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Wednesday, 12 August 2026

सावित्री बाई फुले को सिर्फ अतीत में नहीं बल्कि वर्तमान में देखने की जरूरत है डॉ. अनीश कुमार

        शिक्षा समाज के जागरण में मुख्य भूमिका निभाती है । वास्तव में शिक्षा किसी भी देश या समाज के विकास का आधारभूत ढांचा होता है । यह विदित है कि जिस समाज या देश की शिक्षा प्रणाली उच्च कोटि की होती है या यूं कहें कि जिस समाज या देश की शिक्षा उस समाज के सापेक्ष होती है, उस समाज के तत्व निहित होते हैं, उस देश का विकास बहुत तेज गति से होता है । आज दुनिया भर में यह प्रमाणित हो चुका है कि शिक्षा हर एक नागरिक का सम्पूर्ण विकास करती है । शिक्षा हमें जहां एक ओर स्कूली पाठ्यक्रमों से मिलती है वहीं दूसरी ओर सामाजिक परम्पराओं से भी मिलती है । समाज का ढांचा जैसा होगा शिक्षा उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है । मतलब यह कि समाज का ढांचा यदि निम्न वर्ग का है तो उस समाज के शिक्षा कि महत्ता और अधिक बढ़ जाति है । गौरतलब है कि जिस समाज के भीतर स्त्रियाँ अधिक जागरूक होती है वह समाज कहीं अधिक विकसित हो रहा होता है । स्त्रियों के भीतर एक प्रशासक की क्षमता पुरुषों की अपेक्षा अधिक बेहतर होता है । भारत देश में ऐसी कई नायिकाएँ हैं जिन्होंने अपना योगदान देकर समाज को एक नयी दिशा प्रदान की है ।  इनमें सावित्री बाई फुले का नाम अग्रणीय है । इन्हें क्रांतिज्योति भी कहा जाता है । क्रांति सिर्फ राजनीतिक रूप में नहीं होती बल्कि समाज के भीतर फैली विभेदता, अंधविश्वास आदि को दूर करने के लिए विचारों कि क्रांति भी होती है । सावित्री बाई फुले के द्वारा जलायी गयी ज्योति आज के समय में और अधिक प्रासंगिक है ।

            आज देश की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले के योगदान को जिस तरह याद करना चाहिए, वैसे नहीं किया जाता । 19वीं सदी में जब देश में राजनैतिक गुलामी के साथ-साथ सामाजिक गुलामी का भी दौर था, तब सावित्री बाई फुले ने शिक्षा के महत्व को जाना, समझा और महिलाओं की आज़ादी के नए द्वार खोलकर उनमें नई चेतना का सृजन किया । स्त्रियों को उनके अधिकारों के प्रति चेतना से लैस किया । यदि दूसरे पक्ष से देखें तो हम पाते हैं कि संविधान लागू होने बाद स्त्रियों को उनका अधिकार कानूनी रूप से मिला है किन्तु सावित्री बाई फुले इस अधिकार की बात स्वतन्त्रता के पहले ही कर रही थीं । इस लिहाज से आज के समय में उनके द्वारा किए गए योगदान को समझना और जानना और भी जरूरी हो जाता है कि कैसे उन्होंने उस दौर में स्त्रियों के अधिकारों, अशिक्षा, छुआछूत, सतीप्रथा, बाल या विधवा-विवाह जैसी कुरीतियों पर आवाज उठाई होगी? कैसे उन रूढ़िवादी परंपराओ को तोड़कर महिलाओं को पढ़ने व आगे बढ़ने की राह दी होगी और देश की आधी आबादी महिलाओं को शिक्षा के माध्यम से मुख्यधारा में ला खड़ा किया होगा । उनका यह कार्य उनके स्त्री होने के कारण कहीं अधिक दुरूह था जबकि पूरा समाज पितृसत्ता कि जड़ों से लैस था । ऐसे में दांत के भीतर जीभ बनकर उन्होंने न केवल स्त्रियों के बारें में सोचा बल्कि एक नया रास्ता भी तैयार किया ।  

तत्कालीन प्रतिकूल परिस्थितियों में समाज सुधारक सावित्री बाई फुले एक युग नायिका बनकर उभरीं । उन्हें सिर्फ समाज सुधारक कहकर उनके द्वारा किए गए कार्यों को सीमित नहीं किया जा सकता । अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, निर्भीक व्यक्तित्व, सामाजिक सरोकारो से ओत-प्रोत ज्योतिबा फुले के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दकियानूसी समाज को बदलने हेतु इन्होंने अपने तर्कों के आधार पर बहस किया । आज की स्त्री अभी भी इन तर्कों को अपने विषय वस्तु में शामिल करने से कतराती है । वे स्त्री जीवन को गौरवान्वित किया एवं सामाजिक न्याय को लक्षित किया । दरअसल आज देखिये तो सावित्री बाई फुले को सिर्फ दलित वर्ग की समाज सुधारक के तौर पर ही देखा जाता है । कहा जाता है कि स्त्रियाँ जन्म से ही शूद्र होती हैं हालांकि वर्णव्यवस्था के अनुसार शूद्र सबसे निचले पायदान पर रखा गया है इसलिए स्त्रियाँ भी समाज में सबसे निचले पायदान पर ही मानी गई हैं चाहें वह किसी वर्ग/जाति की हों । ऐसे में यदि सावित्री जी स्त्री हितों की बात करती हैं तो वह सिर्फ दलित स्त्रियों की ही बात नहीं करती हैं । उनकी पाठशाला और विधवा आश्रमों में सभी वर्गों की महिलाओं का प्रवेश होता था । किन्तु आज के समय में हम यह देखते हैं कि ज़्यादातर गैर दलित स्त्रियाँ सावित्री बाई को अपनी नायिका नहीं मानती हैं ।

            सावित्री बाई फुले को सिर्फ इस लिहाज से न देखा जाए कि वह एक दलित महिला थीं और उन्होंने कुछ स्कूलों की स्थापना की । उनका योगदान सिर्फ कुछ जातियों के विकास तक नहीं सीमित है । सावित्री बाई फुले अपने आपको एक मनुष्य की दृष्टि से देखती थीं । उनके समय में किसी भी जाति की महिलाओं को पढ़ने का अधिकार न के बराबर था । उन्होंने सभी वर्ग की महिलाओं के लिए स्कूल खोले और उसमे बिना किसी भेदभाव के सभी उपस्थिती सुनिश्चित किया । इस कार्य में उनके जीवन साथी ज्योतिबा फुले जी का पूरा योगदान मिला । फुले दंपति शिक्षा को बेहद महत्व देते थे । ज्योतिबा फुले के द्वारा चलाये गए शिक्षा के आंदोलन को सावित्री बाई फुले ने बखूबी आगे बढ़ाने में पूरा सहयोग दिया । ज्योतिबा फुले विद्या के महत्व धार्मिक किताबों से कहीं अधिक महत्व देते थे उनका मानना था कि -

विद्या बिना मति गयी, मति बिना नीति गयी

नीति बिना गति गयी, गति बिना वित्त गया

वित्त बिना शूद्र गये !

इतने अनर्थ एक अविद्या ने किये ।

महात्मा फुले ने जीवन में शिक्षा के अभाव से पड़ने वाले प्रभाव को रेखांकित करते हुए ये पंक्तियां किसानों का कोड़ानामक किताब में लिखी है । ज्योतिबा फुले ने समय रहते शिक्षा के महत्व को पहचाना । उन्होंने महसूस किया कि बहुजन समाज और उनके आसपास की महिलाएं शिक्षा की कमी के कारण गुलामी में हैं । इस आधार पर उन्होंने सुझाव दिया है कि ज्ञान की कमी के चलते बहुजन समाज को दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का जीवन भर सामना करना पड़ता है । उन्होंने निदान बताते हुए कहा है कि इस दुर्भाग्य की जड़ अज्ञानता है ।

स्त्री और दलितों की शिक्षा के प्रति फूले दम्पत्ति की प्रतिबद्धता किसी जूनून से कम नहीं थी । लगातार पैसे की कमी के बावजूद भी वे समर्पित भाव से इस काम में लगे रहे । उनका समर्पण इस रूप में स्पष्ट दिखाई देता है कि उन्होंने पूणे शहर और उसके आसपास कुल 18 स्कूल खोले जहां सभी विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा दी जाती थी । सावित्रीबाई द्वारा पढ़ाए गए न जाने कितने ही छात्रों के जीवन में उससे भारी परिवर्तन आया । लेकिन उनके इस योगदान को भारतीय महिलाएं या तो भूल गईं या जानबूझकर भुला दी गई । हम जब भी सावित्री बाई को याद करते हैं तो उन्हें सिर एक इतिहास की पात्र होने नाते याद करते हैं या उनके कार्यों को एक कहानी के तौर पर याद करते हैं । उनके विचारों को हम आत्मसात नहीं करते हैं । जबकि कहीं अधिक जरूरी यह होता है । सावित्री बाई फुले सिर्फ स्कूल खोलकर शिक्षा देने का कार्य नहीं किया बल्कि एक ऐसे समय में शिक्षा दे रही थीं जब उन्हें खुद पढ़ने का समय नहीं था । इसके बावजूद वह स्त्रियों को समाज, संस्कृति आदि के बारे में बता रही थी । उनकी कविताओं के एक-एक शब्द चिल्ला-चिल्लाकर स्त्रियों, दलितों को उनके अधिकारों के प्रति इंगित कर रहे हैं । इसे सिर्फ क्रांतिकारिता कह कर करके सीमित नहीं किया जा सकता । उन विचारों का समाज भीतर प्रभाव को भी देखना चाहिए और उनके विचारों को आत्मसात करना चाहिए ।    

दरअसल स्त्रियों उनका सम्मान से जीवित रहना बड़ी चुनौती है इसके लिए उनका आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना ही एकमात्र उपाय है जिसके लिए उन्होंने कई धार्मिक मान्यताओं को तोड़ा और स्त्रियों को अपने बुनियादी अधिकारों के लिए जागरूक किया । यही बात आगे चलकर प्रभा खेतान भी कहती हैं कि स्त्रियों कि आजादी उनके पर्स से शुरू से होती है । सावित्री बाई फुले ने स्त्री की सदियों पुरानी शारीरिक और मानसिक रूप से गुलाम छवि को ध्वस्त कर उसे स्वतंत्र इंसान के रूप में जीने के लिए प्रेरित किया । यह सत्य है कि स्त्री केवल श्रम और देह ही नहीं बल्कि स्वतंत्र विचार रखने वाली पुरूष के सामान इंसान है । उसे इसी रूप में देखने की जरूरत है । यह सोचने पर समाज को विवश कर ज्योतिबा के परिवर्तनवादी आंदोलन में पूरा सहयोग दिया ।

