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Thursday, 28 September 2017

राष्ट्र निर्माण की भूमिका

      
      राष्ट्र की परिभाषा किसी बंधन व स्वतन्त्रता से परे होती है । जिस प्रकार कोई बालक अपने माँ-बाप के सबसे नजदीक रहते हैं । वहीं माँ-बाप उस उस बालक के प्रथम गुरु व अन्य भूमिकाओं में सबसे पहले आते हैं । माँ-बाप उसकी पूरी दुनिया के समान होते हैं । राष्ट्र उस देश में रहने वालों के किए माँ-बाप के समान होता है । माँ-बाप कभी अपने बच्चों के बीच असमानता का भाव नहीं लाते हैं । उसी प्रकार कोई भी राष्ट्र कभी भी किसी व्यक्ति से अलग नहीं हो सकता है । उसकी दृष्टि में सभी मनुष्य समान हैं । राष्ट्र हमारे सामने कई रूपों में सामने आता है । जैसे प्रकृति, जल, जमीन, हवा या अन्य रूपों में । ये सारी चीजें कभी भी कसीस के साथ भेदभाव नहीं करती हैं ।
     राष्ट्र के निर्माण में सभी मनुष्यों की अपनी-अपनी भूमिका अलग-अलग रूपण में सामने आती है । किसी राष्ट्र का गौरव उस राष्ट्र में निवास करने वाली समस्त जनता के संपूर्णता व एकता तथा अखंडता पर निर्भर करता है । पिछले कुछ महीनों से राष्ट्रवाद पर एक बहस छिदी हुई है । भिन्न-भिन्न लोगों के भिन्न-भिन्न मत हैं । कुछ लोग सतही ज्ञान के द्वारा दिशाहीन व्याख्या करने में लगे हुए हैं । मनुष्यों के राष्ट्र की सीमा व गौरव सर्वोपरि होता है । आज के समय में राष्ट्रवाद कई रूपण में बादल गया है । जैसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, भाषाई राष्ट्रवाद, साहित्यिक राष्ट्रवाद, राजनैतिक राष्ट्रवाद, क्षेत्रीय राष्ट्रवाद इत्यादि ।  
     इसी बीच शिक्षा के विभिन्न संस्थानों में एक नए प्रकार की बहस व मुद्दा हमारे सामने दिखाई दे रहा है । इसकी गूंज धीरे-धीरे बढ़ते जा रहे हैं । इसे हम शैक्षिक राष्ट्रवाद का नाम दें तो बेमानी न होगी । पिछले कई वर्षों में विश्वविद्यालय व अन्य शैक्षिक संस्थानों में इसकी चर्चा व उसका असर देखने को मिल रहा है । भिन्न-भिन्न क्षेत्रों व भाषा प्रदेशों के विद्यार्थी या शोधार्थी इस पर एकमत नहीं दिखाई दे रहे हैं । इसे राजनीति से जोड़कर देखने की कवायद जारी है । राष्ट्र के भीतर रहते हुए हम बिना राजनीति के ऊपर बात किए रह ही नहीं सकते । आज शैक्षिक संस्थानों में राजनीतिक मुद्दों व समकालीन मुद्दों को लेकर परिचर्चाएं व संगोष्ठियाँ आयोजित की जा रही हैं । किसी ने तो यह भी कह दिया कि आज विश्वविद्यालय के छात्र सरकार के साथ विपक्ष कि भूमिका निभा रहे हैं ।
     इन सभी क्षेत्रों में हिन्दी पत्रकारिता का भी महत्वपूर्ण योगदान है । पत्रकारिता अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम होता है । कहा भी जाता है कि जब आपकी बात कोई न सुने तो पत्र या अखबार निकालो । भारतीय संविधान के अनुसार सभी को अखबार, पत्र-पत्रिकाए निकालने व अपनी बात कहने का अधिकार पूरा अधिकार है । हम अतीत में जाकर देखें तो पत्रकारिता का असर व्यापक तौर पर दिखाई देता है । सभी बड़े क्रांतिकारियों ने अपने-अपने पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से समाज में क्रांति लाने का कार्य कर रहे थे । 
“हो सकता है आप में
प्रतिभा दूसरों से कम हो
पर हार न मानने की सोच

आपको उनसे अलग बनाती है ।” 

