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Sunday, 28 February 2016

मानव अधिकार और भारतीय संविधान



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मानव अधिकार और भारतीय संविधान
प्रस्तावना -
     मानव अधिकार सभी लोगों के लिए समान होते हैं । नैतिक व कानूनी रूप में जब हम मानव अधिकार की बात करते हैं तो जो मानव जाति के विकास के लिए मूलभूत मानवीय गरिमा को सुनिश्चित करता हो, वह मानवाधिकार कहलाता है । मानव अधिकार को मूलाधिकार, आधारभूत अधिकार, अंतरनिहित अधिकार तथा नैसर्गिक अधिकार भी कहा जाता है । मानव अधिकार वह अधिकार होते हैं जो प्रत्येक व्यक्ति को मानव मात्र होने के नाते ही प्राप्त हो जाते हैं । भले ही उसकी राष्ट्रियता जाति, धर्म, लिंग, वर्ग आदि कुछ भी हो । मानवाधिकार सरंक्षण अधिनियम -1993 में मनवाधिकारों को पेईभासित करते हुए लिखा गया है की व्यक्ति के जीवन, स्वतन्त्रता, समानता और गरिमा से संबन्धित वे अधिकार मानवाधिकार कहलाते हैं, जो संविधान द्वारा प्रत्याभूत हैं, अंतरराष्ट्रीय संधियों में उल्लिखित हैं अथवा भारत में न्यालयों द्वारा प्रवर्तनीय हैं ।
     मानव समाज मे प्रत्येक स्तर पर कई तरह के विभेद उपस्थित है । भाषा, रंग, प्रजातीय स्तर, और मानसिक स्तर पर मानव समाज के बीच में भेद किया जाता है । इन सबके बावजूद कुछ अनिवार्यताएं सभी समाजों में समान रूप से पाईं जाती हैं ये अनिवार्यताएं ही मानवाधिकार हैं । ये अधिकार मानव को इसलिए प्राप्त होता है क्योंकि वह मानव होता है ।
     प्रथम विश्वयुद्ध के बाद 1929 ईo में अंतरराष्ट्रीय विधि संस्था ने एक अंतरराष्ट्रीय अधिकार घोषणा पत्र प्रस्तुत किया जिसके बहुत से प्रावधान कुछ देशों के संविधानों (फ्रांस, अमेरिका) ने शामिल कर लिए तथा विश्व मानवता के लिए लागू किया गया ।
     घोषणा पत्र के अनुछेद- 1 के अनुसार, “यह प्रत्येक राज्य का कर्तव्य है की वह प्रत्येक व्यक्ति के जीवन , स्वतन्त्रता, संपत्ति के अधिकार सुनिश्चित करे और इन अधिकारों का अपनी सीमा के बाहर भी राष्ट्रियता, लिंग, प्रजाति, भाषा एवं धर्म के भेदभाव से इसका परीक्षण करे ।”
     आजादी के पश्चात भारतीय संविधान में नागरिकों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए ठोस प्रावधान बनाए गए तथा उन्हें न्याय, स्वतन्त्रता, समानता और बंधुत्व का दर्जा प्रदान किया गया । हमारे संविधान निर्माता मुख्यत: बाबा साहब डॉ भीमराव जी अंबेडकर अमेरिका फ्रांस व रूसी क्रांति से बहुत प्रभावित थे । संपत्ति की स्वतंत्रता तथा व्यक्तिगत संबंध बनाने की स्वतन्त्रता उनके प्राथमिक अधिकार थे । विविध वैचारिकी एवं ऐतिहासिक श्रोतों से प्रभावित होकर भारतीय संविधान निर्माताओं ने वैचारिक समन्वय वाला संविधान प्रस्तुत किया । उन्होने बुर्जूआवादी स्वतन्त्रता और समानता के सिद्धान्तों को तथा रूसी क्रांति के समाजवादी आदर्शो को हमारे संविधान मे जगह दी जिसके परिणामस्वरूप भारतीय संविधान में दो प्रमुख विचारधाराओं से प्रभावित आदर्शो व सिद्धान्तों के रूप मे मौलिक अधिकार जिसे अध्याय 3 तथा राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों जिसे अध्याय 4 में स्थापित किया गया है ।