आज भारतीय समाज के जो हालात हैं उससे यह दिखाई देता है कि भारतीय समाज फिर से उन्हीं सामाजिक बुराइयों कि तरफ लौट रहा है । जिसका सावित्री बाई आजीवन विरोध करती रहीं । स्त्रियों और दलितों को सावित्री बाई गुलामी से मुक्त कर उन्हें सम्मान के साथ जीने के लिए जिन्दगी भर संघर्ष करती रहीं उनको फिर गुलाम बनाए रखने की साज़िश होने लगी है । उनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पहरा लगाया जा रहा है । उन्हें उनके मानवाधिकारों से वंचित किया जा रहा है । समाज कि आधी आबादी महिलाओं/लड़कियों को ऐसे माहौल में शिक्षा के साथ-साथ स्वाभिमान से जीने के लिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना बहुत ज़रूरी है । उनका अपने हक़-अधिकारों के लिए जागरूक होना जरूरी है । महिलाएं अपने आपको एक मनुष्य की दृष्टि से देखें । उनके मनुष्य बनने के रास्ते में जो भी आए उससे संघर्ष करना जरूरी हो गया है । और जब उनके अधिकारों का हनन हो तो उसके लिए संघर्ष करना, लड़ना बहुत जरूरी है । यदि आज लड़कियां और महिलाएं सावित्री बाई फुले की शिक्षा को अपनाएं और उनको अपना रोल मॉडल बनाएं तो कोई उनका किसी भी प्रकार का शोषण नहीं कर सकता । कोई उन पर हिंसा नहीं कर पायेगा । कोई उन पर पितृसत्ता व्यवस्था नहीं थोप पायेगा । जब महिलाएं शत-प्रतिशत आत्मनिर्भर बनेगीं तो इससे देश का भी विकास होगा और देश प्रगतिशील बनेगा । सावित्री बाई फुले से प्रेरणा लेकर शिक्षित-जागरूक लड़कियां अन्य लड़कियों और महिलाओं को शिक्षित, जागरूक कर समाज और देश के विकास प्रगति में अपना योगदान कर सकती हैं । जब स्त्रियाँ पढ़-लिख कर शिक्षित होकर, सावित्री बाई के संघर्ष को जानकार जितना जागरूक होंगी समाज का विस्तार उतना ही अधिक होगा । समाज से पितृसत्ता धीरे-धीरे खत्म होने लगेगी ।

 

शिक्षा का लोकतान्त्रिक मूल्य और डॉ. भीमराव अम्बेडकर- डॉ. अनीश कुमार

 डॉ. भीमराव अंबेडकर एक ऐसे नेता रहे हैं जिन्हें भारत में सभी विचारधाराओं के लोग मानते रहे हैं । यह उनका कद ही तो है जो उन्हें अखिल भारतीय स्तर पर ख्याति दिला रहा है । आज उन्हें संपूर्णता में देखने की जरूरत है ।


शिक्षा देश की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक क्रांति का आधार है । डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा दिया गया सूत्र ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’ इस सूत्र में ही उनके संघर्षपूर्ण जीवन का व उनके शैक्षिक विचारों का सारांश छिपा हुआ है । इसलिए डॉ. अम्बेडकर ने स्पष्ट कहा कि ‘शिक्षा शेरनी का वह दूध है जो पियेगा वह दहाड़ेगा ।’ उनका मानना था कि यदि दलित समाज की महिलाएं शिक्षित होंगी तो वे अपनी संतानों को भी शिक्षित व संस्कारवान बना सकती है तथा जीवन में आने वाली कठिनाइयों को हल कर सकेंगी । डॉ. अंबेडकर ने केवल अनुसूचित समाज की शिक्षा पर ही बल नहीं दिया अपितु प्रत्येक वर्ग के सभी महिला व पुरुषों को सामान रूप से शिक्षा मिले, इस पर उनके विचार एक दम स्पष्ट थे । डॉ. अंबेडकर किसी भी समाज के विकसित होने पैमाना यह मानते हैं कि उस समाज की स्त्रियाँ कितनी शिक्षित हैं । उनका मानना था कि जितनी शिक्षा पुरुषों के आवश्यक है उतनी ही महिलाओं के लिए । स्त्रियाँ किसी भी समाज की मूल आधार होती हैं । यह कुल जनसंख्या की आधी आबादी हैं । ऐसे में उन्हें हाशिये पर रखकर किसी भी परिवार, समाज का वास्तविक विकास नहीं हो सकता ।

आगे चलकर ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’ का यह नारा डॉ. अंबेडकर का सबसे अमूलचूल परिवर्तन लाने वाला नारा बन गया । कालांतर में इसका प्रभाव खासकर वंचित समुदायों के सामाजिक परिष्करण में दिखाई दिया । डॉ. भीमराव अंबेडकर ने देश के निर्धन और वंचित समाज को प्रगति करने का जो सूत्र दिया था, उसकी पहली इकाई शिक्षा ही थी । इससे अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि वे गतिशील समाज के लिये शिक्षा को कितना महत्व देते थे । पढ़ो और पढ़ाओ । इस सूत्र का अर्थ स्पष्ट है कि संगठित होने और न्याययुक्त संघर्ष करने के लिये प्रथम शर्त शिक्षित होने की ही है । इस मामले में डॉ. अंबेडकर की दृष्टि एकदम साफ़ है । साधन सम्पन्न समाज के बच्चों के लिये जीवन में प्रगति के अनेक रास्ते हैं । शिक्षा से भौतिक जगत में गतिशील होने की क्षमता तो प्राप्त होती ही है, बौद्धिक विकास भी होता है । शिक्षा व्यक्ति के आंतरिक एवं बाह्य गुणों का विकास कर उसके व्यक्तित्व निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है । वास्तव में लोकतन्त्र के निर्मित होने की पहली कड़ी शिक्षा ही है ।


    पारम्परिक शिक्षा व्यवस्था के स्थान पर लोकतान्त्रिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करने वाले विचारकों में ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु एवं डॉ. भीमराव अम्बेडकर का नाम अग्रणी है । महात्मा फुले ने हंटर कमीशन को भेजे ज्ञापन में शिक्षा के जिन लोकतान्त्रिक मूल्यों की तरफ ध्यान आकृष्ट किया था, डॉ. अम्बेडकर इसी विरासत को आगे बढ़ाने वाले उल्लेखनीय विचारक हैं । अपने लेखन से राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान प्राप्त डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने शिक्षा विषयक विचार स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त किये जो उनके भाषणों, लेखों, संपादकीयों एवं पुस्तकों में परिलक्षित होते हैं । शिक्षा लोकतंत्र के लिए सदैव सबसे बड़े सहारे तथा एक स्थायी साथी के रूप में रही है । शिक्षा के बिना लोकतंत्र का औचित्य तथा इसका प्रभाव बड़ी सीमित रह जाती है । दूसरी ओर लोकतंत्र के बिना शिक्षा अर्थहीन है । वास्तव में लोकतंत्र और शिक्षा में एक अन्योन्य या पारस्परिक संबंध होता है, तथा वे एक दूसरे के बिना पनप नहीं सकते ।

डॉ. अंबेडकर प्राथमिक स्‍तर से ही वैज्ञानिक शैक्षणिक विधियों के पक्षधर थे । उनका मानना था कि अच्‍छे स्‍वास्‍थ्‍य के लिए सफाई की आदत और शारीरिक शिक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए । समाज के वंचित तबकों के बच्‍चों के बारे में उन्‍होंने कहा, “ऐसे बच्‍चों के लिए पहला पाठ नहा-धोकर स्‍वच्‍छ रहना होना चाहिए, दूसरा पाठ साफ-सुथरा संतुलित भोजन होना चाहिए और जो ऐसा करते हैं उन्‍हें विद्यालय में प्रोत्‍साहित करना चाहिए ताकि बाकी बच्‍चे सबक ले सकें ।” इसके साथ ही डॉ. अंबेडकर ने शुरू से ही बच्‍चों में अच्‍छे संस्‍कार व अच्‍छी आदतें डालने की वकालत की । उनके अनुसार “अच्‍छे संस्‍कार लंबी कोशिश व क‍ठोर संयम का नतीजा होते हैं, जो दूसरों की सहूलियतों का भी ध्‍यान रखते हैं । अच्‍छे संस्‍कार प्राथमिक रूप से मां-बाप व अध्‍यापकों से सीखते हैं लेकिन बाद में खुद इनकी जांच-पडताल कर इन पर अपना विश्‍वास दृढ करते हैं । अच्‍छी आदतें बहुत मुश्किल से आती हैं जबकि बुरी आदतें बच्‍चे तेजी से ग्रहण करते हैं, इस तथ्‍य को हमेशा ध्‍यान में रखना चाहिए । बुरी आदतें ही व्‍यक्ति और समाज का पतन करती हैं । शांत व्‍यवहार, मीठी बोली, सभ्‍य तरीका आदि ही तो अच्‍छी संस्‍कृति का निर्माण करते हैं ।”

शिक्षा पर विचार करते वक्‍त तमाम भारतीय शिक्षाशास्त्रियों का बल प्राथमिक शिक्षा पर रहा है । डॉ. अंबेडकर इससे थोडे अलग ढंग से सोचते हैं । उन्‍होंने आंकडों द्वारा इस बात को रेखांकित किया कि अस्‍पृश्‍य जातियों में प्राथमिक शिक्षा के स्‍तर तो विद्यार्थी आ रहे हैं लेकिन वे उच्‍च शिक्षा तक नहीं पहुंच पाते । इसकी वजहों के तौर पर डॉ. अंबेडकर ने रेखांकित किया कि दलित वर्गों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होती इसलिए वे उच्‍च शिक्षा तक नहीं पहुंच पाते । वास्तव में डॉ. अंबेडकर एक दूरद्रष्टा विचारक थे । वे दलितों के लिए उच्‍च शिक्षा की वकालत तो करते ही थे, साथ ही भारत में शिक्षण संस्‍थाओं की दयनीय हालत को देखते हुए वे दलितों को विदेशी विश्‍वविद्यालयों तक की पहुंच संभव बनाना चाहते थे । तत्‍कालीन भारतीय और ब्रिटिश सरकारों के बारे में डॉ. अंबेडकर की स्‍पष्‍ट आलोचना थी कि वे दलितों के लिए उच्‍च शिक्षा मुहैया कराने हेतु पर्याप्‍त प्रयास नहीं कर रही हैं।

