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Friday, 29 March 2024

बहन मायावती : सियासत और सशक्तिकरण की महानायिका - डॉ. अनीश कुमार

 

भारतीय राजनीति में सफल महिलाओं की संख्या गिनी-चुनी ही हैं। उनमें से एक नाम सुश्री मायावती का आता है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री के तौर पर नेतृत्व करना महिला सशक्तिकरण का सबसे बड़ा उदाहरण है। जिस उम्र में महिलाएं अपना जीवन ठीक से नहीं चला पाती हैं उस उम्र में मायावती सबसे बड़े राज्य का प्रतिनिधित्व कर रही थी। भारत में जाति व्यवस्था के दुष्चक्र से बाहर आ पाना पत्थर पर सर मारने जैसा है। मायावती एक दलित समुदाय से आती हैं ऐसे में वह जातीय संघर्ष करते हुए अपना रास्ता स्वयं बनाती हैं। उनके शासनकाल में उत्तरप्रदेश में दलितों व महिलाओं की स्थिति में अभूतपूर्व बदलाव दिखाई देता था। वह अपने छोटे-बड़े कार्यकाल को मिलाकर कुल चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रही हैं।


देश की सियासत में कई बार किंगमेकर की भूमिका निभाने वाली मायावती एक सशक्त महिला की मिसाल हैं। एक ऐसी नेत्री, जिसे कभी देश के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने लोकतंत्र का चमत्कार (miracle of Democracy)’ कहा था। जिसने सियासी रूप से देश के सबसे ताकतवर सूबे उत्तर प्रदेश की सियासत के तमाम स्थापित समीकरणों को ध्वस्त करके रख दिया था जिसके बाद देश की राजनीति में दलित चेतना के नए युग का सूत्रपात हुआ। मायावती पहली दलित महिला हैं, जो भारत के किसी राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। 1995 में गठबंधन की सरकार बनाते हुए मायावती मुख्यमंत्री बनीं थी, उस समय तक मायावती राज्य की सबसे कम उम्र की मुख्यमंत्री बनी थीं। मायावती ने अपना पहला चुनाव साल 1984 में उत्तर प्रदेश में कैराना लोकसभा सीट से लड़ा था। इसके बाद दूसरी बार साल 1985 में उन्होंने बिजनौर और फिर 1987 में हरिद्वार से चुनाव लड़ा। साल 1989 में मायावती को बिजनौर से जीत हासिल हुई। मायावती पहली बार साल 1994 में राज्यसभा सांसद बनीं। उन्होंने अपने जीवन में उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में ऐसे कार्य किये, जिसके कारण उनके फॉलोवर उन्हें आयरन लेडीके नाम से बुलाते हैं।

इन सबके बावजूद भारतीय राजनीति में महिला सशक्तिकरण के तौर पर मायावती का नाम बहुत कम लिया जाता है। मायावती को सिर्फ इस रूप में ही नहीं देखना चाहिए कि वह एक महिला मुख्यमंत्री थी। अथवा कई बार कि राज्यसभा सदस्य रही थीं। मायावती उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं जो अपने पैरों पर खड़े होने कि जद्दोजहद में लगी हैं। मायावती का जन्म एक बेहद सामान्य से दलित (उपजाति जाटव चमार) परिवार में हुआ था। उनके पिता पोस्ट ऑफिस में कर्मचारी थे और माताजी गृहणी थीं। ऐसे सामान्य से घर से निकलकर मुख्यमंत्री बनना एक ऐतिहासिक कार्य था। अपने जीवनकाल में मायावती को अनेकों जातिगत भेदभावों व अन्य प्रकार कि सामाजिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। अपने मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होने उत्तर प्रदेश में दलितों व महिलाओं के सशक्तिकरण के अनेकों कार्य किए। कई जगह बालिका विद्यालय व अनेकों योजनाएं चलाकर महिलाओं को सशक्त बनाने का कार्य किया।

