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Friday, 29 March 2024

कांशीराम और उनका बहुजनवाद : पुनर्पाठ - डॉ. अनीश कुमार

 

मान्यवर कांशीराम ने भारतीय समाज के वंचित तबको, गरीबों, दलितों को जीने की एक मुकम्मल राह दिखाई है । उनमें आत्मविश्वास की ललक पैदा की है । कांशीराम का उद्देश्य सर्व जनहिताय, सर्व जनसुखाय रहा । किन्तु वह वंचित समुदाय को बहुजन समाज नाम के पदबंध से संबोधित करते हैं । वह कई बार अपने भाषणों में कहते हैं कि समाज में जनसंख्या के हिसाब से वंचित समाज की संख्या अधिक है । इसीलिए इसे बहुजन समाज कहना ज्यादा समीचीन होगा । बहुजन समाज को वह भारतीय समाज की असली वारिस मानते हैं । कांशीराम उन लोगों में से थे जो अपना सुख आराम त्याग कर गरीबों की सेवा में अपना जीवन न्यौछावर कर देते हैं । उनके समकालीन तमाम ऐसे नेता थे जो ऐश-आराम करके जिंदगी व्यतीत कर रहे थे । किन्तु कांशीराम ने जिंदगी भर अविवाहित रहकर, बिना किसी लाभ के पद पर रहते हुए उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (BSP) और दलित समाज को संगठित व संचालित किया । सोशल इंजीनियरिंग का उन्होंने जो सफल मंत्र दिया वह भारतीय इतिहास में अद्वितीय है । वंचित तबके की सेवा के लिए अपनी सरकारी नौकरी को भी छोड़ दिया । उनकी यही कर्तव्यनिष्ठता बहुजन समाज को सामाजिक व राजनीतिक रूप से एक नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया । उन्हें बहुजन समाज की राजनीति का पितामह कहा जाता है ।

कांशीराम सामाजिक चेतना की अपेक्षा राजनीतिक चेतना को अधिक तवज्जो देते थे । उनका मानना था कि जिस समुदाय का राजनीतिक व्यवस्था में प्रतिनिधित्व नहीं है, वह समुदाय मर चुका है । ऐसा इसलिए कहते थे कि आप चाहे जितनी बड़ी नौकरी पा जाओ किसी न किसी नेता के शरण में ही काम करना पड़ता है । सभी विभागों के कोई न कोई मंत्री होता है । उन्ही के नीचे सबको काम करना होता है । इसलिए वे राजनीतिक चेतना को अधिक महत्वपूर्ण मानते थे । यही कारण है जब वह नौकरी से त्यागपत्र देने के बाद महाराष्ट्र की प्रमुख राजनीतिक पार्टी आरपीआई से जुड़े तो उन्हें वहाँ पर भी राजनीतिक चेतना का अभाव दिखाई दिया । कांशीराम : बहुजनों के नायककिताब में बद्रीनारायण लिखते हैं, ‘कांशीराम दलितों के लिए कुछ करना चाहते थे इसलिए वह दलित मूवमेंट को आगे बढ़ा रही आरपीआई से जुड़ गए । (आरपीआई के वर्तमान अध्यक्ष एनडीए सरकार के सहयोगी रामदास आठवले हैं ।) उन्होंने पाया कि दलितों की लड़ाई लड़ने वाले नेता अवसरवादी, लालची और स्वार्थी बन चुके हैं । एकता की बात तो करते हैं लेकिन एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करते रहते हैं । धीरे-धीरे वह उससे दूर होते गए । आगे चलकर 1984 में उन्होंने बीएसपी की स्थापना की । तब तक कांशीराम पूरी तरह से एक पूर्णकालिक राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता बन गए थे । उन्होंने तब कहा था कि अंबेडकर किताबें इकट्ठा करते थे लेकिन मैं लोगों को इकट्ठा करता हूं । उन्होंने तब मौजूदा पार्टियों में दलितों की जगह की पड़ताल की और बाद में अपनी अलग पार्टी खड़ा करने की जरूरत महसूस की । वो एक चिंतक भी थे और ज़मीनी कार्यकर्ता भी । बसपा की स्थापना के बाद वह पूरे देश में साइकिल यात्राएं की । यह उनका सार्थक प्रयास था ।

कांशीराम राजनीति के मूल मर्म को समझ गए थे । घूम-घूम कर वह वंचित समुदाय को राजनीतिक रूप से मजबूत होने का आह्वान करते थे । कांशीराम के समय भी बहुत सारे लोग नौकरियों में थे । आरक्षण लागू होने के बाद भी आरक्षित सीट पर बहुत से दलित समुदाय के लोग चुनकर आते थे लेकिन सब अपनी पेट पूजा में ही लगे रहते थे । आर्थिक रूप से मजबूत होने के बाद भी सामाजिक और राजनीतिक रूप से कमजोर थे । कांशीराम एक तरफ डॉ. अंबेडकर द्वारा दिखाये गए रास्ते पे बैक टू सोसायटी के लिए लोगों को प्रेरित करते थे । इसी उद्येश्य से वह बीएसपी से पहले बामसेफडीएस4 की स्थापना किए थे । उनका यह मिशन सफल भी हुआ । कांशीराम ने इसीलिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व को महत्ता देते थे । जब वह समाज के बीच जाते थे तो वह कम शब्दों में अपनी प्रभावशाली बातों से लोगों को समझाते थे । वह वोट की कीमत को समझते थे । वह लोगों को समझाते थे कि चाहे कोई गरीब हो या अमीर अभी के वोट कि कीमत एकसमान होती है । इसलिए अपना वोट सोच-समझकर देना चाहिए । जब वह राजनीति में कदम रखे थे तब कुछ शुरुआती वर्षों में जैसे सन् 1983-84 नारों का साल रहा । उनके कुछ नारे प्रसिद्ध हैं -

- वोट हमारा, राज तुम्हारा, नहीं चलेगा नहीं चलेगा ।

- जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी ।

- वोट से लेंगे CM/PM, आरक्षण से लेंगे SP/DM

धीरे-धीरे उनके नारों में तल्खी आने लगी । वह उन सभी चीजों का विरोध किया जो उनके राजनीतिक चेतना को प्राप्त करने के मार्ग में बाधक हो रहे थे । वह एक और नारा दिया तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार । यह नारा एक तरह से दलितों के लिए आह्वान था । ऊंची जाति के लोग हक्के-बक्के रह गए । बहनजी किताब में अजय बोस लिखते हैं, ‘एक बार कांशीराम मंच पर भाषण देने के लिए खड़े हुए । उन्होंने पहली लाइन में कहा, अगर श्रोताओं में ऊंची जाति के लोग हों तो अपने बचाव के लिए वे वहां से चले जाएं । इसके बाद कांशीराम के समर्थन में जोरदार नारेबाजी हुई । उनकी रैलियों से ऊंची जाति के लोग गायब होते चले गए । ब्राह्मण समुदाय कांशीराम से नाराज भी हुआ किन्तु धीरे-धीरे सामाजिक बुनावट समझ आने पर सब ठीक होता गया । अपने राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष के दौरान कांशीराम ने, उनके मुताबिक़ ब्राह्मणवाद से प्रभावित या उससे जुड़ी हर चीज़ का बेहद तीखे शब्दों में विरोध किया, फिर चाहे वे महात्मा गांधी हों, राजनीतिक दल, मीडिया या फिर ख़ुद दलित समाज के वे लोग जिन्हें कांशीराम चमचाकहते थे । उनके मुताबिक ये चमचेवे दलित नेता थे जो दलितों के स्वतंत्रता संघर्षमें दलित संगठनों का साथ देने के बजाय पहले कांग्रेस और बाद में भाजपा जैसे बड़े राजनीतिक दलों में मौक़े तलाशते रहे । कांशीराम चमचों से बचाने की सलाह दिया करते थे । ये चमचे जिस थाली में खाते थे उसी में छेद करते थे । किन्तु उनकी नजर में हर विरोध करने वाला व्यक्ति चमचा नहीं था । वह स्पष्ट कहते थे कि कार्यकर्ताओं को चमचा समझने की भूल तो नहीं ही करनी चाहिए ।