डॉ. अंबेडकर के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण भी होना चाहिए । समाज के विकास के लिए उसके सदस्यों का चरित्रवान होना आवश्यक है क्योंकि चरित्रवान व्यक्ति ही अपने ज्ञान का उपयोग समाज के कल्याण के लिए करेगा । वहीं वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना भी शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए । जिससे की विद्यार्थी अपनी समस्याओं का समाधान अनुसंधान पूर्ण ढंग से कर सकें तथा ही तथ्य विचारों की तह तक जाकर उनका विश्लेषण कर सके तथा साथ ही तथ्य दे सके ।

डॉ. अंबेडकर विद्यालय को एक सामाजिक संस्था मानते हैं । समाज अपने सदस्यों की शिक्षा के लिए इनका निर्माण करता है । वे विद्यालयों को ऐसा बनाना चाहते थे जो समाज को नया रुप देने में सहायक हो । इसलिए वे परम्परागत विद्यालयों के स्वरुप को स्वीकार नही करते क्योंकि उनमें बच्चों को पूर्व निश्चित परम्पराओं व आदर्शों का ज्ञान कराया जाता है जो कि सामाजिक समता व विकास में बाधक है । डॉ. अंबेडकर ने कहा कि “विद्यालयों की स्थापना बच्चों को बारहखड़ी पढ़ाने के लिए नहीं बल्कि उनके मन को सुसज्जित कर समाज हितोपयोगी बनाने के लिए होनी चाहिए । विद्यालय श्रेष्ठ नागरिक तैयार करने के कारखाने हैं अर्थात् कारखाने का मिस्त्री जितना होशियार होगा, वहां से निकलने वाला माल भी उतना ही उत्तम होगा ।

दरअसल डॉ. अंबेडकर विद्यालय को समाज का लघुरुप मानते थे, इसलिए उन्होंने विद्यालय में सामूहिक शिक्षा पद्धति पर बल दिया तथा विद्यालय में स्वतंत्रता, समता और भ्रातृत्व के वातावरण पर बल दिया । उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को आत्मानुभूति व आत्मोन्नति करना व नैतिक विकास करना है । इस सबके लिए सामाजिक आदर्शों मूल्यों व नैतिकता से पूर्ण उच्च सामाजिक पर्यावरण की आवश्यकता है जो कि विद्यालयों में ही सम्भव है । विद्यालय में विद्वान शिक्षक के द्वारा शील का निर्माण किया जाता है और बालकों का नैतिक विकास होता है ।


 - डॉ. अनीश कुमार

लेखक गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन करते हैं । 

Sunday, 24 August 2025

शिक्षा और विश्वविद्यालयों को समावेशी बनाना होगा - डॉ. अनीश कुमार

             भारत की शिक्षा व्यवस्था को देश की रीढ़ कहा गया है, क्योंकि शिक्षा ही वह माध्यम है जिससे एक व्यक्ति न केवल ज्ञान प्राप्त करता है, बल्कि समाज, संस्कृति, मूल्य, और उत्तरदायित्व को भी समझता है। शिक्षकों की भूमिका इस संपूर्ण व्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाते, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों का निर्माण करते हैं। किंतु आज शिक्षा व्यवस्था अनेक चुनौतियों से जूझ रही है और विशेष रूप से शिक्षक वर्ग अनेक समस्याओं का सामना कर रहा है।

            भारत की शिक्षा व्यवस्था में बीते दशकों में कई सुधार हुए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 जैसे प्रयासों ने नई दिशा देने की कोशिश की है। डिजिटल शिक्षा, कौशल-आधारित पाठ्यक्रम, और मूल्य शिक्षा को बढ़ावा देने के प्रयास हो रहे हैं। फिर भी वास्तविकता यह है कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच भारी असमानता है। स्कूलों की अवस्थापना सुविधाएँ, शिक्षकों की संख्या, डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता आदि क्षेत्रों में भारी अंतर है।


            बहुत से राज्यों में शिक्षकों को समय पर वेतन नहीं मिलता। संविदा शिक्षकों की स्थिति और भी दयनीय है। उन्हें स्थायी नौकरी की गारंटी नहीं होती और वे न्यूनतम वेतन पर कार्य करते हैं। साथ ही
, महँगाई के इस दौर में वेतन संरचना अपर्याप्त सिद्ध हो रही है। शिक्षकों से पढ़ाने के अलावा अनेक गैर-शैक्षणिक कार्य करवाए जाते हैं, जैसे जनगणना, चुनाव ड्यूटी, मध्यान्ह भोजन की निगरानी आदि। इससे उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता और शिक्षण में समय प्रभावित होता है। नई तकनीक और शैक्षिक पद्धतियों के अनुरूप शिक्षकों का पुनः प्रशिक्षण (retraining) नहीं हो रहा है। बहुत से शिक्षक डिजिटल उपकरणों के प्रयोग में दक्ष नहीं हैं, जिससे ऑनलाइन शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

            पहले शिक्षक को 'गुरु' का दर्जा प्राप्त था, परंतु आज समाज में शिक्षकों का सम्मान धीरे-धीरे घट रहा है। विद्यार्थी, अभिभावक और प्रशासन तीनों से अपेक्षित सहयोग और सम्मान का अभाव है। विद्यालयों में कई बार शिक्षकों को ऐसे छात्रों से जूझना पड़ता है जो अनुशासनहीन होते हैं। इसके अलावा परीक्षा परिणाम, बोर्ड के दिशा-निर्देश और सरकारी लक्ष्य प्राप्ति का अतिरिक्त दबाव भी शिक्षक पर पड़ता है। अत्यधिक परीक्षा केंद्रित शिक्षा: सोचने-समझने की स्वतंत्रता की जगह अंक पाने की होड़ ने शिक्षा को रटंत प्रणाली बना दिया है। कई बार सरकार की योजनाएँ अच्छी होती हैं, पर उनका क्रियान्वयन कमजोर होता है।

            भारत की शिक्षा व्यवस्था और शिक्षक दोनों समाज के विकास के मूल स्तंभ हैं। यदि शिक्षक को उचित सम्मान, सुविधाएँ, और स्वतंत्रता दी जाए, तो वह अपने कर्तव्यों का निर्वहन अधिक प्रभावी ढंग से कर सकेगा। हमें यह समझना होगा कि एक सशक्त शिक्षक ही सशक्त राष्ट्र का निर्माता होता है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था की मजबूती का पहला कदम शिक्षकों की समस्याओं का समाधान ही होना चाहिए।

            शिक्षक किसी भी समाज की आत्मा होते हैं। वे न केवल ज्ञान का संचार करते हैं, बल्कि समाज की दिशा और दशा को भी निर्धारित करते हैं। शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह मानवता, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध कराने वाला माध्यम भी है। इस संदर्भ में शिक्षक की भूमिका एक युगनिर्माता की होती है, जिसका प्रभाव पीढ़ियों तक बना रहता है। प्राचीन भारतीय संस्कृति में शिक्षक को "गुरु" कहा गया है, जो अज्ञान रूपी अंधकार से मुक्ति दिलाने वाला होता है। एक शिक्षक समाज की बुनियाद मजबूत करता है। वह विद्यार्थियों को केवल किताबी ज्ञान नहीं देता, बल्कि उन्हें सोचने, समझने और समाज के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देता है। शिक्षक एक ऐसा दीपक है जो स्वयं जलकर दूसरों के जीवन को प्रकाशमय बनाता है।

             आज का समाज जिस नैतिक संकट से गुजर रहा है, उसमें शिक्षक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। वह विद्यार्थियों में सत्य, करुणा, अहिंसा, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा जैसे मूल्यों का विकास करता है। शिक्षक का कर्तव्य है कि वह अपने आचरण से नैतिकता का उदाहरण प्रस्तुत करे और विद्यार्थियों को भी उस मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करे।

            शिक्षक समाज में व्याप्त असमानताओंजैसे जातिवाद, लिंग भेद, आर्थिक विषमता आदिके विरुद्ध जागरूकता फैलाने वाला साधन बन सकता है। वह शिक्षा को समावेशी बनाकर विद्यार्थियों में समानता, सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों की भावना का विकास करता है। इससे समाज अधिक संतुलित और न्यायपूर्ण बनता है। एक शिक्षक की भूमिका केवल विद्यालय तक सीमित नहीं होती। वह समाज के व्यापक कार्योंजैसे महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण सुरक्षा, स्वच्छता अभियान, स्वास्थ्य जागरूकता आदिमें भी सक्रिय भाग ले सकता है। ऐसा करके शिक्षक समाज में एक आदर्श और प्रेरणास्रोत के रूप में स्थापित होता है। शिक्षक को बाल अधिकारों के प्रति भी जागरूक रहना चाहिए। उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके विद्यार्थियों को किसी प्रकार का शोषण या भेदभाव न सहना पड़े। बाल श्रम, बाल विवाह और लैंगिक असमानता जैसे मुद्दों पर शिक्षक की सजग दृष्टि और सक्रिय भूमिका समाज में बड़े परिवर्तन ला सकती है।

            शिक्षक विद्यार्थियों को उनके सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं से जोड़ने का कार्य करता है। वह भाषा, लोककला, त्योहारों, और ऐतिहासिक परंपराओं को सम्मान दिलाता है। इससे समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहता है और वैश्वीकरण की दौड़ में अपनी पहचान नहीं खोता। भारत एक लोकतांत्रिक देश है और इस व्यवस्था की रक्षा के लिए नागरिकों में लोकतांत्रिक मूल्यों की समझ होना आवश्यक है। शिक्षक विद्यार्थियों को समानता, स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और भाईचारे जैसे संविधानिक सिद्धांतों से परिचित कराता है और उन्हें व्यवहार में उतारने की प्रेरणा देता है। शिक्षक अपने विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता, निर्णय लेने की शक्ति, संवाद कौशल और समस्या समाधान की क्षमता का विकास करता है। यह गुण उन्हें भविष्य में समाज का नेतृत्व करने और उसमें सकारात्मक परिवर्तन लाने की दिशा में समर्थ बनाते हैं।