Monday, 27 March 2017

जूठन : समाज के वीभत्स स्वरूप का जीवंत दस्तावेज़
- अनीश कुमार

 
          ओम प्रकाश वाल्मीकि एक महत्त्वपूर्ण दलित साहित्यकार हैं । दलित साहित्य की एक विशिष्ट आत्मकथा जूठन दलित जीवन और पीड़ा का ऐतिहासिक दस्तावेज है । जूठनजातिगत उत्पीडऩ और अतिदलित समाज व्याप्त कुरीतियों, अंधविश्वासों आदि के खिलाफ संघर्ष का आख्यान है । यह सिर्फ आत्मकथा ही नहीं वरन अतीत की मानवीय संवेदनाओं को तार-तार करती हुई वीभत्स घटनाओं और पीड़ादायी अनुभवों से उपजी कराह है, वेदना है, जहां लेखक ही नहीं बल्कि समय-समाज भी उपस्थित है - यातनामय भयावहता के साथ । आत्मकथा में जातिगत व सामाजिक उपेक्षा-अत्याचार का अनवरत सिलसिला है, जिससे मनुष्य में आक्रोश-विरोध का उपजना स्वाभाविक है । ऐसी ही घटनाएं और परिस्थितियां दलित साहित्य के उद्भव के मूल में हैं । जूठनके आरंभ में दलित साहित्य की विषयवस्तु और आत्मकथा लिखने के कारणों को लेखक स्वयं लिखता है - दलित-जीवन की पीड़ाएं असहनीय और अनुभव-दग्ध हैं । ऐसे अनुभव जो साहित्यिक अभिव्यक्तियों में स्थान नहीं पा सके । एक ऐसी समाज-व्यवस्था में हमने साँसे ली हैं, जो बेहद क्रूर और अमानवीय है । दलितों के प्रति असंवेदनशील भी ।”[1] लेखक की इस क्रूर समाज के प्रति आक्रोश स्पष्ट रूप से दिखाई देता है । वे सभी अनुभव अब दलित आत्मकथाओं में स्थान प्राप्त कर रहे हैं और अपनी पीड़ा और समाज की क्रूरतम यथार्थ को सामने ला रहे हैं ।
          वर्णवादी व्यवस्था के कारण सदियों से समाज के एक वर्ग को भीषण यातना और हीन भावना से भरी स्थिति में जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ा है । अपने ही जैसे मनुष्यों के साथ जाति और जन्म के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव के कारण भारतीय वर्णव्यवस्था आज असहनीय हो उठी है । दलित वर्ग ने अब स्वयं पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध मोर्चा तैयार किया है । ऐसे ही संघषो व यातनाओं का प्रस्तुतीकरण वाल्मीकि जी ने अपनी आत्मकथा में किया है । 
          वर्ण व्यवस्था को आदर्श मानने वालों के समक्ष वह बड़ी निर्भीकता के साथ स्पष्ट चुनौती देते हैं कि इस गंदगी के माहौल में चार दिन रहकर भी यदि उनकी सोच वर्णवाद के पक्ष में रह सके, तो उन्हें वर्णवादी व्यवस्था स्वीकार्य है परन्तु वास्तव में बड़ी-बड़ी बातें करना और दूसरी ओर स्वयं उस माहौल में रहकर भोगना दोनों भिन्न हैं । जिसकी हम कल्पना तक नहीं कर सकते । रचनाकार ने स्वयं उस गंदगी भरे माहौल में रहकर भी शिक्षा प्राप्त करने का दुस्साहस किया जिसका भुगतान उसे प्राथमिक विद्यालय के वर्णवादी माहौल में करना पड़ा । 
          जूठनसिर्फ ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा नहीं अपितु सम्पूर्ण दलित समाज का भोगा हुआ कटु यथार्थ है, जहां जाति व्यवस्था की खतरनाक खाई है और वहां से आने वाली दर्दनाक चीखें हैं । पढ़ते समय लगता है कि जूठनआह, अंतर्मन से उपजा हुआ आख्यान है । इसमें वर्णित घटनाएं और प्रसंग वर्णव्यवस्था के पोषकों की निमर्मता के प्रमाण हैं । जातिगत व्यवस्था लेखक का पीछा नहीं छोड़ती । गाँव के सरकारी प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश के समय बालक ओमप्रकाश वाल्मीकि को तरह-तरह से परेशान किया जाता है । शिक्षक द्रोणाचार्य की भूमिका में हैं, तो सहपाठी अर्जुन-भीम की तरह तीर-कमान साधे हुए हैं । प्रवेश परीक्षा अग्निपरीक्षा से कम नहीं है । तीन दिन तक लगातार झाड़ू लगवाया जाता है किंतु कक्षा में बैठने का मौका एक दिन भी नहीं मिलता । यहाँ शिक्षा सिर्फ और सिर्फ किसी की जागीर बनकर रह गई है । कुछ विशेष जाति के लोगों को ही शिक्षा दी जाती थी । दलित जीवन के भुक्तभोगी रचनाकार को जब शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले विद्यालयों से उपेक्षा मिली, तिरस्कार और अपमानजनक शब्दों को सहने के लिए विवश होना पड़ा तो इनके मानस में आरम्भ से ही उच्च कही जाने वाली जातियों के प्रति वितृष्णा का भाव भरता चला गया ।
          “हेडमास्टर ने तेज आवाज मे कहा था, “चूहड़ा हो के पढऩे चला हैजा चला जानहीं तो हाड़-गोड़ तुड़वा दूंगा ।”[2] इससे साफ जाहिर होता है कि समाज में व्याप्त कुरीतियाँ, जाति व्यवस्था से शिक्षा व्यवस्था भी अछूता नहीं है । हेडमास्टर के आवाज में जातीय दंभ और अमानवीयता चरम पर है । परंतु पिता की जिद समाज को चेतावनी भी देता है – “यो चूहड़े का यहीं पढ़ेगाइसी मदरसे में । और यो ही नहीं, इसके बाद और भी आवेंगे पढऩे कू ।[3] जो दलित समाज व साहित्य के भावी स्वरूप का संकेत है, जहां शिक्षा के माध्यम से सवर्णवादी वर्चस्व को तोडऩे का प्रयास हो रहा है । जब हेडमास्टर का ऐसा व्यवहार है, तो छात्रों और अध्यापकों का व्यवहार कैसा होगा ? इतनी उपेक्षा और प्रताडऩा के बाद भी ओमप्रकाश आठवीं कक्षा में पहुंचते-पहुंचते शरतचंद्र, प्रेमचंद और रवींद्रनाथ टैगोर के साहित्य का अध्ययन कर चुके थे । ओमप्रकाश वाल्मीकि के पात्रों के संतुलन और समझदारी के मूल में उनकी अध्ययनप्रियता है, तो सामाजिक अनुभव भी ।
          लेखक के पास बचपन से ही तर्क करने की क्षमता के साथ-साथ शास्त्रों पर प्रश्न उठाने का साहस भी है । वह भरी कक्षा में बड़ी धृष्टता से सवाल करते हैं कि –“अश्वत्थामा को तो दूध की जगह आटे का घोल पिलाया गया और हमें चावल का मांड । फिर किसी भी महाकाव्य में हमारा जिक्र क्यों नहीं आया ? किसी भी महाकवि ने हमारे जीवन पर एक भी शब्द क्यों नहीं लिखा ?”[4] लेखक कहता है कि वाल्मीकि पर द्रोणाचार्य रूपी मास्टर ने महाकाव्य तो रचा, मगर उसकी पीठ पर और शीशम की छड़ी से । ये सवाल सनातनियों के मुंह पर एक तमाचा था । अकारण नहीं सनातन साहित्य सवालों के घेरे में आ जाता है । दलित चिंतक डॉ. धर्मवीर यूं ही नहीं सवाल उठाते हैं कि लेखन और चिंतन में दलित समुदाय उपेक्षित रहा है । हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष आचार्य शुक्ल बड़े साफ शब्दों में लिखते हैं, कि -चाकरी करेंगे नहीं चौपट चमार की । दलित साहित्य हमेशा से उपेक्षा का शिकार रहा है ।
