किसी व्यक्ति या मनुष्य का सबसे संवेदनशील पक्ष आस्था या विश्वास होता है । मानवीय संबंध इसी विश्वास या आस्था पर खड़े होते हैं । श्रद्धा रखना मानवीय गुणों में सर्वोच्च प्रवृत्ति होती है । हम श्रद्धा किसी पर भी रख सकते हैं । श्रद्धा होने के लिए जरूरी नहीं कि सामने वाले सजीव हो या निर्जीव । कभी-कभी हमारा सबसे पालतू कोई जानवर या पशु भी हमारे प्रति इतना श्रद्धावान हो जाता है कि वह हमसे परे हो ही नहीं सकता । यही श्रद्धा आगे चलकर आस्था का नाम ले लेती है । हालांकि श्रद्धा, विश्वास, आस्था, वफादारी लगभग पर्याय माने जाते हैं । आस्था मनुष्य का जिसके प्रति रखी जा रही है उसके प्रति कट्टरता का भी भावबोध कराती है । स्वार्थ और श्रद्धा मनुष्य को विरासत में मिली हुई होती है । मनुष्य स्वभावतः किसी न किसी के प्रति आस्थावान होता ही है । मनुष्य की एक आदत और भी है कि उसके साथ यदि किसी ने कुछ अच्छा व्यवहार या अच्छा साथ दिया तो मनुष्य उसके प्रति श्रद्धावान हो जाता है किन्तु वही यदि मनुष्य के प्रति थोड़ी सी भी गलत भावना रख दे तो वह उसका दुश्मन बनते देर नहीं लगाता । आज के समय में धर्म मनुष्य के सबसे निकट है । धर्म मूलतः मनुष्य को एक साथ और एक अच्छे मार्ग पर चलने के लिए निर्मित किया गया था ताकि समाज में एकसूत्रता बनी रहे । प्रत्येक धर्म को संचालित करने वाला कोई ईश्वर जरूर होता है । कहीं कहीं एकेश्वरवाद तो कहीं बहुदेववाद तो कहीं अनीश्वरवादी ईश्वर का स्वरूप दिखाई देता है । धर्म मनुष्य को सांस्कृतिक रूप से एक्य करते हेतु जरूरी भी है बसर्ते मनुष्य से ऊपर धर्म का अस्तित्व न हो । जहां मनुष्य के ऊपर धर्म का प्रभाव बढ़ने लगता है वहीं से कट्टरता पैदा होने लगती है ।
धर्म मनुष्य को दयालु बनाता है ।
दुनिया लगभग सभी धर्म मनुष्य को एक अच्छे रास्ते पर ले जाने का ही ज़ोर देते हैं । एक
बच्चा जब जन्म लेता है तो वह बिलकुल कोरे कागज की तरह होता है । वह जिस भी धर्म को
मनाने वाले घर में पैदा होता है उसी के अनुरूप उसकी ट्रेनिंग बचपन से ही शुरू हो
जाती है । कुछ परिवार अपने बच्चे को धार्मिक शिक्षा उतना ही देते हैं जितना कि
उसके एक अच्छा मनुष्य बनने में सहायक हो । लेकिन आज के समय में ट्रेंड बदलता जा
रहा है । परिवार व समाज कहीं धार्मिक रूप से कट्टर होते जा रहे हैं । कट्टरता का
अर्थ यहाँ उस अर्थ से है कि जब हम किसी अच्छे काम प्रयोग दूसरे के ऊपर गलत अर्थ
में किया जाये । इसका असर युवा पीढ़ी पर भी दिखाई देने लगा है । आज के समय में ईश्वर
के प्रति आस्था सबसे ऊपर हो गई है । धीरे-धीरे मनुष्य आस्था के प्रति इतना कट्टर
हो जाता है कि उसके बारे किसी भी प्रकार की गलत खबरें या उसकी आलोचना सुनना पसंद
नहीं करता । धीरे-धीरे यही प्रवृत्ति हिंसा का रूप धारण कर लेती है । यह प्रवृत्ति
आगे चलकर हमारे समाज के बीच से होकर वैश्विक स्तर पर पहुँच जाता है । जबकि यह भी
सत्य है कि प्रकृति प्रदत्त ऐसा कोई भी वस्तु नहीं है जिसकी आलोचना नहीं की जा
सकती । ऐसा प्राचीन समय में ब्रूनों जैसे कई उदाहरण हैं जो धार्मिक हिंसा के शिकार
हुए किन्तु कालांतर में उनकी कही बात सत्य साबित हुई ।
भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्षता की
वकालत करता है । यही विशेषता भारत को दुनिया से अलग करता है । भारत में सभी धर्मों, संप्रदायों को समान अधिकार व महत्व दिया गया है । बावजूद इसके वर्तमान समय