            शिक्षक का कार्य केवल पढ़ाना नहीं है, बल्कि समाज को जागरूक, संवेदनशील, नैतिक और सशक्त बनाना भी उसका दायित्व है। यदि शिक्षक अपने सामाजिक कर्तव्यों को निष्ठा, संवेदनशीलता और समर्पण के साथ निभाए, तो समाज न केवल शिक्षित होगा, बल्कि संस्कारित और समृद्ध भी बनेगा। ऐसे शिक्षक ही एक सशक्त राष्ट्र और समतामूलक समाज के वास्तविक निर्माता होते हैं। "एक शिक्षक की समाज में भूमिका किसी दीपक की तरह है, जो स्वयं जलता है और दूसरों के जीवन में उजाला करता है।"

            शिक्षक केवल ज्ञान का दाता नहीं होता, बल्कि वह समाज के निर्माण का प्रमुख स्तंभ होता है। उसका कर्तव्य न केवल विद्यार्थियों को पढ़ाना है, बल्कि उन्हें एक उत्तरदायी नागरिक बनाना भी है। एक अच्छा शिक्षक समाज में नैतिक मूल्यों, सहिष्णुता और समानता की भावना का बीजारोपण करता है। भारतीय संस्कृति में शिक्षक को "गुरु" कहा गया है, जो माता-पिता के बाद सबसे अधिक सम्मान का पात्र होता है। सामाजिक दृष्टि से शिक्षक वह दीपक है जो अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर समाज को प्रकाशमान करता है। उसके विचार, व्यवहार और कार्य समाज पर गहरा प्रभाव डालते हैं। आज के यांत्रिक और प्रतियोगितात्मक युग में नैतिक मूल्यों का ह्रास होता जा रहा है। शिक्षक का सामाजिक कर्तव्य है कि वह विद्यार्थियों को सत्य, अहिंसा, करुणा, और अनुशासन जैसे गुणों से परिचित कराए। एक शिक्षक की शिक्षा केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं होनी चाहिए। एक शिक्षक को समाज में व्याप्त असमानता, जातिवाद, लिंगभेद आदि के खिलाफ जागरूकता फैलानी चाहिए। उसका दायित्व है कि वह अपने विद्यार्थियों को समावेशी और न्यायप्रिय दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा दे ताकि वे सबके लिए समान अवसर के पक्षधर बनें।

            शिक्षकों को स्कूल की चारदीवारी से बाहर निकलकर ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण, स्वच्छता अभियान, पर्यावरण संरक्षण जैसे सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय भाग लेना चाहिए। इससे वे समाज में प्रेरक व्यक्तित्व के रूप में उभरते हैं। शिक्षक का सामाजिक कर्तव्य यह भी है कि वह बाल श्रम, बाल विवाह, लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर आवाज़ उठाए और विद्यार्थियों को उनके अधिकारों के प्रति सजग करे। वह बच्चों की आवाज़ बनकर उनके सर्वांगीण विकास के लिए प्रयत्न करे। शिक्षक स्थानीय और राष्ट्रीय संस्कृति, परंपरा तथा भाषा को जीवित रखने में सहायक होता है। वह विद्यार्थियों को उनकी सांस्कृतिक पहचान से जोड़ता है और विविधता में एकता की भावना को बल देता है, जिससे सामाजिक समरसता को बढ़ावा मिलता है।

            एक शिक्षक को विद्यार्थियों में लोकतंत्र, समानता, स्वतंत्रता, और धर्मनिरपेक्षता जैसे संविधानिक मूल्यों का विकास करना चाहिए। इससे विद्यार्थी न केवल अच्छे छात्र बनते हैं, बल्कि समाज के जागरूक नागरिक भी बनते हैं। शिक्षक समाज को ऐसे नेतृत्वकर्ताओं की नई पीढ़ी देता है जो राष्ट्रहित में सोचते हैं। वह विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता, संवाद कौशल, और निर्णय लेने की योग्यता विकसित करता है जिससे वे सामाजिक बदलाव के अग्रदूत बन सकें। इस प्रकार, शिक्षक का कार्य केवल विद्यालय में सीमित नहीं है। उसका व्यापक सामाजिक कर्तव्य है समाज में नैतिकता, संवेदनशीलता और विवेक को बनाए रखना। यदि शिक्षक अपने सामाजिक दायित्वों को पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से निभाए, तो न केवल शिक्षा व्यवस्था सशक्त होगी, बल्कि समाज भी स्वस्थ, समतामूलक और उन्नतिशील बनेगा।

 

संपर्क

डॉ. अनीश कुमार 


लेखक गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन करते हैं ।

जनसंदेश टाइम्स, सुबह सबेरे, जनवाणी, युवा शक्ति, अचूक संघर्ष समेत कई अखबारों में लगातार लेखन कार्य । इसके साथ ऑनलाइन पोर्टल यूथ की आवाज, जनपथ, दलित दस्तक आदि पर भी विभिन्न लेख प्रकाशित ।

इसके साथ द पर्सपेक्टिव अंतर्राष्ट्रीय जर्नल तथा हिन्दी विभाग, गुरु घासीदास (केंद्रीय) विश्वविद्यालय, बिलासपुर की संस्थागत त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका स्वनिम के सह-संपादक का निर्वहन ।  

ईमेल anishaditya52@gmail.com तथा मोबाइल नंबर 9198955188 है ।

 

 

Friday, 29 March 2024

बहन मायावती : सियासत और सशक्तिकरण की महानायिका - डॉ. अनीश कुमार

 

भारतीय राजनीति में सफल महिलाओं की संख्या गिनी-चुनी ही हैं। उनमें से एक नाम सुश्री मायावती का आता है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री के तौर पर नेतृत्व करना महिला सशक्तिकरण का सबसे बड़ा उदाहरण है। जिस उम्र में महिलाएं अपना जीवन ठीक से नहीं चला पाती हैं उस उम्र में मायावती सबसे बड़े राज्य का प्रतिनिधित्व कर रही थी। भारत में जाति व्यवस्था के दुष्चक्र से बाहर आ पाना पत्थर पर सर मारने जैसा है। मायावती एक दलित समुदाय से आती हैं ऐसे में वह जातीय संघर्ष करते हुए अपना रास्ता स्वयं बनाती हैं। उनके शासनकाल में उत्तरप्रदेश में दलितों व महिलाओं की स्थिति में अभूतपूर्व बदलाव दिखाई देता था। वह अपने छोटे-बड़े कार्यकाल को मिलाकर कुल चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रही हैं।


देश की सियासत में कई बार किंगमेकर की भूमिका निभाने वाली मायावती एक सशक्त महिला की मिसाल हैं। एक ऐसी नेत्री, जिसे कभी देश के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने लोकतंत्र का चमत्कार (miracle of Democracy)’ कहा था। जिसने सियासी रूप से देश के सबसे ताकतवर सूबे उत्तर प्रदेश की सियासत के तमाम स्थापित समीकरणों को ध्वस्त करके रख दिया था जिसके बाद देश की राजनीति में दलित चेतना के नए युग का सूत्रपात हुआ। मायावती पहली दलित महिला हैं, जो भारत के किसी राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। 1995 में गठबंधन की सरकार बनाते हुए मायावती मुख्यमंत्री बनीं थी, उस समय तक मायावती राज्य की सबसे कम उम्र की मुख्यमंत्री बनी थीं। मायावती ने अपना पहला चुनाव साल 1984 में उत्तर प्रदेश में कैराना लोकसभा सीट से लड़ा था। इसके बाद दूसरी बार साल 1985 में उन्होंने बिजनौर और फिर 1987 में हरिद्वार से चुनाव लड़ा। साल 1989 में मायावती को बिजनौर से जीत हासिल हुई। मायावती पहली बार साल 1994 में राज्यसभा सांसद बनीं। उन्होंने अपने जीवन में उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में ऐसे कार्य किये, जिसके कारण उनके फॉलोवर उन्हें आयरन लेडीके नाम से बुलाते हैं।

इन सबके बावजूद भारतीय राजनीति में महिला सशक्तिकरण के तौर पर मायावती का नाम बहुत कम लिया जाता है। मायावती को सिर्फ इस रूप में ही नहीं देखना चाहिए कि वह एक महिला मुख्यमंत्री थी। अथवा कई बार कि राज्यसभा सदस्य रही थीं। मायावती उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं जो अपने पैरों पर खड़े होने कि जद्दोजहद में लगी हैं। मायावती का जन्म एक बेहद सामान्य से दलित (उपजाति जाटव चमार) परिवार में हुआ था। उनके पिता पोस्ट ऑफिस में कर्मचारी थे और माताजी गृहणी थीं। ऐसे सामान्य से घर से निकलकर मुख्यमंत्री बनना एक ऐतिहासिक कार्य था। अपने जीवनकाल में मायावती को अनेकों जातिगत भेदभावों व अन्य प्रकार कि सामाजिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। अपने मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होने उत्तर प्रदेश में दलितों व महिलाओं के सशक्तिकरण के अनेकों कार्य किए। कई जगह बालिका विद्यालय व अनेकों योजनाएं चलाकर महिलाओं को सशक्त बनाने का कार्य किया।

मायावती की एक खासियत यह भी है कि इन्होंने मान्यवर कांशीराम के सानिध्य और मार्गदर्शन में राजनीति में अपनी पहचान स्वयं बनाई। इनका पारिवारिक पृष्ठभूमि पूरी तरह से गैर राजनीतिक था। पिताजी का सपना था कि बेटी एक आईएएस ऑफिसर या वकील बनकर देश की सेवा करे। लेकिन मायावती कि दृढ़ इच्छा, स्पष्ट वाक्पटुता और मान्यवर कांशीराम के मार्गदर्शन में वो राजनीति की ओर आईं। इस बारे में मायावती ने कहा था मैंने राजनीति में आने का जो फ़ैसला किया तो मुझे दूसरे नेताओं की तरह राजनीति विरासत में नहीं मिली। हमारे परिवार में कोई राजनीति में नहीं है, दूर-दूर तक हमारे रिश्ते नातों में भी कोई राजनीति में नहीं है।लेकिन बिना राजनीतिक विरासत के भी मायावती ने देश की सियासत खलबली मचा दी।

बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम इनकी भाषण कला से इतने प्रभावित हुए थे कि इन्हें राजनीति में आने की सलाह दे डाली। मायावती और कांशीराम के के रिश्ते बेहद विनम्र थे। कांशीराम ने उनके प्रथम भाषण को सुनकर ही उनके राजनीतिक जीवन की भविष्यवाणी कर दी थी। दरअसल इस मुलाक़ात से एक दिन पहले मायावती दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में भाषण दे रही थींमायावती ने मंच से ही कांग्रेसी नेता राजनारायण को दलितों को बार-बार हरिजनकहने पर बुरी तरह लताड़ा था। एक 21 साल की लड़की का ऐसा रुख़ देखकर ही मान्यवर कांशीराम साहब मायावती से इतने प्रभावित हो गए थे कि सीधे उनके घर जाकर उनसे अपने साथ साथ काम करने का अनुरोध किया।

उन दोनों के संबंधों का ज़िक्र पत्रकार नेहा दीक्षित ने कारवांपत्रिका में मायावती पर छपे अपने लेख में किया है। दीक्षित लिखती हैं, “जब कांशीराम अपने हुमायूं रोड वाले घर में आए तो मायावती को वहां रहने के लिए कोई कमरा नहीं दिया गया। जब कांशीराम भारतीय राजनीति के दिग्गजों से अपने ड्राइंग रूम में बैठ कर मंत्रणा कर रहे होते थे, तो मायावती घर के पिछवाड़े के आंगन में दरी पर बैठ कर ग्रामीण इलाकों से आने वाले कार्यकर्ताओं के साथ बात कर रही होती थीं। कांशीराम अपने घर के फ़्रिज को लॉककर चाबी अपने पास रखते थे। उन्होंने मायावती और अपने दूसरे सहयोगियों को निर्देश दे रखे थे कि फ़्रिज से उन लोगों को ही कोल्ड ड्रिंक सर्वकिया जाए जिनसे वो अपने ड्राइंग रूम में मिलते हैं।मायावती और कांशीराम साहब के रिश्ते को लेकर भी सवाल उठते रहे। अक्सर उनके चरित्र पर भी दाग़ लगाने की कोशिश की गई। लेकिन इससे मायावती विचलित नहीं हुईं। एक इंटरव्यू में मायावती ने इस बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में कहा था जब कोई त्याग करके आगे बढ़ता है तो विरोधियों के पास एक ही मुद्दा होता है, कैरेक्टर को लेकर बदनाम करना। मान्यवर कांशीराम जी को मैं अपना गुरु मानती हूँ और वो मुझे अपना शिष्य मानते हैं।

आज के समय में महिलाओं को मायावती को अपने आइकन के तौर देखने की जरूरत है। मायावती ने अपने शासनकाल में उन तमाम दलित, बहुजन नायकों की तस्वीरों व मूर्तियों को स्थापित किया जो नेपथ्य से पीछे थे या गुमशुदा थे। उन्होंने बहुजन राजनीति की नई इबारत लिखी। पूरे उत्तर प्रदेश में बहुजन नायकों को दुबारा स्थापित करने का श्रेय मायावती को ही जाता है। वैसे तो बहुजन राजनीति में पुरे देश में मायावती के नाम के बिना अधूरा है लेकिन बात उत्तरप्रदेश की राजनीति की करें तो वो मायावती के जिक्र के बिना पूरी हो ही नहीं सकती है। उस समय मायावती को यूपी में दलितों के लिए आइकन के रूप देखते थे जो आज भी बरकरार है।

भारत में आरक्षण एक ऐसी प्रणाली है जिसके तहत विश्वविद्यालयों में सरकारी पदों और सीटों का एक प्रतिशत पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जाति और जनजाति के व्यक्तियों के लिए आरक्षित है। अपने राजनीतिक जीवन के दौरान, मायावती ने पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में आरक्षण का समर्थन किया, जिसमें कोटा और धार्मिक अल्पसंख्यकों और आर्थिक रूप से कमजोर उच्च जातियों जैसे समुदायों को शामिल किया गया। अगस्त 2012 में एक बिल को मंजूरी दी गई थी जो संविधान में संशोधन की प्रक्रिया शुरू करती है ताकि राज्य की नौकरियों में पदोन्नति के लिए आरक्षण प्रणाली का विस्तार किया जा सके। जाति के दंश को इस रूप में भी समझा सकता है कि आप बहुत अच्छे हैं, कोई कमी नहीं है आपमें। जाति पता चलते ही आप बुरे हो जाते हैं। आप कामचोर हो जाते हैं, आपकी सारी मेरिटख़त्म हो जाती है और आप आरक्षण का फ़ायदा लेकर हर जगह घुसपैठ करने वाले बन जाते हैं। मायावती ने इन सबको धता बताते हुए अपनी पहचान स्वयं बनाई। मायावती के करियर को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव द्वारा लोकतंत्र का चमत्कारकहा गया है। लाखों दलित समर्थक उन्हें एक आइकन के रूप में देखते हैं और उन्हें बहन जीके रूप में संदर्भित करते हैं।50 बहुजन नायक पुस्तक खरीदें

मायावती स्वयं डॉ. भीमराव अंबेडकर को अपना आदर्श मानती हैं। उन्होंने एकबार अपने पिता से पूछ लिया था कि क्या मैं भी बाबा साहब की तरह काम करूँ तो मेरी भी पुण्यतिथि उनकी तरह मनाई जाएगी। यह सुनकर उनके पिता हतप्रभ रह गए थे। गौरतलब है कि उनके पिताजी ने बाबा साहब कि जीवनी मायावती को पढ़ने के लिए दिया था। यहीं से मायावती बाबा साहब को अपना आदर्श मनाने लगी थी। राजनीति में आने के बाद उनके पिताजी ने उनसे दूरियाँ बना ली थी। मायावती ने आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लिया था ताकि वह बहुजन समाज की सेवा कर सकें।

मायावती को अपने जीवनकाल में यहाँ तक की सांसद बन जाने के बाद भी जातीय भेदभाव सहने पड़े। अजय बोस बहनजी : अ पॉलिटिकल बायोग्राफ़ी ऑफ़ मायावतीमें लिखते हैं, “जब मायावती पहली बार लोकसभा में चुन कर आईं तो उनके तेल लगे बाल और देहाती लिबास तथाकथित सभ्रांत महिला सांसदों के लिए मज़े की चीज़ हुआ करते थे। वो अक्सर शिकायत करती थीं कि मायावती को बहुत पसीना आता है। उनमें से एक ने एक वरिष्ठ महिला सांसद से यहां तक कहा था कि वो मायावती से कहें कि वो अच्छा परफ़्यूमलगा कर सदन में आया करें।सफाई को लेकर उनका व्यवहार धीरे-धीरे बदल गया। मायावती के नज़दीकी लोगों के अनुसार बार-बार उनकी जाति का उल्लेख और उनको ये आभास दिलाने की कोशिश कि दलित अक्सर गंदे होते हैं, का उन पर दीर्घकालीन असर पड़ा। उन्होंने हुक्म दिया कि उनके कमरे में कोई भी व्यक्ति वो चाहे जितना बड़ा ही क्यों ना हो, जूता पहन कर नहीं जाएगा।मायावती की जीवनी लिखने वाली कारंवा पत्रिका की पत्रकार नेहा दीक्षित ने भी अपने लिखे एक लेख द मिशन इनसाइड मायावतीज़ बैटल फ़ॉर उत्तर प्रदेशमें लिखा था, “मायावती में सफ़ाई के लिए इस हद तक जुनून है कि वो अपने घर में दिन में तीन बार पोछा लगवाती हैं।

मायावती होना एक गर्व की निशानी भी है। मायावती भारतीय महिला राजनीति में मनोवैज्ञानिक परिवर्तन भी लाई हैं। अपने कार्यकाल में हमेशा कड़े फैसले लेने व उसको क्रियान्वित करके दिखने की क्षमता सुश्री मायावती में थी। मायावती का मुख्यमंत्री बनना इस बात का संकेत भी है कि हाशिये कि महिलाओं को यदि अवसर दिया जाए तो वह समाज व देश कि सेवा में आमूलचूल परिवर्तन लाने में सक्षम हैं। मायावती द्वारा किया गया कार्य हाशिये के समाज के लिए एक इतिहास बन गया है। आज भारत की कोई भी हाशिये के वर्ग की महिला मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री बनने का सपना देख सकती है। यह ताकत उसे मायावती से मिलती है। अपने राजनीतिक जीवन में तमाम असहमतियों व सफलता-असफलता के बावजूद मायावती भारतीय राजनीति की एकमात्र दलित राजनेता हैं जिन्हें आप पूरी तरह से नकार नहीं सकते हैं। विरोध के बावजूद उनके किए कार्यों का बखान तो करना ही पड़ेगा। उत्तर प्रदेश की दलित महिलाएं जो कभी पुरुषों के आज्ञा के बगैर घर से बाहर नहीं निकलती थी वह मायावती के राजनीतिक रैलियों में बड़े आदर के साथ मायावती का कटाउट या उनका मुखौटा लिए हिस्सा लेती हैं।

मायावती के होने से हाशिये के समाज की महिलाओं के अंदर एक चेतना आई है। मायावती अपने शासनकाल में कई विवादों और घोटालों के आरोपों में जरूर रही हों पर उनका राजनितिक अभ्युदय सचमुच अद्भुत रहा है। एक सामान्य परिवार से आई दलित महिला ने ऐसा मक़ाम हासिल किया जैसा इस देश के इतिहास में कम ही महिलाओं ने किया है। विवादों की परवाह किए बिना मायावती के समर्थको ने हर बार उनका साथ दिया और अपनी वफादारी साबित की है। मायावती ने दलितों के दिल में अपनी खुद की जगह बनाई है और दलितों में अपने प्रति विश्वास कायम किया है। जो मायावती को उनकी ज़िन्दगी में एक सफल राजनेता बनाता है। मायावती अभी तक अविवाहित है जो की उनके किये कार्यो के प्रति लगन और उनके सिद्धांतो को दर्शाता है। हमारे देशवासियों को ऐसी महिला राजनेता पर गर्व होना चाहिए। मायावती ने अपनी चौथे कार्यकाल में बहुजन इतिहास को जीवित करने के लिए भी काफ़ी काम किया। मायावती ने बहुजन नायक-नायिकाओं के सम्मान में ऐतिहासिक काम कर दिखाया। जिन बहुजन नायक-नायिकाओं को इतिहास में कभी उचित सम्मान नहीं मिला था, मायावती ने उनकी शानदार प्रतिमाएँ लगाकर बहुजन समाज से उनका परिचय कराया।

