से
उपजी कराह है, वेदना है, जहां लेखक ही
नहीं बल्कि समय-समाज भी उपस्थित है - यातनामय भयावहता के साथ
। आत्मकथा में जातिगत व सामाजिक उपेक्षा-अत्याचार का अनवरत सिलसिला है, जिससे मनुष्य में आक्रोश-विरोध का उपजना स्वाभाविक है । ऐसी ही घटनाएं और
परिस्थितियां दलित साहित्य के उद्भव के मूल में हैं । ‘जूठन’
के आरंभ में दलित साहित्य की विषयवस्तु और आत्मकथा लिखने के कारणों
को लेखक स्वयं लिखता है - “दलित-जीवन
की पीड़ाएं असहनीय और अनुभव-दग्ध हैं । ऐसे अनुभव जो साहित्यिक अभिव्यक्तियों में
स्थान नहीं पा सके । एक ऐसी समाज-व्यवस्था में हमने साँसे ली हैं, जो बेहद क्रूर और अमानवीय है । दलितों के प्रति असंवेदनशील भी ।”[1]
लेखक की इस क्रूर समाज के प्रति आक्रोश स्पष्ट रूप से दिखाई देता है । वे सभी
अनुभव अब दलित आत्मकथाओं में स्थान प्राप्त कर रहे हैं और अपनी पीड़ा और समाज की
क्रूरतम यथार्थ को सामने ला रहे हैं ।
वर्णवादी
व्यवस्था के कारण सदियों से समाज के एक वर्ग को भीषण यातना और हीन भावना से भरी
स्थिति में जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ा है । अपने ही जैसे मनुष्यों के साथ
जाति और जन्म के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव के कारण भारतीय वर्णव्यवस्था आज
असहनीय हो उठी है । दलित वर्ग ने अब स्वयं पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध
मोर्चा तैयार किया है । ऐसे ही संघषो व यातनाओं का प्रस्तुतीकरण वाल्मीकि जी ने
अपनी आत्मकथा में किया है ।
वर्ण
व्यवस्था को आदर्श मानने वालों के समक्ष वह बड़ी निर्भीकता के साथ स्पष्ट चुनौती
देते हैं कि इस गंदगी के माहौल में चार दिन रहकर भी यदि उनकी सोच वर्णवाद के पक्ष
में रह सके, तो उन्हें वर्णवादी व्यवस्था स्वीकार्य है परन्तु वास्तव में बड़ी-बड़ी
बातें करना और दूसरी ओर स्वयं उस माहौल में रहकर भोगना दोनों भिन्न हैं । जिसकी हम
कल्पना तक नहीं कर सकते । रचनाकार ने स्वयं उस गंदगी भरे माहौल में रहकर भी शिक्षा
प्राप्त करने का दुस्साहस किया जिसका भुगतान उसे प्राथमिक विद्यालय के वर्णवादी
माहौल में करना पड़ा ।
‘जूठन’ सिर्फ ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा नहीं अपितु सम्पूर्ण दलित समाज का
भोगा हुआ कटु यथार्थ है, जहां जाति व्यवस्था की खतरनाक खाई
है और वहां से आने वाली दर्दनाक चीखें हैं । पढ़ते समय लगता है कि ‘जूठन’ आह, अंतर्मन से उपजा हुआ
आख्यान है । इसमें वर्णित घटनाएं और प्रसंग वर्णव्यवस्था के पोषकों की निमर्मता के
प्रमाण हैं । जातिगत व्यवस्था लेखक का पीछा नहीं छोड़ती । गाँव के सरकारी प्राथमिक
विद्यालय में प्रवेश के समय बालक ओमप्रकाश वाल्मीकि को तरह-तरह से परेशान किया
जाता है । शिक्षक द्रोणाचार्य की भूमिका में हैं, तो सहपाठी
अर्जुन-भीम की तरह तीर-कमान साधे हुए हैं । प्रवेश परीक्षा अग्निपरीक्षा से कम
नहीं है । तीन दिन तक लगातार झाड़ू लगवाया जाता है किंतु कक्षा में बैठने का मौका
एक दिन भी नहीं मिलता । यहाँ शिक्षा सिर्फ और सिर्फ किसी की जागीर बनकर रह गई है ।
कुछ विशेष जाति के लोगों को ही शिक्षा दी जाती थी । दलित जीवन के भुक्तभोगी