            कुछ (नेता) लोग कार्यकर्ताओं को चमचे समझने की भूल कर सकते हैं । यह भयंकर भूल होगी । कार्यकर्ता और चमचा धुर विरोधी होते हैं । कार्यकर्ता अत्यंत लाभकारी होता है, जबकि चमचा गुलाम होता है जो लोग आज्ञाकारी था और गुलाम में भेद नहीं कर सकते । वे कार्यकर्ता को भी चमचा समझने की भूल कर सकते हैं । चमचे का इस्तेमाल उसकी अपनी ही जाति के खिलाफ किया जाता है जबकि कार्यकर्ता का इस्तेमाल उसकी जाति की भलाई के लिए होता है और चमचे का इस्तेमाल उसकी अपनी ही जाति के सच्चे और खाली नेता को कमजोर करने के लिए होता है । जब कार्यकर्ता का इस्तेमाल उसकी जाति और की सच्ची और खरे नेता की मदद के लिए उसके हाथ मजबूत करने के लिए होता है और कार्यकर्ता में अंतर करने के लिए और भी कई तथ्य दिए जा सकते हैं । किंतु यहां हमारी दिलचस्पी केवल इस बात पर जोर देने में है कि एक कार्यकर्ता को समझ चमचा समझने की भूल तो नहीं है । नहीं चाहिए ।

            कांशीराम सिर्फ सत्ता पाने तक समाज या पार्टी को सीमित नहीं रखना नहीं चाहते थे । वह राजनीतिक सत्ता पाने के बाद सामाजिक परिवर्तन को भी उसी रूप में देखना चाहते थे । इन सभी संदर्भों को उनके विचारों के आलोक में देखें तो उनकी दूरदृष्टिता स्पष्ट दिखाई देती है । उनके प्रमुख विचार निम्नवत हैं - 

  • ·   हम सामाजिक न्याय नहीं चाहते हैं, हम सामाजिक परिवर्तन चाहते हैं । सामाजिक न्याय सत्ता में मौजूद व्यक्ति पर निर्भर करता है । मान लीजिए, एक समय में, कोई अच्छा नेता सत्ता में आता है और लोग सामाजिक न्याय प्राप्त करते हैं और खुश होते हैं लेकिन जब एक बुरा नेता सत्ता में आता है तो वह फिर से अन्याय में बदल जाता है । इसलिए, हम संपूर्ण सामाजिक परिवर्तन चाहते हैं ।
  • ·    जब तक हम राजनीति में सफल नहीं होंगे और हमारे हाथों में शक्ति नहीं होगी, तब तक सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन संभव नहीं है । राजनीतिक शक्ति सफलता की कुंजी है ।
  • ·     सत्ता पाने के लिए जन आंदोलन की जरूरत होती है, उस जन आंदोलन को वोटों में परिवर्तित करना, फिर वोटों को सीटों में बदलना, सीटों को सत्ता में परिवर्तित करना और अंतिम रूप से (सत्ता में) केंद्र में परिवर्तित करना । यह हमारे लिए मिशन और लक्ष्य है ।
  • ·     ऊंची जातियां हमसे पूछती हैं कि हम उन्हें पार्टी में शामिल क्यों नहीं करते, लेकिन मैं उनसे कहता हूं कि आप अन्य सभी दलों का नेतृत्व कर रहे हैं । यदि आप हमारी पार्टी में शामिल होंगे तो आप बदलाव को रोकेंगे । मुझे पार्टी में ऊंची जातियों को लेकर डर लगता है । वे यथास्थिति बनाए रखने की कोशिश करते हैं और हमेशा नेतृत्व संभालने की कोशिश करते हैं । यह सिस्टम को बदलने की प्रक्रिया को रोक देगा ।
  • ·     जब तक, जाति है, मैं अपने समुदाय के लाभ के लिए इसका उपयोग करूँगा । यदि आपको कोई समस्या है, तो जाति व्यवस्था को समाप्त करें ।
  • ·     जहाँ ब्राह्मणवाद एक सफलता है, कोई अन्य वादसफल नहीं हो सकता है, हमें मौलिक, संरचनात्मक, सामाजिक परिवर्तनों की आवश्यकता है ।
  • ·     बहुत लंबे समय से हम सिस्टम के दरवाजे खटखटा रहे हैं, न्याय मांग रहे हैं और न्याय नहीं पा रहे हैं, इन हथकड़ियों को तोड़ने का समय आ गया है ।
  • ·     हम तब तक नहीं रुकेंगे जब तक हम व्यवस्था के पीड़ितों को एकजुट नहीं करेंगे और हमारे देश में असमानता की भावना को खत्म नहीं करेंगे ।
  • ·       मैं, गांधी को शंकराचार्य और मनु (मनु स्मृति के) की श्रेणी में रखता हूं जो उन्होंने बड़ी चतुराई से 52% ओबीसी को किनारे रखने में कामयाब रहे ।
  • ·       जिस समुदाय का राजनीतिक व्यवस्था में प्रतिनिधित्व नहीं है, वह समुदाय मर चुका है ।

अपने जीवनकाल में उन्होंने बसपा को काफी सशक्त किया । जब बसपा ने चुनाव लड़ना शुरू कर दिया तो उन्होंने एक नोट, एक वोटनारा देकर नोट और वोट खींचे । धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता बढ़ी और समर्थक उन्हें सिक्कों में तौलने लगे । इस पैसे का इस्तेमाल उन्होंने चुनाव लड़ने के लिए किया । उन्होंने खुद तो कभी राजनीति नहीं की लेकिन उन्होंने हजारों लोगों को राजनीति में आने का मौका दिया । एक बिन्दु और ध्यान देने लायक है कि उनके परिवार में कोई भी सदस्य राजनीति में नहीं थे । न हीं उन्हें राजनीति विरासत में मिली थी । किन्तु अपनी मेहनत, चतुराई और कूट बुद्धि कि वजह से वह राजनीति के बड़े चेहरे बन गए । उनकी नीतियों को कई लोग बेहद महान मानते हैं । बाबा भीमराव अंबेडकर के बाद उन्होंने ही देश के दलितों को सही मायनों में एक करने का सपना सच कर दिखाया । सोशल इंजीनियरिंग का उन्होंने जो फंडा दिया उसका इस्तेमाल करके ही बीएसपी ने पिछले कई सालों तक यूपी में राज किया । उनकी कार्यशैली की वजह से ही एक समय बीएसपी और सपा में गठबंधन हो पाया था लेकिन राजनीतिक षडयंत्र की वजह से यह गठबंधन नहीं चल पाया । इसी चेतना ने दलित समुदाय हेतु समाज में नवीन प्रतीकों को भी स्थापित किया है, आज यह नवीन चेतना दलितों में सामुदायिक भावना, आत्मविश्वास तथा पहचान की शक्ति का संचार करने में सफल हुई है । सामाजिक आंदोलनों व दलित समुदाय में बढ़ती राजनीतिक चेतना तथा व्यापक जनाधार के कारण आज बसपा भारतीय राजनीति का केन्द्र बन चुकी हैं । बसपा व दलित आंदोलन को इस स्तर तक पहुंचाने में कांशीराम एवं मायावती के कार्यों को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता । क्योंकि उन्होंने डा. अम्बेडकर के वैचारिक आंदोलन को जमीन पर क्रियान्वित करने का काम किया ।

कांशीराम का समग्र मूल्यांकन सिर्फ इतने से भी किया जा सकता है कि वे केवल एक व्यक्ति के लिए कुछ नहीं किया । ये व्यक्ति वे ख़ुद थे । घर त्यागने से पहले परिवार के लिए वे एक चिट्ठी छोड़ गए थे । इसमें उन्होंने लिखा था, ‘अब कभी वापस नहीं लौटूंगा । और वे सच में नहीं लौटे । न घर बसाया और न ही कोई संपत्ति बनाई । परिवार के सदस्यों की मृत्यु पर भी वे घर नहीं गए । परिवार के लोग कभी लेने आए तो उन्होंने जाने से इनकार कर दिया । अपनी शपथ पर वह जीवन भर अडिग रहे ।

कांशीराम आजादी के बाद भारतीय दलितों की सबसे बड़ी आवाज बनकर उभरे । उनके न रहने के बाद से ही असमानता मिटाने वाले आंदोलन में कमी सी आई है । कांशीराम का बहुजन आंदोलन बनाम क्रांति- प्रतिक्रांति का दौर भारतीय राजनीति में विशेषतया उत्तर प्रदेश के सामाजिक तथा राजनैतिक परिदृश्य में 1990 का दशक सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन का दशक माना जायेगा क्योंकि इसी दशक में मण्डल आयोग की सिफारिशें लागू हुई और दलित-पिछड़ी जातियों को शासन-प्रशासन में भागीदारी हासिल हुई । इसी दशक में दलित राष्ट्रपति का मुद्दा भारतीय राजनीति में गर्म हुआ और इसी दशक में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का राजनीतिक ध्रुवीकरण अस्तित्व में आया ।