मायावती की एक खासियत यह भी है कि इन्होंने मान्यवर कांशीराम के सानिध्य और मार्गदर्शन में राजनीति में अपनी पहचान स्वयं बनाई। इनका पारिवारिक पृष्ठभूमि पूरी तरह से गैर राजनीतिक था। पिताजी का सपना था कि बेटी एक आईएएस ऑफिसर या वकील बनकर देश की सेवा करे। लेकिन मायावती कि दृढ़ इच्छा, स्पष्ट वाक्पटुता और मान्यवर कांशीराम के मार्गदर्शन में वो राजनीति की ओर आईं। इस बारे में मायावती ने कहा था मैंने राजनीति में आने का जो फ़ैसला किया तो मुझे दूसरे नेताओं की तरह राजनीति विरासत में नहीं मिली। हमारे परिवार में कोई राजनीति में नहीं है, दूर-दूर तक हमारे रिश्ते नातों में भी कोई राजनीति में नहीं है।लेकिन बिना राजनीतिक विरासत के भी मायावती ने देश की सियासत खलबली मचा दी।

बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम इनकी भाषण कला से इतने प्रभावित हुए थे कि इन्हें राजनीति में आने की सलाह दे डाली। मायावती और कांशीराम के के रिश्ते बेहद विनम्र थे। कांशीराम ने उनके प्रथम भाषण को सुनकर ही उनके राजनीतिक जीवन की भविष्यवाणी कर दी थी। दरअसल इस मुलाक़ात से एक दिन पहले मायावती दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में भाषण दे रही थींमायावती ने मंच से ही कांग्रेसी नेता राजनारायण को दलितों को बार-बार हरिजनकहने पर बुरी तरह लताड़ा था। एक 21 साल की लड़की का ऐसा रुख़ देखकर ही मान्यवर कांशीराम साहब मायावती से इतने प्रभावित हो गए थे कि सीधे उनके घर जाकर उनसे अपने साथ साथ काम करने का अनुरोध किया।

उन दोनों के संबंधों का ज़िक्र पत्रकार नेहा दीक्षित ने कारवांपत्रिका में मायावती पर छपे अपने लेख में किया है। दीक्षित लिखती हैं, “जब कांशीराम अपने हुमायूं रोड वाले घर में आए तो मायावती को वहां रहने के लिए कोई कमरा नहीं दिया गया। जब कांशीराम भारतीय राजनीति के दिग्गजों से अपने ड्राइंग रूम में बैठ कर मंत्रणा कर रहे होते थे, तो मायावती घर के पिछवाड़े के आंगन में दरी पर बैठ कर ग्रामीण इलाकों से आने वाले कार्यकर्ताओं के साथ बात कर रही होती थीं। कांशीराम अपने घर के फ़्रिज को लॉककर चाबी अपने पास रखते थे। उन्होंने मायावती और अपने दूसरे सहयोगियों को निर्देश दे रखे थे कि फ़्रिज से उन लोगों को ही कोल्ड ड्रिंक सर्वकिया जाए जिनसे वो अपने ड्राइंग रूम में मिलते हैं।मायावती और कांशीराम साहब के रिश्ते को लेकर भी सवाल उठते रहे। अक्सर उनके चरित्र पर भी दाग़ लगाने की कोशिश की गई। लेकिन इससे मायावती विचलित नहीं हुईं। एक इंटरव्यू में मायावती ने इस बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में कहा था जब कोई त्याग करके आगे बढ़ता है तो विरोधियों के पास एक ही मुद्दा होता है, कैरेक्टर को लेकर बदनाम करना। मान्यवर कांशीराम जी को मैं अपना गुरु मानती हूँ और वो मुझे अपना शिष्य मानते हैं।

आज के समय में महिलाओं को मायावती को अपने आइकन के तौर देखने की जरूरत है। मायावती ने अपने शासनकाल में उन तमाम दलित, बहुजन नायकों की तस्वीरों व मूर्तियों को स्थापित किया जो नेपथ्य से पीछे थे या गुमशुदा थे। उन्होंने बहुजन राजनीति की नई इबारत लिखी। पूरे उत्तर प्रदेश में बहुजन नायकों को दुबारा स्थापित करने का श्रेय मायावती को ही जाता है। वैसे तो बहुजन राजनीति में पुरे देश में मायावती के नाम के बिना अधूरा है लेकिन बात उत्तरप्रदेश की राजनीति की करें तो वो मायावती के जिक्र के बिना पूरी हो ही नहीं सकती है। उस समय मायावती को यूपी में दलितों के लिए आइकन के रूप देखते थे जो आज भी बरकरार है।