     भारतीय संविधान की प्रस्तावना भारत की सभी नागरिकों के लिए सामाजिक न्याय, आर्थिक और राजनीतिक विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, विश्वास आस्था और पुजा की स्वतन्त्रता, अवसर की समानता तथा भातृत्व भाव से प्रत्येक व्यक्ति की एकता अखंडता को राष्ट्र के रूप मे व्यक्त करती है ।
     भारतीय संविधान में मानव अधिकारों को मौलिक अधिकार व नीति निदेशक तत्वों के रूप में लिखा गया है ।
(क)- मौलिक अधिकार
    न्यायिक रूप से लागू किए जाने वाले मौलिक अधिकार समस्त नागरिक और राजनीतिक अधिकारों सहित अल्पसंख्यक के अधिकारों को भी रेखांकित करने वाली यह अधिकार भारतीय संविधान के भाग 3 में अनुछेद 12 से अनुछेद 35 तक विस्तृत हैं यह अधिकार समानता, स्वतन्त्रता, शोषण के विरुद्ध, धर्म संस्कृति और शिक्षा तथा सवैधानिक उपचारों का अधिकार है ।
     अनुछेद 14 समस्त नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है । अनुछेद 15 राज्य को धर्म, प्रजाति, जाति, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर विभेद करने से प्रतिबंधित करती है तथा अनुछेद 16 में सभी नागरिकों को अवसर की समानता उपलब्ध कराई गई है और अनुछेद 17 छुआछूत का निषेध करती है और ऐसा करने वालों को दंडनीय अपराध का भागीदार मानती है । अनुछेद 15 व 16 दोनों सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के विकास के लिए कुछ विशेष प्रावधान निर्मित करने का अधिकार प्रदान करते हैं । अनुछेद 18  सभी तरह के असैनिक और अशैक्षणिक उपाधियों के अंत की व्यवस्था करता है । अनुछेद 19 में वर्णित स्वतन्त्रता का अधिकार सभी नागरिकों को भाषण और अभिव्यक्ति की सभा, संगठन बुलाने की, शांतिपूर्वक इकट्ठा होने की, समस्त देश में भ्रमण करने की और भारत में कहीं भी आवास निर्मित करने की तथा किसी भी व्यवसाय को शुरू करने की स्वतन्त्रता प्रदान करती है और अनुछेद 20 व्यक्ति को किसी भी अपराध के लिए संवैधानिक स्तर पर दंड की व्यवस्था करती है तथा 19 जो समस्त मुलाधिकारों का प्रमुख तत्व है वह घोषित करती है की किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन और स्वतन्त्रता से विधि के अनुसार निर्मित प्रक्रिया के तहत ही वंचित किया जा सकेगा अनुछेद 22 के तहत व्यक्ति को गिरफ्तार करने के कारणों कानूनी सहायता प्राप्त करने और 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने उपस्थित होने का अधिकार प्रदान करता है सिर्फ इस तथ्य के की वह उपचारात्मक रूप से गिरफ़्तार न किया गया हो ।
     अनुछेद 23 में देह व्यापार और बंधुआ मजदूरी का निषेध किया गया है और अनुछेद 24 ,14 वर्ष से कम आयू के किसी भी भारतीय बच्चे को काम न करने का अधिकार प्रदान करता है । अनुछेद 25 के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी चेतना और नैतिकता के अनुसार उसके अपने धर्म, आस्था और विश्वास को मानने की स्वतत्न्त्रता प्रदान की गई है और सभी धर्मों को, पंथों को अपने के अनुसार धार्मिक संस्था और गतिविधि चलाने का अधिकार दिया गया है । अनुछेद 27 व 28 के अनुसार किसी भी धार्मिक शैक्षणिक संस्था को वित्तीय सहयोग नहीं देगा । किसी भी धर्म एवं पंथ के नागरिक को अपनी भाषा एवं संस्कृति के विकास को आजादी दी गई है । अनुछेद 29 में शैक्षणिक संस्थाओं को अपनी रुचि के अनुसार शैक्षणिक संस्था गठित करने का अधिकार अनुछेद 30 प्रदान करता है ।