कांशीराम के केंद्र में हमेशा दलित समस्या रही । उनका मानना था कि अति-पिछड़ा वर्ग, गरीब मुसलमान और अन्य गरीब समुदायों को किस तरह से एक मंच पर लाया जाये यही कांशीराम का बहुजनवाद था और इसी की राजनीति कांशीराम कर रहे थे । इस काम में कांशीराम कामयाब भी रहे और अपनी बहुजनवाद की राजनीति के माध्यम से उत्तर प्रदेश की राजनीति को केंद्र में रखते हुये दो बड़े राजनीतिक दलों कांग्रेस और भाजपा को दो दशक से अधिक समय तक यानि 1993 से लेकर 2017 तक हाशिये पर धकेल दिया और इन दो दशकों की राजनीति की धुरी किसी न किसी प्रकार से बने रहे । कभी बसपा-भाजपा की गठबंधन सरकार के रूप में कभी पूर्ण बहुमत की सरकार के रूप में यह सब उनकी अपनी मर्जी के हिसाब से और उनकी शर्तों के आधार पर था ।

- डॉ. अनीश कुमार

सह-संपादक, द पर्सपेक्टिव अंतर्राष्ट्रीय जर्नल (www.tpijssh.com)

सह-संपादक, स्वनिम त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका, हिन्दी विभाग, गुरु घासीदास (केंद्रीय) विश्वविद्यालय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़ 


श्रद्धा या विश्वास किसी से पूंछकर नहीं की जाती !!! - डॉ. अनीश कुमार

             किसी व्यक्ति या मनुष्य का सबसे संवेदनशील पक्ष आस्था या विश्वास होता है । मानवीय संबंध इसी विश्वास या आस्था पर खड़े होते हैं । श्रद्धा रखना मानवीय गुणों में सर्वोच्च प्रवृत्ति होती है । हम श्रद्धा किसी पर भी रख सकते हैं । श्रद्धा होने के लिए जरूरी नहीं कि सामने वाले सजीव हो या निर्जीव । कभी-कभी हमारा सबसे पालतू कोई जानवर या पशु भी हमारे प्रति इतना श्रद्धावान हो जाता है कि वह हमसे परे हो ही नहीं सकता । यही श्रद्धा आगे चलकर आस्था का नाम ले लेती है । हालांकि श्रद्धा, विश्वास, आस्था, वफादारी लगभग पर्याय माने जाते हैं । आस्था मनुष्य का जिसके प्रति रखी जा रही है उसके प्रति कट्टरता का भी भावबोध कराती है । स्वार्थ और श्रद्धा मनुष्य को विरासत में मिली हुई होती है । मनुष्य स्वभावतः किसी न किसी के प्रति आस्थावान होता ही है । मनुष्य की एक आदत और भी है कि उसके साथ यदि किसी ने कुछ अच्छा व्यवहार या अच्छा साथ दिया तो मनुष्य उसके प्रति श्रद्धावान हो जाता है किन्तु वही यदि मनुष्य के प्रति थोड़ी सी भी गलत भावना रख दे तो वह उसका दुश्मन बनते देर नहीं लगाता । आज के समय में धर्म मनुष्य के सबसे निकट है । धर्म मूलतः मनुष्य को एक साथ और एक अच्छे मार्ग पर चलने के लिए निर्मित किया गया था ताकि समाज में एकसूत्रता बनी रहे । प्रत्येक धर्म को संचालित करने वाला कोई ईश्वर जरूर होता है । कहीं कहीं एकेश्वरवाद तो कहीं बहुदेववाद तो कहीं अनीश्वरवादी ईश्वर का स्वरूप दिखाई देता है । धर्म मनुष्य को सांस्कृतिक रूप से एक्य करते हेतु जरूरी भी है बसर्ते मनुष्य से ऊपर धर्म का अस्तित्व न हो । जहां मनुष्य के ऊपर धर्म का प्रभाव बढ़ने लगता है वहीं से कट्टरता पैदा होने लगती है ।

            धर्म मनुष्य को दयालु बनाता है । दुनिया लगभग सभी धर्म मनुष्य को एक अच्छे रास्ते पर ले जाने का ही ज़ोर देते हैं । एक बच्चा जब जन्म लेता है तो वह बिलकुल कोरे कागज की तरह होता है । वह जिस भी धर्म को मनाने वाले घर में पैदा होता है उसी के अनुरूप उसकी ट्रेनिंग बचपन से ही शुरू हो जाती है । कुछ परिवार अपने बच्चे को धार्मिक शिक्षा उतना ही देते हैं जितना कि उसके एक अच्छा मनुष्य बनने में सहायक हो । लेकिन आज के समय में ट्रेंड बदलता जा रहा है । परिवार व समाज कहीं धार्मिक रूप से कट्टर होते जा रहे हैं । कट्टरता का अर्थ यहाँ उस अर्थ से है कि जब हम किसी अच्छे काम प्रयोग दूसरे के ऊपर गलत अर्थ में किया जाये । इसका असर युवा पीढ़ी पर भी दिखाई देने लगा है । आज के समय में ईश्वर के प्रति आस्था सबसे ऊपर हो गई है । धीरे-धीरे मनुष्य आस्था के प्रति इतना कट्टर हो जाता है कि उसके बारे किसी भी प्रकार की गलत खबरें या उसकी आलोचना सुनना पसंद नहीं करता । धीरे-धीरे यही प्रवृत्ति हिंसा का रूप धारण कर लेती है । यह प्रवृत्ति आगे चलकर हमारे समाज के बीच से होकर वैश्विक स्तर पर पहुँच जाता है । जबकि यह भी सत्य है कि प्रकृति प्रदत्त ऐसा कोई भी वस्तु नहीं है जिसकी आलोचना नहीं की जा सकती । ऐसा प्राचीन समय में ब्रूनों जैसे कई उदाहरण हैं जो धार्मिक हिंसा के शिकार हुए किन्तु कालांतर में उनकी कही बात सत्य साबित हुई ।

            भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्षता की वकालत करता है । यही विशेषता भारत को दुनिया से अलग करता है । भारत में सभी धर्मों, संप्रदायों को समान अधिकार व महत्व दिया गया है । बावजूद इसके वर्तमान समय में देखें तो दूसरों के आस्था के साथ खिलवाड़ जमकर हो रहा है । समस्या तब ज्यादा भयावह हो जाती है जब मनुष्य दूसरों की आस्था के साथ खिलवाड़ करना शुरू करता है । इनमें सोशल मीडिया पर प्रसारित खबरें इस प्रकार के मुद्दों में आग में घी डालने का काम करती हैं । बरहाल मीडिया से ये हमेशा यह अपेक्षा की जाती रही है कि वह खबरों को या इन मुद्दों को निष्पक्ष भाव से कहेगा या दिखाएगा किन्तु स्थिति आज इसके उलट दिखाई देती है । ज़्यादातर मीडिया तो कारपोरेट घरानों या रईसों के अधीन काम कर रहे हैं, जो स्वतंत्र रूप से इस पर कार्य भी कर रहे हैं तो उन्हें आस्था के नाम पर डरा-धमकाकर चुप करा दिया जाता है ।

            अंत में एक बात समझने की कोशिश करनी चाहिए कि मनुष्य अपने आस्था या श्रद्धा के साथ इतना वफादार होता है तो दूसरे की आस्था अथवा श्रद्धा को ठेस क्यों पहुंचाता है । कई बार ऐसे पात्रों के प्रति हम श्रद्धा रखते हैं जो वास्तविक रूप में तथ्यरहित होता है । अब जाहिर है कि सभी के लिए वह श्रद्धा कि वस्तु नहीं होगी । कोई न कोई उसकी आलोचना करेगा ही । यहीं से समस्या शुरू होती है जब हम आलोचना को नहीं देखना चाहते जबकि आलोचना एक स्वस्थ विमर्श को जन्म देती है । मिथकीय इतिहास को लेकर ये सब सिर्फ हिंसा को जन्म दे रही हैं । वास्तविकता से इसका कितना संबंध है ये भी बुद्धिजीवी लोग भलीभाँति जानते हैं । कभी-कभी राजनीति भी इसमें मिलकर रोटियाँ सेंक लेती है । सरकारी तंत्र तो इसका पूरा फायदा उठाता ही है । यह हमेशा ध्यान रखने की कोशिश की जानी चाहिए कि हम जिस भी धर्म को मानते हैं या श्रद्धा रखते हैं वह हमारा अपना निजी मामला है । हमें किसी अन्य धर्म या पंथ में गैरज़रूरी हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए । वास्तव में धर्म हमें एक अच्छे रास्ते पर चलने की शिक्षा देता है जब तक कि हम धर्म को निजी तौर पर बिना किसी के नुकसान किए मानते हैं ।

