अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मायने
आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है तो इस अवसर पर पूरे विश्व में इसे सेलिब्रेट किया जा रहा है। अभी हाल में कुछ घटनाओं पर नजर डाले तो महिलाओं की सुरक्षा और उनकी प्रतिनिधित्व पर बड़ा सवाल खड़ा होता है। उनकी भागीदारी व सहमति न के बराबर आज भी दिखती है। भारत के स्तर पर देखे तो ये स्थिति दलित व पिछड़े समुदाय की महिलाओं को लेकर ज्यादा खराब है। अगर शिक्षा की बात करें तो ये स्थिति इसलिए खराब है क्योंकि ज्यादातर महिलाओं व महिला संगठनों को अपनी नायिकाओं का नाम ही नहीं पता होता है। और पता भी है तो वे उसे सामने नहीं लाना चाहती। अक्सर कहा जाता है कि महिलाएं सूद्र होती हैं किन्तु जब किसी बड़े मंच से प्रतिनिधित्व व सहभागिता की बात आती है तो वहाँ "जातिवाद" का जिन्न तुरंत सामने आ जाता है। यह जिन्न सभी जागरूकता व शिक्षा के आगे निकल जाता है। दलित महिलाओं की स्थिति इन्हीं वजहों से खस्ताहाल है। सावित्री बाई फुले, फातिमा शेख, फूलन देवी, उदा देवी पासी, आदि ऐसी बहुत सी बहुजन नायिकाएं हैं जो महिलाओं के हक और न्याय के लिए संघर्षरत थी। लेकिन आज बिडम्बना यह है कि आज के दिन भी मंच से इन सभी नायिकाओं का नाम लेने से महिला संगठन बचती हैं। आदिवासी चिंतक डॉ सुनील कुमार सुमन अपने फेसबुक वॉल पर भी ये चिंता व्यक्त करते हैं।
सभी को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं
जोहार
आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है तो इस अवसर पर पूरे विश्व में इसे सेलिब्रेट किया जा रहा है। अभी हाल में कुछ घटनाओं पर नजर डाले तो महिलाओं की सुरक्षा और उनकी प्रतिनिधित्व पर बड़ा सवाल खड़ा होता है। उनकी भागीदारी व सहमति न के बराबर आज भी दिखती है। भारत के स्तर पर देखे तो ये स्थिति दलित व पिछड़े समुदाय की महिलाओं को लेकर ज्यादा खराब है। अगर शिक्षा की बात करें तो ये स्थिति इसलिए खराब है क्योंकि ज्यादातर महिलाओं व महिला संगठनों को अपनी नायिकाओं का नाम ही नहीं पता होता है। और पता भी है तो वे उसे सामने नहीं लाना चाहती। अक्सर कहा जाता है कि महिलाएं सूद्र होती हैं किन्तु जब किसी बड़े मंच से प्रतिनिधित्व व सहभागिता की बात आती है तो वहाँ "जातिवाद" का जिन्न तुरंत सामने आ जाता है। यह जिन्न सभी जागरूकता व शिक्षा के आगे निकल जाता है। दलित महिलाओं की स्थिति इन्हीं वजहों से खस्ताहाल है। सावित्री बाई फुले, फातिमा शेख, फूलन देवी, उदा देवी पासी, आदि ऐसी बहुत सी बहुजन नायिकाएं हैं जो महिलाओं के हक और न्याय के लिए संघर्षरत थी। लेकिन आज बिडम्बना यह है कि आज के दिन भी मंच से इन सभी नायिकाओं का नाम लेने से महिला संगठन बचती हैं। आदिवासी चिंतक डॉ सुनील कुमार सुमन अपने फेसबुक वॉल पर भी ये चिंता व्यक्त करते हैं।
सभी को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं
जोहार
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