प्रकृति ने संसार को अनेक चमत्कारों से परिपूर्ण किया है । कुछ चमत्कारों की खोज भी एक लंबे अंतराल के शोध के बाद ही संभव हो सकी थी । यही कारण है कि किसी भी सत्य की खोज और उसकी पुष्टी के लिए शोध का होना अनिवार्य होता है । मानव की जिज्ञासु प्रवृत्ति ने ही शोध प्रक्रिया को जन्म दिया । किसी भी सत्य को निकटता से जानने के लिए शोध एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है । समय- समय पर विभिन्न विषयों की खोज और उनके अध्ययन और निष्कर्षो की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता भी शोध की मदद से ही संभव हो पाती है । जैसे जैसे समय बीत रहा हैं वैसे वैसे मानव की समस्याएँ भी विकट होती जा रही हैं । प्रतिदिन एक नई समस्या से उसका सामना होता है । ऐसे में शोध की महत्ता स्वतः ही पैदा हो जाती है । हालांकि मानव की सोच विविधता वाली होती है और उसकी रूचि, प्रकृति, व्यवहार, स्वभाव और योग्यता भिन्न-भिन्न होती है । इस कारण से अनेक जटिलताएं भी पैदा हो जाती है । अत: मानवीय व्यवहारों की अनिश्चित प्रकृति के कारण जब हम उसका व्यवस्थित ढंग से अध्ययन कर किसी निष्कर्ष पर आना चाहते हैं तो वहां पर हमें शोध का प्रयोग करना होगा । इस तरह सरल शब्दों में कहें तो सत्य की खोज के लिए व्यवस्थित प्रयत्न करना या प्राप्त ज्ञान की परीक्षा के लिए व्यवस्थित प्रयत्न भी शोध कहलाता है । तथ्यों कर अवलोकन करके कार्य- कारण संबंध ज्ञात करना शोध / अनुसंधान की प्रमुख प्रक्रिया है ।
वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में उच्च शिक्षा की सहज उपलब्धता और उच्च शिक्षा संस्थानों को शोध से अनिवार्य रूप से जोड़ने की नीति ने शोध की महत्ता को बढ़ा दिया है । आज शैक्षिक शोध का क्षेत्र विस्तृत और सघन हुआ है । शोध उस प्रक्रिया अथवा कार्य का नाम है जिसमें बोधपूर्वक प्रयत्न से तथ्यों का संकलन कर सूक्ष्मग्राही एवं विवेचक बुद्धि से उसका अवलोकन- विश्लेषण करके नए तथ्यों या सिद्धांतों का उद्घाटन किया जाता है ।
शोध उस प्रक्रिया अथवा कार्य का नाम है जिसमें बोधपूर्वक प्रयत्न से तथ्यों का संकलन कर सूक्ष्मग्राही एवं विवेचक बुद्धि से उसका अवलोकन- विश्लेषण करके नए तथ्यों या सिद्धांतों का उद्घाटन किया जाता है।
शोध का प्रमुख लक्ष्य वैज्ञानिक पद्वति के प्रयोग द्वारा प्रश्नों के उत्तर खोजना है। इसका उद्देश्य अध्ययनरत समस्या के अंदर छुपी हुई यर्थाथता का पता लगाना या किसी समस्या के बारे में उस सब की खोज करना है, जिसकी जानकारी नहीं है। शोध का उद्देश्य सिद्धांतों का निर्माण करना होता है। मनुष्य के जीवन में आने वाली समस्याओं के निदान में भी शोध ही आगे आता है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी (1969) लिखते हैं कि स्थूल अर्थों में शोध नवीन और विस्मृत तत्वों का अनुसंधान है जिसको अंग्रेजी में डिस्कवरी ऑफ फैक्ट्स कहते हैं । और सूक्ष्म अर्थ में वह ज्ञात साहित्य के पूनर्मूल्यांकन और नई व्याख्याओं का सूचक है ।
पी.वी.यंग (1966) के अनुसार शोध एक ऎसी व्यवस्थित विधि है जिसके द्वारा नवीन तथ्यों की खोज तथा प्राचीन तथ्यों की पुष्टि की जाती है, तथा उन अनुक्रमों, पारस्परिक सम्बंधों तथा कारणात्मक व्याख्याओं का अध्ययन करती है जो कि उन्हें नियंत्रित करते हैं ।