            वास्तव में श्रद्धा दिल से आती है जहां दिमाग की कोई आवश्यकता नहीं वहीं अंधविश्वास में दिल और दिमाग दोनों की ही आवश्यकता नहीं । कई बार श्रद्धा के अनुकूल व्यवहार न करने पर वह अंधश्रद्धा बन जाती है । श्रद्धा बंद आँखों से वहीं अंधविश्वास खुली आँखों से । श्रद्धा आस्था के कारण तो वहीं अंधविश्वास डर के कारण । श्रद्धा मे सर झुकता है और अंधविश्वास में बुद्धि । श्रद्धा मे आप स्वयं ही खुद को सौंप देते हो तो वहीं अंधविश्वास में आपको खुद को सौंपना पड़ता है । श्रद्धा मे आप स्वयं करते हो तो वहीं अंधविश्वास में आपको करना पड़ता है । वास्तव में हम सभी एक शिक्षित और समतावादी समाज निर्माण की कल्पना भी करते हैं और उसे बनाने की कोशिश भी करते हैं । हमें अपना योगदान अवश्य देना चाहिए । किसी के प्रति श्रद्धा रखकर अथवा किसी इष्ट के प्रति श्राद्धवान होकर हम अपनी उपस्थिति बेहतर तरीके से दे सकते हैं ।

- डॉ. अनीश कुमार

सह-संपादक, द पर्सपेक्टिव अंतर्राष्ट्रीय जर्नल (www.tpijssh.com)

सह-संपादक, स्वनिम त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका, हिन्दी विभाग, गुरु घासीदास (केंद्रीय) विश्वविद्यालय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़ 

 

Friday, 8 December 2023

केयर लिस्टेड पत्रिकाएँ : अकादमिक जगत में भ्रष्टाचार की नर्सरी

            भारत में प्रतिवर्ष लाखों पत्रिकाओं/जर्नल्स का सम्पादन होता है । इनमें कुछ मासिक, त्रैमासिक, छमाही व वार्षिक पत्रिकाएँ शामिल हैं । पत्रिकाओं के प्रकाशन के लिए आईएसएसएन नंबर जारी किया जाता है जो कि एक विदेशी संस्था द्वारा जारी किया जाता है । भारत में इसे निस्केयर के द्वारा संचालित किया जाता है । प्रिंट पत्रिका निकालने के लिए भारत सरकार द्वारा जारी आरएनआई नंबर होना अनिवार्य है वहीं ऑनलाइन के लिए सिर्फ आईएसएसएन काफी है । इन्टरनेट के आगमन के बाद वेब पत्रिकाओं की संख्या में बेतहाशा इजाफा हुआ है । पहले कुछ बड़े शहरों से ही अच्छी पत्रिकाएँ व जर्नल्स निकलते थे किन्तु इन्टरनेट ने इसे सुगम कर दिया । अब कोई भी कहीं से भी वेब पत्रिकाओं का सम्पादन कर सकता है । इससे पत्रिकाओं के सम्पादन में लगने वाले खर्चे को भी कम कर दिया । इन्टरनेट पर पहले सिर्फ अँग्रेजी में एक्सेस माजूद था किन्तु यूनिकोड के आने से हिन्दी भाषा की पत्रिकाओं व जर्नल्स भी अधिक मात्रा में निकलने लगीं । एक तरीके से यह भी कहा जा सकता है कि हिन्दी के विकास में नए पंख भी लग गए ।  


            भारत में विश्वविद्यालयों में होने वाले शोध कार्यों पर यूजीसी अपना नियंत्रण रखती है । समय समय पर निर्देश जारी करती रहती है । 2016 के पहले पीएचडी/एमफिल और पीडीएफ़ की थीसिस में शोध-पत्र की अनिवार्यता नहीं थी । इसके बाद यूजीसी ने पीएचडी थीसिस/एमफिल डिजर्टेशन के साथ दो शोध-पत्र और दो सेमिनार पत्र को लगाना अनिवार्य कर दिया है । ये शोध-पत्र किसी रेफर्ड आईएसएसएन नंबर की पत्रिका में छपना अनिवार्य होता था । यूजीसी ने 2018 में यूजीसी एप्रूव्ड लिस्ट नाम से पत्रिकाओं और जरनल्स की सूची जारी की थी । जिसमें यूजीसी का स्पष्ट आदेश था कि अब से विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति व पीएचडी/एमफिल थीसिस में यूजीसी एप्रूव्ड लिस्ट में शामिल पत्रिकाओं/जर्नल्स में ही प्रकाशित शोध पत्र ही सिर्फ मान्य किए जाएंगे । इसके बाद धड़ल्ले से सभी लोगों ने अपनी-अपनी पत्रिकाओं को इस कतार में शामिल करवाना शुरू कर दिया ।

            यूजीसी लिस्टेड पत्रिकाओं की सूची के बाद यूजीसी ने 2019 में यूजीसी ने CARE नाम से नई सूची जारी की है । यूजीसी के अनुसार अब इसमें शामिल पत्रिकाओं/जर्नल्स में ही प्रकाशित शोध-पत्र ही मान्य होंगे । इस समय ज़्यादातर संस्थागत पत्रिकाएँ ही इस लिस्ट में शामिल हैं । व्यक्तिगत पत्रिकाएँ या अन्य गैरसरकारी संस्थाओं द्वारा प्रकाशित पत्रिकाएँ लगभग न के बराबर शामिल हैं । इधर यूजीसी केयर पत्रिका नाम का शिगूफ़ा आने के बाद पत्रिका संपादित करने वालों की तो जैसे पर ही निकल आए । यूजीसी CARE के नाम पर इस समय कुछ पत्रिकाएँ व जर्नल्स शोधार्थियों से 2000 से 3000 रुपये वसूल रहे हैं । अक्सर देखा गया है कि इस लिस्ट में शामिल पत्रिकाओं का स्तर निम्नतर है । शोध जैसा कुछ भी नहीं दिखाई देता है । यूजीसी CARE लिस्ट सिर्फ एक कोटापूर्ति बन कर रह गई है । आए दिन यह भी शिकायतें मिलती हैं कि फला विश्वविद्यालय या महाविद्यालय में शोधार्थियों को यह बाध्य किया जा रहा है कि शोध-पत्र का प्रकाशन यूजीसी लिस्ट में शामिल पत्रिकाओं में करवाए । अब शोधार्थी के पास पैसे देने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है । बहरहाल यहाँ शोधार्थियों कि उदासीनता भी दिखाई देती है । जो अच्छे शोधार्थी होते हैं वह पहले से कुछ अच्छे जर्नल्स व पत्रिकाएँ हैं उनमें प्रकाशित करवा लेते हैं ।

            यूजीसी ने तमाम विरोधों के बावजूद पियर रिव्यूड पत्रिकाओं को भी नियुक्ति और पीएचडी थीसिस के मान्य तो कर दिया है लेकिन अभी कुछ संस्थाएं अपनी मनमानी से बाज नहीं आती । इससे गंभीर शोध प्रभावित हो रहा है । मनमाने तरीके से शोध-पत्रों का प्रकाशन हो रहा है । ऐसी कई यूजीसी एप्रूव्ड और यूजीसी केयर लिस्टेड पत्रिकाएँ देखता रहता हूँ जिनमें एक पेज या दो पेज शोध-पत्र प्रकाशित हुए हैं । कोई कोई जर्नल्स 1000 पेज के एक अंक निकाल दे रहे हैं । कई ऐसे पियर रिव्यूड जर्नल्स है जहां न कोई पब्लिश करने का फार्मेट है न ही कोई पैटर्न । कट-पेस्ट किया हुआ आर्टिकिल भी प्रकाशित किया जा रहा है । यह काम धड़ल्ले से हो रहा है । इस काम ने आज के समय में व्यवसाय का रूप ले लिया है । कोई एक अकादमिक संस्था खोल लीजिये उसके बरक्स कई 100 जर्नल्स शुरू कर दिया । आईएसएसएन नंबर देने वाली संस्था का कार्य भी इतना ढीला है कि लगभग सभी को आईएसएसएन नंबर मिल ही जाता है । सिर्फ दिखावे के लिए उसमें समीक्षक मण्डल, संपादकीय मण्डल को भर दिया जाता है । बाकी सभी काम मालिक का होता है । पैसा दीजिये एक हफ्ते अथवा 10 से 15 दिन में आर्टिकिल प्रकाशित हो जाता है । ज़्यादातर जर्नल्स में प्लेगजिरिज़्म चेक भी नहीं होता है । यह काम ऑनलाइन पत्रिकाओं व जर्नल्स में ज्यादा होता है । वह पैसे लेकर पीछे के अंकों में भी आर्टिकिल प्रकाशित कर देते हैं । यह व्यवसाय आजकल काफी धड़ल्ले से चल रहा है । घर बैठे लोग लाखों रुपये कमा रहे हैं । शोध के नाम पर सिर्फ कट-पेस्ट ही हो रहा है । इस प्रकार के जर्नल्स में प्रकाशित 10 पेज के आर्टिकिल को पढ़ने पर एक पंक्ति भी मौलिक नहीं दिखाई देती । ऐसे में हम गंभीर शोध की उम्मीद भी क्या ही कर सकते हैं । इस पत्र चिंता जताते हुए वरिष्ठ कथाकार डॉ. देवेंद्र कहते हैं कि नौकरियों के लिए केयर लिस्टेड पत्रिकाओं में प्रकाशन की अनिवार्य शर्तो ने रचनात्मकता के नाम पर हिन्दी विभागों को एक विशाल और बदबूदार कूड़ाघर बनाकर रख दिया है । इन केयर लिस्टेड पत्रिकाओं में आज तक एक भी ऐसा लेख नहीं छपा, जिसकी कोई अनुगूंज साहित्यिक गोष्ठियों में सुनाई दी हो ।