मायावती के जीवन संघर्ष पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के प्रो. विवेक कुमार ने पिछले दिनों अपने एक लेख में लिखा था, ‘यह विडंबना है कि लोग आज मायावती के गहने देखते हैं, उनका लंबा संघर्ष और एक-एक कार्यकर्ता तक जाने की मेहनत नहीं देखते। वे यह जानना ही नहीं चाहते कि संगठन खड़ा करने के लिए मायावती कितना पैदल चलीं, कितने दिन-रात उन्होंने दलित बस्तियों में काटे। मीडिया इस तथ्य से आंखें मूंदे है। जाति और मजहब की बेड़ियां तोड़ते हुए मायावती ने अपनी पकड़ समाज के हर वर्ग में बनाई है। वह उत्तर प्रदेश की पहली ऐसी नेता हैं, जिन्होंने नौकरशाहों को बताया कि वे मालिक नहीं, जनसेवक हैं। अब सर्वजन का नारा देकर उन्होंने बहुजन के मन में अपना पहला दलित प्रधानमंत्री देखने की इच्छा बढ़ा दी है। दलित आंदोलन और समाज अब मायावती में अपना चेहरा देख रहा है। भारतीय लोकतंत्र को समाज की सबसे पिछली कतार से निकली एक बहुजन महिला की उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए।


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डॉ. अनीश कुमार

लेखक गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन करते हैं । जनसंदेश टाइम्स, सुबह सबेरे, जनवाणी, युवा शक्ति, अचूक संघर्ष समेत कई अखबारों में लगातार लेखन कार्य । इसके साथ विभिन्न ऑनलाइन पोर्टल जैसे SSRN, यूथ की आवाज, जनपथ, दलित दस्तक आदि पर भी विभिन्न लेख प्रकाशित ।

इसके साथ ‘द पर्सपेक्टिव अंतर्राष्ट्रीय जर्नल’ तथा हिन्दी विभाग, गुरु घासीदास (केंद्रीय) विश्वविद्यालय, बिलासपुर की संस्थागत त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका ‘स्वनिम’ के सह-संपादक का निर्वहन ।  

ईमेल anishaditya52@gmail.com तथा मोबाइल नंबर 9198955188 है ।

 

सतपुड़ा की पगडंडियाँ : सहजीविता और मानवीय संवेदनाओं की काव्यात्मक अभिव्यक्ति - डॉ. अनीश कुमार

              सतपुड़ा की पगडंडियाँ युवा कवि रमेश गोहे की सद्द: प्रकाशित पहला कविता संग्रह है । इन कविताओं से गुजरते हुए सहज ही महसूस किया जा सकता है कि यहाँ जो मैंहै, वह एक समाजहै । वह सभी कालों और सभ्यताओं के मनुष्यों का प्रतिनिधित्व करता है । बेशक वह कवि के समय की, हमारे अपने समय का, निवासी  है लेकिन उसे भरपूर अहसास है कि वह एक परंपरा में स्थित है, बल्कि उसी के हाथों निर्मित है । कवि इन कविताओं में स्वयं माजूद है । कविता प्रकाशित होने के पश्चात जब पाठक के सन्मुख आती है तो वह उसका आस्वादन करता है । मुख्यत: पाठक उस रचना में भाव ढूंढता है, कोई बिम्ब, कोई प्रतीक या कोई विचार उसे उद्वेलित करता है वह उस कविता में अपने आसपास के परिदृश्य की तलाश करता है । पाठक के मन की कोई बात यदि उस कविता में हो तो वह उसे पढ़कर प्रसन्न होता है । यदि कविता में उसके आक्रोश को अभिव्यक्ति मिलती है या उसे अपनी समस्याओं का समाधान नज़र आता है तो वह कविता उसकी प्रिय कविताओं में शामिल हो जाती है । रमेश गोहे की कवितायें कविता की इन परम्पराओं में अपने को फिट पाती हैं । जब कवि स्वयं लिखता है कि मेरी कविताओं को पढ़ना मेरे साथ चलने जैसा है । मेरे भोगे हुए यथार्थ के बहाने मेरी कविताओं को पढ़कर अपने मन की तहें खोलने जैसा है और कुछ हद तक मुझे समझने जैसा भी । मेरी कवितायें निश्चित रूप से मेरे जीवनानुभवों, आत्मसंघर्षों, संवेदनात्मक ज्ञान और सांसारिक सुख-दुख कि पीड़जन्य अनुभूतियों का दस्तावेज़ हैं ।

            रमेश गोहे की कविताओं की विषयवस्तु में विविध संवेदनात्मक अभिव्यक्ति है । यहां प्रकृति भी है और प्रेम भी, बम भी है और बारूद भी, गांव भी है और शहर भी । रमेश गोहे सतपुड़ा की पगडंडियां के माध्यम से सम्पूर्ण जंगल-गाथा कह देने में संकोच नहीं करते । ये कविताएं जमीन से जुड़कर मानवीय अस्मिता पर प्रहार करती नीतियों के प्रति आवाज उठाती हैं । कविताओं में सौंदर्य का बखान करने के लिए उन्हें किसी बाह्य रूपकों की आवश्यकता नहीं पड़ती बल्कि कवि अपनी परंपरा से जुड़ी चीजों में से ही रूपकों का निर्माण करता है । कविताएं रचाव व बचाव की प्रवृत्ति को आत्मसात करती हुई खत्म होती मानवीय संवेदनाएं और सहजीविता को पुनर्स्थापित करने की वकालत करती हैं । कवितायें मनुष्यता का ख्यान रखती हैं । जहां आज के समय में मनुष्य के अंदर स्वार्थ पूर्ति की भावना आ गई है वहीं कवि आगे आकर संवेदना को समझने का प्रयास कर रहा है -

मैं यहाँ ठीक हूँ !

आशा है तुम भी वहाँ ठीक होंगे !

चिट्ठियों में हम

न जाने क्या-क्या लिखते जाते हैं !

चिट्ठी लिखते समय

हम कितने स्वस्थ हो जाते हैं !

            कवि सहजीविता की बात करता हैं । सपाटबयानी रमेश गोहे की विशेषता है । कविता प्राकृतिक और मानवीय राग का सुंदर चित्रण है ।

                        तुम अपनी बात कहो

मैं सुनता हूँ

तुम्हारी सालों की पीड़ा का दर्द कह दो मेरे कानो में ।

            कवि ने अपने समय और समाज के संवेदना को ध्यान में रखते हुए कविता का विषयवस्तु का चयन किया है । उनकी कविता मुक्ति के स्वप्न की कविता है । उनके यहाँ स्वप्न एक बार बार दुहराया जाने वाला का विषय है । रमेश गोहे की कविताओं का परिदृश्य काफी बहुमुखी और विविधतापूर्ण है। वस्तुत: हिन्दी कविता का संसार या क्षितिज बहुत फैलाव लिए हुए है। दरअसल कविता की भाषा कुछ तो कवि के पास सहज रूप में उपलब्ध होती है, कुछ अभ्यास से कवि अपनी भाषा के रूप में सुधार भी लाता है । रमेश गोहे ने भाषा का बावबोध एकदम सरल रखा है जिससे उसके शिल्प में दुरूहता नहीं आए । ऐसे समय में जब कविता का परिदृश्य साहित्य की राजनीति से संचालित हो रहा हो, कुछ जरूरी बातों को कहने के लिए खतरे उठाने ही होंगे । ऐसे में रमेश गोहे स्पष्ट लिखते हैं कि –

कुत्तों का आतंक है,

और बंदर

बच्चों को पेट से चिपटाए,

हाँफ-हाँफ कर दौड़ रहे हैं ।

किसानों के लिए भी कवि के अंदर उतनी ही संवेदना है जितना कि प्रेम को बचाने के लिए ।

अन्नदाता

जागो और देखो

धरती के साथ दु:शासन

खेल रहा है,

चीरहरण का खेल !

रचा जा रहा है कोई षडयंत्र ,

हल कि जगह चलाये जा रहे हैं बुल्डोजर । 

            आज कविता का संसार औसत का संसार है । कवि जिस जमीन में रहता है उस जमीन और परिवेश जिसे हम व्यापक अर्थों में लोक की संज्ञा देते हैं उसका सन्निवेश । और जिस लोक पर कविता लिखी जा रही हो उस लोक की संस्कृति, भाषा व सामाजिक संरचना का पूरा बोध होना चाहिए । यदि ऐसा नहीं है तो कविता में वास्तविकता भ्रमात्मक कल्पना के रूप में प्रवेश करती है और पाठक को मिथ्या तर्क देते हुए लोक की वास्तविक विसंगतियों से ध्यान भटका देती है । कवि के लोक को हम कवि “व्यक्तित्व” का सन्निवेश कह सकते हैं । कविता में कवि के व्यक्तित्व का प्रवेश ही कवि के लोक का प्रवेश है । इससे कविता में “यथार्थ” बचा रहता है और भ्रम की संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं । एक कविता देखिये -

गुब्बारे जो अपने देश की हवा से फूलकर

ऊंची उड़ान भरते हैं

सात आसमान पार करते हैं

पर वापस लौटकर नहीं आते कभी ।

            कविताओं में वैयक्तिकता भी प्रमुखता से ऊभर करके आई है । उनके प्राणों की विविध अनुभूतियां उनकी कविता में अनायास ही नहीं आ गई है लेकिन उसने गाथा में आलंबन अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण वैयक्तिकता ही प्रमुख रूप से उभर कर के आई है जिनमें उनके अश्रु, दुख, विरह और वेदना ने ही स्थान पाया है -

धरती जब चादर पीली ओढ़ लेती है

तब बनती है कविता

कविता बनती है

जब दर्द हद से गुजर जाता है

हाँ कविता तब नहीं बनती

जब इंसान की

संवेदना मर जाती है ।

            स्त्री की सामाजिक स्थिति के साथ-साथ आर्थिक स्थिति का सजीव वर्णन भी रमेश गोहे की कविताओं के माध्यम से हमें देखने को मिलता है । दरअसल आदिवासी लेखन जीवन का लेखन है यह कल्पना और मनोरंजन का क़िस्सा नहीं है और न ही आदिवासी औरतें नुमाईश की वस्तु है । किन्तु आज के समय में मीडिया के माध्यम से आदिवासी स्त्रियों को बाजार की नुमाइश की वस्तु बना दी गई है ।