एडवार्ड (1969) के अनुसार शोध किसी प्रश्न अथवा समस्या अथवा प्रस्तावित उत्तरों की जाँच के लिए उत्तर खोजने हेतु किया जाता है ।
विश्लेषण करने पर शोध के चार अंग हमारे सामने आते हैं-
1. ज्ञान क्षेत्र की किसी समस्या को सुलझाने की प्रेरणा ।
2. विवेकपूर्ण अध्ययन ।
3. प्रासंगिक तथ्यों का संकलन ।
4. परिणाम स्वरूप निर्णय ।
शोध के प्रकार :
उपयोग के आधार पर :
1. विशुद्ध / मूल शोध (Pure / fundamental Research)
2. प्रायोगिक /प्रयुक्त या क्रियाशील शोध (Applied Research)
काल के आधार पर :
1. ऎतिहासिक शोध (Historical Research)
2. वर्णनात्मक / विवरणात्मक शोध (Descriptive Research)
इसके अलावा स्वतंत्र रूप से शोध के कुछ मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं -
1. वर्णनात्मक शोध- किसी विषय, वस्तु या घटना अथवा व्यक्ति या समूह की विशेषता और स्थिति-परिस्थिति का सही चित्रण करने के लिए किये जाने वाले शोध को वर्णनात्मक शोध कहते है। यह क्या है? कैसा है? कहाँ है? क्यों है?शोधकर्ता का चरों (variables) पर नियंत्रण नहीं होता । सर्वेक्षण पद्धति का प्रयोग होता है । वर्तमान समय का वर्णन होता है । मूल प्रश्न होता है: “क्या है?”
2. विश्लेषणात्मक शोध (Analytical Research) - शोधकर्ता का चरों (variables) पर नियंत्रण होता है । शोधकर्ता पहले से उपलब्ध सूचनाओं व तथ्यों का अध्ययन करता है ।
3. विशुद्ध / मूल शोध - किसी घटना-परिघटना (फेनोमेना) के कार्य-कारण संबंधों को निर्धारित करने के उद्देश्य से किये जाने वाले शोध को मौलिक या विशुद्व शोध कहते हैमौलिक या विशुद्व शोध के द्वारा मौलिक सिद्वांतों और नियमों का प्रतिपादन किया जाता है। मौलिक या विशुद्व शोध का उद्वेश्य ज्ञान की प्राप्ति है। शोध के द्वारा ज्ञान की प्राप्ति, पुनर्मूल्यांकन, पुनःपरिक्षण परिमार्जन और परिवर्धन किया जाता है । इसमें सिद्धांत (Theory) निर्माण होता है जो ज्ञान का विस्तार करता है । गणित तथा मूल विज्ञान के शोध ।
4. प्रायोगिक / प्रयुक्त शोध (Applied Research): समस्यामूलक पद्धति का उपयोग होता है । किसी सामाजिक या व्यावहारिक समस्या का समाधान होता है । इसमें विशुद्ध शोध से सहायता ली जाती है ।
5. मात्रात्मक शोध (Quantitative Research): इस शोध में चरों (variables) का संख्या या मात्रा के आधार पर विश्लेषन किया जाता है ।
6. गुणात्मक शोध (qualitative Research) : इस शोध में चरों (variables) का उनके गुणों के आधार पर विश्लेषन किया जाता है ।
7. सैद्धांतिक शोध (Theoretical Research): सिद्धांत निर्माण और विकास पुस्तकालय शोध या उपलब्ध डाटा के आधार पर किया जाता है ।
8. आनुभविक शोध (Empirical Research): इस शोध के तीन प्रकार हैं – क) प्रेक्षण (Observation) ख) सहसंबंधात्मक (Correlational) ग) प्रयोगात्मक (Experimental)
9. अप्रयोगात्मक शोध (Non-Experimental Research) - वर्णनात्मक शोध के समान
10. ऎतिहासिक शोध (Historical Research): इतिहास को ध्यान में रख कर शोध होता है । मूल प्रश्न होता है: “क्या था?”