            अब आते हैं इम्पैक्ट फैक्टर पर । यूजीसी का निर्देश है कि थॉमसन रियुटर्स द्वारा प्रदान किए गए इम्पैक्ट फैक्टर ही जर्नल्स के लिए मान्य होंगे । लेकिन आजकल यह काम भी बड़े धड़ल्ले से चल पड़ा है । ऐसी कई गैर सरकारी संस्थाएं हैं जो इम्पैक्ट बांटने का काम करती हैं । एक साल के इम्पैक्ट लेने के लिए 5000 से 10000 रुपये तक वसूल रही हैं । इतना पैसा दीजिये मनचाहा इम्पैक्ट फैक्टर पाइये । 10 में से 8 इम्पैक्ट फैक्टर वाले जर्नल की भी कोई गंभीर शोध नहीं दिखाई देता है । 

            हिन्दी के क्षेत्र में इस तरह के गैर जिम्मेदराना तरीके से थोपा गया यह काम हिन्दी के लिए साथ अन्य सभी अनुशासनों के लिए भी नुकसानदायक साबित हो रहा है । हम हिन्दी की बात करें तो हिन्दी भाषा और साहित्य को लेकर ऐसी कई पत्रिकाएँ हैं जिनका अभी तक आईएसएसएन नंबर भी नहीं है किन्तु उनका स्तर काफी अच्छा है । ऐसे ही पत्रिकाएँ हिन्दी साहित्य की गंभीरता को बचाए रखी हैं । लेकिन यूजीसी के इस यूजीसी केयर लिस्ट ने गंभीर पत्रिकाओं के अरमानों पर भी पानी फेरता हुआ दिखाई दे रहा है । हिन्दी में हंस, कथादेश, उद्भावना, प्रतिमान, साखी जैसी पत्रिकाओं के लिए कोई जरूरी नहीं है कि वह यूजीसी लिस्ट में शामिल है या नहीं । उसकी गंभीरता अभी भी बनी हुई है ।

            अभी हाल में यूजीसी ने कोई नोटिस निकाला था कि संभवतः पीएचडी के दौरान दो शोध-पत्रों के प्रकाशन संबंधी अनिवार्यता पर पुनर्विचार हो रहा है । फिलहाल ऐसा होता है तो यह एक अच्छी पहल होगी । अभी भी विश्वविद्यालयों में शोध के क्षेत्र में सुधार व क्रियान्वयन की आवश्यकता है । विशेषकर हिन्दी क्षेत्र में । 

 (नोट- यह आलेख जनसंदेश टाइम्स और सुबह सबेरे अखबार में प्रकाशित हो चुका है । इसे जनपथ वेबसाइट पर भी पढ़ा जा सकता है । लिंक है - )

 


 

Thursday, 25 April 2019

चुनावी विश्लेषण – 1


      इस समय भारत में आम चुनाव हो रहे हैं । इस चुनाव में चुने हुए प्रतिनिधि भारत की तकदीर बदलते हैं । वे भारत की सर्वोच्च विधायिका संसद के सदस्य चुने जाते हैं । भारत को मुख्यतः कृषिप्रधान देश कहा जाता है । और इसे सबसे अधिक युवाओं का देश भी कहा जाता है । भारतीय लोकतन्त्र को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र भी कहा जाता है । एक लोकतान्त्रिक देश में सभी राष्ट्रीय मुद्दे लोकतान्त्रिक होते हैं । शिक्षा, स्वस्थ्य, पर्यावरण, भूमि, समाज, कानून, रक्षा, राष्ट्रवाद आदि प्रमुख मुद्दे हैं जिनपर बात की जानी चाहिए । 2019 का आम चुनाव में चुनावी यात्रा दो खेमों में बंटा हुआ दिख रहा है । यह विभाजन विचारधारा के आधार पर स्वतः हो गया है । एक वर्ग ऐसा है जो संवैधानिक दायरे में रहकर अपनी बात करता है । संविधान उसके लिए सर्वोच्च है । वहीं दूसरा वर्ग ऐसा है जो व्यक्तिकेंद्रित हो गया है । सारे आम संविधान की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं । कानून को तोड़ा जा रहा है लेकिन वह खेमा बिलकुल चुप है । लोकतन्त्र की रक्षा के लिए संविधान का सुरक्षित रहना बहुत जरूरी होता है । भारत जैसे विभिन्नताओं वाले देश में संविधान की महत्ता कितनी है यह बताने की जरूरत नहीं है । भारत का संविधान एक मनुष्य को उसके मनुष्यता की दृष्टि से ही देखता है । वह किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करता है । एक वर्ग संविधान को बचाने की बात कर रहा है तो दूसरा वर्ग उसे बदलने व जलाने का कार्य कर रहा है । एक वर्ग देश के असल मुद्दे शिक्षा, स्वस्थ्य, समाज आदि की बात कर रहा है तो वहीं दूसरा वर्ग देश के गौंड़ मुद्दे जैसे धर्म, मंदिर, सांप्रदायिक राजनीति आदि में उलझाने का प्रयास करा रहा है ।
इस समय चुनाव सिर्फ जीतकर संसद पहुँचने का जरिया मात्र बनकर रह गया है । इसके लिए तरीका चाहे जो भी हो । धनबल, बाहुबल का चारोओर बोलबाला है । यही कारण है कि चुनाव जीतने कि जिद में देश का असली मुद्दा गायब हो गया है । आज का ग्रेजुएट कभी आपको शिक्षा, स्वस्थ्य, समाज, पर्यावरण, कानून, संविधान आदि पर बात करता हुआ नहीं मिलेगा । आम जनता इन मुद्दो से अनभिज्ञ रहती है वह कभी अपने नेता से इन मुद्दों को लेकर सवाल नहीं खड़े करती ।
“घोषणा पत्र नामक अलादीन की चिराग में राजनीतिक पार्टियां परस्पर प्रतिस्पर्धात्मक रवैया अपनाती जा रही हैं । चुनाव के समय में लोकतन्त्र और उसके असली मुद्दे गायब होते जा रहे हैं ।
महिला सुरक्षा के नाम पर लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां चुप ही हैं । जातिगत राजनीति, ध्रुवीकरण कि राजनीति आज की मुख्य राजनीति बन गई है । पिछले 5 वर्षों में बेरोजगारी बेतहासा बढ़ी है लेकिन कभी नौकरियों को लेकर कोई मुद्दा नहीं बनाया जाता ।
पर्यावरण का तो राजनीति से दूर दूर तक कोई नाता ही नहीं है । किसी राजनीतिक पार्टियों के मुख्य मुद्दों में यह शामिल नहीं होता ।
सत्ता से सवाल पूछने पर कार्यकर्ता मारपीट पर उतारू हो जाते हैं । आखिर सत्ता सवालों से इतना क्यूँ डरती है ।
------------ शेष अगले भाग में --- क्रमशः

Thursday, 30 August 2018

अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की सामाजिक स्थिति और मण्डल कमीशन : कल और आज