में देखें तो दूसरों के आस्था के साथ खिलवाड़ जमकर हो रहा है । समस्या तब ज्यादा
भयावह हो जाती है जब मनुष्य दूसरों की आस्था के साथ खिलवाड़ करना शुरू करता है ।
इनमें सोशल मीडिया पर प्रसारित खबरें इस प्रकार के मुद्दों में आग में घी डालने का
काम करती हैं । बरहाल मीडिया से ये हमेशा यह अपेक्षा की जाती रही है कि वह खबरों
को या इन मुद्दों को निष्पक्ष भाव से कहेगा या दिखाएगा किन्तु स्थिति आज इसके उलट
दिखाई देती है । ज़्यादातर मीडिया तो कारपोरेट घरानों या रईसों के अधीन काम कर रहे
हैं, जो स्वतंत्र रूप से इस पर कार्य भी कर रहे हैं तो
उन्हें आस्था के नाम पर डरा-धमकाकर चुप करा दिया जाता है ।
अंत में एक बात समझने की कोशिश करनी
चाहिए कि मनुष्य अपने आस्था या श्रद्धा के साथ इतना वफादार होता है तो दूसरे की
आस्था अथवा श्रद्धा को ठेस क्यों पहुंचाता है । कई बार ऐसे पात्रों के प्रति हम
श्रद्धा रखते हैं जो वास्तविक रूप में तथ्यरहित होता है । अब जाहिर है कि सभी के
लिए वह श्रद्धा कि वस्तु नहीं होगी । कोई न कोई उसकी आलोचना करेगा ही । यहीं से
समस्या शुरू होती है जब हम आलोचना को नहीं देखना चाहते जबकि आलोचना एक स्वस्थ
विमर्श को जन्म देती है । मिथकीय इतिहास को लेकर ये सब सिर्फ हिंसा को जन्म दे रही
हैं । वास्तविकता से इसका कितना संबंध है ये भी बुद्धिजीवी लोग भलीभाँति जानते हैं
। कभी-कभी राजनीति भी इसमें मिलकर रोटियाँ सेंक लेती है । सरकारी तंत्र तो इसका
पूरा फायदा उठाता ही है । यह हमेशा ध्यान रखने की कोशिश की जानी चाहिए कि हम जिस
भी धर्म को मानते हैं या श्रद्धा रखते हैं वह हमारा अपना निजी मामला है । हमें
किसी अन्य धर्म या पंथ में गैरज़रूरी हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए । वास्तव में धर्म
हमें एक अच्छे रास्ते पर चलने की शिक्षा देता है जब तक कि हम धर्म को निजी तौर पर
बिना किसी के नुकसान किए मानते हैं ।
वास्तव में श्रद्धा दिल से आती है
जहां दिमाग की कोई आवश्यकता नहीं वहीं अंधविश्वास में दिल और दिमाग दोनों की ही
आवश्यकता नहीं । कई बार श्रद्धा के अनुकूल व्यवहार न करने पर वह अंधश्रद्धा बन
जाती है । श्रद्धा बंद आँखों से वहीं अंधविश्वास खुली आँखों से । श्रद्धा आस्था के
कारण तो वहीं अंधविश्वास डर के कारण । श्रद्धा मे सर झुकता है और अंधविश्वास में
बुद्धि । श्रद्धा मे आप स्वयं ही खुद को सौंप देते हो तो वहीं अंधविश्वास में आपको
खुद को सौंपना पड़ता है । श्रद्धा मे आप स्वयं करते हो तो वहीं अंधविश्वास में आपको
करना पड़ता है । वास्तव में हम सभी एक शिक्षित और समतावादी समाज निर्माण की कल्पना
भी करते हैं और उसे बनाने की कोशिश भी करते हैं । हमें अपना योगदान अवश्य देना
चाहिए । किसी के प्रति श्रद्धा रखकर अथवा किसी इष्ट के प्रति श्राद्धवान होकर हम
अपनी उपस्थिति बेहतर तरीके से दे सकते हैं ।
- डॉ. अनीश कुमार
सह-संपादक, द पर्सपेक्टिव अंतर्राष्ट्रीय जर्नल (www.tpijssh.com)
सह-संपादक, स्वनिम त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका, हिन्दी विभाग, गुरु घासीदास (केंद्रीय) विश्वविद्यालय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
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