          ओमप्रकाश वाल्मीकी जी ने अपनी आत्मकथा में बताया कि उनका जीवन बचपन से ही अभावग्रस्त था । उन के घर का प्रत्येक सदस्य कुछ न कुछ कार्य करता था । तगाओं के घर से लेकर खेती-बाड़ी मेहनत-मजदूरी सभी कार्य होते थे । कभी-कभी रात में भी बेगार करनी पड़ती थी, जिसके बदले में पैसा या अनाज नहीं मिलता था । इतना करने के बाबजूद भी दो वक्त की रोटी ठीक से नहीं मिल पाती थी । कोई तगा कभी नाम लेकर उन्हे नहीं पुकारते थे । वे लोग नाम तक लेना अपनी शान के खिलाफ समझते थे । यदि उम्र में बड़ा हो तो, ओ चूहड़े, बराबर या उम्र में छोटा होता तो अबे चूहड़े के यही सम्बोधन करते थे ।
          जूठन समाज का एक कड़वा सच सामने लाता है । इस किताब में न जाने ऐसी ही कितनी घटनाओं का ज़िक्र है कि आपको पढ़ते हुए समाज के जाति-धर्म के नाम पर होने वाले भेदभाव से बेचैनी का अनुभव होगा । किसी भी तबके से आते हो आखिर इंसान तो इंसान ही है । शायद अब इस तरह का भेदभाव उतना नहीं होता होगा लेकिन फिर भी पूरी तरह से ख़त्म हो गया ये कहा नहीं जा सकता । क्यूंकि किसी न किसी रूप में ये असलियत हमारे-आपके सामने आ ही जाती है । मुझे तो नहीं लगता कि हममें से कोई भी ऐसा होगा जिसने इस भेदभाव को साक्षात् नहीं देखा होगा या इसका हिस्सा नहीं रहा होगा । आप किसी भी ओर हो सकते हैं । भेदभाव करने वाले की ओर या सहने वाले की ओर । भले ही आप इस भेदभाव से आहत हुए हों लेकिन अगर आपने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ न उठाई हो तो आप इसका हिस्सा ही कहलायेंगे ।
          जाति को वे समाज की वास्तविक सच्चाई मानते हैं । इस बात को वे अपनी आत्मकथा में लिखते हैं - “भारतीय समाज में जातिएक महत्वपूर्ण घटक है । जातिपैदा होते ही व्यक्ति की नियति तय कर देती है । पैदा होना व्यक्ति के अधिकार में नहीं होता । यदि होता तो मैं भंगी के घर क्यों पैदा होता? जो स्वयं को इस देश की महान सांस्कृतिक धरोहर के तथाकथित अलमबरदार कहते हैं, क्या वे अपनी मर्ज़ी से उन घरों में पैदा हुए हैं ? हाँ,इसे जस्टिफाई करने के लिए अनेक धर्मशास्त्रों का सहारा वे ज़रूर लेते हैं । वे धर्मशास्त्र जो समता,स्वतंत्रता की हिमायत नहीं करते,बल्कि सामंती प्रवृतियों को स्थापित करते हैं ।[5]
          जाति प्रथा उच्च-जाति के व्यक्ति के दिल-दिमाग में उच्चता-श्रेष्ठता की ग्रंथि पैदा करती है तो कथित निम्न जातियों में हीनता-ग्रंथि पैदा करके समस्त समाज का असामान्य जीवन बनाती है और समाज के वर्गों को एक-दूसरे से दूर व एक-दूसरे के विरूद्ध करने का कुचक्र रचती है । ओमप्रकाश वाल्मीकि में जाति को लेकर कोई हीनता का बोध नहीं है, कहीं यह अहसास नहीं है कि कथित निम्न जाति में पैदा होने से उनकी मानवता, सम्मान व गरिमा में कोई कमी आ गई है । हीनता बोध-ग्रंथि पर पार पाकर ही जातिगत पहचान के स्थान पर मानवीय पहचान व गरिमा की अपेक्षा करने का नैतिक साहस आता है और समस्त दलितों की पीड़ा व दलित-मुक्ति के लिए संघर्ष करने का आधार बनता है और साहस पैदा होता है जो समस्त दलित समाज व सवर्ण समाज को प्रभावित करता है । जिस तरह वाल्मीकि ने अपनी जाति को खुलेआम बताया है उससे उनको व्यक्तिगत नुकसान व पीड़ा अवश्य पहुंची है, लेकिन मानव-मुक्ति की लड़ाई में, सदियों से चली आ रही प्रथाओं को चुनौती देने वालों को, वर्चस्वी मान्यताओं पर ऊंगली उठाने वाले समाज-सुधारकों व क्रांतिकारियों को समाज के वर्चस्वी वर्गों की फटकार तो सहन करनी ही पड़ती है । ओमप्रकाश वाल्मीकि का आग्रह है कि उन्हें एक मानव के रूप में स्वीकार किया जाए, न कि जाति की पहचान पर ।
          इस बात को पहचानने की जरूरत है कि कथित उच्च या निम्न जाति में पैदा होना न तो पाप है और न पूर्वजन्म के कर्मों का फल, बल्कि यह शोषण करने के लिए की गई व्यवस्था है जिसे बचाने के लिए खुद को बदलने की जरूरत नहीं, बल्कि अपनी मानवी पहचान के आग्रह के साथ इस अमानवीय व्यवस्था से आँखों में आँखें डालकर टकराने की जरूरत है । ब्राह्मणवाद के कई हथकंड़े हैं जाति के साथ गौत्र भी है, एक को छोड़कर दूसरे को अपनाना उसका विरोध नहीं बल्कि उसमें खप जाना है, समा जाना है । जाति को तोडऩे के संघर्ष में तथा जातिविहिन समाज के निर्माण में ही मानवी पहचान संभव है जाति-गौत्र के खांचों में नहीं । जो लोग इसी में अपनी पहचान खोजना चाहते हैं वे ब्राह्मणवाद का ही शिकार हैं ।
          जिन पूर्वाग्रहों और धारणाओं का सहारा लेकर सवर्ण समाज दलितों के प्रति हिंसा व घृणा को उचित ठहराता है उन पर भी ओमप्रकाश वाल्मीकि ने प्रश्न चिह्न लगाया है । मुसलमानों, दलितों व अन्य कमजोर वर्गों के प्रति नफरत व हिंसा को उचित ठहराने के लिए ब्राह्मणवादी मानसिकता ने बहुत ही बेहूदा व अवैज्ञानिक तर्क गढ़ लिया है कि वे गंदे होते हैं, जबकि यह विकास के अवसरों पर तथा जीवन-स्थितियों पर निर्भर करता है कि कौन कितना साफ-सुथरा रहेगा । समाज के जिन वर्गों को सबसे गंदे माने जाने वाले काम सौंप दिए गए हैं उनको गंदा कहकर उनसे नफरत करना निहायत अन्यायपूर्ण है, उन्होंने ये काम अपनी इच्छा से नहीं चुने बल्कि उनको मजबूरी में ये काम करने पड़ते हैं । जिस तरह की सामाजिक व्यवस्था है और उनमें जैसी जीवन-स्थितियां हैं । उनमें रहकर कोई भी व्यक्ति साफ सुथरा नहीं रह सकता । मेहनतकश लोग जो सारा दिन खेतों व कारखानों में काम करते हैं, अपना पसीना बहाते हैं, उनको गंदा कहना श्रम का अवमूल्यन करना तो है ही साथ ही उनसे चमचमाते व खुशबूदार इत्र लगाकर रहने की अपेक्षा करना उनसे ज्यादती करना नहीं तो क्या है ?
          ओमप्रकाश वाल्मीकि ने भू-स्वामी सवर्णों और श्रमिक दलितों के बीच मुख्य अन्तर्विरोध व संघर्ष को बिल्कुल सही तरह से व्यक्त करते हैं । गांव का सारा कारोबार व संस्कृति खेती-आधारित है, जिस वर्ग के पास जमीन का मालिकाना हक है वही वहां मुख्य शक्ति बनकर खड़ा है बाकी सब उन पर ही निर्भर है । दलितों को साल भर अपने जानवरों का पेट भरने के लिए चारा लेने तथा अपना पेट भरने के लिए भू-स्वामियों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिस कारण उसे भू-स्वामी वर्ग की समस्त शर्तें मानने पर मजबूर किया जाता है । ये बात सत्य है कि वास्तविक सत्ता तो उसी के पास होती है, जिसके पास उत्पादन के साधन होते हैं उसी वर्ग के विचार-संस्कार समाज में मुख्य रूप से प्रचलित होते हैं, लेकिन इसके बावजूद श्रमिक दलित वर्ग अपने शोषण से छुटकारा पाने के लिए तथा अपनी जीवन स्थितियां सुधारने के लिए लगातार कसमसाता रहता है और मौका मिलने पर स्थितियां बदलने के लिए संघर्ष भी करता है, लेकिन पूर्णत: भू-स्वामियों पर निर्भर होने के कारण श्रमिक-दलित इसमें कम ही कामयाब होते हैं क्योंकि अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए भू-स्वामी वर्ग भी नए-नए कुचक्र रचता रहता है । इस संघर्ष को रेखांकित करते हुए ओमप्रकाश वाल्मीकि ने लिखा कि फसल कटाई को लेकर अक्सर खेतों में हुज्जत चलती रहती थी । मजदूरी देने में ज्यादातर तगा कंजूसी बरतते थे । काटनेवालों की मजबूरी थी । जो भी मिलता, थोड़ी-बहुत ना-नुकर के बाद लेकर घर लौट आते । घर आकर कुढ़ते रहते या तगाओं को कोसते रहते । लेकिन भूख के सामने विरोध दम तोड़ देता था । ये उनकी नियति बन चुकी थी । ओमप्रकाश वाल्मीकि ने ग्रामीण समाज के यथार्थ को आलोचनात्मक दृष्टि से प्रस्तुत करते हुए समस्या के सही समाधन की ओर संकेत किया है ।