रचनाकार को जब शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले विद्यालयों से उपेक्षा मिली, तिरस्कार और अपमानजनक शब्दों को सहने के लिए विवश होना पड़ा तो इनके मानस
में आरम्भ से ही उच्च कही जाने वाली जातियों के प्रति वितृष्णा का भाव भरता चला
गया ।
“हेडमास्टर
ने तेज आवाज मे कहा था, “चूहड़ा हो के पढऩे चला है… जा चला जा… नहीं तो हाड़-गोड़ तुड़वा दूंगा ।”[2]
इससे साफ जाहिर होता है कि समाज में व्याप्त कुरीतियाँ, जाति
व्यवस्था से शिक्षा व्यवस्था भी अछूता नहीं है । हेडमास्टर के आवाज में जातीय दंभ
और अमानवीयता चरम पर है । परंतु पिता की जिद समाज को चेतावनी भी देता है – “यो
चूहड़े का यहीं पढ़ेगा… इसी मदरसे में । और यो ही नहीं,
इसके बाद और भी आवेंगे पढऩे कू ।”[3] जो दलित समाज व साहित्य के भावी स्वरूप का संकेत है, जहां शिक्षा के माध्यम से सवर्णवादी वर्चस्व को तोडऩे का प्रयास हो रहा है
। जब हेडमास्टर का ऐसा व्यवहार है, तो छात्रों और अध्यापकों
का व्यवहार कैसा होगा ? इतनी उपेक्षा और प्रताडऩा के बाद भी
ओमप्रकाश आठवीं कक्षा में पहुंचते-पहुंचते शरतचंद्र, प्रेमचंद
और रवींद्रनाथ टैगोर के साहित्य का अध्ययन कर चुके थे । ओमप्रकाश वाल्मीकि के
पात्रों के संतुलन और समझदारी के मूल में उनकी अध्ययनप्रियता है, तो सामाजिक अनुभव भी ।
लेखक
के पास बचपन से ही तर्क करने की क्षमता के साथ-साथ शास्त्रों पर प्रश्न उठाने का
साहस भी है । वह भरी कक्षा में बड़ी धृष्टता से सवाल करते हैं कि –“अश्वत्थामा को
तो दूध की जगह आटे का घोल पिलाया गया और हमें चावल का मांड । फिर किसी भी महाकाव्य
में हमारा जिक्र क्यों नहीं आया ?
किसी भी महाकवि ने हमारे जीवन पर एक भी शब्द क्यों नहीं लिखा ?”[4] लेखक कहता है कि वाल्मीकि पर द्रोणाचार्य रूपी मास्टर ने महाकाव्य तो रचा,
मगर उसकी पीठ पर और शीशम की छड़ी से । ये सवाल सनातनियों के मुंह पर
एक तमाचा था । अकारण नहीं सनातन साहित्य सवालों के घेरे में आ जाता है । दलित
चिंतक डॉ. धर्मवीर यूं ही नहीं सवाल उठाते हैं कि लेखन और चिंतन में दलित समुदाय
उपेक्षित रहा है । हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष आचार्य शुक्ल बड़े साफ शब्दों में
लिखते हैं, कि -’चाकरी करेंगे नहीं
चौपट चमार की ।’ दलित साहित्य हमेशा से उपेक्षा का शिकार रहा
है ।
ओमप्रकाश वाल्मीकी जी ने अपनी आत्मकथा में
बताया कि उनका जीवन बचपन से ही अभावग्रस्त था । उन के घर का प्रत्येक सदस्य कुछ न कुछ
कार्य करता था । तगाओं के घर से लेकर खेती-बाड़ी मेहनत-मजदूरी सभी कार्य होते थे । कभी-कभी रात में भी बेगार
करनी पड़ती थी, जिसके बदले में पैसा या अनाज नहीं मिलता था । इतना
करने के बाबजूद भी दो वक्त की रोटी ठीक से नहीं मिल पाती थी । कोई तगा कभी नाम लेकर
उन्हे नहीं पुकारते थे । वे लोग नाम तक लेना अपनी शान के खिलाफ समझते थे । यदि उम्र
में बड़ा हो तो, ओ चूहड़े, बराबर या उम्र
में छोटा होता तो अबे चूहड़े के यही सम्बोधन करते थे ।
जूठन
समाज का एक कड़वा सच सामने लाता है । इस किताब में न जाने ऐसी ही कितनी घटनाओं का
ज़िक्र है कि आपको पढ़ते हुए समाज के जाति-धर्म के नाम पर होने वाले भेदभाव से