सिर पर लकड़ी का गट्ठर लादकर

सुबह-सुबह जब एक के पीछे एक कतार में

निकलती हैं आदिवासी लड़कियां

तो मीडिया का आदमी

मुंह इंधारे फ्लैश चमकाकर

मिचमिचाती आँखों से खींचता है

उनकी अधनंगी तस्वीर

            जनजीवन को कविताओं में उकेरने वाले कवि रमेश गोहे शुक्ल प्रेम और प्रकृति के कवि हैं । वे सीधे सरल शब्दों में जादुई बातें कहने के ऐसे माहिर हैं, जो नदी, पहाड़, घाटी से लेकर जमीन से जुड़े हुए आदमीको अपनी कविता में समेट लेते हैं । वास्तव में वे सजग शिल्प के कवि हैं, जो बेहद महीनी से शब्दों को पिरोते हैं । उनकी काव्य भाषा, शिल्प और कहन कविताओं को सतपुड़ा के जंगलों से सीधे जोड़ती है । समाज में प्रेम को लेकर एक असंवेदांशीलता दिखाई देती है जिसे रमेश गोहे बेरंग होती दुनिया में प्रेम को घोल देना चाहते हैं ।  

                        पुरुष जो प्रेम से दूर होता है

प्रेम सिखाती हैं उसे स्त्रियाँ

पुरुष जो बेरंग होता है

रंग भरती हैं उसमें स्त्रियाँ  

            वास्तव में यदि कोई कवि होगा, उसके भीतर प्रेम होगा । प्रेम ही आदमी को कवि बनाता है । कवि की ज़रूरत इसलिए होती है कि जब हवाओं में घृणा भरी हो, वह प्रेम का संगीत बाँटता है । वह सुंदरता से प्रेम करना सिखाता है और बताता है, क्या सुंदर है, क्या नहीं । आधुनिकतावादी समय में प्रेम की भाषा ठीक वैसी नहीं हो सकती थी, जैसी क्लासिकल या रोमांटिक युग में थी । बदली जीवन स्थितियों में प्रेम का अनुभव अलग तरह का होगा, पर उसमें क्लासिक और रोमांटिक संस्कारों की गूँज न हो, यह संभव नहीं है । यदि प्रेम में अनुभव की सच्चाई के साथ एक कलात्मक गहराई मौजूद हो, इन संस्कारों की गूँज होगी ज़रूर ।


 


पुस्तक – सतपुड़ा पगडंडियाँ
कवि- रमेश गोहे
प्रकाशक- एविन्सपब पब्लिशिंग, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
वर्ष – दिसंबर 2022  
मूल्य – 199 

 

समीक्षक – डॉ. अनीश कुमार

कांशीराम और उनका बहुजनवाद : पुनर्पाठ - डॉ. अनीश कुमार

 

मान्यवर कांशीराम ने भारतीय समाज के वंचित तबको, गरीबों, दलितों को जीने की एक मुकम्मल राह दिखाई है । उनमें आत्मविश्वास की ललक पैदा की है । कांशीराम का उद्देश्य सर्व जनहिताय, सर्व जनसुखाय रहा । किन्तु वह वंचित समुदाय को बहुजन समाज नाम के पदबंध से संबोधित करते हैं । वह कई बार अपने भाषणों में कहते हैं कि समाज में जनसंख्या के हिसाब से वंचित समाज की संख्या अधिक है । इसीलिए इसे बहुजन समाज कहना ज्यादा समीचीन होगा । बहुजन समाज को वह भारतीय समाज की असली वारिस मानते हैं । कांशीराम उन लोगों में से थे जो अपना सुख आराम त्याग कर गरीबों की सेवा में अपना जीवन न्यौछावर कर देते हैं । उनके समकालीन तमाम ऐसे नेता थे जो ऐश-आराम करके जिंदगी व्यतीत कर रहे थे । किन्तु कांशीराम ने जिंदगी भर अविवाहित रहकर, बिना किसी लाभ के पद पर रहते हुए उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (BSP) और दलित समाज को संगठित व संचालित किया । सोशल इंजीनियरिंग का उन्होंने जो सफल मंत्र दिया वह भारतीय इतिहास में अद्वितीय है । वंचित तबके की सेवा के लिए अपनी सरकारी नौकरी को भी छोड़ दिया । उनकी यही कर्तव्यनिष्ठता बहुजन समाज को सामाजिक व राजनीतिक रूप से एक नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया । उन्हें बहुजन समाज की राजनीति का पितामह कहा जाता है ।

कांशीराम सामाजिक चेतना की अपेक्षा राजनीतिक चेतना को अधिक तवज्जो देते थे । उनका मानना था कि जिस समुदाय का राजनीतिक व्यवस्था में प्रतिनिधित्व नहीं है, वह समुदाय मर चुका है । ऐसा इसलिए कहते थे कि आप चाहे जितनी बड़ी नौकरी पा जाओ किसी न किसी नेता के शरण में ही काम करना पड़ता है । सभी विभागों के कोई न कोई मंत्री होता है । उन्ही के नीचे सबको काम करना होता है । इसलिए वे राजनीतिक चेतना को अधिक महत्वपूर्ण मानते थे । यही कारण है जब वह नौकरी से त्यागपत्र देने के बाद महाराष्ट्र की प्रमुख राजनीतिक पार्टी आरपीआई से जुड़े तो उन्हें वहाँ पर भी राजनीतिक चेतना का अभाव दिखाई दिया । कांशीराम : बहुजनों के नायककिताब में बद्रीनारायण लिखते हैं, ‘कांशीराम दलितों के लिए कुछ करना चाहते थे इसलिए वह दलित मूवमेंट को आगे बढ़ा रही आरपीआई से जुड़ गए । (आरपीआई के वर्तमान अध्यक्ष एनडीए सरकार के सहयोगी रामदास आठवले हैं ।) उन्होंने पाया कि दलितों की लड़ाई लड़ने वाले नेता अवसरवादी, लालची और स्वार्थी बन चुके हैं । एकता की बात तो करते हैं लेकिन एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करते रहते हैं । धीरे-धीरे वह उससे दूर होते गए । आगे चलकर 1984 में उन्होंने बीएसपी की स्थापना की । तब तक कांशीराम पूरी तरह से एक पूर्णकालिक राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता बन गए थे । उन्होंने तब कहा था कि अंबेडकर किताबें इकट्ठा करते थे लेकिन मैं लोगों को इकट्ठा करता हूं । उन्होंने तब मौजूदा पार्टियों में दलितों की जगह की पड़ताल की और बाद में अपनी अलग पार्टी खड़ा करने की जरूरत महसूस की । वो एक चिंतक भी थे और ज़मीनी कार्यकर्ता भी । बसपा की स्थापना के बाद वह पूरे देश में साइकिल यात्राएं की । यह उनका सार्थक प्रयास था ।

कांशीराम राजनीति के मूल मर्म को समझ गए थे । घूम-घूम कर वह वंचित समुदाय को राजनीतिक रूप से मजबूत होने का आह्वान करते थे । कांशीराम के समय भी बहुत सारे लोग नौकरियों में थे । आरक्षण लागू होने के बाद भी आरक्षित सीट पर बहुत से दलित समुदाय के लोग चुनकर आते थे लेकिन सब अपनी पेट पूजा में ही लगे रहते थे । आर्थिक रूप से मजबूत होने के बाद भी सामाजिक और राजनीतिक रूप से कमजोर थे । कांशीराम एक तरफ डॉ. अंबेडकर द्वारा दिखाये गए रास्ते पे बैक टू सोसायटी के लिए लोगों को प्रेरित करते थे । इसी उद्येश्य से वह बीएसपी से पहले बामसेफडीएस4 की स्थापना किए थे । उनका यह मिशन सफल भी हुआ । कांशीराम ने इसीलिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व को महत्ता देते थे । जब वह समाज के बीच जाते थे तो वह कम शब्दों में अपनी प्रभावशाली बातों से लोगों को समझाते थे । वह वोट की कीमत को समझते थे । वह लोगों को समझाते थे कि चाहे कोई गरीब हो या अमीर अभी के वोट कि कीमत एकसमान होती है । इसलिए अपना वोट सोच-समझकर देना चाहिए । जब वह राजनीति में कदम रखे थे तब कुछ शुरुआती वर्षों में जैसे सन् 1983-84 नारों का साल रहा । उनके कुछ नारे प्रसिद्ध हैं -

- वोट हमारा, राज तुम्हारा, नहीं चलेगा नहीं चलेगा ।

- जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी ।

- वोट से लेंगे CM/PM, आरक्षण से लेंगे SP/DM

धीरे-धीरे उनके नारों में तल्खी आने लगी । वह उन सभी चीजों का विरोध किया जो उनके राजनीतिक चेतना को प्राप्त करने के मार्ग में बाधक हो रहे थे । वह एक और नारा दिया तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार । यह नारा एक तरह से दलितों के लिए आह्वान था । ऊंची जाति के लोग हक्के-बक्के रह गए । बहनजी किताब में अजय बोस लिखते हैं, ‘एक बार कांशीराम मंच पर भाषण देने के लिए खड़े हुए । उन्होंने पहली लाइन में कहा, अगर श्रोताओं में ऊंची जाति के लोग हों तो अपने बचाव के लिए वे वहां से चले जाएं । इसके बाद कांशीराम के समर्थन में जोरदार नारेबाजी हुई । उनकी रैलियों से ऊंची जाति के लोग गायब होते चले गए । ब्राह्मण समुदाय कांशीराम से नाराज भी हुआ किन्तु धीरे-धीरे सामाजिक बुनावट समझ आने पर सब ठीक होता गया । अपने राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष के दौरान कांशीराम ने, उनके मुताबिक़ ब्राह्मणवाद से प्रभावित या उससे जुड़ी हर चीज़ का बेहद तीखे शब्दों में विरोध किया, फिर चाहे वे महात्मा गांधी हों, राजनीतिक दल, मीडिया या फिर ख़ुद दलित समाज के वे लोग जिन्हें कांशीराम चमचाकहते थे । उनके मुताबिक ये चमचेवे दलित नेता थे जो दलितों के स्वतंत्रता संघर्षमें दलित संगठनों का साथ देने के बजाय पहले कांग्रेस और बाद में भाजपा जैसे बड़े राजनीतिक दलों में मौक़े तलाशते रहे । कांशीराम चमचों से बचाने की सलाह दिया करते थे । ये चमचे जिस थाली में खाते थे उसी में छेद करते थे । किन्तु उनकी नजर में हर विरोध करने वाला व्यक्ति चमचा नहीं था । वह स्पष्ट कहते थे कि कार्यकर्ताओं को चमचा समझने की भूल तो नहीं ही करनी चाहिए ।

