दुनिया में आरक्षण (प्रतिनिधित्व) से
बढ़कर ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनी,
जिसने इतने कम समय में अहिंसक क्रान्ति के ज़रिये समाज के इतने बड़े तबके को
गौरवपूर्ण व गरिमापूर्ण जीवन जीने में इससे ज़्यादा लाभ पहुँचाया हो । भारत में ये
काम दुबारा मण्डल कमीशन के माध्यम से होने जा रहा था । प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई
ने अनुच्छेद 340 के
तहत नए पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की घोषणा की । आयोग की विज्ञप्ति 1 जनवरी, 1979 को जारी की
गई, जिसकी
रिपोर्ट 31
दिसंबर 1980 को
दी जिसे राष्ट्रपति ने अनुमोदित किया । 30
अप्रैल 1982 में
इसे सदन के पटल पर रखा गया,
जो 10
वर्ष तक फिर ठंडे बस्ते में रहा । वी.पी. सिंह की सरकार ने 7 सितंबर 1990 को सरकारी
नौकरियों में पिछड़ों के लिए 27%
आरक्षण लागू करने की घोषणा की । सरकार की क़ुर्बानी देकर आने वाली पीढ़ियों की परवाह
करने वाले जननेता वी.पी. सिंह जैसी शख़्सियतों के बारे में ही राजनीतिक चिंतक जे.
एफ. क्लार्क कहते हैं कि “A
politician thinks of the next election. A statesman, of the next generation” अर्थात्
एक राजनीतिज्ञ अगले चुनाव के बारे में सोचता है, पर एक दूरदर्शी राजनेता अगली पीढ़ी के बारे में” । इस परिभाषा
में फिट बैठने वाले बहुत कम राजनेता मिलते हैं । वीपी सिंह ने साबित किया कि यदि
दूरदृष्टि, सत्यनिष्ठा
व इंटेग्रिटी हो, तो
अल्पमत की गठबंधन सरकार भी समाजहित व देशहित में ऐतिहासिक व ज़रूरी फ़ैसले ले सकती
है । जो काम उनके पहले के प्रधानमंत्री अपने पाँच साल के कार्यालय में भी नहीं कर
पाये, उसे
उन्होंने साल भर के अंदर कर दिखाया । इसी संदर्भ में भारत में आजादी के बाद
सामाजिक न्याय के प्रणेता बी.एन.मंडल द्वारा राज्यसभा में सन 1969 में दिया
गया भाषण याद आता है,
‘जनतंत्र में अगर कोई पार्टी या व्यक्ति यह समझे कि वह ही जब तक शासन में रहेगा, तब तक संसार
में उजाला रहेगा, वह
गया तो सारे संसार में अंधेरा हो जाएगा,
इस ढंग की मनोवृत्ति रखने वाला,
चाहे कोई व्यक्ति हो या पार्टी,
वह देश को रसातल में पहुंचाएगा। …
हिंदुस्तान में (सत्ता) से चिपके रहने की एक आदत पड़ गयी है, मनोवृत्ति बन
गई है । उसी ने देश के वातावरण को विषाक्त कर दिया है ।’
ओबीसी जातियाँ अपने इतिहास को गर्व
करती हैं सिर्फ इसलिए कि उसका इतिहास ऐसे कई विभूतियों के महान कार्यों से भरी पड़ी
हैं जो समाज के सर्वस्व न्योछावर कर दिये थे । शुरू से ही अतिपिछड़ा राज्य की
श्रेणी में रहा बिहार राज्य के पहले यादव अर्थात ओबीसी मुख्यमंत्री के तौर पर बीपी
मण्डल ने शपथ ली थी । उनके शपथ लेने के साथ ही बरौनी रिफायनरी में तेल का रिसाव
गंगा में हो गया और उसमें आग लग गयी । इस प्रकरण को मुद्दा बनाकर बिहार विधानसभा