(ख) नीति निर्देशक तत्व
     भारतीय संविधान कुछ अधिकार राज्यों को भी दिए हैं जिससे वह समाज की असमानता व अन्य अधिकारों के ऊपर कानून बनाते समय इन तत्वों की सहायता ले सकें । राज्य अपनी नीति का विशिष्टतया इस प्रकार संचालन करेगा की सुनिश्चित रूप से अनुछेद 39(क) के अनुसार सभी नागरिकों को समान रूप से जीविकोंपार्जन का साधन प्राप्त करने का अधिकार हो । (ख) के अनुसार समूहिक श्रोतों व सामाग्री पर सामान्य हित को वरीयता मिलनी चाहिए । (ग) के अनुसार संपत्ति तथा उत्पादन के साधनो के विकेन्द्रीकरण का निषेध किया गया है । (घ) के अनुसार पुरुषों एवं स्त्रियों दोनों का समान कार्य के लिए समान वेतन हो । (च) के अनुसार बाल श्रम का निषेध तथा पुरुष व कर्मकार स्त्रियों के स्वास्थ्य के अधिकार की बात की गई है ।
     अनुछेद 46 के अनुसार अनुसूचित जतियों, अनुसूचित जनजतियों और अन्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि अर्थात राज्य जनता के दुर्बल वर्गों के विशिष्टतया अनुसूचित जातियों और जनजातियों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से उनकी सरंक्षा करेगा ।
संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुछेद 32)
     डॉ भीमराव जी अंबेडकर इसे संविधान का हृदय एवं आत्मा कहा था । यह नागरिकों को अधिकारों देता है की यदि सरकार कोई ऐसा कार्य करती है जिससे उसके मौलिक अधिकारों का हनन होता है तो नागरिकों को न्यायिक समाधान पाने का अधिकार है ।
अनुछेद 32 (1) यह अधिकार सभी व्यक्तियों को सर्वोच्च न्यायालय में जाने तथा अपने मौलिक अधिकारों को लागू करवाने का अधिकार देता है ।
(2) सर्वोच्च न्यायालय को आदेश, रिट निर्देश(पाँच प्रकार के) जारी करने का अधिकार देता है । डॉ अंबेडकर के अनुसार यह अनुछेद सर्वाधिक महत्वपूर्ण अनुछेद है जिसके बिना संविधान व्यर्थ है । इस अनुछेद के बिना अन्य मौलिक अधिकारों को वास्तविक नहीं मन सकते हैं क्योंकि यही अनुछेद व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकार दिलवाता है । बिना इस अधिकार के अन्य अधिकार मात्र कागजी रह जाएंगे ।
     रीट 5 प्रकार के है-
(1)     बंदी प्रत्यक्षीकरण     (4) अधिकार पृच्छ।
(2)     परमादेश            (5) उत्प्रेषण रिट
(3)     प्रतिषेध
(3) इस संविधान द्वारा अन्यथा उपबंधित के सिवाय इस अनुछेद द्वारा प्रत्याभूत अधिकार निलंबित नहीं किया जा सकेगा ।
     मानवाधिकारों को सुरक्षित करने के लिए भारत सरकार ने कमजोर वर्गों के हितों के लिए विभिन्न आयोगों का भी गठन किया गया है । भारत सरकार विभिन्न संविधान संशोधनों के द्वारा मनवाधिकारों के हित के लिए कानून बनाए हैं ।
(1) भारत का संविधान –
   उद्देशिका, भाग 3 व 4 और 4(क), अनुo 226, 300(क), 325, 326
(2) राष्ट्रीय मानवाधिकार सरंक्षण अधिनियम, 1993
(3) राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1993
(4) राष्ट्रीय अनुसूचित/ जनजाति आयोग
(5) राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992
(6) राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990