          ओमप्रकाश वाल्मीकि ने दलितों की मानवी-गरिमा को समाप्त करने वाले रिवाजों, प्रथाओं तथा परम्पराओं पर प्रश्नचिह्न लगाया है तथा इन प्रथाओं में छिपी अमानवीयता को उजागर किया है । जूठनखाने व उठाने की प्रथा का वर्णन करते हुए लिखा है- शादी-ब्याह के मौकों पर जब मेहमान या बाराती खाना खा रहे होते थे तो चूहड़े दरवाजों के बाहर बड़े-बड़े टोकरे लेकर बैठे रहते थे । बारात के खाना खा चुकने पर झूठी पत्तलें उन टोकरों में डाल दी जाती थीं, जिन्हें घर ले जाकर वे जूठनइकट्ठी कर लेते थे ।
          सलामकी प्रथा भी इसी तरह की प्रथा है, शादी-विवाह के समय दुल्हा उन घरों के दरवाजे पर जाता है जिन घरों में दुल्हन की माँ काम करती है । इसी तरह दुल्हन उन घरों के दरवाजे पर जाती है जिन घरों पर दुल्हे की माँ काम करती है । इस प्रथा के बारे में ओमप्रकाश वाल्मीकि ने लिखा है सदियों से चली आ रही इस प्रथा के पीछे में जातीय अहम की पराकाष्ठा है । समाज में जो गहरी खाई है, उसे प्रथा और गहरा बनाती है । एक साजिश है हीनता के भंवर में फंसा देने की । कोई इसके खिलाफ आवाज उठाने के बारे में सोचता भी नहीं था । “कितनी ही बार दुल्हों को ही नहीं, दुल्हनों को भी बेइंतहा अपमान सहना पड़ता है । गरीब परिवार की अनपढ़ लड़की अजनबियों के बीच जाकर वैसे ही गूंगी बनी रहती है । ऊपर से उसे दरवाजे-दरवाजे लेकर घूमने पर रही-सही कसर भी पूरी हो जाती है ।”[6]
          ओमप्रकाश वाल्मीकि ने दलित समाज में व्याप्त अंधविश्वास, जड़ता व अज्ञानता पर प्रश्नचिह्न लगाया है । अंधविश्वासों ने दलितों की चेतना को जकड़ रखा है जो वैज्ञानिक सोच व चिन्तन को जीवन में आने ही नहीं देता । धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मिलकर अंधविश्वास ऐसी शक्ति बन जाती है । जो जीवन को नियंत्रित करती है, दलितों में व्याप्त गरीबी इसको स्वमेव बढ़ावा देती है और अंधविश्वास गरीबी के कारणों की पहचान नहीं होने देते, ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं कि इस दुष्चक्र को तोड़े बिना दलितों में परिवर्तनकामी चेतना का संचार नहीं हो सकता जो ब्राह्मणवाद के चंगुल से मुक्ति पाने के लिए निहायत जरूरी है ।
          ब्राह्मणवाद दलितों को शिक्षा व ज्ञान से वंचित करके ही उनकी मानवीय गरिमा व पहचान समाप्त करने में कामयाब हुआ है । ज्ञान व शिक्षा पाने की ललक दलितों में थोड़ी-बहुत हमेशा ही रही है, लेकिन बीसवीं शताब्दी के दलित आन्दोलन ने तो शिक्षा प्राप्त करने को केन्द्रीय मुद्दा बना दिया । दलितों को ब्राह्मणवाद के शिंकजे से तथा नारकीय जीवन स्थितियों से छुटकारा दिलाने में शिक्षा व ज्ञान का महत्त्वपूर्ण योगदान हो सकता है । ओमप्रकाश वाल्मीकि के पिता उसे शिक्षा पाने के लिए बार-बार प्रेरित करते हैं कि पढ़-लिख कर जाति सुधारनीहै । जाति सुधारनेका उनके लिए सीध सा अर्थ है कि अपमान की जिन्दगी से छुटकारा पाना, शोषण व बेगार से मुक्ति । इस बात को सवर्ण समाज भी अच्छी तरह जानता है कि दलितों का शोषण तभी तक किया जा सकता है, जब तक कि वह अज्ञानी, अशिक्षित व अचेत है, इसलिए वह दलितों को शिक्षा नहीं देना चाहता । ओमप्रकाश वाल्मीकि दलित मुक्ति संघर्ष में शिक्षा की भूमिका को तो पहचाने ही हैं, साथ ही शिक्षा की सीमाओं को भी रंखांकित करते हैं कि मात्र शिक्षा ग्रहण करने से ही समाज से जाति प्रथा मिटने वाली नहीं है इसके लिए वैज्ञानिक व मानवीय दृष्टि की आवश्यकता है । शिक्षा भी ब्राह्मणवादी विचारों व कुतर्कों ने अपनी जगह बना ली है ।
          मध्यकाल में संभ्रांत हिंदू समाज की विधवाओं को सती होना पड़ता था । पुनर्जागरण के बाद भी विधवा-विवाह को हीन दृष्टि से देखा जाता था । आधुनिक युग में विधवाओं पर समाज द्वारा सुविधाहीन जीवन जीने का दबाव है, किंतु दलित समाज में विधवा-विवाह को मान्यता आदिकाल से है । क्योंकि जहां स्त्रियां श्रम करती हैं, वहां उनका महत्त्व-आवश्यकता और कुछ स्वतंत्र व्यक्तित्व भी होता है । बड़े भाई सुखबीर की मृत्यु के बाद छोटे भाई जसबीर से भाभी की शादी करा दी जाती है । इस शादी को रिश्तेदार और समाज द्वारा स्वीकृति प्राप्त है । चाचा श्यामलाल की पत्नी को मायके वापस भेज दिया जाता है । श्यामलाल की दूसरी शादी रामकटोरी से होती है, वह भी कुछ दिनों बाद सोल्हड़ का हाथ थाम लेती है । अत: दलित समाज में विवाह-विच्छेद और पुनर्विवाह के नियम शिथिल हैं । यही बात वीरभारत तलवार भी अपनी पुस्तक रस्साकस्सी में लिखते हैं ।
          अकारण नहीं कि इस समाज के विकास के लिए बनी सरकारी योजनाएं फलीभूत नहीं हो पाती हैं । ऐसे में दलित आत्मकथाओं के माध्यम से जो सच निखरकर आ रहा है, उसे देखने और समझने की जरूरत है । जूठनऔर उसके बाद आईं  सभी दलित आत्मकथाओं में भूत-प्रेत, जादू-टोना का उल्लेख इस समाज की अज्ञानता और पिछड़ेपन को बयां करता है । आत्मकथाएं दलित समाज का आईना हैं, जिसमें सामान्य जीवन व्यवहार के साथ धार्मिक-सांस्कृतिक मूल्यों को भी देखा जा सकता है । आजादी के खोखलेपन को व्यक्त करने में यह सफल रही । ऐसे जनतंत्र का क्या मतलब, जिसमें लोकतांत्रिक अधिकार चंद लोगों की मुट्ठी में हों ? आजादी के बाद के लोमहर्षक अथवा लोकलुभावनी सच का यह क्रूर दस्तावेज है, जिसकी सर्जनात्मक क्षमता से हिंदी में दलित आत्मकथा लेखक का मार्ग प्रशस्त हुआ ।
          जूठनआत्मकथा ने आधुनिक दलित साहित्य को सम्मृद्ध बनाने एवं दलित जीवन की यथार्थ को समाज के सामने प्रस्तुत करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की जूठनआत्मकथा में दलित जीवन की अभिव्यक्ति स्वतः ही दिखाई देती है ।  