में पंडित बिनोदानंद झा ने कहा कि शुद्र मुख्यमंत्री बना है तो गंगा में आग ही
लगेगी । ये प्रकरण उस समय में काफी चर्चित था । सवर्ण तबका इसको ज़ोरशोर से मुद्दा
बना दिया था ।
भारत जैसे विशाल देश को आजादी मिलने के
बाद समाज में व्यापक बदलाव की संभावनाओं के रूप में देखा जा रहा था । भारतीय समाज
और राजनीति लगभग दोनों ही देश को बांटने में लगे हुए थे लिहाजा समाज को जाति, धर्म अथवा
राजनीतिक बाहुबल को कम नहीं किया जा सका । इसका खामियाजा आज भी भारतीय समाज भुगतने
को अभिशप्त है । आजादी मिलने के कुछ वर्षों बाद भारत में जनसंख्या के हिंसाब से
भागीदारी सुनिश्चित करने की माग पुनः उठने लगी थी । इसके पीछे कारण यह था आजादी के
बाद भारत की सम्पूर्ण सत्ता भारतीय नेताओं व समाज सुधारकों के हाथ में आ गई थी
किन्तु उसके बाद भी समाज के सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व नहीं हो पा रहा था ।
भारत को मुख्यतया कृषि प्रधान देश के
रूप में जाना जाता है । लेकिन इसके पीछे यह कभी नहीं जानने की कोशिश की गई कि ये
मुख्यतः कृषि पर आश्रित लोग किस समुदाय अथवा समाज से आते हैं । निश्चय ही ये लोग
निचले तबके से आते हैं । वास्तव में भारत जाति-प्रधान और विभिन्न समुदायों और
संप्रदायों में विभाजित एक गणतन्त्र है । यहाँ जाति सबसे अहम है । जो जिस जाति में
पैदा हुआ वह उसी का होकर रह जाता है । डॉ. अंबेडकर इस संदर्भ में कहते हैं कि
हिन्दू धर्म में जातियों की जड़े इतनी मजबूत हैं कि जो जिस जाति में एक बार पैदा हो
गया वह उसी जाति में मरेगा चाहे वह कितना भी अच्छा कार्य क्यों न कर ले । यह एक
ऐसा बहुमंजिला भवन है जिसमें एक तल से दूसरे तल तक जाने के लिए सीढ़ी ही नहीं है ।
इसमें जाति के आधार पर भारत का वर्गीकरण करें तो ओबीसी अर्थात अन्य पिछड़ा वर्ग में
सम्मिलित जातियाँ सबसे ज्यादा हैं ।
भारतीय समाज और राजनीति को मुख्यतया दो
भागों में विभाजित करके इसके स्थितियों का अध्ययन किया जा सकता है । पहला “मण्डल कमीशन
के पहले का भारत” दूसरा
“मण्डल
कमीशन के बाद का भारत”
। इन दोनों कालखण्डों को ध्यान में रखकर भारतीय समाज और राजनीति में आए बदलाओं
का अध्ययन करने पर हमें भारत की असली तस्वीर दिखाई देती है । यह आश्चर्यजनक है कि
मण्डल कमीशन को बहुत कम लोगों ने पढ़ा व समझा है । इसका मुख्य कारण यह है कि इसका
प्रचार-प्रसार करना भी सरकार ने उचित नहीं समझा लिहाजा यह फाइलों और दफ्तरों तक
सिमटकर रह गई । इसका सबसे कारण इसके अनुवाद को लेकर थी । यह मुख्यतया अँग्रेजी में
था जिसका अनुवाद अभी तक नहीं हुआ था ।
संविधान लागू होने के समय भारत कि
ओबीसी जातियों को कोई आरक्षण नहीं दिया गया । (यहाँ आरक्षण का तात्पर्य “प्रतिनिधित्व” से है । कुछ
लोग आरक्षण शब्द की गलत व्याख्या करके उसका समाज के बीच भ्रम पैदा करते हैं ।)