(7) सिविल अधिकार सरंक्षण अधिनियम, 1955
(8) अनुसूचित जाति/ जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989
(9) सफाई कर्मचारी नियोजन और शुष्क शौचालय संनिर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1993
(10) अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956
(11) स्त्री अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1986
(12) दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961
(13) सती (निवारण) अधिनियम, 1987
(14) प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम, 1961
(15) बाल विवाह अवरोध अधिनियम, 1929
(16) बाल (श्रम गिरवीकरण) अधिनियम, 1933
(17) अनाथालय और अन्य पूर्त आश्रम (पर्यवेक्षण और नियंत्रण) अधिनियम, 1960
(18) बालक अधिनियम, 1960
(19) बालक श्रम (प्रतिषेद और विनिमयन) अधिनियम, 1986
(20) किशोर न्याय अधिनियम, 1986
(21) अल्पवय व्यक्ति (अपहानिकर) अधिनियम, 1956
(22) जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम, 1950
(23) मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987
(24) बंधित श्रम पद्धति (उत्सादन) अधिनियम, 1976
     मानवाधिकारों की समस्या विश्व की अन्य समस्याओं मे से प्रमुख है । पुलिस थानों मे ही नहीं बल्कि शिक्षा संस्थाओं, फैक्ट्रियों, अस्पतालों, सुधार गृहों, परिवार आदि जगह आर्थिक, सामाजिक असमानता के कारण मानवाधिकार का हनन होता है । भारत में संविधान में लिखित होनर के बावजूद सबसे ज्यादा मनवाधिकारों का हनन जाति के आधार पर होती है । सामाजिक व आर्थिक परिदृश्य बदलने के साथ मनवाधिकारों के संदर्भ मे भी बदलाव आता है । भारत मे मनवाधिकारों की हनन की समस्या बड़ी गंभीर है । जहाँ अनुसूचित जाति, जनजाति, अल्पसंख्यक महिलाओं को संवैधानिक अधिकार प्राप्त होने के बावजूद सामाजिक, आर्थिक समानता प्राप्त नहीं है ।
     डॉ अंबेडकर अपने अछूतोद्धार आंदोलनों के दौरान ही मानवीय अधिकारों की मांग प्रस्तुत की थी। वह पराधीनता की भावना से घृणा करते थे और अछूतो पर सवर्ण हिन्दू सुधारकों के सरंक्षण के कट्टर विरोधी थे । बाबा साहेब ने मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रताओं की रक्षा के लिए संविधान मे व्यवस्था की थी । उन्होने इन सिद्धान्तो की स्थापना के लिए जीवन भर संघर्ष किया । शूद्रों व स्त्रियों के अधिकार दिलाने के लिए वह जीवनपर्यंत संघर्षरत रहे और अंत में जब वे विधि मंत्री के रूप में स्त्रियों को उनके मौलिक अधिकार दिलाने वाले कानून पास कराने मे सफलता नहीं पा सके तो वह अपने पद से त्यागपत्र दे दिये ।
     इस प्रकार भारतीय संविधान एक जनतान्त्रिक रूप से निर्मित सरकार की व्यवस्था ही नहीं वरन जनतान्त्रिक शासन प्रणाली एवं जनतान्त्रिक जीवन पद्धति की प्रतिबिंब भी है । भारत के समस्त नागरिक समान रूप से अपने-अपने व्यक्तित्व विकास के लिए मौलिक अधिकारों के प्रयोग की बौद्धिक क्षमता रखते हैं । भारत के उच्चतम न्यायालय में मूलाधिकारों को प्राकृतिक अधिकार अथवा मानव अधिकार के रूप में मान्यता दी है । मानव अधिकारों की रक्षा, देशों की सीमाओं और विचारधाराओं से परे एक विश्वव्यापी जिम्मेवारी है जिसमें सबकी भागीदारी अनिवार्य है ।  