भारत में आरक्षण एक ऐसी प्रणाली है जिसके तहत विश्वविद्यालयों में सरकारी पदों और सीटों का एक प्रतिशत पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जाति और जनजाति के व्यक्तियों के लिए आरक्षित है। अपने राजनीतिक जीवन के दौरान, मायावती ने पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में आरक्षण का समर्थन किया, जिसमें कोटा और धार्मिक अल्पसंख्यकों और आर्थिक रूप से कमजोर उच्च जातियों जैसे समुदायों को शामिल किया गया। अगस्त 2012 में एक बिल को मंजूरी दी गई थी जो संविधान में संशोधन की प्रक्रिया शुरू करती है ताकि राज्य की नौकरियों में पदोन्नति के लिए आरक्षण प्रणाली का विस्तार किया जा सके। जाति के दंश को इस रूप में भी समझा सकता है कि आप बहुत अच्छे हैं, कोई कमी नहीं है आपमें। जाति पता चलते ही आप बुरे हो जाते हैं। आप कामचोर हो जाते हैं, आपकी सारी मेरिटख़त्म हो जाती है और आप आरक्षण का फ़ायदा लेकर हर जगह घुसपैठ करने वाले बन जाते हैं। मायावती ने इन सबको धता बताते हुए अपनी पहचान स्वयं बनाई। मायावती के करियर को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव द्वारा लोकतंत्र का चमत्कारकहा गया है। लाखों दलित समर्थक उन्हें एक आइकन के रूप में देखते हैं और उन्हें बहन जीके रूप में संदर्भित करते हैं।50 बहुजन नायक पुस्तक खरीदें

मायावती स्वयं डॉ. भीमराव अंबेडकर को अपना आदर्श मानती हैं। उन्होंने एकबार अपने पिता से पूछ लिया था कि क्या मैं भी बाबा साहब की तरह काम करूँ तो मेरी भी पुण्यतिथि उनकी तरह मनाई जाएगी। यह सुनकर उनके पिता हतप्रभ रह गए थे। गौरतलब है कि उनके पिताजी ने बाबा साहब कि जीवनी मायावती को पढ़ने के लिए दिया था। यहीं से मायावती बाबा साहब को अपना आदर्श मनाने लगी थी। राजनीति में आने के बाद उनके पिताजी ने उनसे दूरियाँ बना ली थी। मायावती ने आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लिया था ताकि वह बहुजन समाज की सेवा कर सकें।

मायावती को अपने जीवनकाल में यहाँ तक की सांसद बन जाने के बाद भी जातीय भेदभाव सहने पड़े। अजय बोस बहनजी : अ पॉलिटिकल बायोग्राफ़ी ऑफ़ मायावतीमें लिखते हैं, “जब मायावती पहली बार लोकसभा में चुन कर आईं तो उनके तेल लगे बाल और देहाती लिबास तथाकथित सभ्रांत महिला सांसदों के लिए मज़े की चीज़ हुआ करते थे। वो अक्सर शिकायत करती थीं कि मायावती को बहुत पसीना आता है। उनमें से एक ने एक वरिष्ठ महिला सांसद से यहां तक कहा था कि वो मायावती से कहें कि वो अच्छा परफ़्यूमलगा कर सदन में आया करें।सफाई को लेकर उनका व्यवहार धीरे-धीरे बदल गया। मायावती के नज़दीकी लोगों के अनुसार बार-बार उनकी जाति का उल्लेख और उनको ये आभास दिलाने की कोशिश कि दलित अक्सर गंदे होते हैं, का उन पर दीर्घकालीन असर पड़ा। उन्होंने हुक्म दिया कि उनके कमरे में कोई भी व्यक्ति वो चाहे जितना बड़ा ही क्यों ना हो, जूता पहन कर नहीं जाएगा।मायावती की जीवनी लिखने वाली कारंवा पत्रिका की पत्रकार नेहा दीक्षित ने भी अपने लिखे एक लेख द मिशन इनसाइड मायावतीज़ बैटल फ़ॉर उत्तर प्रदेशमें लिखा था, “मायावती में सफ़ाई के लिए इस हद तक जुनून है कि वो अपने घर में दिन में तीन बार पोछा लगवाती हैं।