आजादी के बाद भी सत्ता सिर्फ सामाजिक,
राजनीतिक व आर्थिक रूप से सशक्त समुदाय के पास रही । दलितों व पिछड़े वर्गों की
स्थिति में कोई सुधार नहीं दिख रही थी । अपना दल के संस्थापक का एक कथन है “अभी सिर्फ
अंग्रेजों से आजादी मिली है । समान भागीदारी और स्वाभिमान के लिए कमेरा समाज दूसरी
आजादी कि जंग के लिए मैदान में आए । उठो शोषितों, उठो कमेरों । राजसत्ता पर कब्जा करो ।”
आजादी के समय ज्यादातर ज़मीनें
जमींदारों के पास थी और ज्यादातर जमींदार उंची जाति से थे । जिसके पास धन होता है, वो आसानी से
आगे बढ़ जाता है । ऐसा ही हो रहा था । दलित समुदाय के लोग पिछड़ रहे थे । भारत में
जमींदारी प्रथा भी एक बहुत बड़ी समस्या के रूप में सामने आई है । इससे समाज के बीच
में असमानता की खाईं को बढ़ाने का काम किया है । भारत के पहले प्रधानमंत्री
जवाहरलाल नेहरू ने 29
जनवरी, 1953 को
काका कालेलकर की अध्यक्षता में ‘पिछड़ा
वर्ग आयोग’ का
गठन किया । उनकी अगुवाई में लगभग दो साल के बाद आयोग ने 30 मार्च, 1955 को अपनी
रिपोर्ट भारत सरकार को सौंपी । इस रिपोर्ट का कुछ खास असर नहीं हुआ । क्योंकि
तत्कालीन नेहरू सरकार ने इस रिपोर्ट पर संसद में चर्चा करने से ही मना कर दिया और
इसे खारिच कर दिया । काका कालेलकर आयोग ने अपने सिफ़ारिशों में उन सभी पक्षों को
नहीं ला पाई जो तत्कालीन समय और भविष्य में एक समतामूलक समाज निर्माण के लिए
आवश्यक था ।
इन सभी कमी को पूरा करने के लिए
तत्कालीन मोरार जी देसाई सरकार ने अपने ओबीसी सांसद बिंदेश्वरी प्रसाद मण्डल
(बी.पी.मण्डल) की अगुवाई में मण्डल आयोग का गठन किया । मण्डल आयोग ने अपने सदस्यों
के साथ ओबीसी जातियों को चिन्हित करने के लिए पूरे देश का दौरा आरंभ किया । लेकिन
बड़ी बिडम्बना यह रही की मण्डल कमीशन तब पूर्ण हुई जब मोरार जी देसाई सरकार गिर
चुकी थी ।
मंडल आयोग की कुछ सिफ़ारिशें :
मंडल आयोग के रिपोर्ट में पिछडे़ वर्गों
के लोगों के लिए सरकारी नौकरियों में 27
फीसदी आरक्षण की सिफारिश की बात की गई । भारत में अनुसूचित जाति और अनुसूचित
जनजाति को पहले से 22.5
प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा था । इसी कारण तत्कालीन इंदिरा गांधी की सरकार इस
सिफारिश को लागू करने से बचती रही । मंडल आयोग की सिफारिश को लागू करने का मतलब था
49.5
प्रतिशत सीटें आरक्षित कर देना । लेकिन इंदिरा गांधी सरकार इसे लागू नहीं कर सकी ।
सरकारी नौकरियों में आरक्षण के अलावा
मंडल आयोग की अन्य सिफारिश भी थी । जो मण्डल कमीशन की प्रमुख सिफ़ारिशों में शामिल
थी । मुख्य सिफ़ारिश कुछ निम्न हैं -
· जमींदारी प्रथा को खत्म करने के लिए भूमि सुधार कानून लागू किया जाये
क्योंकि पिछड़े वर्गों का सबसे बड़ा दुश्मन जमींदारी प्रथा थी ।
· सरकार द्वारा अनुबंधित जमीन को न
केवल ST/ST को