11. नैदानिक शोध (Diagnostic / Clinical Research): समस्याओं का पता लगाने के लिए किया जाता है ।
शोध प्रक्रिया (Research Process)
शोध प्रक्रिया उन क्रियाओं अथवा चरणों का क्रमबद्ध विवरण जिसके द्वारा किसी शोध को सफलता के साथ संपन्न किया जाता है । शोध प्रक्रिया के कई चरण होते हैं । यहाँ यह जानना आवश्यक है कि सभी चरण शोध प्रक्रिया में एक-दूसरे से पृथक एवं स्वतंत्र नहीं हैं । प्रत्येक चरण एक दूसरे पर निर्भर होता है ।
शोध प्रक्रिया के चरण
1. शोध समस्या का निर्माण
2. संबंधित साहित्य का व्यापक सर्वेक्षण (survey of literature)
3. परिकल्पना/प्राकल्पना (Hypothesis) का निर्माण
4. शोध की रूपरेखा/शोध प्रारूप (Research Design) तैयार करना
5. आँकड़ों का संकलन / तथ्यों का संग्रह (collection of data or facts)
6. आँकड़ों / तथ्यों का विश्लेषण (analysis of facts and data)
7. परिकल्पना की जाँच
8. सामान्यीकरण एवं व्याख्या (generalization and description)
9. शोध प्रतिवेदन (Research Report) तैयार करना
शोध प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण एवं प्रथम चरण शोध समस्या का चुनाव (selection) एवं सही निर्माण करना है । शोधकर्ता द्वारा चयनित (selected) और निर्मित (formulated)शोध समस्या पर ही उसके शोध की सफलता निर्भर करती है । सामान्य अर्थों में शोध समस्या सैद्धांतिक (theoretical) या व्यवहारिक (practical) संदर्भो में व्याप्त वह समस्या / कठिनाई है जिसका समाधान शोधकर्ता करना चाहता है । निम्न शर्तों के होने पर शोध समस्या विद्यमान (exist) होती है:
1. किसी वातावरण में समस्या से संबंधित एक व्यक्ति, एक समूह अथवा एक संगठन का होना आवश्यक है ।
2. समस्या के समाधान के लिए कम से कम दो कार्यप्रणालियाँ (course of action) होनी चाहिए । कार्यप्रणाली से तात्पर्य उस तरीके से जिसे नियंत्रित चरों के एक या एक से अधिक मूल्य परिभाषित (define) करते है ।
3. कार्यप्रणाली को प्रयोग करने के बाद किसी समस्या के कम से कम दो संभावित परिणाम होने चाहिए जिनमें से एक शोधकर्ता को दूसरे से अधिक उपयुक्त (suitable) लगता हो । इसका अर्थ है कि शोधकर्ता के पास कम से कम एक ऎसा परिणाम हो जो उसका उद्देश्य (aim) हो ।
4. कार्यप्रणालियाँ उद्देश्यों पर आधरित कार्य करने की सुविधा प्रदान करने वाली हों । इन कार्यप्रणालियों में असमानताएँ होनी चाहिए ।
एक शोध समस्या का चुनाव करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:
1. ऎसा विषय जिस पर अत्याधिक कार्य हो चुका हो, उसका चुनाव नहीं करना चाहिए क्योंकि उस विषय पर नई रोशनी डालना कठिन होता है ।
2. समस्या न तो अति संकीर्ण (over narrow) हो और न ही अति व्यापक (over broad) हो ।
3. किसी औसत शोधकर्ता को विवादास्पद (controversial) विषय के चुनाव से बचना चाहिए ।
4. शोध का विषय परिचित (known) तथा संभाव्य (possible) होना चाहिए जिससे कि शोधकर्ता इससे संबंधित सामग्री या संसाधन आसानी से प्राप्त कर सके ।
5. शोध समस्या का चुनाव करते समय शोधकर्ता को अनेक तत्वों को ध्यान में रखना चाहिए जैसे विषय का महत्व, योग्यताएँ, प्रशिक्षण (training), समय, धन एवं शक्ति के रूप में लगने वाला व्यय (expenditure) ।
6. शोध विषय के चयन के पहले यथासंभव प्रारंभिक अन्वेषण (search) करना आवश्यक है ।
- अनीश कुमार