          दुनिया में आरक्षण (प्रतिनिधित्व) से बढ़कर ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनी, जिसने इतने कम समय में अहिंसक क्रान्ति के ज़रिये समाज के इतने बड़े तबके को गौरवपूर्ण व गरिमापूर्ण जीवन जीने में इससे ज़्यादा लाभ पहुँचाया हो । भारत में ये काम दुबारा मण्डल कमीशन के माध्यम से होने जा रहा था । प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने अनुच्छेद 340 के तहत नए पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की घोषणा की । आयोग की विज्ञप्ति 1 जनवरी, 1979 को जारी की गई, जिसकी रिपोर्ट 31 दिसंबर 1980 को दी जिसे राष्ट्रपति ने अनुमोदित किया । 30 अप्रैल 1982 में इसे सदन के पटल पर रखा गया, जो 10 वर्ष तक फिर ठंडे बस्ते में रहा । वी.पी. सिंह की सरकार ने 7 सितंबर 1990 को सरकारी नौकरियों में पिछड़ों के लिए 27% आरक्षण लागू करने की घोषणा की । सरकार की क़ुर्बानी देकर आने वाली पीढ़ियों की परवाह करने वाले जननेता वी.पी. सिंह जैसी शख़्सियतों के बारे में ही राजनीतिक चिंतक जे. एफ. क्लार्क कहते हैं कि “A politician thinks of the next election. A statesman, of the next generation” अर्थात् एक राजनीतिज्ञ अगले चुनाव के बारे में सोचता है, पर एक दूरदर्शी राजनेता अगली पीढ़ी के बारे में। इस परिभाषा में फिट बैठने वाले बहुत कम राजनेता मिलते हैं । वीपी सिंह ने साबित किया कि यदि दूरदृष्टि, सत्यनिष्ठा व इंटेग्रिटी हो, तो अल्पमत की गठबंधन सरकार भी समाजहित व देशहित में ऐतिहासिक व ज़रूरी फ़ैसले ले सकती है । जो काम उनके पहले के प्रधानमंत्री अपने पाँच साल के कार्यालय में भी नहीं कर पाये, उसे उन्होंने साल भर के अंदर कर दिखाया । इसी संदर्भ में भारत में आजादी के बाद सामाजिक न्याय के प्रणेता बी.एन.मंडल द्वारा राज्यसभा में सन 1969 में दिया गया भाषण याद आता है, ‘जनतंत्र में अगर कोई पार्टी या व्यक्ति यह समझे कि वह ही जब तक शासन में रहेगा, तब तक संसार में उजाला रहेगा, वह गया तो सारे संसार में अंधेरा हो जाएगा, इस ढंग की मनोवृत्ति रखने वाला, चाहे कोई व्यक्ति हो या पार्टी, वह देश को रसातल में पहुंचाएगा। हिंदुस्तान में (सत्ता) से चिपके रहने की एक आदत पड़ गयी है, मनोवृत्ति बन गई है । उसी ने देश के वातावरण को विषाक्त कर दिया है ।

          ओबीसी जातियाँ अपने इतिहास को गर्व करती हैं सिर्फ इसलिए कि उसका इतिहास ऐसे कई विभूतियों के महान कार्यों से भरी पड़ी हैं जो समाज के सर्वस्व न्योछावर कर दिये थे । शुरू से ही अतिपिछड़ा राज्य की श्रेणी में रहा बिहार राज्य के पहले यादव अर्थात ओबीसी मुख्यमंत्री के तौर पर बीपी मण्डल ने शपथ ली थी । उनके शपथ लेने के साथ ही बरौनी रिफायनरी में तेल का रिसाव गंगा में हो गया और उसमें आग लग गयी । इस प्रकरण को मुद्दा बनाकर बिहार विधानसभा में पंडित बिनोदानंद झा ने कहा कि शुद्र मुख्यमंत्री बना है तो गंगा में आग ही लगेगी । ये प्रकरण उस समय में काफी चर्चित था । सवर्ण तबका इसको ज़ोरशोर से मुद्दा बना दिया था ।

          भारत जैसे विशाल देश को आजादी मिलने के बाद समाज में व्यापक बदलाव की संभावनाओं के रूप में देखा जा रहा था । भारतीय समाज और राजनीति लगभग दोनों ही देश को बांटने में लगे हुए थे लिहाजा समाज को जाति, धर्म अथवा राजनीतिक बाहुबल को कम नहीं किया जा सका । इसका खामियाजा आज भी भारतीय समाज भुगतने को अभिशप्त है । आजादी मिलने के कुछ वर्षों बाद भारत में जनसंख्या के हिंसाब से भागीदारी सुनिश्चित करने की माग पुनः उठने लगी थी । इसके पीछे कारण यह था आजादी के बाद भारत की सम्पूर्ण सत्ता भारतीय नेताओं व समाज सुधारकों के हाथ में आ गई थी किन्तु उसके बाद भी समाज के सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व नहीं हो पा रहा था ।

          भारत को मुख्यतया कृषि प्रधान देश के रूप में जाना जाता है । लेकिन इसके पीछे यह कभी नहीं जानने की कोशिश की गई कि ये मुख्यतः कृषि पर आश्रित लोग किस समुदाय अथवा समाज से आते हैं । निश्चय ही ये लोग निचले तबके से आते हैं । वास्तव में भारत जाति-प्रधान और विभिन्न समुदायों और संप्रदायों में विभाजित एक गणतन्त्र है । यहाँ जाति सबसे अहम है । जो जिस जाति में पैदा हुआ वह उसी का होकर रह जाता है । डॉ. अंबेडकर इस संदर्भ में कहते हैं कि हिन्दू धर्म में जातियों की जड़े इतनी मजबूत हैं कि जो जिस जाति में एक बार पैदा हो गया वह उसी जाति में मरेगा चाहे वह कितना भी अच्छा कार्य क्यों न कर ले । यह एक ऐसा बहुमंजिला भवन है जिसमें एक तल से दूसरे तल तक जाने के लिए सीढ़ी ही नहीं है । इसमें जाति के आधार पर भारत का वर्गीकरण करें तो ओबीसी अर्थात अन्य पिछड़ा वर्ग में सम्मिलित जातियाँ सबसे ज्यादा हैं ।

          भारतीय समाज और राजनीति को मुख्यतया दो भागों में विभाजित करके इसके स्थितियों का अध्ययन किया जा सकता है । पहला मण्डल कमीशन के पहले का भारतदूसरा मण्डल कमीशन के बाद का भारत। इन दोनों कालखण्डों को ध्यान में रखकर भारतीय समाज और राजनीति में आए बदलाओं का अध्ययन करने पर हमें भारत की असली तस्वीर दिखाई देती है । यह आश्चर्यजनक है कि मण्डल कमीशन को बहुत कम लोगों ने पढ़ा व समझा है । इसका मुख्य कारण यह है कि इसका प्रचार-प्रसार करना भी सरकार ने उचित नहीं समझा लिहाजा यह फाइलों और दफ्तरों तक सिमटकर रह गई । इसका सबसे कारण इसके अनुवाद को लेकर थी । यह मुख्यतया अँग्रेजी में था जिसका अनुवाद अभी तक नहीं हुआ था ।

          संविधान लागू होने के समय भारत कि ओबीसी जातियों को कोई आरक्षण नहीं दिया गया । (यहाँ आरक्षण का तात्पर्य प्रतिनिधित्वसे है । कुछ लोग आरक्षण शब्द की गलत व्याख्या करके उसका समाज के बीच भ्रम पैदा करते हैं ।) आजादी के बाद भी सत्ता सिर्फ सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक रूप से सशक्त समुदाय के पास रही । दलितों व पिछड़े वर्गों की स्थिति में कोई सुधार नहीं दिख रही थी । अपना दल के संस्थापक का एक कथन है अभी सिर्फ अंग्रेजों से आजादी मिली है । समान भागीदारी और स्वाभिमान के लिए कमेरा समाज दूसरी आजादी कि जंग के लिए मैदान में आए । उठो शोषितों, उठो कमेरों । राजसत्ता पर कब्जा करो ।

          आजादी के समय ज्यादातर ज़मीनें जमींदारों के पास थी और ज्यादातर जमींदार उंची जाति से थे । जिसके पास धन होता है, वो आसानी से आगे बढ़ जाता है । ऐसा ही हो रहा था । दलित समुदाय के लोग पिछड़ रहे थे । भारत में जमींदारी प्रथा भी एक बहुत बड़ी समस्या के रूप में सामने आई है । इससे समाज के बीच में असमानता की खाईं को बढ़ाने का काम किया है । भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 29 जनवरी, 1953 को काका कालेलकर की अध्यक्षता में पिछड़ा वर्ग आयोगका गठन किया । उनकी अगुवाई में लगभग दो साल के बाद आयोग ने 30 मार्च, 1955 को अपनी रिपोर्ट भारत सरकार को सौंपी । इस रिपोर्ट का कुछ खास असर नहीं हुआ । क्योंकि तत्कालीन नेहरू सरकार ने इस रिपोर्ट पर संसद में चर्चा करने से ही मना कर दिया और इसे खारिच कर दिया । काका कालेलकर आयोग ने अपने सिफ़ारिशों में उन सभी पक्षों को नहीं ला पाई जो तत्कालीन समय और भविष्य में एक समतामूलक समाज निर्माण के लिए आवश्यक था ।