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नवें दसकोत्तर हिन्दी उपन्यास और भूमंडलीकरण

     भूमंडलीकरण बाज़ार और पूंजी आधारित एक ऐसी जटिल अंतरसंबंध एकतंत्रात्मक साम्राज्यवादी सत्ता व सरंचना है, जो किसी साझे मकसद या स्वप्न के लिए नहीं बल्कि साम्राज्यवादी मंसूबों की पूर्ति के लिए रची गई है और जो मानवता के अब तक के इतिहास में सबसे बड़े दुःस्वप्न की तरह है । यह ऐसे तिलिस्म की तरह है जो आसानी से समझ नहीं आता । यह विश्व पूंजीवाद, साम्राज्यवाद के अग्रिम विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया हैइसमें एकीकरण और विघटन दोनों परिघटनाएँ शामिल है । धर्म, क्षेत्र, भाषा, जाति और अंतरराष्ट्रीय चौखट में राष्ट्रीयता और नृवंशीयता के सहारे विश्व की प्रतिरोधी शक्तियों की एकजुटता को तोड़ने और बाज़ार एवं पूंजी के एकीकरण को रचने वाले मायावी बाज़ार, भूमंडलीकरण सम्पूर्ण बाज़ार को एक कर रहा है और मनुष्यों को बाँट रहा है ।

     भूमंडलीकरण के स्तर पर उत्तर आधुनिकता और तीसरी दुनिया के संदर्भ में उत्तरऔपनिवेशिक सिद्धांत मुख्य औज़ार है । समाजवाद पराजित हो चुका है वहीं पूंजीवाद की फतह सम्पूर्ण सर्वव्यापी है । आधुनिक भारतीय संस्कृति और समाज में जो कुछ भी प्रगतिशील और मूल्यवान है उसका एक बड़ा हिस्सा यूरोप से आया है

     सांस्कृतिक तर्क के सहारे पूंजीवाद के साम्राज्यवाद का उत्कर्ष ही भूमंडलीकरण है । भारत में भूमंडलीकरण की शुरुआत नब्बे(1990) के दशक से होती है । भूमंडलीकरण की शुरुआत मेँ लिखे गए उपन्यासों मेँ लिखे गए उपन्यासों मेँ उनके प्रभाव को देखा जा सकता है । जब भारत मौजूदा आर्थिक और राजनीतिक नेतृत्व व भूमंडलीकरण के समक्ष समर्पण की नीति पर चल रहा हो उस समय प्रतिरोधी संस्कृति और साहित्य से ही आशा की जा सकती है । हिन्दी मेँ भूमंडलीकरण के प्रभाव मेँ अनेक उपन्यास लिखे जा रहे हैं तो दूसरी तरफ उसके सम्पूर्ण प्रतिरोध और विकल्प के रूप मे बहुत से उपन्यास प्रतिरोध का सही नजरिया अपनाकर भूमंडलीकरण के विरुद्ध जन प्रतिरोध की सही अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर साहित्य के जनतंत्र की रचना कर रहा है ।

     हिन्दी उपन्यासों मे भूमंडलीकरण का प्रभाव और प्रतिरोध कई रूपों मे है । भारत के औपनिवेशिक काल मे प्रेमचंद ने 1923 ई॰ मेँ ही रंगभूमिमेँ विदेशी पूंजी का विरोध करते हैं । 1991 ई॰ के बाद भारत मेँ आए भूमंडलीकरण और उदारीकरण की सैद्धांतिकी और उसके मूल्यों का समर्थन और प्रचार की प्रवृत्ति देखी जा सकती है । 1993 ई॰ मेँ प्रकाशित सुरेन्द्र वर्मा के उपन्यास मुझे चाँद चाहिएके केंद्र मेँ यौन मुक्ति के दर्शन को प्रस्तुत किया गया है । उपन्यास की नायिका सिलबिल कस्बे के प्राइमरी स्कूल के मामूली अध्यापक की बेटी है, उसके सामने असंभव महत्वाकांक्षाओं और सपनों की कभी न समाप्त होने वाली श्रीखला सजाई जाती है और वह उन सबको पाने के लिए मचल उठती है । असंभव से आगे बढ़ते जाने की ललक सिलबिल उर्फ़ वर्षा वशिष्ठ को अकेला कर देती है । सिलबिल एक प्रतीक मात्र है उन लड़कियों की जो सबकुछ पा लेने के चक्कर मेँ अपना सर्वस्व खो देती हैं । पूंजी इतनी चंचल है की वह किसी संबंध को ठहरने नहीं देती । सिलबिल अपनी उपलब्धियों और जीवन मेँ संबंध तथा समंजस्य नहीं बैठा पाई ।