            कुछ (नेता) लोग कार्यकर्ताओं को चमचे समझने की भूल कर सकते हैं । यह भयंकर भूल होगी । कार्यकर्ता और चमचा धुर विरोधी होते हैं । कार्यकर्ता अत्यंत लाभकारी होता है, जबकि चमचा गुलाम होता है जो लोग आज्ञाकारी था और गुलाम में भेद नहीं कर सकते । वे कार्यकर्ता को भी चमचा समझने की भूल कर सकते हैं । चमचे का इस्तेमाल उसकी अपनी ही जाति के खिलाफ किया जाता है जबकि कार्यकर्ता का इस्तेमाल उसकी जाति की भलाई के लिए होता है और चमचे का इस्तेमाल उसकी अपनी ही जाति के सच्चे और खाली नेता को कमजोर करने के लिए होता है । जब कार्यकर्ता का इस्तेमाल उसकी जाति और की सच्ची और खरे नेता की मदद के लिए उसके हाथ मजबूत करने के लिए होता है और कार्यकर्ता में अंतर करने के लिए और भी कई तथ्य दिए जा सकते हैं । किंतु यहां हमारी दिलचस्पी केवल इस बात पर जोर देने में है कि एक कार्यकर्ता को समझ चमचा समझने की भूल तो नहीं है । नहीं चाहिए ।

            कांशीराम सिर्फ सत्ता पाने तक समाज या पार्टी को सीमित नहीं रखना नहीं चाहते थे । वह राजनीतिक सत्ता पाने के बाद सामाजिक परिवर्तन को भी उसी रूप में देखना चाहते थे । इन सभी संदर्भों को उनके विचारों के आलोक में देखें तो उनकी दूरदृष्टिता स्पष्ट दिखाई देती है । उनके प्रमुख विचार निम्नवत हैं - 

  • ·   हम सामाजिक न्याय नहीं चाहते हैं, हम सामाजिक परिवर्तन चाहते हैं । सामाजिक न्याय सत्ता में मौजूद व्यक्ति पर निर्भर करता है । मान लीजिए, एक समय में, कोई अच्छा नेता सत्ता में आता है और लोग सामाजिक न्याय प्राप्त करते हैं और खुश होते हैं लेकिन जब एक बुरा नेता सत्ता में आता है तो वह फिर से अन्याय में बदल जाता है । इसलिए, हम संपूर्ण सामाजिक परिवर्तन चाहते हैं ।
  • ·    जब तक हम राजनीति में सफल नहीं होंगे और हमारे हाथों में शक्ति नहीं होगी, तब तक सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन संभव नहीं है । राजनीतिक शक्ति सफलता की कुंजी है ।
  • ·     सत्ता पाने के लिए जन आंदोलन की जरूरत होती है, उस जन आंदोलन को वोटों में परिवर्तित करना, फिर वोटों को सीटों में बदलना, सीटों को सत्ता में परिवर्तित करना और अंतिम रूप से (सत्ता में) केंद्र में परिवर्तित करना । यह हमारे लिए मिशन और लक्ष्य है ।
  • ·     ऊंची जातियां हमसे पूछती हैं कि हम उन्हें पार्टी में शामिल क्यों नहीं करते, लेकिन मैं उनसे कहता हूं कि आप अन्य सभी दलों का नेतृत्व कर रहे हैं । यदि आप हमारी पार्टी में शामिल होंगे तो आप बदलाव को रोकेंगे । मुझे पार्टी में ऊंची जातियों को लेकर डर लगता है । वे यथास्थिति बनाए रखने की कोशिश करते हैं और हमेशा नेतृत्व संभालने की कोशिश करते हैं । यह सिस्टम को बदलने की प्रक्रिया को रोक देगा ।
  • ·     जब तक, जाति है, मैं अपने समुदाय के लाभ के लिए इसका उपयोग करूँगा । यदि आपको कोई समस्या है, तो जाति व्यवस्था को समाप्त करें ।
  • ·     जहाँ ब्राह्मणवाद एक सफलता है, कोई अन्य वादसफल नहीं हो सकता है, हमें मौलिक, संरचनात्मक, सामाजिक परिवर्तनों की आवश्यकता है ।
  • ·     बहुत लंबे समय से हम सिस्टम के दरवाजे खटखटा रहे हैं, न्याय मांग रहे हैं और न्याय नहीं पा रहे हैं, इन हथकड़ियों को तोड़ने का समय आ गया है ।
  • ·     हम तब तक नहीं रुकेंगे जब तक हम व्यवस्था के पीड़ितों को एकजुट नहीं करेंगे और हमारे देश में असमानता की भावना को खत्म नहीं करेंगे ।
  • ·       मैं, गांधी को शंकराचार्य और मनु (मनु स्मृति के) की श्रेणी में रखता हूं जो उन्होंने बड़ी चतुराई से 52% ओबीसी को किनारे रखने में कामयाब रहे ।
  • ·       जिस समुदाय का राजनीतिक व्यवस्था में प्रतिनिधित्व नहीं है, वह समुदाय मर चुका है ।

अपने जीवनकाल में उन्होंने बसपा को काफी सशक्त किया । जब बसपा ने चुनाव लड़ना शुरू कर दिया तो उन्होंने एक नोट, एक वोटनारा देकर नोट और वोट खींचे । धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता बढ़ी और समर्थक उन्हें सिक्कों में तौलने लगे । इस पैसे का इस्तेमाल उन्होंने चुनाव लड़ने के लिए किया । उन्होंने खुद तो कभी राजनीति नहीं की लेकिन उन्होंने हजारों लोगों को राजनीति में आने का मौका दिया । एक बिन्दु और ध्यान देने लायक है कि उनके परिवार में कोई भी सदस्य राजनीति में नहीं थे । न हीं उन्हें राजनीति विरासत में मिली थी । किन्तु अपनी मेहनत, चतुराई और कूट बुद्धि कि वजह से वह राजनीति के बड़े चेहरे बन गए । उनकी नीतियों को कई लोग बेहद महान मानते हैं । बाबा भीमराव अंबेडकर के बाद उन्होंने ही देश के दलितों को सही मायनों में एक करने का सपना सच कर दिखाया । सोशल इंजीनियरिंग का उन्होंने जो फंडा दिया उसका इस्तेमाल करके ही बीएसपी ने पिछले कई सालों तक यूपी में राज किया । उनकी कार्यशैली की वजह से ही एक समय बीएसपी और सपा में गठबंधन हो पाया था लेकिन राजनीतिक षडयंत्र की वजह से यह गठबंधन नहीं चल पाया । इसी चेतना ने दलित समुदाय हेतु समाज में नवीन प्रतीकों को भी स्थापित किया है, आज यह नवीन चेतना दलितों में सामुदायिक भावना, आत्मविश्वास तथा पहचान की शक्ति का संचार करने में सफल हुई है । सामाजिक आंदोलनों व दलित समुदाय में बढ़ती राजनीतिक चेतना तथा व्यापक जनाधार के कारण आज बसपा भारतीय राजनीति का केन्द्र बन चुकी हैं । बसपा व दलित आंदोलन को इस स्तर तक पहुंचाने में कांशीराम एवं मायावती के कार्यों को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता । क्योंकि उन्होंने डा. अम्बेडकर के वैचारिक आंदोलन को जमीन पर क्रियान्वित करने का काम किया ।

कांशीराम का समग्र मूल्यांकन सिर्फ इतने से भी किया जा सकता है कि वे केवल एक व्यक्ति के लिए कुछ नहीं किया । ये व्यक्ति वे ख़ुद थे । घर त्यागने से पहले परिवार के लिए वे एक चिट्ठी छोड़ गए थे । इसमें उन्होंने लिखा था, ‘अब कभी वापस नहीं लौटूंगा । और वे सच में नहीं लौटे । न घर बसाया और न ही कोई संपत्ति बनाई । परिवार के सदस्यों की मृत्यु पर भी वे घर नहीं गए । परिवार के लोग कभी लेने आए तो उन्होंने जाने से इनकार कर दिया । अपनी शपथ पर वह जीवन भर अडिग रहे ।

कांशीराम आजादी के बाद भारतीय दलितों की सबसे बड़ी आवाज बनकर उभरे । उनके न रहने के बाद से ही असमानता मिटाने वाले आंदोलन में कमी सी आई है । कांशीराम का बहुजन आंदोलन बनाम क्रांति- प्रतिक्रांति का दौर भारतीय राजनीति में विशेषतया उत्तर प्रदेश के सामाजिक तथा राजनैतिक परिदृश्य में 1990 का दशक सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन का दशक माना जायेगा क्योंकि इसी दशक में मण्डल आयोग की सिफारिशें लागू हुई और दलित-पिछड़ी जातियों को शासन-प्रशासन में भागीदारी हासिल हुई । इसी दशक में दलित राष्ट्रपति का मुद्दा भारतीय राजनीति में गर्म हुआ और इसी दशक में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का राजनीतिक ध्रुवीकरण अस्तित्व में आया ।

कांशीराम के केंद्र में हमेशा दलित समस्या रही । उनका मानना था कि अति-पिछड़ा वर्ग, गरीब मुसलमान और अन्य गरीब समुदायों को किस तरह से एक मंच पर लाया जाये यही कांशीराम का बहुजनवाद था और इसी की राजनीति कांशीराम कर रहे थे । इस काम में कांशीराम कामयाब भी रहे और अपनी बहुजनवाद की राजनीति के माध्यम से उत्तर प्रदेश की राजनीति को केंद्र में रखते हुये दो बड़े राजनीतिक दलों कांग्रेस और भाजपा को दो दशक से अधिक समय तक यानि 1993 से लेकर 2017 तक हाशिये पर धकेल दिया और इन दो दशकों की राजनीति की धुरी किसी न किसी प्रकार से बने रहे । कभी बसपा-भाजपा की गठबंधन सरकार के रूप में कभी पूर्ण बहुमत की सरकार के रूप में यह सब उनकी अपनी मर्जी के हिसाब से और उनकी शर्तों के आधार पर था ।

- डॉ. अनीश कुमार

सह-संपादक, द पर्सपेक्टिव अंतर्राष्ट्रीय जर्नल (www.tpijssh.com)

सह-संपादक, स्वनिम त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका, हिन्दी विभाग, गुरु घासीदास (केंद्रीय) विश्वविद्यालय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़