दिया जाये बल्कि OBC को
भी इसमें शामिल किया जाये ।
· केंद्र और राज्य सरकारों में
ओबीसी के हितों की सुरक्षा के लिए अलग मंत्रालय/विभाग बनाये जाये ।
· केंद्र और राज्य सरकारों के अधीन
चलने वाली वैज्ञानिक,
तकनीकी तथा प्रोफेशनल शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए ओबीसी वर्गों के
छात्र-छात्राओं के लिए 27%
आरक्षण लागू किया जाये । जैसे अनुसूचित जाति और जनजातियों को उनकी जनसंख्या के
अनुपात में 22.5
प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है ।
· समाज की मुख्य धारा से पीछे छूट
गई आबादी के सांस्कृतिक उन्नयन के लिए पिछड़े वर्गों की सघन आबादी वाले इलाकों में
शिक्षा की विशेष व्यवस्था होनी चाहिए । इसमें व्यावसायिक शिक्षा पर विशेष ध्यान
देना चाहिए । तकनीकी और व्यावसायिक संस्थानों में आरक्षण कोटे से आए छात्रों के
लिए कोचिंग की विशेष व्यवस्था की जाए । ओबीसी की आबादी वाले क्षेत्रों में वयस्क
शिक्षा केंद्र तथा पिछड़ें वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए आवासीय विद्यालय खोले
जाए वहीं ओबीसी छात्रों को रोजगारपरक शिक्षा दी जाये ।
· ग्रामीण कामगारों के कौशल को
बढ़ावा देने के लिए विशेष योजना चला कर उन्हें रियायती दरों पर ऋण मुहैया कराना
ज़रूरी है । औद्योगिक और व्यावसायिक कारोबार में पिछड़े वर्गों की भागीदारी बढ़ाने
के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा वित्तीय और तकनीकी संस्थानों का नेटवर्क
विकसित किया जाए ।
· आयोग ने कहा कि समाज का पिछड़ा
तबका गुजर बसर करने के लिए धनी किसानों के ऊपर निर्भर है क्योंकि इस वर्ग के पास
खेती के लिए बड़े भूखंड नहीं है । इसलिए देश भर में क्राँतिकारी भूमि सुधार लागू
करने की ज़रूरत है ।
· पिछड़े वर्गों के लिए कल्याणकारी
कार्यक्रम चलाने के वास्ते राज्यों को केंद्रीय सहायता की ज़रूरत है ।
भारतीय समाज को दिशा देने कार्य आजादी के
पहले डॉ. बी.आर.अंबेडकर द्वारा किया गया था वहीं आजादी के बाद ये दूसरा महत्वपूर्ण
कार्य बी.पी. मण्डल के द्वारा होने जा रहा था । इसी के साथ मान्यवर कांशीराम के
नेतृत्व में बहुजन आंदोलन भी जोर पकड़ रहा था । उस समय एक नारा भी अपने चरम पर था “ब्राह्मणवाद
का फूटा कमंडल, जय
भीम मण्डल जय भीम मण्डल”
। ये नारा ओबीसी और दलितों को एक साथ आने को प्रेरित कर रहा था । लम्बे समय तक
पिछड़ों का क़ानूनी अधिकार समाजवादियों के नारों में “सोशलिस्ट पार्टी बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ” गूंजता रहा । ये वो दौर था जब मण्डल कमीशन अपने सिफ़ारिशों
को सरकार को सौंप दिया था । लेकिन सरकार ने इसे लागू करने में हिला-हवाली कर रही
था । इसके रिपोर्ट को सौंपे जाने के साथ समर्थन और विरोध दोनों में आंदोलन शुरू हो
गए थे । बी.पी.मण्डल अपने गहन अध्ययन व पड़ताल के द्वारा ओबीसी जतियों की असली