[1] वाल्मीकि, ओमप्रकाश. जूठन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 7
[2] वाल्मीकि, ओमप्रकाश. जूठन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 16
[3] वाल्मीकि, ओमप्रकाश. जूठन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 16
[4] वाल्मीकि, ओमप्रकाश. जूठन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 34
[5] वाल्मीकि, ओमप्रकाश. जूठन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 163
[6] वाल्मीकि, ओमप्रकाश. जूठन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 45

भारतीय महिला मुक्ति आंदोलन

          मुक्ति की कामना प्रत्येक व्यक्ति की आंतरिक कामना होती है । अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए व्यक्ति का स्वतंत्र होना अंत्यन्त आवश्यक है । स्वतन्त्रता का अर्थ केवल आजादी नहीं बल्कि एक जीवन मूल्य है । इसीलिए जब कभी व्यवस्था व्यक्ति का शोषण कर गुलाम बनाने का प्रयत्न करती है, तब उस व्यवस्था से मुक्ति पाने के लिए संघर्ष प्रारम्भ होता है । इस दृष्टि से नारी स्वतन्त्रता का अपना विशेष महत्व है । “नारी मुक्ति आंदोलन व्यक्ति स्वतन्त्रता का पर्याय है, ऐसी स्वतन्त्रता जिसमें जीवन के साधनों और साध्यों में पूर्णतया समानता और स्वतन्त्रता हो । समान शैक्षिक, मानसिक वातावरण प्राप्त महिलाओं और पुरुषों में समान मैत्री भाव हो और महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण कर सकने के समान अवसर मिले । सबसे पहले अपने को पहचान कर अपनी पहचान बनानी है ।”[1] वास्तव में नारी मुक्ति का आंदोलन पुरुष विरोधी आंदोलन न होकर यह उस व्यवस्था विरोधी आंदोलन है, जिसमें नारी का शोषण किया जाता है ।
          प्राचीन भारतीय संस्कृति हमेशा से सामंती व्यवस्था पर आधारित रही है । परिवार में नारी सूत्रधारक होने के कारण वैदिक काल में उसकी स्थिति कुछ हद तक ठीक थी । लेकिन उत्तर वैदिक काल में नारी की स्थिति में गिरावट आना शुरू हो गया और समाज, परिवार या अन्य जगह पर नारी का स्थान गौण होता गया, जिसके फलस्वरूप नारी मुक्ति का संघर्ष शुरू होता है । किसी भी आंदोलन की शुरुआत किसी निश्चित तरिख या समय से नहीं होती । स्वतः समाज में धीरे-धीरे विकसित होकर समय के साथ एक बड़ा रूप अख़्तियार कर लेता है । “भारतीय स्त्री मुक्ति का संघर्ष कहाँ से शुरू होता है, इसके लिए कुछ निश्चित प्रमाण नहीं मिलते । इतना ही कहा जा सकता है कि उत्तर वैदिक काल से जैसे-जैसे बंधन क्रमशः कसते गए होंगे, उससे मुक्ति कि चाह वैसे-वैसे बलवती होती गई होगी ।”[2]
          सच्चे अर्थों में स्त्री को अपनी परंपरा, अपना संघर्ष और अपनी भागीदारी का इतिहास खुद लिखना होगा। स्त्री जानती है भिन्न-भिन्न वर्गों, वर्णों और जातियों के बीच नए-नए समीकरणों के साथ उसे अपने लिए लड़ना होगा। पूंजीवादी पितृसत्ता ऊपर से चाहे जितनी उदार और सरल लगे, पर भीतर-भीतर जटिल है। दोष उसकी संरचना में ही है। अगर ऐसा नहीं होता तो आजादी के आंदोलन से लेकर अभी तक के स्त्री संघर्ष को इतिहास में कहीं तो जगह मिली होती। आजादी के इतिहास पर अनेक ग्रंथ हैं, पर स्त्रियों की सामान्य भागीदारी पर अलग से खोज करने निकलें, तो कहीं कुछ नहीं मिलता। स्त्री की पूरी परंपरा उसका इतिहास उसका संघर्ष दफन कर दिया गया है। आशा रानी वोहरा ने जब ‘महिलाएं और स्वराज किताब’ लिखना शुरू किया तो उन्हें तथ्य जुटाने में बारह वर्ष लगे। उन्होंने एक जगह लिखा है कि आजादी आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका पर लिखने के लिए जब सामग्री जुटाने लगीं तो गहरी निराशा हुई। सच तो यह है कि सभी दलित और वंचित वर्गों को अपना अतीत दर्ज करने का उद्यम स्वयं ही करना पड़ता है। जानी-मानी नारी चिंतक प्रभा खेतान ने एक जगह लिखा है, ‘हम स्त्रियों के पास इसके सिवा चारा ही क्या है! हम अपने आप को उघाड़ कर ही यथास्थिति के खिलाफ विद्रोह कर पाती हैं। हमारा अपना अंतरग अनुभव ही हमारा पहला अस्त्र है। जो आगे जाकर अपनी प्रमाणिकता के जरिए इतिहास बनाता है।’
          आधुनिक काल में महिला मुक्ति का संघर्ष 19वीं शताब्दी से शुरू हुआ । ब्रह्म समाज, आर्य समाज, प्रार्थना समाज तथा थियोसोफ़िकल सोसायटी के कारण नारी उत्थान को प्रमुख स्थान मिला । राजा राम महान राय ने सती प्रथा का विरोध का विरोध किया । महाराष्ट्र में ज्योतिबाफुले, सवित्रीबाईं, गुजरात में स्वामी दयानंद और बंगाल में ईश्वरचंद विद्यासागर, राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानन्द ने स्त्रियों के सामाजिक अधिकारों के पक्ष में अभियान छेड़ दिया था। इनसे भी बहुत पहले इतिहास पर दृष्टि डाले तो महाकारुणिक गौतम बुद्ध द्वारा आश्रम में स्त्रियों को प्रवेश देना और स्त्रियों का उद्भव भी परिवार और समाज के उत्पीड़न के विरूद्ध खड़ी स्त्रियों की मुहिम ही मानी जाएगी। इन्होंने धर्मकी चैखट को या कहा जाए धार्मिक दुर्ग की दीवारों को तोड़ या लांघ कर उसमें प्रवेश या हस्तक्षेप करने की पहल की थी।
          भारत में स्त्री आंदोलन कि असली शुरुआत 19वीं सदी के आखिरी दशकों में हुई जब पंडिता रमाबाई, रमाबाई रानाडे, आनंदीबाई जोशी, फ्रानना सोराबजी, सरला देवी जैसी औरतें अपने घरों में पुरुष प्रधान समाज द्वारा थोपें बंधनों को तोड़कर ऊंची शिक्षा के लिए विदेश गई और लौटकर उन्होने भारत में स्त्रियों के आंदोलन को आगे बढ़ाया । स्त्रियों के द्वारा बनाए गए अनेक संगठन कार्य करना प्रारम्भ हो गए । 1886 में स्वर्णकुमारी देवी ने ‘लेडीज़ एसोसिएशन’ नामक संस्था बनाई । 1892 में पंडिता रमाबाई ने स्त्रियों के लिए पूना में ‘शारदा सदन’ खोला । उन्होने स्त्रियों कि शिक्षा और रोजगार के लिए प्रयत्न किए, बाल विवाह, विधवा विवाह पर अनेक व्यख्यान दिये जिसके कारण उनको अनेक विरोध सहने पड़े । रमाबाई के समान ही मैडम ब्लावस्त्सकी, मारग्रेट नोबल, आणि वेसेंट और मिराबेन जैसी कुछ विदेशी महिलाओं द्वारा भी भारत में नारी जागरण का कार्य किया गया ।
          1917 में मद्रास में श्रीमती मार्गरेट काजिन्स ने ‘इंडियन वुमेन एसोसिएशन’ कि स्थापना की और महिलाओं को संगठित कर उनकी गतिविधियां संचालित की । ब्लावस्तकी ने ‘थियोसोफ़िकल सोसायटी की स्थापना की जिसका नेतृत्व संभालने वाली श्रीमती एनी बेसेंट एक आइरिस महिला थी । 1917 में श्रीमती सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में महिलाओं का एक प्रतिनिधिमंडल ‘सेक्रेटरी आफ स्टेट फार इंडिया’ से मिला और महिलाओं के लिए मताधिकार की मांग किया । इसके फलस्वरूप 1921 में मुंबई और मद्रास में महिलाओं को अलग मताधिकार प्राप्त हुआ । 1927 में ‘अखिल भारतीय महिला सम्मेलन’ नमक गैरराजनीतिक संगठन की स्थापना की गई । इस संगठन का मुख्य काम महिलाओं की सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति को उन्नत करना था । 1929 में बाल विवाह निषेध अधिनियम पास हुआ, जो महिलाओं की सामाजिक स्थिति के सुधार में एक नया मोड़ था ।