बेचैनी का अनुभव होगा । किसी भी तबके से आते हो आखिर इंसान तो इंसान ही है । शायद
अब इस तरह का भेदभाव उतना नहीं होता होगा लेकिन फिर भी पूरी तरह से ख़त्म हो गया ये
कहा नहीं जा सकता । क्यूंकि किसी न किसी रूप में ये असलियत हमारे-आपके सामने आ ही
जाती है । मुझे तो नहीं लगता कि हममें से कोई भी ऐसा होगा जिसने इस भेदभाव को
साक्षात् नहीं देखा होगा या इसका हिस्सा नहीं रहा होगा । आप किसी भी ओर हो सकते
हैं । भेदभाव करने वाले की ओर या सहने वाले की ओर । भले ही आप इस भेदभाव से आहत
हुए हों लेकिन अगर आपने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ न उठाई हो तो आप इसका हिस्सा ही कहलायेंगे
।
जाति
को वे समाज की वास्तविक सच्चाई मानते हैं । इस बात को वे अपनी आत्मकथा में लिखते
हैं - “भारतीय समाज में ‘जाति’ एक महत्वपूर्ण घटक है । ‘जाति’ पैदा होते ही व्यक्ति की नियति तय कर देती है
। पैदा होना व्यक्ति के अधिकार में नहीं होता । यदि होता तो मैं भंगी के घर क्यों
पैदा होता? जो स्वयं को इस देश की महान सांस्कृतिक धरोहर के
तथाकथित अलमबरदार कहते हैं, क्या वे अपनी मर्ज़ी से उन घरों
में पैदा हुए हैं ? हाँ,इसे जस्टिफाई
करने के लिए अनेक धर्मशास्त्रों का सहारा वे ज़रूर लेते हैं । वे धर्मशास्त्र जो
समता,स्वतंत्रता की हिमायत नहीं करते,बल्कि
सामंती प्रवृतियों को स्थापित करते हैं ।”[5]
जाति प्रथा उच्च-जाति के व्यक्ति के
दिल-दिमाग में उच्चता-श्रेष्ठता की ग्रंथि पैदा करती है तो कथित निम्न जातियों में
हीनता-ग्रंथि पैदा करके समस्त समाज का असामान्य जीवन बनाती है और समाज के वर्गों
को एक-दूसरे से दूर व एक-दूसरे के विरूद्ध करने का कुचक्र रचती है । ओमप्रकाश
वाल्मीकि में जाति को लेकर कोई हीनता का बोध नहीं है, कहीं यह अहसास नहीं है कि कथित निम्न जाति में पैदा होने से उनकी मानवता,
सम्मान व गरिमा में कोई कमी आ गई है । हीनता बोध-ग्रंथि पर पार पाकर
ही जातिगत पहचान के स्थान पर मानवीय पहचान व गरिमा की अपेक्षा करने का नैतिक साहस
आता है और समस्त दलितों की पीड़ा व दलित-मुक्ति के लिए संघर्ष करने का आधार बनता
है और साहस पैदा होता है जो समस्त दलित समाज व सवर्ण समाज को प्रभावित करता है ।
जिस तरह वाल्मीकि ने अपनी जाति को खुलेआम बताया है उससे उनको व्यक्तिगत नुकसान व
पीड़ा अवश्य पहुंची है, लेकिन मानव-मुक्ति की लड़ाई में,
सदियों से चली आ रही प्रथाओं को चुनौती देने वालों को, वर्चस्वी मान्यताओं पर ऊंगली उठाने वाले समाज-सुधारकों व क्रांतिकारियों
को समाज के वर्चस्वी वर्गों की फटकार तो सहन करनी ही पड़ती है । ओमप्रकाश वाल्मीकि
का आग्रह है कि उन्हें एक मानव के रूप में स्वीकार किया जाए, न कि जाति की पहचान पर ।
इस बात को पहचानने की जरूरत है कि कथित
उच्च या निम्न जाति में पैदा होना न तो पाप है और न पूर्वजन्म के कर्मों का फल, बल्कि यह शोषण करने के लिए की गई व्यवस्था है जिसे बचाने के लिए खुद को
बदलने की जरूरत नहीं, बल्कि अपनी मानवी पहचान के आग्रह के
साथ इस अमानवीय व्यवस्था से आँखों में आँखें डालकर टकराने की जरूरत है ।
ब्राह्मणवाद के कई हथकंड़े हैं जाति के साथ गौत्र भी है, एक