समस्याओं को पता लगाकर उसे अपने सिफ़ारिशों में शामिल किया । मण्डल कमीशन की मुख्य
सफारिशों को करने में ही सरकार के पसीने छूट रहे थे ।
मंडल आयोग ने पिछड़ी जातियों, वर्गों के
निर्धारण के लिए सामाजिक,
शैक्षिक और आर्थिक मानकों के आधार पर 11
सूचकांक तय किए थे -
सामाजिक स्थिति :
· वैसी जाति या वर्ग जिन्हें अन्य
जाति या वर्गों द्वारा सामाजिक रूप से पिछड़ा समझा जाता है ।
· वैसी जाति या वर्ग जो आजीविका के
लिए मुख्य रूप से शारीरिक श्रम पर निर्भर है ।
· वैसी जातियाँ या तबका जिनमें 17 साल से कम
आयु की महिलाओं का विवाह दर ग्रामीण इलाकों में राज्य औसत से 25 प्रतिशत और
शहरी इलाकों में दस प्रतिशत अधिक है और इसी आयु वर्ग में पुरुषों का विवाह दर
ग्रामीण इलाकों में दस प्रतिशत और शहरी क्षेत्र में पाँच प्रतिशत ज्यादा है ।
शैक्षिक आधार :
· वैसी जातियाँ या वर्ग जिनमें
पाँच से 15 साल
की आयु वर्ग में स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की संख्या राज्य औसत से कम से कम 25 प्रतिशत
अधिक हो ।
· इसी आयु वर्ग में जिन जातियों या
वर्गों के बच्चों के स्कूल छोड़ने का प्रतिशत राज्य औसत से कम से कम 25 प्रतिशत है
।
· वैसी जातियाँ, वर्गों
जिनमें मैट्रिक परीक्षा पास करने वाले छात्र-छात्राओं का प्रतिशत राज्य औसत से 25 प्रतिशत कम
है ।
आर्थिक आधार :
· वैसी जातियाँ, वर्गों
जिनमें औसत पारिवारिक संपत्ति मूल्य राज्य औसत से 25 प्रतिशत कम है ।
· ऐसी जातियाँ, वर्ग जिनमें
कच्चे घरों में रहने वालों की संख्या राज्य औसत से कम से कम 25 प्रतिशत कम
है ।
· ऐसे इलाकों में रह रही जातियाँ, वर्ग जिनमें 50 फीसदी
परिवारों को पेयजल के लिए आधा किलोमीटर से दूर जाना पड़ता है ।
आज की स्थिति थोड़ा और दयनीय है । आजादी
के बाद समाज निर्माण की सबसे बड़ी पहल में शामिल मण्डल कमीशन राजनीतिक दावपेंच में
फंस कर रह गई है । जिसकी संख्या सबसे ज्यादा है वही आज हाशिये पर जीने को अभिशप्त
है । मण्डल कमीशन के आने के बाद कई ओबीसी नेताओं का उदय हुआ जिनमें कुछ तो अपने
मिशन के प्रति सफल भी हुए वहीं कुछ सत्ता के हाथों बिक गए । नतीजा ये है कि आज तक
मण्डल कमीशन कि सिर्फ तीन सिफ़ारिशें ही लागू हो पाई है । बाकी अमल में नहीं पाया ।
वर्तमान में मोदी सरकार जो अपने को पिछड़ी जाति कि बताते हैं वही आज इसके गला घोटने
के प्रयास में लगे हुए हैं ।
वास्तव में मंडल कमीशन कि सिर्फ कुछ ही
सफारिशों के लागू होने से ही सौ प्रतिशत भारत जाग गया । उत्तर प्रदेश में कल्याण
सिंह और राजनाथ सिंह के बाद कोई भी अगड़ी जाती का व्यक्ति मुख्यमंत्री नहीं बना ।
राष्ट्रीय स्तर पर उमा भारती जैसे सरीखे नेता भाजपा में उभरकर आए । सन 1990 से आज तक
बिहार में भी कोई भी अगड़ी जाती का व्यक्ति मुख्यमंत्री नहीं बना । मध्यप्रदेश, राजस्थान में
