मुक्ति की कामना प्रत्येक व्यक्ति की आंतरिक कामना होती है । अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए व्यक्ति का स्वतंत्र होना अंत्यन्त आवश्यक है । स्वतन्त्रता का अर्थ केवल आजादी नहीं बल्कि एक जीवन मूल्य है । इसीलिए जब कभी व्यवस्था व्यक्ति का शोषण कर गुलाम बनाने का प्रयत्न करती है, तब उस व्यवस्था से मुक्ति पाने के लिए संघर्ष प्रारम्भ होता है । इस दृष्टि से नारी स्वतन्त्रता का अपना विशेष महत्व है । “नारी मुक्ति आंदोलन व्यक्ति स्वतन्त्रता का पर्याय है, ऐसी स्वतन्त्रता जिसमें जीवन के साधनों और साध्यों में पूर्णतया समानता और स्वतन्त्रता हो । समान शैक्षिक, मानसिक वातावरण प्राप्त महिलाओं और पुरुषों में समान मैत्री भाव हो और महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण कर सकने के समान अवसर मिले । सबसे पहले अपने को पहचान कर अपनी पहचान बनानी है ।”[1] वास्तव में नारी मुक्ति का आंदोलन पुरुष विरोधी आंदोलन न होकर यह उस व्यवस्था विरोधी आंदोलन है, जिसमें नारी का शोषण किया जाता है ।
प्राचीन भारतीय संस्कृति हमेशा से सामंती व्यवस्था पर आधारित रही है । परिवार में नारी सूत्रधारक होने के कारण वैदिक काल में उसकी स्थिति कुछ हद तक ठीक थी । लेकिन उत्तर वैदिक काल में नारी की स्थिति में गिरावट आना शुरू हो गया और समाज, परिवार या अन्य जगह पर नारी का स्थान गौण होता गया, जिसके फलस्वरूप नारी मुक्ति का संघर्ष शुरू होता है । किसी भी आंदोलन की शुरुआत किसी निश्चित तरिख या समय से नहीं होती । स्वतः समाज में धीरे-धीरे विकसित होकर समय के साथ एक बड़ा रूप अख़्तियार कर लेता है । “भारतीय स्त्री मुक्ति का संघर्ष कहाँ से शुरू होता है, इसके लिए कुछ निश्चित प्रमाण नहीं मिलते । इतना ही कहा जा सकता है कि उत्तर वैदिक काल से जैसे-जैसे बंधन क्रमशः कसते गए होंगे, उससे मुक्ति कि चाह वैसे-वैसे बलवती होती गई होगी ।”[2]
सच्चे अर्थों में स्त्री को अपनी परंपरा, अपना संघर्ष और अपनी भागीदारी का इतिहास खुद लिखना होगा। स्त्री जानती है भिन्न-भिन्न वर्गों, वर्णों और जातियों के बीच नए-नए समीकरणों के साथ उसे अपने लिए लड़ना होगा। पूंजीवादी पितृसत्ता ऊपर से चाहे जितनी उदार और सरल लगे, पर भीतर-भीतर जटिल है। दोष उसकी संरचना में ही है। अगर ऐसा नहीं होता तो आजादी के आंदोलन से लेकर अभी तक के स्त्री संघर्ष को इतिहास में कहीं तो जगह मिली होती। आजादी के इतिहास पर अनेक ग्रंथ हैं, पर स्त्रियों की सामान्य भागीदारी पर अलग से खोज करने निकलें, तो कहीं कुछ नहीं मिलता। स्त्री की पूरी परंपरा उसका इतिहास उसका संघर्ष दफन कर दिया गया है। आशा रानी वोहरा ने जब ‘महिलाएं और स्वराज किताब’ लिखना शुरू किया तो उन्हें तथ्य जुटाने में बारह वर्ष लगे। उन्होंने एक जगह लिखा है कि आजादी आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका पर लिखने के लिए जब सामग्री जुटाने लगीं तो गहरी निराशा हुई। सच तो यह है कि सभी दलित और वंचित वर्गों को अपना अतीत दर्ज करने का उद्यम स्वयं ही करना पड़ता है। जानी-मानी नारी चिंतक प्रभा खेतान ने एक जगह लिखा है, ‘हम स्त्रियों के पास इसके सिवा चारा ही क्या है! हम अपने आप को उघाड़ कर ही यथास्थिति के खिलाफ विद्रोह कर पाती हैं। हमारा अपना अंतरग अनुभव ही हमारा पहला अस्त्र है। जो आगे जाकर अपनी प्रमाणिकता के जरिए इतिहास बनाता है।’