     भूमंडलीकरण मेँ स्त्री की अंधी दौड़ को दर्शाने वाला उपन्यास है चित्रा मुद्गल का आँवा’(1999) जहां स्त्री इस भूमंडलीकरण के आँवा मेँ पक रही है । पूंजी की चकाचौंध किसी को भी गुलाम बना सकती है और वह चाहे मुंबई के ट्रेड यूनियन के नेता की बेटी नमिता पाण्डेय हो या कोई और स्त्री मुक्ति का प्रश्न देह मुक्ति के कुछ हद तक रेड्यूसहो जाता है । बाज़ार मुक्ति को झांसा देता है शायद कुछ हद तक मुक्त करता है लेकिन उससे ज्यादा वह अपने संजाल मेँ फंसाता भी है । ममता कालिया के उपन्यास एक पत्नी के नोट्स’, मृदुला गर्ग का उपन्यास कठगुलाब’(1996) विभिन्न समाजों, राष्ट्रों और वर्गों की स्त्रियों की नियति से साक्षात्कार कराता है । वह इस सत्य को उद्घाटित करता है की इतिहास में भी औरत दूसरे दर्जे की नागरिक रही है । राजी सेठ निष्कवच’(1995) में आधुनिक स्त्री के दो रूपों के खाँटी और निष्कवच यथार्थ को नीरा और मार्था के रूप में प्रस्तुत करती हैं । राजी सेठ स्वीकृत और परंपरागत मूल्यों पर पुनर्विचार के लिए उकसाती हैं । नासिरा शर्मा के उपन्यास शाल्मली’(1993) व जिंदा मुहावरे’(1993) हैं जिनमें वे व्यापक मानवीय संदर्भों को उठाती और चिन्हित करती है । मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास बेतवा बहती रही’(1994) बुंदेलखंड की पृष्टभूमि में बेतवा के कछारी क्षेत्र में साधारण स्त्री के उत्पीड़न और यातना के संदर्भों को उद्घाटित करता है इसी का विस्तार वह इदन्नममें करती हैं । स्त्री की मुक्ति का सवाल पूरे समाज की मुक्ति से जुड़ा है वह इस सत्य को कभी ओझल नहीं होने देती । 

     भूमंडलीकरण के समय मेँ और भी मुद्दे हैं आदिवासी विमर्श और विस्थापन, दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, धार्मिक और सांप्रदायिकता संकीर्णता । इस समय उपन्यासों इन सभी विषयवस्तु को साथ लिए एक समानरूप से सामने आते हैं । सांप्रदायिकता को जहाँ एक दूसरे खास तरह की आक्रामकता मिलती है और अल्पसंख्यक इसके खास रूप से शिकार बनते हैं ।

