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Wednesday, 25 May 2016

अहिंसा का स्वरूप और बौद्ध धर्म




अहिंसा का स्वरूप और बौद्ध धर्म
(अंतरअनुशासनिक अध्ययन)



                आज का समय हिंसा और अहिंसा के बीच उलझता जा रहा है। अहिंसा की भावना लोगों के पढ़ने लिखने तक सीमित रह गई है इसको व्यवहार में लाना आज के मनुष्य के लिए सबसे कठिन काम हो गया है। अहिंसा का सामान्य अर्थ है – हिंसा न करना। इसका व्यापक अर्थ है – किसी भी प्राणी को तन मन कर्म और वाणी से कोई नुकसान न पहुंचाना। मन से किसी का अहित न सोचना किसी को कटुवाणी आदि के द्वारा भी नुकसान न देना तथा कर्म से भी किसी भी अवस्था में, किसी भी प्राणी की हिंसा न करना यह अहिंसा है।
                वैदिक काल में हिंसा अपने चरम सीमा पर थी। देवी देवताओं को खुश करने के लिए पशुबलि, नरबलि आदि का चलन ज्यादा था। अश्वमेघ यज्ञ के नाम पर महिलाओं का शोषण किया जाता था। यज्ञ होने से पहले घोड़े का महिला के साथ संभोग करवाया जाता था। इसके पीछे उनका मानना था की ये सब करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। कोई जानबूझकर हिंसा करता था तो कोई अनजाने में। प्राणी हिंसा उनकी मुख्य विचार में शामिल थी। भगवान बुद्ध के जिस तरह की परिस्थितियाँ थी वह बहुत भयावह थी। आडंबर, ब्राहमणवाद अपने चरम सीमा पर था। इस परंपरा का सर्वप्रथम विरोध चार्वाकों ने किया था। बौद्ध धर्म अहिंसा की प्रेरणा जैन और चार्वाकों से ग्रहण करता है। अहिंसा को परम धर्म मान लिया गया अर्थात “अहिंसा परमों धर्म:”।
                तथागत बुद्ध हिंसा के खिलाफ थे किन्तु न्याय के पक्ष में थे। जब कभी न्याय के लिए हिंसा आवश्यक हुआ तो वहाँ तथागत बुद्ध ने अनुमति दी थी। भगवान बुद्ध कहते हैं कि जो मनुष्य न्याय, नैतिकता, सुरक्षा और आजादी के लिए संघर्ष करता है वह हिंसा के लिए जिम्मेदार नहीं है। बुद्ध अपने प्रारम्भिक उपदेशों मे स्पष्ट करते है कि किसी गलत या सही कर्म दोनों का जिम्मेदार मनुष्य कि तृष्णा ही होती है। इसलिए बुद्ध आष्टांगिक मार्ग को बताते हैं –
(1) सम्यक दृष्टि।  
(2) सम्यक संकल्प।
(3) सम्यक वाक़।
(4) सम्यक कर्म।
(5) सम्यक जीविका।
(6) सम्यक प्रयास।  
(7) सम्यक स्मृति।
(8) सम्यक समाधि।  
                तथागत बुद्ध अपने दर्शन के माध्यम से भी गलत एवं अनुचित कार्यों से दूर रहने को कहा है। उनके नैतिक सिद्धांत मे पंचशील का नियम आता है-
(1) अहिंसा (प्राणतिपात विरति) अर्थात प्राणी हिंसा से विरत रहो।
(2) सत्य (मृषावाद विरति) अर्थात असत्य से हमेशा विरत रहो।
(3) अचौर्य (अदत्तादान) अर्थात दूसरे के द्वारा दी गई वस्तु को ग्रहण नहीं करना है। बौद्ध दर्शन में इसे चोरी करने के अर्थ में लिया गया है।
(4) ब्रह्मचर्य (कममिथ्याचार विरति) अर्थात व्यभिचार आदि से विरत रहो।
(5) आर्जव अर्थात नशावर्जन (सुरमद्द मेरेया विरति) अर्थात नशा, मदिरा पान का वर्जन है।
                बुरा सोचना भी हिंसा को जन्म देता है। बौद्ध धर्म के अनुसार बुरा सोचना या मन में गलत द्वेष-भाव रखना या करना तथा उससे किए गए कर्म घटक होते हैं। इस प्रकार मन का उदाहरण धम्मपद के शुरू मे ही मिलता है।
       मनोसुब्ब गमा धम्मा, मनोसेठ्ठा मनोगमा।
        मनसा च पदुठ्ठेन , भासती वा करोति वा।
        ततो न दुःखमन्वेति, चक्क व वहतों पद ।। । 1। ।