आधुनिक काल में महिला मुक्ति का संघर्ष 19वीं शताब्दी से शुरू हुआ । ब्रह्म समाज, आर्य समाज, प्रार्थना समाज तथा थियोसोफ़िकल सोसायटी के कारण नारी उत्थान को प्रमुख स्थान मिला । राजा राम महान राय ने सती प्रथा का विरोध का विरोध किया । महाराष्ट्र में ज्योतिबाफुले, सवित्रीबाईं, गुजरात में स्वामी दयानंद और बंगाल में ईश्वरचंद विद्यासागर, राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानन्द ने स्त्रियों के सामाजिक अधिकारों के पक्ष में अभियान छेड़ दिया था। इनसे भी बहुत पहले इतिहास पर दृष्टि डाले तो महाकारुणिक गौतम बुद्ध द्वारा आश्रम में स्त्रियों को प्रवेश देना और स्त्रियों का उद्भव भी परिवार और समाज के उत्पीड़न के विरूद्ध खड़ी स्त्रियों की मुहिम ही मानी जाएगी। इन्होंने धर्मकी चैखट को या कहा जाए धार्मिक दुर्ग की दीवारों को तोड़ या लांघ कर उसमें प्रवेश या हस्तक्षेप करने की पहल की थी।
भारत में स्त्री आंदोलन कि असली शुरुआत 19वीं सदी के आखिरी दशकों में हुई जब पंडिता रमाबाई, रमाबाई रानाडे, आनंदीबाई जोशी, फ्रानना सोराबजी, सरला देवी जैसी औरतें अपने घरों में पुरुष प्रधान समाज द्वारा थोपें बंधनों को तोड़कर ऊंची शिक्षा के लिए विदेश गई और लौटकर उन्होने भारत में स्त्रियों के आंदोलन को आगे बढ़ाया । स्त्रियों के द्वारा बनाए गए अनेक संगठन कार्य करना प्रारम्भ हो गए । 1886 में स्वर्णकुमारी देवी ने ‘लेडीज़ एसोसिएशन’ नामक संस्था बनाई । 1892 में पंडिता रमाबाई ने स्त्रियों के लिए पूना में ‘शारदा सदन’ खोला । उन्होने स्त्रियों कि शिक्षा और रोजगार के लिए प्रयत्न किए, बाल विवाह, विधवा विवाह पर अनेक व्यख्यान दिये जिसके कारण उनको अनेक विरोध सहने पड़े । रमाबाई के समान ही मैडम ब्लावस्त्सकी, मारग्रेट नोबल, आणि वेसेंट और मिराबेन जैसी कुछ विदेशी महिलाओं द्वारा भी भारत में नारी जागरण का कार्य किया गया ।
1917 में मद्रास में श्रीमती मार्गरेट काजिन्स ने ‘इंडियन वुमेन एसोसिएशन’ कि स्थापना की और महिलाओं को संगठित कर उनकी गतिविधियां संचालित की । ब्लावस्तकी ने ‘थियोसोफ़िकल सोसायटी की स्थापना की जिसका नेतृत्व संभालने वाली श्रीमती एनी बेसेंट एक आइरिस महिला थी । 1917 में श्रीमती सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में महिलाओं का एक प्रतिनिधिमंडल ‘सेक्रेटरी आफ स्टेट फार इंडिया’ से मिला और महिलाओं के लिए मताधिकार की मांग किया । इसके फलस्वरूप 1921 में मुंबई और मद्रास में महिलाओं को अलग मताधिकार प्राप्त हुआ । 1927 में ‘अखिल भारतीय महिला सम्मेलन’ नमक गैरराजनीतिक संगठन की स्थापना की गई । इस संगठन का मुख्य काम महिलाओं की सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति को उन्नत करना था । 1929 में बाल विवाह निषेध अधिनियम पास हुआ, जो महिलाओं की सामाजिक स्थिति के सुधार में एक नया मोड़ था ।