     इस भूमंडलीकरण के दौर में सबसे ज्यादा कोई परास्त और निराश हुआ हो तो वे हैं आदिवासी, दलित और स्त्री । नब्बे के दसक के बाद इन सभी विमर्शों के केंद्र मे रखकर साहित्य लिखे जा रहे हैं । दमित अस्मिताएं और उनकी लोकतान्त्रिक मांगों, उपभोक्तावादी अपसंस्कृति, मध्यवर्गीय जीवन की विद्रूपता जनजीवन की तबाही उत्पीड़न आदि को रेखांकित किया जा सकता है । आदिवासी विनाश और विस्थापन को चित्रित करने वाले उपन्यासों में प्रमुख है – ‘हिडिंब’-एस॰ आर॰ हरनोट, ‘ग्लोबल गाँव के देवता’, ‘गायब होता देश’- रणेन्द्र, ‘जहां जंगल शुरू होता है’ – संजीव, ‘जहां बांस फूलते हैं’ –श्री प्रकाश मिश्र, सांप्रदायिकता की समस्या पर केन्द्रित उपन्यास है- हमारा शहर उस बरस’- गीतांजली श्री ,’कैसी आग लगाई’, ‘बरखा लगाई’- असगर वजाहत , ‘नागफनी के जंगल में’, ‘कितने पाकिस्तान’ – कमलेश्वर तथा आखिरी कलाम’- दूधनाथ सिंह , जनजीवन में विकृति और प्रतिरोध को उभारने वाले उपन्यास लिखे भी गए हैं जिनमें प्रमुख हैं; ‘बिश्रामपुर का संत’- श्रीलाल शुक्ल, ‘विसर्जन’– राजू शर्मा, ‘देश निकाला’- धीरेन्द्र अस्थाना, ‘मुन्नी मोबाइल’- प्रदीप सौरभ आदि । दमित अस्मिता पर केन्द्रित उपन्यास है ; ‘थमेगा नही विद्रोह’- उमराव सिंह जाटव, ‘उधर के लोग’- अजय नवरिया, ‘जख्म हमारे’, ‘मुक्ति पर्व’- मोहनदास नैमिशराय आदि ।

     इस तरह हिन्दी औपन्यासिकता भूमंडलीकृत यथार्थ के विविया रूपों को अपने में समेटती और उसका प्रतिरोध एवं विकल्प प्रस्तुत करती है । भूमंडलीकरण और बाज़ार की पूरी सरंचना सत्ता केंद्र और उसके तिलिस्म की भयावहता और कुरूपता को, नए किस्म के यथार्थ को उसकी पूरी पेचीदगी के साथ हिन्दी उपन्यासों में प्रस्तुत करते हुए उसके विरुद्ध जनप्रतिरोध और विकल्प को रखने की कोशिशें दिखती हैं ।  

     राकेश कुमार सिंह का सन 2003 में प्रकाशित उपन्यास पठार पर कोहराझारखंड के जनजातीय जीवन पर लिखा गया है । रचनाकर ने शोषण उत्पीड़न और अत्याचार के विभिन्न हतकंडो के चंगुल में फंसे संथाल में मुंडा आदिवासियों की स्थिति को उजागर किया है । प्रस्तुत उपन्यास में शोषण उत्पीड़न और अत्याचार के नए- नए दुश्चक्रों के जाल में फंसे आदिवासी मानस को जागृत करते हुए उसमें अस्मिता और चेतना को जगाने वाले एक संवेदनशील और दुर्दम्य आत्मविश्वास, इछाशक्ति वाले नायक पेशे से अध्यापक संजीव शान्याल की संघर्ष गाथा है साथ ही हताशा से घिरी एक आदिवासी मुंडा युवती के रंगीनी आत्मसंघर्ष, अस्तित्व की रक्षा और नारी मुक्ति की कहानी है । उपन्यासकार ने झारखंड के आदिवासी लोकजीवन की छटाओं का चित्रण करते हुए उनके सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन को स्पर्श करने का प्रयास किया है ।

     महिला लेखिका शरद सिंह का पिछले पन्ने की औरतेंउपन्यास सन 2005 में प्रकाशित हुआ । सदियों से उपेक्षित, वंचित, उत्पीड़ित, एवं आर्थिक बदहाली का जीवन जी रही बेड़ियाँ समाज की औरतों के जीवन सत्य को इस उपन्यास में उजागर किया है ।