 अर्थात मन सभी प्रवृत्तियों का अगुआ है, मन ही उसका प्रधान है, वे मन से ही उत्पन्न होती है । यदि कोई दूषित मन से वचन बोलता है या पाप कर्म करता है तो दुःख उसका पीछा उसी प्रकार करता है, जिस प्रकार की चक्का (पहिया) गाड़ी खींचने वाले बैलों के पैरों का ।
       अंकोच्छी मं अवधि मं अजिनि मं अहासि मे ।
       ये  च  तं  उपन्यहंति  वेरं  तेसं  न  सम्मति । । 3। ।
अर्थात उसने मुझे डांटा, उसने मुझे मारा, उसने मुझे जीत लिया, उसने मेरा सब कुछ लूट लिया – जो भी मनुष्य ऐसा मन में बनाए रखते हैं, उनका वैर कभी शांत नही होता ।
       न  हि  वेरेन  वेरानि  सम्मन्तीध  कुदाचनं ।
       अवेरेन  च  सम्मन्ति  एस  धम्मों  सनन्तनों । । 5। ।
अर्थात इस संसार में वैर से वैर कभी शांत नहीं होते, अ- वैर (मैत्री) से ही शांत होते हैं – यही संसार का सनातन नियम है ।    
      सब्बे तसन्ती  दंडस्य, सब्बे भायन्ती मच्चुनों  ।
      अत्तानं  उपमं  कत्वा, न हनेय्य  न घातये । । 129। ।
अर्थात दंड से सभी डरते हैं, मृत्यु से सभी भय खाते हैं, अपने समान (इन बातों को) जानकर न किसी को मारे न ही किसी को मरने की प्रेरणा दें ।
       सब्बे तसन्ती दंडस्य सब्बेस जीवितम पियं ।
       अत्तानम उपमं कत्वा न हनेय्य न घातये । । 130। ।
अर्थात सभी दंड से डरते हैं, सबको अपना जीवन प्रिय है, (इन बातों को) अपने समान जानकर न किसी को मारे और न मारने की प्रेरणा दें ।  
                इस प्रकार अहिंसा के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए हिंसा को पूरे बौद्ध धम्म में कहीं स्थान नही दिया है । उन्होने त्रिपिटक में दीघनिकाय के ब्रहमजाल सुत्त मे भी अहिंसा को स्पष्ट करते हैं । मानव जीवन ऐसी किसी क्षेत्र को उन्होने नहीं छोड़ा जिससे की हिंसा की जा सके सबमें रोक लगा दिया । अपने भिक्षुओं और अनुयायियों को अन्य संप्रदायों से दूर रखा । भगवान बुद्ध कहते हैं की श्रमण गौतम ऐसा कोई काम नहीं करते जिससे की हिंसा हो । श्रमण गौतम जीव हिंसा (प्राणातिपात) को छोड़ कर हिंसा से विरत रहता है । वह दंड और शस्त्र को त्यागकर लज्जावान, दयालु और सभी चीजों का हित चाहने वाला है । श्रमण गौतम चोरी से विरत रहता है । वह किसी की दी हुई चीज को ही स्वीकार करता है । श्रमण गौतम मिथ्या भाषण नहीं करते हैं ।
                इसी प्रकार वह भिक्षुओं के लिए  वर्षावास का नियम बनाते हैं । 3 महीने एक ही स्थान पर रहकर उन्हे भिक्षा मांगकर खाना पड़ता है । क्योंकि एकसाथ कई लोगों के चलने पर रास्ते के छोटे – छोटे कीट पतंगे, बीज, पौधे आदि नष्ट हो जाते थे इसलिए बुद्ध ने ये नियम बनाए । विनय पिटक के महावग्ग में भी अहिंसा के वर्णन मिलते है  ।
                इस प्रकार बौद्ध धर्म एक वैज्ञानिक और तार्किक धर्म है । वैदिक धर्म सभी कर्मकांडों व हिंसा को पूरी तरह से बुद्ध ने नकारा है । लगभग बौद्ध के सम्पूर्ण साहित्य में अहिंसा का वर्णन मिलता है । आज के इस संक्रमण कालीन समय में बौद्ध धम्म की सख्त जरूरत है ।
                धन्यवाद ।





                                                                                          अनीश कुमार

                                                                                      एमफ़िल हिंदी साहित्य  

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