1910 में बंगाल में सरला देवी ने भारत स्त्री मंडल की स्थापना की। 1917 में सरोजनी नायडू के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल स्त्रियों की रक्षा और मताधिकार को लेकर मांटेग्यू चेम्सफोर्ड से मिला। अप्रैल 1918 में पटना में हुए एक आयोजन में एनी बेसेंट ने कहा कि जब तक औरतों को अधिकार नहीं मिलता, मोर्ले मिंटो सुधार से कोई लाभ नहीं होगा। महिलाओं के मताधिकार की मांग को लेकर साउथ बोरो कमेटी की स्थापना की गई। 1919 के जनवरी में पटना में भी अखिल भारतीय महिला सम्मेलन हुआ। बिहार की महिलाओं ने बाल विवाह, दहेज प्रथा और मताधिकार के मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद की। उसी साल राजकिशोरी देवी ने मझवेलिया, लहेरिया सराय में बिहार महिला पीठ की स्थापना की। 1921 के राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में बिहार से आठ महिलाओं ने हिस्सा लिया।
इसी क्रम में गांधी जी द्वारा महिलाओं के उत्थान के लिए किया गया कार्य सराहनीय है । वेयपने प्रत्येक कार्यक्रमों में भागीदारी के लिए पुरुषों के समान दर्जा दिया । 1930 में गांधी जी के आह्वान पर ‘नमक सत्याग्रह’ आंदोलन में हजारों स्त्रियों ने भाग लिया । जिनमें सरोजिनी नायडू, कमला देवी चट्टोपाध्याय और रुक्मिनी लक्ष्मीपति, पेरिन कैप्टन, विजयलक्ष्मी पंडित, कृष्णा नेहरू, कमला देवी, लीलावती मुंशी, दुर्गाबाई, डॉ. मुतुलक्ष्मी रेड्डी, मनीबेन पटेल, हंसा मेहता आदि का नाम प्रमुख है ।
भारतीय स्त्री आंदोलन को स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से जोड़ कर देखना होगा। जिसकी शुरुआत संन्यासी विद्रोह से होता है। संन्यासी विद्रोह की सूत्रधार देवी चैधरानी को अंग्रेज इतिहासकारों ने दस्यु रानी की संज्ञा दी थीं। वहीं देवी चैधरानी ने संन्यासी विद्रोह का सूत्रपात किया। उस समय के लेफ्टिनेंट ब्रेनन की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि भवानी पाठक की विद्रोही गतिविधियों के पीछे देवी चैधरानी का प्रमुख हाथ था। भवानी पाठक के मारे जाने के बाद भी देवी चैधरानी ने कभी हार नहीं मानी। बराबर लड़ती रहीं, अंत तक अंग्रेजों के हाथ नहीं आर्इं।
भारतीय स्त्री मुक्ति आन्दोलन अपने विकास के दौरान जहाँ बहुत सारे सामाजिक, धार्मिक रूढ़ियों, जड़ताओं कुप्रथाओं और पाखण्डों से मुक्त हुई है, वही उसके सामने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नई चुनौतियाँ भी उत्पन्न हुई है । जो परम्परागत कुरीतियों से अधिक घातक सिद्ध हो रही हैं । भारतमें भूमण्डलीकरण के कारण भी बहुत-सी नई समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं। नए रूप में स्त्री देह व्यापार, भ्रूण-हत्या, यौन उत्पीड़न, बलात्कार, घरेलू हिंसा, कुपोषण, हिंसा-अपराध, हत्या-आत्महत्या, विस्थापन, निरक्षरता, साम्प्रदायिकता, महिलाओं का वस्तुकरण, परिवार का बिखरना जैसी अनेक भयावह स्थितियाँ सामने खड़ी हैं. साथ ही बहुत-सी पुरानी परम्पराएँ कुप्रथाएँ भी आज तक कायम हैं जो स्त्री सशक्तिकरण में अवरोधक हैं। साथ ही गरीबी, जातिवाद, कुपोषण, सम्प्रदायवाद, पारिवारिक विघटन, हिंसा, कुपोषण, स्वास्थ्य की असुविधाओं का अभाव आदि है जो जेंडर विभेद के कारण समाज में मौजूद है. यह एक चिंताजनक बात है कि जब एक ओर तमाम महिला संगठनों, महिला स्वयंसेवी संस्थाओं की संख्या बढ़ रही है, तब हम देख रहे हैं उसी के साथ-साथ महिलाओं के साथ शोषण व अत्याचार भी बढ़ रहा है. चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, रोज प्रचार माध्यमों में स्त्रियों पर हिंसा की कोई-न-कोई ताजी खबर जरूर रहती है। महिला आन्दोलनों से जुड़ी कार्यकर्ताओं के बीच, महिला बुद्धिजीवियों के सामने यह एक जटिल प्रश्न है कि स्त्री मुक्ति आन्दोलन की दिशा कौन-सी होनी चाहिए? क्या करने से महिलाओं की पीड़ा और समस्याएँ कम हो जायेंगी ? आज स्त्री मुक्ति आन्दोलन के सामने कई चुनौतियाँ हैं । लेकिन इस पर सोचने के पहले हमें अपना इतिहास परखकर देखना जरूरी है ।
महिला चिंतक राधा कुमार लिखती हैं “सन 1910 के बाद से उग्रराष्ट्रवादी स्त्रियाँ महिला अधिकारों के मुद्दे पर होने वाले आंदोलनों में ज्यादा सक्रिय नजर आईं । सन 1913 में क्रांतिकारी आतंकवाद की समर्थक कुमिदिनी मित्रा को बुडापेस्ट में सम्पन्न हुई इन्टरनेशनल विमेन सफरेज अलायंस कांग्रेस में ‘भारतीय स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करने के लिए भारतीय प्रतिनिधि के रूप में आमंत्रित किया गया ।”[3]
देश भर में जब महिलाएं अपने अधिकार के लिए आंदोलन कर रही थीं, बिहार उस आंदोलन से अछूता नहीं था। परंपराओं की अनेक धाराओं के विरुद्ध बिहार की महिलाओं ने भी मोर्चा खोला। बिहार को जब बंगाल प्रेसिडेंसी से अलग किया गया, उस समय बिहार में स्कूल जाने वाली लड़कियों की संख्या काफी कम थी। उसी दौरान शुरू हुए सुधार आंदोलन में बिहार की महिलाओं ने भूमिका निभाई। शिक्षा एक मुद्दा बना। पटना में राममोहन राय सेमिनरी में महिलाओं ने शिक्षा के साथ साथ बाल विवाह के खिलाफ सम्मेलन में प्रस्ताव पारित किए। मधोलकर ने इसकी अध्यक्षता की और बाल विवाह के खिलाफ समिति बनाने का सुझाव दिया। बिहार सहित दूसरे राज्यों में भी सुधार आंदोलन चल रहा था। जल, जंगल जमीन के साथ साथ महिलाएं अपने वोट देने के अधिकार को लेकर भी संघर्ष कर रही थीं।
राजनीतिक रुप से बिहार हमेशा से चेतनशील रहा है। 1917 में महात्मा गांधी के आगमन के बाद पर्दा प्रथा,बाल विवाह, सती प्रथा, शिक्षा जैसे सवालों के साथ-साथ असहयोग, स्वदेशी खिलाफत और खादी के आंदोलन में महिलाओं ने जमकर हिस्सा लिया। 1912 में पटना में राममोहन राय सेमिनरी में महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया। श्रीमती मधोलकर ने इसकी अध्यक्षता की। और बाल-विवाह के खिलाफ समिति बनाने का सुझाव दिया। 1928 में महिलाओं ने साइमन कमिशन का जबरदस्त विरोध किया। बिहार में लेजिस्लेटिव कौंसिल में महिलाओं को वोट देने के अधिकार व लेंगिक भेदभाव को लेकर नवम्बर,1921 को एक प्रस्ताव पेश किया गया। 1919 के एक्ट के अनुसार वे वोट नहीं दे सकती थीं। कौंसिल में इस मसले पर जमकर बहस हुई। और यह प्रस्ताव 10 वोटों से गिर गया। और कोलकाता में पेश महिलाओं के मताधिकार देने संबंधित प्रस्ताव भी भारी मतों से पराजित हो गया। पर महिलाएं हिम्मत नहीं हारीं। उनके संघर्ष जारी रहे। लंबी लड़ाई के बाद बिहार और उड़़ीसा में 1929 में यह अधिकार महिलाओं को मिला।
[1] डॉ. शीला रजवार, स्वतंत्र्योत्तर हिन्दी कथा साहित्य में नारी के बदलते संदर्भ
[2] आशारानी वोहरा, औरत : कल, आज और कल
[3] राधा कुमार, स्त्री संघर्ष का इतिहास, पृष्ठ 120
(अनीश कुमार)
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