          1910 में बंगाल में सरला देवी ने भारत स्त्री मंडल की स्थापना की। 1917 में सरोजनी नायडू के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल स्त्रियों की रक्षा और मताधिकार को लेकर मांटेग्यू चेम्सफोर्ड से मिला। अप्रैल 1918 में पटना में हुए एक आयोजन में एनी बेसेंट ने कहा कि जब तक औरतों को अधिकार नहीं मिलता, मोर्ले मिंटो सुधार से कोई लाभ नहीं होगा। महिलाओं के मताधिकार की मांग को लेकर साउथ बोरो कमेटी की स्थापना की गई। 1919 के जनवरी में पटना में भी अखिल भारतीय महिला सम्मेलन हुआ। बिहार की महिलाओं ने बाल विवाह, दहेज प्रथा और मताधिकार के मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद की। उसी साल राजकिशोरी देवी ने मझवेलिया, लहेरिया सराय में बिहार महिला पीठ की स्थापना की। 1921 के राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में बिहार से आठ महिलाओं ने हिस्सा लिया।
          इसी क्रम में गांधी जी द्वारा महिलाओं के उत्थान के लिए किया गया कार्य सराहनीय है । वेयपने प्रत्येक कार्यक्रमों में भागीदारी के लिए पुरुषों के समान दर्जा दिया । 1930 में गांधी जी के आह्वान पर ‘नमक सत्याग्रह’ आंदोलन में हजारों स्त्रियों ने भाग लिया । जिनमें सरोजिनी नायडू, कमला देवी चट्टोपाध्याय और रुक्मिनी लक्ष्मीपति, पेरिन कैप्टन, विजयलक्ष्मी पंडित, कृष्णा नेहरू, कमला देवी, लीलावती मुंशी, दुर्गाबाई, डॉ. मुतुलक्ष्मी रेड्डी, मनीबेन पटेल, हंसा मेहता आदि का नाम प्रमुख है ।
          भारतीय स्त्री आंदोलन को स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से जोड़ कर देखना होगा। जिसकी शुरुआत संन्यासी विद्रोह से होता है। संन्यासी विद्रोह की सूत्रधार देवी चैधरानी को अंग्रेज इतिहासकारों ने दस्यु रानी की संज्ञा दी थीं। वहीं देवी चैधरानी ने संन्यासी विद्रोह का सूत्रपात किया। उस समय के लेफ्टिनेंट ब्रेनन की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि भवानी पाठक की विद्रोही गतिविधियों के पीछे देवी चैधरानी का प्रमुख हाथ था। भवानी पाठक के मारे जाने के बाद भी देवी चैधरानी ने कभी हार नहीं मानी। बराबर लड़ती रहीं, अंत तक अंग्रेजों के हाथ नहीं आर्इं।
          भारतीय स्त्री मुक्ति आन्दोलन अपने विकास के दौरान जहाँ बहुत सारे सामाजिक, धार्मिक रूढ़ियों, जड़ताओं कुप्रथाओं और पाखण्डों से मुक्त हुई है, वही उसके सामने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नई चुनौतियाँ भी उत्पन्न हुई है । जो परम्परागत कुरीतियों से अधिक घातक सिद्ध हो रही हैं । भारतमें भूमण्डलीकरण के कारण भी बहुत-सी नई समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं। नए रूप में स्त्री देह व्यापार, भ्रूण-हत्या, यौन उत्पीड़न, बलात्कार, घरेलू हिंसा, कुपोषण, हिंसा-अपराध, हत्या-आत्महत्या, विस्थापन, निरक्षरता, साम्प्रदायिकता, महिलाओं का वस्तुकरण, परिवार का बिखरना जैसी अनेक भयावह स्थितियाँ सामने खड़ी हैं. साथ ही बहुत-सी पुरानी परम्पराएँ कुप्रथाएँ भी आज तक कायम हैं जो स्त्री सशक्तिकरण में अवरोधक हैं। साथ ही गरीबी, जातिवाद, कुपोषण, सम्प्रदायवाद, पारिवारिक विघटन, हिंसा, कुपोषण, स्वास्थ्य की असुविधाओं का अभाव आदि है जो जेंडर विभेद के कारण समाज में मौजूद है. यह एक चिंताजनक बात है कि जब एक ओर तमाम महिला संगठनों, महिला स्वयंसेवी संस्थाओं की संख्या बढ़ रही है, तब हम देख रहे हैं उसी के साथ-साथ महिलाओं के साथ शोषण व अत्याचार भी बढ़ रहा है. चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, रोज प्रचार माध्यमों में स्त्रियों पर हिंसा की कोई-न-कोई ताजी खबर जरूर रहती है। महिला आन्दोलनों से जुड़ी कार्यकर्ताओं के बीच, महिला बुद्धिजीवियों के सामने यह एक जटिल प्रश्न है कि स्त्री मुक्ति आन्दोलन की दिशा कौन-सी होनी चाहिए? क्या करने से महिलाओं की पीड़ा और समस्याएँ कम हो जायेंगी ? आज स्त्री मुक्ति आन्दोलन के सामने कई चुनौतियाँ हैं । लेकिन इस पर सोचने के पहले हमें अपना इतिहास परखकर देखना जरूरी है ।
          महिला चिंतक राधा कुमार लिखती हैं “सन 1910 के बाद से उग्रराष्ट्रवादी स्त्रियाँ महिला अधिकारों के मुद्दे पर होने वाले आंदोलनों में ज्यादा सक्रिय नजर आईं । सन 1913 में क्रांतिकारी आतंकवाद की समर्थक कुमिदिनी मित्रा को बुडापेस्ट में सम्पन्न हुई इन्टरनेशनल विमेन सफरेज अलायंस कांग्रेस में ‘भारतीय स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करने के लिए भारतीय प्रतिनिधि के रूप में आमंत्रित किया गया ।”[3]
          देश भर में जब महिलाएं अपने अधिकार के लिए आंदोलन कर रही थीं, बिहार उस आंदोलन से अछूता नहीं था। परंपराओं की अनेक धाराओं के विरुद्ध बिहार की महिलाओं ने भी मोर्चा खोला। बिहार को जब बंगाल प्रेसिडेंसी से अलग किया गया, उस समय बिहार में स्कूल जाने वाली लड़कियों की संख्या काफी कम थी। उसी दौरान शुरू हुए सुधार आंदोलन में बिहार की महिलाओं ने भूमिका निभाई। शिक्षा एक मुद्दा बना। पटना में राममोहन राय सेमिनरी में महिलाओं ने शिक्षा के साथ साथ बाल विवाह के खिलाफ सम्मेलन में प्रस्ताव पारित किए। मधोलकर ने इसकी अध्यक्षता की और बाल विवाह के खिलाफ समिति बनाने का सुझाव दिया। बिहार सहित दूसरे राज्यों में भी सुधार आंदोलन चल रहा था। जल, जंगल जमीन के साथ साथ महिलाएं अपने वोट देने के अधिकार को लेकर भी संघर्ष कर रही थीं।
          राजनीतिक रुप से बिहार हमेशा  से चेतनशील रहा है। 1917 में महात्मा गांधी के आगमन के बाद पर्दा प्रथा,बाल विवाह, सती प्रथा, शिक्षा जैसे सवालों के साथ-साथ असहयोग, स्वदेशी खिलाफत और खादी के आंदोलन में महिलाओं ने जमकर हिस्सा लिया। 1912 में पटना में राममोहन राय सेमिनरी में महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया। श्रीमती मधोलकर ने इसकी अध्यक्षता की। और बाल-विवाह के खिलाफ समिति बनाने का सुझाव दिया। 1928 में महिलाओं ने साइमन कमिशन का जबरदस्त विरोध किया। बिहार में लेजिस्लेटिव कौंसिल में महिलाओं को वोट देने के अधिकार व लेंगिक भेदभाव को लेकर नवम्बर,1921 को एक प्रस्ताव पेश किया गया। 1919 के एक्ट के अनुसार वे वोट नहीं दे सकती थीं। कौंसिल में इस मसले पर जमकर बहस हुई। और यह प्रस्ताव 10 वोटों से गिर गया। और कोलकाता में पेश महिलाओं के मताधिकार देने संबंधित प्रस्ताव भी भारी मतों से पराजित हो गया। पर महिलाएं हिम्मत नहीं हारीं। उनके संघर्ष जारी रहे। लंबी लड़ाई के बाद बिहार और उड़़ीसा में 1929 में यह अधिकार महिलाओं को मिला।