     ‘शाम भर बातेंदिव्या माथुर का लिखा हुआ उपन्यास है जो 2015 मे आया था । वह प्रवासी दुनिया मे भूमंडलीकरण के समय मे किस तरह से पार्टियों का चलन एक सभ्यता बन गई है इसको बारीकी के साथ सामने लाती है । पार्टी मे महिलाओं का किस तरह से शोषण बड़े स्तर पर किया जाता है इसको दिखाती हैं । विद्याभूषण का लिखा हुआ लौटना नहीं है’(2015), उपन्यास अपने समय और समाज को समझने का सशक्त माध्यम दिखता है । एक तरफ जब देश विकास और सफलता की अग्रसर है, विश्वशक्ति बनने की ओर कदम बढ़ा रहा है ठीक ऐसे समय में स्त्रियों पर कभी परम्पराओं के नाम पर तो कभी रीति रिवाजों के नाम पर अत्याचार करना अत्यंत चिंतनीय और सोचनीय है । यह उपन्यास स्त्रियों की जीवन की विषमताओं, बिडंबनाओं और जटिलताओं को ही व्यक्त नहीं करता बल्कि उन्हें अपनी स्वतन्त्रता और संघर्ष के लिए भी प्ररित करता है ।

     भूमंडलीकरण एक ओर जहां पूंजीपतियों के लिए वरदान साबित हो रहा है वही शोषित वर्ग (दलित, आदिवासी, स्त्री, अल्पसंख्यक ) के लिए नई समस्या बनकर सामने आया है । भूमंडलीकरण का सीधा प्रहार आदिवासियो की की संस्कृति पर हुआ है । आज आदिवासी केन्द्रित बहुत उपन्यास लिखे जा रहे हैं जिनमें वैश्वीकरण का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है । भूमंडलीकरण का प्रभाव मनुष्य पर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों स्तरों से पड़ा है । साहित्य का जुड़ाव समाज से सबसे सबसे अधिक होता है इसलिए समाज व समय के बदलने के साथ साहित्य के प्रतिमान बदलने लगता है । 21वीं सदी में वृद्धों की समस्याये बच्चों की समस्याएँ, मानव अधिकार आदि समस्याएँ भी अपनी उपस्थिती दर्ज करवा रही है । वर्तमान समय के उपन्यासों मे इन सभी की उपस्थिती देखी जा सकती है । इस समय कुछ आत्मकथात्मक उपन्यास भी लिखे जाने लगे हैं । लेखक अपनी जमीन व अपने परिवेश को अपने तरीके से जोड़कर सामने ला रहा है ।

     इस प्रकार हम देखते हैं की नब्बे के दशक के बाद के उपन्यासों में सांप्रदायिकता, उदारवादी नीति का विरोध तथा उसका प्रभाव, दलितों/ शोषितों की स्थिति, महिलाओं की स्थिति, बच्चों, वृद्धों आदि की स्थिति तथा युवा पीढ़ी का अपने समय व समाज के साथ खत्म होती रुझान की स्थिति का निरूपण मिलता है ।

   

संदर्भ- सूची

1.       मुद्गल, चित्रा, आँवा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, छठा संस्करण- 2010, ISBN: 81-7138-022-0

2.       वजाहत, असगर, कैसी आग लगाई, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पहला संस्करण- 2014, ISBN: 978-81-267-0885-7

3.       मिश्र, श्रीप्रकाश, जहां बांस फूलते हैं, यस पब्लिकेशन्स, दिल्ली, ISBN: 978-93-81130-97-1

4.       सिंह, पुष्पपाल, भूमंडलीकरण और हिन्दी उपन्यास, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण- 2012, ISBN: 9788183615037

5.       सिंह, पुष्पपाल, 21वीं सदी का हिन्दी उपन्यास, राधाकृष्ण प्रकाशन, संस्करण- 2015, ISBN: 9788183617888

6.       काबरा, कमल नयन, भूमंडलीकरण के भंवर में भारत, संस्करण- 2005, ISBN: 817714202x, 9788177142020

 

 

 

                             

उच्च शिक्षा में संवर्धन में समस्याएँ

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