          इन सभी कमी को पूरा करने के लिए तत्कालीन मोरार जी देसाई सरकार ने अपने ओबीसी सांसद बिंदेश्वरी प्रसाद मण्डल (बी.पी.मण्डल) की अगुवाई में मण्डल आयोग का गठन किया । मण्डल आयोग ने अपने सदस्यों के साथ ओबीसी जातियों को चिन्हित करने के लिए पूरे देश का दौरा आरंभ किया । लेकिन बड़ी बिडम्बना यह रही की मण्डल कमीशन तब पूर्ण हुई जब मोरार जी देसाई सरकार गिर चुकी थी । 

मंडल आयोग की कुछ सिफ़ारिशें :

          मंडल आयोग के रिपोर्ट में पिछडे़ वर्गों के लोगों के लिए सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की बात की गई । भारत में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को पहले से 22.5 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा था । इसी कारण तत्कालीन इंदिरा गांधी की सरकार इस सिफारिश को लागू करने से बचती रही । मंडल आयोग की सिफारिश को लागू करने का मतलब था 49.5 प्रतिशत सीटें आरक्षित कर देना । लेकिन इंदिरा गांधी सरकार इसे लागू नहीं कर सकी ।

          सरकारी नौकरियों में आरक्षण के अलावा मंडल आयोग की अन्य सिफारिश भी थी । जो मण्डल कमीशन की प्रमुख सिफ़ारिशों में शामिल थी । मुख्य सिफ़ारिश कुछ निम्न हैं -

·       जमींदारी प्रथा को खत्म  करने के लिए भूमि सुधार कानून लागू किया जाये क्योंकि पिछड़े वर्गों का सबसे बड़ा दुश्मन जमींदारी प्रथा थी ।

·       सरकार द्वारा अनुबंधित जमीन को न केवल ST/ST को दिया जाये बल्कि OBC को भी इसमें शामिल किया जाये ।

·       केंद्र और राज्य सरकारों में ओबीसी के हितों की सुरक्षा के लिए अलग मंत्रालय/विभाग बनाये जाये ।

·       केंद्र और राज्य सरकारों के अधीन चलने वाली वैज्ञानिक, तकनीकी तथा प्रोफेशनल शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए ओबीसी वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए 27% आरक्षण लागू किया जाये । जैसे अनुसूचित जाति और जनजातियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में 22.5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है ।

·       समाज की मुख्य धारा से पीछे छूट गई आबादी के सांस्कृतिक उन्नयन के लिए पिछड़े वर्गों की सघन आबादी वाले इलाकों में शिक्षा की विशेष व्यवस्था होनी चाहिए । इसमें व्यावसायिक शिक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए । तकनीकी और व्यावसायिक संस्थानों में आरक्षण कोटे से आए छात्रों के लिए कोचिंग की विशेष व्यवस्था की जाए । ओबीसी की आबादी वाले क्षेत्रों में वयस्क शिक्षा केंद्र तथा पिछड़ें वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए आवासीय विद्यालय खोले जाए वहीं ओबीसी छात्रों को रोजगारपरक शिक्षा दी जाये ।

·       ग्रामीण कामगारों के कौशल को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजना चला कर उन्हें रियायती दरों पर ऋण मुहैया कराना ज़रूरी है । औद्योगिक और व्यावसायिक कारोबार में पिछड़े वर्गों की भागीदारी बढ़ाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा वित्तीय और तकनीकी संस्थानों का नेटवर्क विकसित किया जाए ।

·       आयोग ने कहा कि समाज का पिछड़ा तबका गुजर बसर करने के लिए धनी किसानों के ऊपर निर्भर है क्योंकि इस वर्ग के पास खेती के लिए बड़े भूखंड नहीं है । इसलिए देश भर में क्राँतिकारी भूमि सुधार लागू करने की ज़रूरत है ।

·       पिछड़े वर्गों के लिए कल्याणकारी कार्यक्रम चलाने के वास्ते राज्यों को केंद्रीय सहायता की ज़रूरत है ।

          भारतीय समाज को दिशा देने कार्य आजादी के पहले डॉ. बी.आर.अंबेडकर द्वारा किया गया था वहीं आजादी के बाद ये दूसरा महत्वपूर्ण कार्य बी.पी. मण्डल के द्वारा होने जा रहा था । इसी के साथ मान्यवर कांशीराम के नेतृत्व में बहुजन आंदोलन भी जोर पकड़ रहा था । उस समय एक नारा भी अपने चरम पर था ब्राह्मणवाद का फूटा कमंडल, जय भीम मण्डल जय भीम मण्डल। ये नारा ओबीसी और दलितों को एक साथ आने को प्रेरित कर रहा था । लम्बे समय तक पिछड़ों का क़ानूनी अधिकार समाजवादियों के नारों में सोशलिस्ट पार्टी बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठगूंजता रहा । ये वो दौर था जब मण्डल कमीशन अपने सिफ़ारिशों को सरकार को सौंप दिया था । लेकिन सरकार ने इसे लागू करने में हिला-हवाली कर रही था । इसके रिपोर्ट को सौंपे जाने के साथ समर्थन और विरोध दोनों में आंदोलन शुरू हो गए थे । बी.पी.मण्डल अपने गहन अध्ययन व पड़ताल के द्वारा ओबीसी जतियों की असली समस्याओं को पता लगाकर उसे अपने सिफ़ारिशों में शामिल किया । मण्डल कमीशन की मुख्य सफारिशों को करने में ही सरकार के पसीने छूट रहे थे ।

          मंडल आयोग ने पिछड़ी जातियों, वर्गों के निर्धारण के लिए सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक मानकों के आधार पर 11 सूचकांक तय किए थे -

सामाजिक स्थिति :

·       वैसी जाति या वर्ग जिन्हें अन्य जाति या वर्गों द्वारा सामाजिक रूप से पिछड़ा समझा जाता है ।

·       वैसी जाति या वर्ग जो आजीविका के लिए मुख्य रूप से शारीरिक श्रम पर निर्भर है ।

·       वैसी जातियाँ या तबका जिनमें 17 साल से कम आयु की महिलाओं का विवाह दर ग्रामीण इलाकों में राज्य औसत से 25 प्रतिशत और शहरी इलाकों में दस प्रतिशत अधिक है और इसी आयु वर्ग में पुरुषों का विवाह दर ग्रामीण इलाकों में दस प्रतिशत और शहरी क्षेत्र में पाँच प्रतिशत ज्यादा है ।

शैक्षिक आधार :

·       वैसी जातियाँ या वर्ग जिनमें पाँच से 15 साल की आयु वर्ग में स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की संख्या राज्य औसत से कम से कम 25 प्रतिशत अधिक हो ।

·       इसी आयु वर्ग में जिन जातियों या वर्गों के बच्चों के स्कूल छोड़ने का प्रतिशत राज्य औसत से कम से कम 25 प्रतिशत है ।

·       वैसी जातियाँ, वर्गों जिनमें मैट्रिक परीक्षा पास करने वाले छात्र-छात्राओं का प्रतिशत राज्य औसत से 25 प्रतिशत कम है ।

आर्थिक आधार :

·       वैसी जातियाँ, वर्गों जिनमें औसत पारिवारिक संपत्ति मूल्य राज्य औसत से 25 प्रतिशत कम है ।

·       ऐसी जातियाँ, वर्ग जिनमें कच्चे घरों में रहने वालों की संख्या राज्य औसत से कम से कम 25 प्रतिशत कम है ।

·       ऐसे इलाकों में रह रही जातियाँ, वर्ग जिनमें 50 फीसदी परिवारों को पेयजल के लिए आधा किलोमीटर से दूर जाना पड़ता है ।