भी क्रमशः शिवराज सिंह चौहान और अशोक सिंह गहलोत सत्ता में आए ।
वास्तविक स्थिति इससे इतर थी । ओबीसी
के लिए 27
प्रतिशत आरक्षण देने के साथ ही उसमें क्रीमीलेयर लगाकर उसे दो भागों में बाँट दिया
गया । क्रीमीलेयर ओबीसी के ऊपर आरक्षण को जिंदा लाश बना देने के समान था । ये बात
सौ प्रतिशत सत्य है कि मंडल कमीशन के बाद भारत की राजनीती में एक टर्निंग पॉइंट
आया । जिससे राजनीति और समाज की दशा तथा दिशा दोनों ही बदल गई । आरक्षण की मांग कर
रहे हैं वो लोग और जो नहीं कर रहे हैं वो लोग, जिन्हें ये समझना चाहिए कि जब तक इस देश में कास्ट सिस्टम की
लड़ाई चल रही है तब ऐसा मामला तूल पकड़ता रहेगा। शायद कास्ट सिस्टम ख़त्म हो जाये तो
इस देश में जाति अंतर का भाव ख़त्म हो जायेगा ।
आज स्थिति और मण्डल कमीशन कि सिफ़ारिशों
को देखते हुए सरकार उसे पुनः लागू करने की नाकाम कोशिश में लगी हुई है । अन्य
पिछड़ी जातियों को मंडल कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर दो दशक पहले सरकारी नौकरियों
में 27
फीसदी आरक्षण दिया गया । हालांकि हाल ही में आरटीआई के जरिए केन्द्र से जानकारी
मिली कि 1
जनवरी 2015 तक
केन्द्रीय कर्मचारियों में महज 12
फीसदी लोग अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) से आते हैं । आंकड़ों के मुताबिक केन्द्र
सरकार ने ग्रुप ए, बी, सी और डी
श्रेणी में कुल मिलाकर 79,483 पद
हैं और इनमें महज 9,040
कर्मचारी अन्य पिछड़ी जातियों से आते है । वहीं केन्द्र सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ
पर्सनल एंड ट्रेनिंग के आंकड़ों के मुताबिक इसके मंत्रालय में 12.91 फीसदी
अनुसूचित जाति, 4
फीसदी जनजाति और 6.7
फीसदी ओबीसी कर्मचारी हैं जिन्हें मंडल के तहत आरक्षण का लाभ मिला है । मंत्रालय
में कुल कर्मचारियों की संख्या 6,879 है
।
मण्डल कमीशन की सिफ़ारिशें राष्ट्र
निर्माण की एक महत्वाकांछी सपनों के समान थी । जिसमें भारत सम्पूर्ण तस्वीर बदलने
की शक्ति थी । यदि प्रारम्भ में ही पूरी सिफ़ारिशों को लागू कर दिया गया होता आज
भारत की तस्वीर इतनी भयावह नहीं होती । सामाजिक व राजनीतिक रूप से सशक्त समाज ही
एक नए और दृढ़ राष्ट्र का निर्माण करता है । सत्ता में स्थापित सरकारें अपने निजी
स्वार्थ के लिए मण्डल कमीशन का वोट बैंक मजबूत करने के लिए भी प्रयोग करती रही हैं
और सफल भी हो रही हैं । एक तरफ आरक्षण का विरोध वही दूसरी तरफ उन्हीं ओबीसी
जातियों को हिन्दू के नाम पर छद्म रूप से संगठित करने की कोशिश भारतीय समाज में
असमानता की खाईं को और मजबूत कर रहा है ।
ओबीसी जातियाँ अपने आज अपने अस्तित्व
को भूलने लगी हैं । मण्डल कमीशन उनमें ये अलख जगाने का कार्य कर रहा था । मण्डल
कमीशन को पढ़ते समय मान्यवर कांशीराम जी के योगदान को कुछ लोग भुला देते हैं । जिस