को छोड़कर दूसरे को अपनाना उसका विरोध नहीं बल्कि उसमें खप जाना है, समा जाना है । जाति को तोडऩे के संघर्ष में तथा जातिविहिन समाज के निर्माण
में ही मानवी पहचान संभव है जाति-गौत्र के खांचों में नहीं । जो लोग इसी में अपनी
पहचान खोजना चाहते हैं वे ब्राह्मणवाद का ही शिकार हैं ।
जिन पूर्वाग्रहों और धारणाओं का सहारा
लेकर सवर्ण समाज दलितों के प्रति हिंसा व घृणा को उचित ठहराता है उन पर भी
ओमप्रकाश वाल्मीकि ने प्रश्न चिह्न लगाया है । मुसलमानों, दलितों व अन्य कमजोर वर्गों के प्रति नफरत व हिंसा को उचित ठहराने के लिए
ब्राह्मणवादी मानसिकता ने बहुत ही बेहूदा व अवैज्ञानिक तर्क गढ़ लिया है कि वे
गंदे होते हैं, जबकि यह विकास के अवसरों पर तथा
जीवन-स्थितियों पर निर्भर करता है कि कौन कितना साफ-सुथरा रहेगा । समाज के जिन
वर्गों को सबसे गंदे माने जाने वाले काम सौंप दिए गए हैं उनको गंदा कहकर उनसे नफरत
करना निहायत अन्यायपूर्ण है, उन्होंने ये काम अपनी इच्छा से
नहीं चुने बल्कि उनको मजबूरी में ये काम करने पड़ते हैं । जिस तरह की सामाजिक
व्यवस्था है और उनमें जैसी जीवन-स्थितियां हैं । उनमें रहकर कोई भी व्यक्ति साफ
सुथरा नहीं रह सकता । मेहनतकश लोग जो सारा दिन खेतों व कारखानों में काम करते हैं, अपना पसीना बहाते हैं, उनको गंदा कहना श्रम का
अवमूल्यन करना तो है ही साथ ही उनसे चमचमाते व खुशबूदार इत्र लगाकर रहने की
अपेक्षा करना उनसे ज्यादती करना नहीं तो क्या है ?
ओमप्रकाश वाल्मीकि ने भू-स्वामी सवर्णों
और श्रमिक दलितों के बीच मुख्य अन्तर्विरोध व संघर्ष को बिल्कुल सही तरह से व्यक्त
करते हैं । गांव का सारा कारोबार व संस्कृति खेती-आधारित है, जिस वर्ग के पास जमीन का मालिकाना हक है वही वहां मुख्य शक्ति बनकर खड़ा है
बाकी सब उन पर ही निर्भर है । दलितों को साल भर अपने जानवरों का पेट भरने के लिए
चारा लेने तथा अपना पेट भरने के लिए भू-स्वामियों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिस कारण उसे भू-स्वामी वर्ग की समस्त शर्तें मानने पर मजबूर किया जाता
है । ये बात सत्य है कि वास्तविक सत्ता तो उसी के पास होती है, जिसके पास उत्पादन के साधन होते हैं उसी वर्ग के विचार-संस्कार समाज में
मुख्य रूप से प्रचलित होते हैं, लेकिन इसके बावजूद श्रमिक
दलित वर्ग अपने शोषण से छुटकारा पाने के लिए तथा अपनी जीवन स्थितियां सुधारने के
लिए लगातार कसमसाता रहता है और मौका मिलने पर स्थितियां बदलने के लिए संघर्ष भी
करता है, लेकिन पूर्णत: भू-स्वामियों पर निर्भर होने के कारण
श्रमिक-दलित इसमें कम ही कामयाब होते हैं क्योंकि अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए
भू-स्वामी वर्ग भी नए-नए कुचक्र रचता रहता है । इस संघर्ष को रेखांकित करते हुए ओमप्रकाश
वाल्मीकि ने लिखा कि फसल कटाई को लेकर अक्सर खेतों में हुज्जत चलती रहती थी ।
मजदूरी देने में ज्यादातर तगा कंजूसी बरतते थे । काटनेवालों की मजबूरी थी । जो भी
मिलता, थोड़ी-बहुत ना-नुकर के बाद लेकर घर लौट आते । घर आकर
कुढ़ते रहते या तगाओं को कोसते रहते । लेकिन भूख के सामने विरोध दम तोड़ देता था ।