          आज की स्थिति थोड़ा और दयनीय है । आजादी के बाद समाज निर्माण की सबसे बड़ी पहल में शामिल मण्डल कमीशन राजनीतिक दावपेंच में फंस कर रह गई है । जिसकी संख्या सबसे ज्यादा है वही आज हाशिये पर जीने को अभिशप्त है । मण्डल कमीशन के आने के बाद कई ओबीसी नेताओं का उदय हुआ जिनमें कुछ तो अपने मिशन के प्रति सफल भी हुए वहीं कुछ सत्ता के हाथों बिक गए । नतीजा ये है कि आज तक मण्डल कमीशन कि सिर्फ तीन सिफ़ारिशें ही लागू हो पाई है । बाकी अमल में नहीं पाया । वर्तमान में मोदी सरकार जो अपने को पिछड़ी जाति कि बताते हैं वही आज इसके गला घोटने के प्रयास में लगे हुए हैं ।

          वास्तव में मंडल कमीशन कि सिर्फ कुछ ही सफारिशों के लागू होने से ही सौ प्रतिशत भारत जाग गया । उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह के बाद कोई भी अगड़ी जाती का व्यक्ति मुख्यमंत्री नहीं बना । राष्ट्रीय स्तर पर उमा भारती जैसे सरीखे नेता भाजपा में उभरकर आए । सन 1990 से आज तक बिहार में भी कोई भी अगड़ी जाती का व्यक्ति मुख्यमंत्री नहीं बना । मध्यप्रदेश, राजस्थान में भी क्रमशः शिवराज सिंह चौहान और अशोक सिंह गहलोत सत्ता में आए ।

          वास्तविक स्थिति इससे इतर थी । ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण देने के साथ ही उसमें क्रीमीलेयर लगाकर उसे दो भागों में बाँट दिया गया । क्रीमीलेयर ओबीसी के ऊपर आरक्षण को जिंदा लाश बना देने के समान था । ये बात सौ प्रतिशत सत्य है कि मंडल कमीशन के बाद भारत की राजनीती में एक टर्निंग पॉइंट आया । जिससे राजनीति और समाज की दशा तथा दिशा दोनों ही बदल गई । आरक्षण की मांग कर रहे हैं वो लोग और जो नहीं कर रहे हैं वो लोग, जिन्हें ये समझना चाहिए कि जब तक इस देश में कास्ट सिस्टम की लड़ाई चल रही है तब ऐसा मामला तूल पकड़ता रहेगा। शायद कास्ट सिस्टम ख़त्म हो जाये तो इस देश में जाति अंतर का भाव ख़त्म हो जायेगा ।

          आज स्थिति और मण्डल कमीशन कि सिफ़ारिशों को देखते हुए सरकार उसे पुनः लागू करने की नाकाम कोशिश में लगी हुई है । अन्य पिछड़ी जातियों को मंडल कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर दो दशक पहले सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण दिया गया । हालांकि हाल ही में आरटीआई के जरिए केन्द्र से जानकारी मिली कि 1 जनवरी 2015 तक केन्द्रीय कर्मचारियों में महज 12 फीसदी लोग अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) से आते हैं । आंकड़ों के मुताबिक केन्द्र सरकार ने ग्रुप ए, बी, सी और डी श्रेणी में कुल मिलाकर 79,483 पद हैं और इनमें महज 9,040 कर्मचारी अन्य पिछड़ी जातियों से आते है । वहीं केन्द्र सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग के आंकड़ों के मुताबिक इसके मंत्रालय में 12.91 फीसदी अनुसूचित जाति, 4 फीसदी जनजाति और 6.7 फीसदी ओबीसी कर्मचारी हैं जिन्हें मंडल के तहत आरक्षण का लाभ मिला है । मंत्रालय में कुल कर्मचारियों की संख्या 6,879 है ।

          मण्डल कमीशन की सिफ़ारिशें राष्ट्र निर्माण की एक महत्वाकांछी सपनों के समान थी । जिसमें भारत सम्पूर्ण तस्वीर बदलने की शक्ति थी । यदि प्रारम्भ में ही पूरी सिफ़ारिशों को लागू कर दिया गया होता आज भारत की तस्वीर इतनी भयावह नहीं होती । सामाजिक व राजनीतिक रूप से सशक्त समाज ही एक नए और दृढ़ राष्ट्र का निर्माण करता है । सत्ता में स्थापित सरकारें अपने निजी स्वार्थ के लिए मण्डल कमीशन का वोट बैंक मजबूत करने के लिए भी प्रयोग करती रही हैं और सफल भी हो रही हैं । एक तरफ आरक्षण का विरोध वही दूसरी तरफ उन्हीं ओबीसी जातियों को हिन्दू के नाम पर छद्म रूप से संगठित करने की कोशिश भारतीय समाज में असमानता की खाईं को और मजबूत कर रहा है ।

          ओबीसी जातियाँ अपने आज अपने अस्तित्व को भूलने लगी हैं । मण्डल कमीशन उनमें ये अलख जगाने का कार्य कर रहा था । मण्डल कमीशन को पढ़ते समय मान्यवर कांशीराम जी के योगदान को कुछ लोग भुला देते हैं । जिस समय सिफ़ारिशें लागू हो रही थी उस समय मान्यवर कांशीराम पूरे ज़ोर-शोर से मण्डल कमीशन को लागू करवाने में अपनी पूरी ताकत लगा दी थी । जगह जगह संगोष्ठियाँ करके मण्डल कमीशन के बारें में लोगों को जागरूक कर रहे थे ।

          तामिलनाडू के आरटीआई कार्यकर्ता मुरलीधरन जी ने केंद्र सरकार के लगभग सभी विभागों से जानकारी मांगी थी और वह जानकारी 27 दिसंबर 2015 को टाइम्स ऑफ इंडियाने पहले पन्ने पर छापी । इस जानकारी के अनुसार मंडल आयोग की अनुशंसायें लागू होने के बाद के 25 वर्षों में ओबीसी के हिस्से में मात्र 12 प्रतिशत नौकरियां आई हैं । यानी जिस ओबीसी की जनसंख्या 52 प्रतिशत से भी अधिक है, उन्हें सिर्फ 27 प्रतिशत आरक्षण और उसमें से भी उसे सिर्फ 12 प्रतिशत ही प्राप्त होने देना साजिश ही तो है । कालांतर में यह स्थिति और भवायव ही होती जा रही है । नौकरियों व अन्य क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व धीरे-धीरे लगभग समाप्त हो रहा है ।

          बी.पी. मंडल ने सामाजिक न्याय के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है वह पिछड़े समाज के आखिरी पायदान पर रहने वाले व्यक्ति के बारे में सोचते थे । बी.पी. मंडल की देन है कि आज पिछड़ा और दलित को सामाजिक न्याय मिल पाया है । पिछड़े वर्ग के मामले में आज डॉ. भीमराव अंबेडकर कहीं पीछे रह गए हैं, जिन्होंने पिछड़ों की समृद्धि का सपना तो देखा था, लेकिन इस रूप में नहीं जैसा आज है । यह बी.पी. मण्डल की देन है । अतिपिछड़े अपने उन साथियों की ज़्यादतियों का शिकार हैं जो सिर्फ नाम के पिछड़े रह गए हैं । सामाजिक और आर्थिक रूप से वे अगड़ी जातियों से कहीं आगे हैं ।

           मण्डल कमीशन के लागू होने के बाद ओबीसी की सामाजिक व राजनीतिक स्थितियों में कमोबेश सुधार हुआ । आर्थिक क्षेत्र में यह समाज सशक्त होने लगा । जमींदारी प्रथा को हटाकर चकबंदी का कानून लाये जाने से निचले तबके ऐसे वर्गों का फायदा हुआ जो पूर्णतः भूमिहीन थे । विगत कुछ वर्षों से ओबीसी समुदाय अपने हक और अधिकार के लिए लड़ाई तेज कर दी है । जगह जगह जनसभाएं करके मण्डल कमीशन की पूरी रिपोर्ट को लागू करवाने पर भारत सरकार पर दबाव कर रही है । वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र पी एस ने मण्डल कमीशन की पूरी रिपोर्ट का हिन्दी अनुवाद मण्डल कमीशन : राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी पहलशीर्षक से करके सामाजिक न्याय के क्षेत्र में क्रांतिकारी काम किया है । इसे अब हिन्दी में आसानी से पढ़ा जा सकता है । धीरे-धीरे ओबीसी समुदाय अपने अधिकारों को समझ रही है । बी.पी. मण्डल के योगदान को अब भुलाया नहीं जा सकता । इनके नाम पर सामाजिक न्याय दिवस घोषित करके सरकारी छुट्टी की भी मांग चल पड़ी है ।                     । । ।  जय मण्डल, जय भीम, जय कांशीराम, जय भारत   । । ।