समय सिफ़ारिशें लागू हो रही थी उस समय मान्यवर कांशीराम पूरे ज़ोर-शोर से मण्डल
कमीशन को लागू करवाने में अपनी पूरी ताकत लगा दी थी । जगह जगह संगोष्ठियाँ करके
मण्डल कमीशन के बारें में लोगों को जागरूक कर रहे थे ।
तामिलनाडू के आरटीआई कार्यकर्ता
मुरलीधरन जी ने केंद्र सरकार के लगभग सभी विभागों से जानकारी मांगी थी और वह
जानकारी 27
दिसंबर 2015 को ‘टाइम्स ऑफ
इंडिया’ ने
पहले पन्ने पर छापी । इस जानकारी के अनुसार मंडल आयोग की अनुशंसायें लागू होने के
बाद के 25
वर्षों में ओबीसी के हिस्से में मात्र 12
प्रतिशत नौकरियां आई हैं । यानी जिस ओबीसी की जनसंख्या 52 प्रतिशत से
भी अधिक है, उन्हें
सिर्फ 27
प्रतिशत आरक्षण और उसमें से भी उसे सिर्फ 12
प्रतिशत ही प्राप्त होने देना साजिश ही तो है । कालांतर में यह स्थिति और भवायव ही
होती जा रही है । नौकरियों व अन्य क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व धीरे-धीरे लगभग समाप्त
हो रहा है ।
बी.पी. मंडल ने सामाजिक न्याय के
क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है वह पिछड़े समाज के आखिरी पायदान पर रहने वाले
व्यक्ति के बारे में सोचते थे । बी.पी. मंडल की देन है कि आज पिछड़ा और दलित को
सामाजिक न्याय मिल पाया है । पिछड़े वर्ग के मामले में आज डॉ. भीमराव अंबेडकर कहीं
पीछे रह गए हैं, जिन्होंने
पिछड़ों की समृद्धि का सपना तो देखा था,
लेकिन इस रूप में नहीं जैसा आज है । यह बी.पी. मण्डल की देन है । अतिपिछड़े
अपने उन साथियों की ज़्यादतियों का शिकार हैं जो सिर्फ नाम के पिछड़े रह गए हैं ।
सामाजिक और आर्थिक रूप से वे अगड़ी जातियों से कहीं आगे हैं ।
मण्डल कमीशन के लागू होने के बाद ओबीसी
की सामाजिक व राजनीतिक स्थितियों में कमोबेश सुधार हुआ । आर्थिक क्षेत्र में यह
समाज सशक्त होने लगा । जमींदारी प्रथा को हटाकर चकबंदी का कानून लाये जाने से
निचले तबके ऐसे वर्गों का फायदा हुआ जो पूर्णतः भूमिहीन थे । विगत कुछ वर्षों से
ओबीसी समुदाय अपने हक और अधिकार के लिए लड़ाई तेज कर दी है । जगह जगह जनसभाएं करके
मण्डल कमीशन की पूरी रिपोर्ट को लागू करवाने पर भारत सरकार पर दबाव कर रही है ।
वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र पी एस ने मण्डल कमीशन की पूरी रिपोर्ट का हिन्दी अनुवाद “मण्डल कमीशन
: राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी पहल”
शीर्षक से करके सामाजिक न्याय के क्षेत्र में क्रांतिकारी काम किया है । इसे
अब हिन्दी में आसानी से पढ़ा जा सकता है । धीरे-धीरे ओबीसी समुदाय अपने अधिकारों को
समझ रही है । बी.पी. मण्डल के योगदान को अब भुलाया नहीं जा सकता । इनके नाम पर
सामाजिक न्याय दिवस घोषित करके सरकारी छुट्टी की भी मांग चल पड़ी है । । । । जय मण्डल,
जय भीम, जय
कांशीराम, जय
भारत । । ।