ये उनकी नियति बन चुकी थी । ओमप्रकाश वाल्मीकि ने ग्रामीण समाज के यथार्थ को
आलोचनात्मक दृष्टि से प्रस्तुत करते हुए समस्या के सही समाधन की ओर संकेत किया है
।
ओमप्रकाश वाल्मीकि ने दलितों की
मानवी-गरिमा को समाप्त करने वाले रिवाजों, प्रथाओं तथा
परम्पराओं पर प्रश्नचिह्न लगाया है तथा इन प्रथाओं में छिपी अमानवीयता को उजागर
किया है । ‘जूठन’ खाने व उठाने की
प्रथा का वर्णन करते हुए लिखा है- ‘शादी-ब्याह के मौकों पर
जब मेहमान या बाराती खाना खा रहे होते थे तो चूहड़े दरवाजों के बाहर बड़े-बड़े
टोकरे लेकर बैठे रहते थे । बारात के खाना खा चुकने पर झूठी पत्तलें उन टोकरों में
डाल दी जाती थीं, जिन्हें घर ले जाकर वे ‘जूठन’ इकट्ठी कर लेते थे ।’
‘सलाम’
की प्रथा भी इसी तरह की प्रथा है, शादी-विवाह
के समय दुल्हा उन घरों के दरवाजे पर जाता है जिन घरों में दुल्हन की माँ काम करती
है । इसी तरह दुल्हन उन घरों के दरवाजे पर जाती है जिन घरों पर दुल्हे की माँ काम
करती है । इस प्रथा के बारे में ओमप्रकाश वाल्मीकि ने लिखा है सदियों से चली आ रही
इस प्रथा के पीछे में जातीय अहम की पराकाष्ठा है । समाज में जो गहरी खाई है,
उसे प्रथा और गहरा बनाती है । एक साजिश है हीनता के भंवर में फंसा
देने की । कोई इसके खिलाफ आवाज उठाने के बारे में सोचता भी नहीं था । “कितनी ही
बार दुल्हों को ही नहीं, दुल्हनों को भी बेइंतहा अपमान सहना
पड़ता है । गरीब परिवार की अनपढ़ लड़की अजनबियों के बीच जाकर वैसे ही गूंगी बनी
रहती है । ऊपर से उसे दरवाजे-दरवाजे लेकर घूमने पर रही-सही कसर भी पूरी हो जाती है
।”[6]
ओमप्रकाश वाल्मीकि ने दलित समाज में
व्याप्त अंधविश्वास, जड़ता व अज्ञानता पर
प्रश्नचिह्न लगाया है । अंधविश्वासों ने दलितों की चेतना को जकड़ रखा है जो
वैज्ञानिक सोच व चिन्तन को जीवन में आने ही नहीं देता । धार्मिक अनुष्ठानों के साथ
मिलकर अंधविश्वास ऐसी शक्ति बन जाती है । जो जीवन को नियंत्रित करती है, दलितों में व्याप्त गरीबी इसको स्वमेव बढ़ावा देती है और अंधविश्वास गरीबी
के कारणों की पहचान नहीं होने देते, ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते
हैं कि इस दुष्चक्र को तोड़े बिना दलितों में परिवर्तनकामी चेतना का संचार नहीं हो
सकता जो ब्राह्मणवाद के चंगुल से मुक्ति पाने के लिए निहायत जरूरी है ।
ब्राह्मणवाद दलितों को शिक्षा व ज्ञान से
वंचित करके ही उनकी मानवीय गरिमा व पहचान समाप्त करने में कामयाब हुआ है । ज्ञान व
शिक्षा पाने की ललक दलितों में थोड़ी-बहुत हमेशा ही रही है, लेकिन बीसवीं शताब्दी के दलित आन्दोलन ने तो शिक्षा प्राप्त करने को
केन्द्रीय मुद्दा बना दिया । दलितों को ब्राह्मणवाद के शिंकजे से तथा नारकीय जीवन
स्थितियों से छुटकारा दिलाने में शिक्षा व ज्ञान का महत्त्वपूर्ण योगदान हो सकता
है । ओमप्रकाश वाल्मीकि के पिता उसे शिक्षा पाने के लिए बार-बार प्रेरित करते हैं
कि ‘पढ़-लिख कर जाति सुधारनी’ है । ‘जाति सुधारने’ का उनके लिए सीध सा अर्थ है कि अपमान
की जिन्दगी से छुटकारा पाना, शोषण व बेगार से मुक्ति । इस
बात को सवर्ण समाज भी अच्छी तरह जानता है कि दलितों का शोषण तभी तक किया जा सकता
है, जब तक कि वह अज्ञानी, अशिक्षित व