[1] डॉ. शीला रजवार, स्वतंत्र्योत्तर हिन्दी कथा साहित्य में नारी के बदलते संदर्भ
[2] आशारानी वोहरा, औरत : कल, आज और कल
[3] राधा कुमार, स्त्री संघर्ष का इतिहास, पृष्ठ 120 

   (अनीश कुमार)

शोध : अर्थ, प्रकार और प्रक्रिया

          प्रकृति  ने  संसार को अनेक चमत्कारों  से परिपूर्ण किया है । कुछ चमत्कारों की खोज भी एक लंबे अंतराल के शोध के बाद ही संभव हो सकी थी । यही कारण है कि किसी भी सत्य की खोज और उसकी पुष्टी के लिए शोध का होना अनिवार्य होता है । मानव की जिज्ञासु प्रवृत्ति ने ही शोध प्रक्रिया को जन्म दिया  । किसी भी सत्य को निकटता से जानने के लिए शोध एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है । समय- समय पर विभिन्न विषयों की खोज और उनके अध्ययन और निष्कर्षो की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता भी शोध की मदद से ही संभव हो पाती है । जैसे जैसे समय बीत रहा हैं वैसे वैसे मानव की समस्याएँ भी विकट होती जा रही हैं । प्रतिदिन एक नई समस्या से उसका सामना होता है । ऐसे में शोध की महत्ता स्वतः ही पैदा हो जाती है । हालांकि मानव की सोच विविधता वाली होती है और उसकी रूचि, प्रकृति, व्यवहार, स्वभाव और योग्यता भिन्न-भिन्न होती है । इस कारण से अनेक जटिलताएं भी पैदा हो जाती है । अत: मानवीय व्यवहारों की अनिश्चित प्रकृति के कारण जब हम उसका व्यवस्थित ढंग से अध्ययन कर किसी निष्कर्ष पर आना चाहते हैं तो वहां पर हमें शोध का प्रयोग करना होगा । इस तरह सरल शब्दों में कहें तो सत्य की खोज के लिए व्यवस्थित प्रयत्न करना या प्राप्त ज्ञान की परीक्षा के लिए व्यवस्थित प्रयत्न भी शोध कहलाता है । तथ्यों कर अवलोकन करके कार्य- कारण संबंध ज्ञात करना शोध / अनुसंधान की प्रमुख प्रक्रिया है । 
          वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में उच्च शिक्षा की सहज उपलब्धता और उच्च शिक्षा संस्थानों को शोध से अनिवार्य रूप से जोड़ने की नीति ने शोध की महत्ता को बढ़ा दिया है । आज शैक्षिक शोध का क्षेत्र विस्तृत और सघन हुआ है । शोध उस प्रक्रिया अथवा कार्य का नाम है जिसमें बोधपूर्वक प्रयत्न से तथ्यों का संकलन कर सूक्ष्मग्राही एवं विवेचक बुद्धि से उसका अवलोकन- विश्‌लेषण करके नए तथ्यों या सिद्धांतों का उद्‌घाटन किया जाता है ।
शोध उस प्रक्रिया अथवा कार्य का नाम है जिसमें बोधपूर्वक प्रयत्न से तथ्यों का संकलन कर सूक्ष्मग्राही एवं विवेचक बुद्धि से उसका अवलोकन- विश्‌लेषण करके नए तथ्यों या सिद्धांतों का उद्‌घाटन किया जाता है।
शोध का प्रमुख लक्ष्य वैज्ञानिक पद्वति के प्रयोग द्वारा प्रश्नों के उत्तर खोजना है। इसका उद्देश्य अध्ययनरत समस्या के अंदर छुपी हुई यर्थाथता का पता लगाना या किसी समस्या के बारे में उस सब की खोज करना है, जिसकी जानकारी नहीं है। शोध का उद्देश्य सिद्धांतों  का निर्माण करना होता है। मनुष्य के जीवन में आने वाली समस्याओं के निदान में भी शोध ही आगे आता है।
          आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी (1969) लिखते हैं कि स्थूल अर्थों में शोध नवीन और विस्मृत तत्वों का अनुसंधान है जिसको अंग्रेजी में डिस्कवरी ऑफ फैक्ट्स कहते हैं । और सूक्ष्म अर्थ में वह ज्ञात साहित्य के पूनर्मूल्यांकन और नई व्याख्याओं का सूचक है ।      
          पी.वी.यंग (1966) के अनुसार शोध एक ऎसी व्यवस्थित विधि है जिसके द्वारा नवीन तथ्यों की खोज तथा प्राचीन तथ्यों की पुष्टि की जाती है, तथा उन अनुक्रमों, पारस्परिक सम्बंधों तथा कारणात्मक व्याख्याओं का अध्ययन करती है जो कि उन्हें नियंत्रित करते हैं ।
          एडवार्ड (1969) के अनुसार शोध किसी प्रश्न अथवा समस्या अथवा प्रस्तावित उत्तरों की जाँच के लिए उत्तर खोजने हेतु किया जाता है ।