अचेत है, इसलिए वह दलितों को शिक्षा नहीं देना चाहता ।
ओमप्रकाश वाल्मीकि दलित मुक्ति संघर्ष में शिक्षा की भूमिका को तो पहचाने ही हैं,
साथ ही शिक्षा की सीमाओं को भी रंखांकित करते हैं कि मात्र शिक्षा
ग्रहण करने से ही समाज से जाति प्रथा मिटने वाली नहीं है इसके लिए वैज्ञानिक व
मानवीय दृष्टि की आवश्यकता है । शिक्षा भी ब्राह्मणवादी विचारों व कुतर्कों ने
अपनी जगह बना ली है ।
मध्यकाल में संभ्रांत हिंदू समाज की विधवाओं को सती होना पड़ता
था । पुनर्जागरण के बाद भी विधवा-विवाह को हीन दृष्टि से देखा जाता था । आधुनिक
युग में विधवाओं पर समाज द्वारा सुविधाहीन जीवन जीने का दबाव है, किंतु दलित समाज में
विधवा-विवाह को मान्यता आदिकाल से है । क्योंकि जहां स्त्रियां श्रम करती हैं,
वहां उनका महत्त्व-आवश्यकता और कुछ स्वतंत्र व्यक्तित्व भी होता है
। बड़े भाई सुखबीर की मृत्यु के बाद छोटे भाई जसबीर से भाभी की शादी करा दी जाती
है । इस शादी को रिश्तेदार और समाज द्वारा स्वीकृति प्राप्त है । चाचा श्यामलाल की
पत्नी को मायके वापस भेज दिया जाता है । श्यामलाल की दूसरी शादी रामकटोरी से होती
है, वह भी कुछ दिनों बाद सोल्हड़ का हाथ थाम लेती है । अत:
दलित समाज में विवाह-विच्छेद और पुनर्विवाह के नियम शिथिल हैं । यही बात वीरभारत
तलवार भी अपनी पुस्तक रस्साकस्सी में लिखते हैं ।
अकारण
नहीं कि इस समाज के विकास के लिए बनी सरकारी योजनाएं फलीभूत नहीं हो पाती हैं ।
ऐसे में दलित आत्मकथाओं के माध्यम से जो सच निखरकर आ रहा है, उसे देखने और समझने
की जरूरत है । ‘जूठन’ और उसके बाद आईं सभी दलित आत्मकथाओं में भूत-प्रेत, जादू-टोना का उल्लेख इस समाज की अज्ञानता और पिछड़ेपन को बयां करता है ।
आत्मकथाएं दलित समाज का आईना हैं, जिसमें सामान्य जीवन
व्यवहार के साथ धार्मिक-सांस्कृतिक मूल्यों को भी देखा जा सकता है । आजादी के
खोखलेपन को व्यक्त करने में यह सफल रही । ऐसे जनतंत्र का क्या मतलब, जिसमें लोकतांत्रिक अधिकार चंद लोगों की मुट्ठी में हों ? आजादी के बाद के लोमहर्षक अथवा लोकलुभावनी सच का यह क्रूर दस्तावेज है,
जिसकी सर्जनात्मक क्षमता से हिंदी में दलित आत्मकथा लेखक का मार्ग
प्रशस्त हुआ ।
‘जूठन’ आत्मकथा ने आधुनिक दलित साहित्य को सम्मृद्ध बनाने एवं दलित जीवन की
यथार्थ को समाज के सामने प्रस्तुत करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । ओमप्रकाश
वाल्मीकि जी की ‘जूठन’ आत्मकथा में दलित
जीवन की अभिव्यक्ति स्वतः ही दिखाई देती है ।
[1] वाल्मीकि, ओमप्रकाश. जूठन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 7
[2] वाल्मीकि, ओमप्रकाश. जूठन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 16
[3] वाल्मीकि, ओमप्रकाश. जूठन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 16
[4] वाल्मीकि,
ओमप्रकाश. जूठन, वाणी प्रकाशन, नई
दिल्ली, पृष्ठ संख्या 34
[5] वाल्मीकि, ओमप्रकाश. जूठन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 163
[6] वाल्मीकि,
ओमप्रकाश. जूठन, वाणी प्रकाशन, नई
दिल्ली, पृष्ठ संख्या 45
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