विश्लेषण करने पर शोध के चार अंग हमारे सामने आते हैं-
1.    ज्ञान क्षेत्र की किसी समस्या को सुलझाने की प्रेरणा  ।
2.    विवेकपूर्ण अध्ययन  ।
3.    प्रासंगिक तथ्यों का संकलन  ।
4.    परिणाम स्वरूप निर्णय  ।
शोध के प्रकार :
उपयोग के आधार पर : 
1. विशुद्ध / मूल शोध  (Pure / fundamental Research)
2. प्रायोगिक /प्रयुक्त या क्रियाशील शोध (Applied Research)
काल के आधार पर :
1.  ऎतिहासिक शोध (Historical Research)
2. वर्णनात्मक / विवरणात्मक शोध (Descriptive Research)
इसके अलावा स्वतंत्र रूप से शोध के कुछ मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं -
1.     वर्णनात्मक शोध- किसी विषय, वस्तु या घटना अथवा व्यक्ति या समूह की विशेषता और स्थिति-परिस्थिति का सही चित्रण करने के लिए किये जाने वाले शोध को वर्णनात्मक शोध कहते है।  यह क्या है? कैसा है? कहाँ है? क्यों है?शोधकर्ता का चरों (variables) पर नियंत्रण नहीं होता । सर्वेक्षण पद्धति का प्रयोग होता है । वर्तमान समय का वर्णन होता है । मूल प्रश्न होता है: “क्या है?”
2.     विश्लेषणात्मक शोध (Analytical Research) - शोधकर्ता का चरों (variables) पर नियंत्रण होता है । शोधकर्ता पहले से उपलब्ध सूचनाओं व तथ्यों का अध्ययन करता है ।
3.     विशुद्ध / मूल शोध  - किसी घटना-परिघटना (फेनोमेना) के कार्य-कारण संबंधों को निर्धारित करने के उद्देश्य से किये जाने वाले शोध को मौलिक या विशुद्व शोध कहते हैमौलिक या विशुद्व शोध के द्वारा मौलिक सिद्वांतों और नियमों का प्रतिपादन किया जाता है। मौलिक या विशुद्व शोध का उद्वेश्य ज्ञान की प्राप्ति है। शोध के द्वारा ज्ञान की प्राप्ति, पुनर्मूल्यांकन, पुनःपरिक्षण परिमार्जन और परिवर्धन किया जाता है । इसमें सिद्धांत (Theory) निर्माण होता है जो ज्ञान का विस्तार करता है । गणित तथा मूल विज्ञान के शोध ।
4.     प्रायोगिक / प्रयुक्त शोध (Applied Research): समस्यामूलक पद्धति का उपयोग होता है । किसी सामाजिक या व्यावहारिक समस्या का समाधान होता है । इसमें विशुद्ध शोध से सहायता ली जाती है ।
5.     मात्रात्मक शोध (Quantitative Research): इस शोध में चरों (variables) का संख्या या मात्रा के आधार पर विश्लेषन किया जाता है ।
6.     गुणात्मक शोध (qualitative Research) : इस शोध में चरों (variables) का उनके गुणों के आधार पर विश्लेषन किया जाता है ।
7.     सैद्धांतिक शोध (Theoretical Research):  सिद्धांत निर्माण और विकास पुस्तकालय शोध या उपलब्ध डाटा के आधार पर किया जाता है ।
8.     आनुभविक शोध (Empirical Research): इस शोध के तीन प्रकार हैं – क) प्रेक्षण (Observation) ख) सहसंबंधात्मक (Correlational) ग) प्रयोगात्मक (Experimental)
9.    अप्रयोगात्मक शोध (Non-Experimental Research) - वर्णनात्मक शोध  के समान
10.  ऎतिहासिक शोध (Historical Research): इतिहास को ध्यान में रख कर शोध होता है । मूल प्रश्न होता है: “क्या था?”
11.  नैदानिक शोध (Diagnostic / Clinical Research): समस्याओं का पता लगाने के लिए किया जाता है । 
शोध प्रक्रिया (Research Process)
शोध प्रक्रिया उन क्रियाओं अथवा चरणों का क्रमबद्ध विवरण जिसके द्वारा किसी शोध को सफलता के साथ संपन्न किया जाता है । शोध प्रक्रिया के कई चरण होते हैं । यहाँ यह जानना आवश्यक है कि सभी चरण शोध प्रक्रिया में एक-दूसरे से पृथक एवं स्वतंत्र नहीं हैं । प्रत्येक चरण एक दूसरे पर निर्भर होता है  ।
शोध प्रक्रिया के चरण
1.     शोध समस्या का निर्माण
2.     संबंधित साहित्य का व्यापक सर्वेक्षण (survey of literature)
3.     परिकल्पना/प्राकल्पना (Hypothesis) का निर्माण
4.     शोध की रूपरेखा/शोध प्रारूप (Research Design) तैयार करना
5.     आँकड़ों का संकलन / तथ्यों का संग्रह (collection of data or facts)
6.     आँकड़ों / तथ्यों का विश्‍लेषण (analysis of facts and data)
7.     परिकल्पना की जाँच
8.     सामान्यीकरण एवं व्याख्या (generalization and description)
9.     शोध प्रतिवेदन (Research Report) तैयार करना
          शोध प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण एवं प्रथम चरण शोध समस्या का चुनाव (selection) एवं सही निर्माण करना है । शोधकर्ता द्वारा चयनित (selected) और निर्मित (formulated)शोध समस्या पर ही उसके शोध की सफलता निर्भर करती है । सामान्य अर्थों में शोध समस्या सैद्धांतिक (theoretical) या व्यवहारिक (practical) संदर्भो में व्याप्त वह समस्या / कठिनाई है जिसका समाधान शोधकर्ता करना चाहता है । निम्न शर्तों के होने पर शोध समस्या विद्यमान (exist) होती है:
1.     किसी वातावरण में समस्या से संबंधित एक व्यक्ति, एक समूह अथवा एक संगठन का होना आवश्यक है ।
2.     समस्या के समाधान  के लिए कम से कम दो कार्यप्रणालियाँ (course of action) होनी चाहिए । कार्यप्रणाली से तात्पर्य उस तरीके से जिसे नियंत्रित चरों के एक या एक से अधिक मूल्य परिभाषित (define) करते है ।
3.     कार्यप्रणाली को प्रयोग करने के बाद किसी समस्या के कम से कम दो संभावित परिणाम होने चाहिए जिनमें से एक शोधकर्ता को दूसरे से अधिक उपयुक्त (suitable) लगता हो । इसका अर्थ है कि शोधकर्ता के पास कम से कम एक ऎसा परिणाम हो जो उसका उद्देश्य (aim) हो ।
4.     कार्यप्रणालियाँ उद्देश्यों पर आधरित कार्य करने की सुविधा प्रदान करने वाली हों । इन कार्यप्रणालियों में असमानताएँ होनी चाहिए ।
एक शोध समस्या का चुनाव करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:
1.     ऎसा विषय जिस पर अत्याधिक कार्य हो चुका हो, उसका चुनाव नहीं करना चाहिए क्योंकि उस विषय पर नई रोशनी डालना कठिन होता है ।
2.     समस्या न तो अति संकीर्ण (over narrow) हो और न ही अति व्यापक (over broad) हो ।
3.     किसी औसत शोधकर्ता को विवादास्पद (controversial) विषय के चुनाव से बचना चाहिए ।
4.     शोध का विषय परिचित (known) तथा संभाव्य (possible) होना चाहिए जिससे कि शोधकर्ता इससे संबंधित सामग्री या संसाधन आसानी से प्राप्त कर सके ।
5.     शोध समस्या का चुनाव करते समय शोधकर्ता को अनेक तत्वों को ध्यान में रखना चाहिए जैसे विषय का महत्व, योग्यताएँ, प्रशिक्षण (training), समय, धन एवं शक्ति के रूप में लगने वाला व्यय  (expenditure) ।
6.  शोध विषय के चयन के पहले यथासंभव प्रारंभिक अन्वेषण (search)  करना  आवश्यक है ।

- अनीश कुमार

Tuesday, 23 August 2016

आजादी के 69 वर्ष : हम कितने आजाद

          हम आजादी के 69वां वर्ष मनाने जा रहे हैं । आजादी के जश्न में हम पूरी तरह सराबोर हो जाते हैं । कहा जाता है कि हम वहीं तक आजाद हैं जहां से दूसरे की नाक शुरू होती है । आजादी एक ऐसा शब्द जो शरीर को झकझोर कर रख देता है । हम एकदम कुछ करने के लिए तन मन धन से तत्परता से आगे आ जाते हैं । आजादी हमें जीने के मायने व तौर तरीके सिखाती है । 15 अगस्त 1947 कि आधी रात से ही भारत आजाद होकर एक लोकतान्त्रिक देश बन गया । तब से लेकर आज तक हम आजादी का जश्न मानते चले आ रहे हैं ।

          मनुष्य हमेशा अपने आपको आजाद रखना चाहता है । समय समय पर आजादी के मायने बदलते गए और हम अपने आप को आजाद मानते गए । किसी भी आजादी उस देश की समस्त जनता की आजादी है । यह आजादी किसी को इतना आजाद कर दे की वह अपने को मनुष्य से भी ऊपर समझने लगे और किसी की आजादी इतनी छीन लिया जाए कि उसे पशु से भी बदतर जीने को मजबूर होना पड़े, यह बात समझ से परे लगती है । आज हमारे सामने तमाम मानवीय कुरीतियों मुँह बाए खड़ी हैं ।

ü जिस देश कि आधी जनता भूखे पेट सोने पर मजबूर हो ।

ü जिस देश में मनुष्य कि पहचान प्रतिभा से नहीं बल्कि उसकी जाति से की जाती हो ।

ü जिस देश में धर्म मनुष्य से ऊपर हो ।

ü जिस देश में लोकतान्त्रिक तरीके से हक़ व अधिकार मांगने पर पुलिस की लाठी का शिकार होना पड़े ।

ü जिस देश में महिलाओं को समानता का अधिकार न हो बल्कि उन्हें मानवीय ज़्यादतियों का सामना करना पड़े ।

ü जहां सरेआम बलात्कार, लूट, हत्या, अपहरण आदि घटनाएँ हों ।

ü महिलाओं को डायन के नाम पर सरेआम उनको पीटना, उनकी बेइज्जती करना ।

 ü जिस देश में किसान गरीबी के चलते अत्महत्या करने को मजबूर हो।