मायावती होना एक गर्व की निशानी भी है। मायावती भारतीय महिला राजनीति में मनोवैज्ञानिक परिवर्तन भी लाई हैं। अपने कार्यकाल में हमेशा कड़े फैसले लेने व उसको क्रियान्वित करके दिखने की क्षमता सुश्री मायावती में थी। मायावती का मुख्यमंत्री बनना इस बात का संकेत भी है कि हाशिये कि महिलाओं को यदि अवसर दिया जाए तो वह समाज व देश कि सेवा में आमूलचूल परिवर्तन लाने में सक्षम हैं। मायावती द्वारा किया गया कार्य हाशिये के समाज के लिए एक इतिहास बन गया है। आज भारत की कोई भी हाशिये के वर्ग की महिला मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री बनने का सपना देख सकती है। यह ताकत उसे मायावती से मिलती है। अपने राजनीतिक जीवन में तमाम असहमतियों व सफलता-असफलता के बावजूद मायावती भारतीय राजनीति की एकमात्र दलित राजनेता हैं जिन्हें आप पूरी तरह से नकार नहीं सकते हैं। विरोध के बावजूद उनके किए कार्यों का बखान तो करना ही पड़ेगा। उत्तर प्रदेश की दलित महिलाएं जो कभी पुरुषों के आज्ञा के बगैर घर से बाहर नहीं निकलती थी वह मायावती के राजनीतिक रैलियों में बड़े आदर के साथ मायावती का कटाउट या उनका मुखौटा लिए हिस्सा लेती हैं।

मायावती के होने से हाशिये के समाज की महिलाओं के अंदर एक चेतना आई है। मायावती अपने शासनकाल में कई विवादों और घोटालों के आरोपों में जरूर रही हों पर उनका राजनितिक अभ्युदय सचमुच अद्भुत रहा है। एक सामान्य परिवार से आई दलित महिला ने ऐसा मक़ाम हासिल किया जैसा इस देश के इतिहास में कम ही महिलाओं ने किया है। विवादों की परवाह किए बिना मायावती के समर्थको ने हर बार उनका साथ दिया और अपनी वफादारी साबित की है। मायावती ने दलितों के दिल में अपनी खुद की जगह बनाई है और दलितों में अपने प्रति विश्वास कायम किया है। जो मायावती को उनकी ज़िन्दगी में एक सफल राजनेता बनाता है। मायावती अभी तक अविवाहित है जो की उनके किये कार्यो के प्रति लगन और उनके सिद्धांतो को दर्शाता है। हमारे देशवासियों को ऐसी महिला राजनेता पर गर्व होना चाहिए। मायावती ने अपनी चौथे कार्यकाल में बहुजन इतिहास को जीवित करने के लिए भी काफ़ी काम किया। मायावती ने बहुजन नायक-नायिकाओं के सम्मान में ऐतिहासिक काम कर दिखाया। जिन बहुजन नायक-नायिकाओं को इतिहास में कभी उचित सम्मान नहीं मिला था, मायावती ने उनकी शानदार प्रतिमाएँ लगाकर बहुजन समाज से उनका परिचय कराया।

मायावती के जीवन संघर्ष पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के प्रो. विवेक कुमार ने पिछले दिनों अपने एक लेख में लिखा था, ‘यह विडंबना है कि लोग आज मायावती के गहने देखते हैं, उनका लंबा संघर्ष और एक-एक कार्यकर्ता तक जाने की मेहनत नहीं देखते। वे यह जानना ही नहीं चाहते कि संगठन खड़ा करने के लिए मायावती कितना पैदल चलीं, कितने दिन-रात उन्होंने दलित बस्तियों में काटे। मीडिया इस तथ्य से आंखें मूंदे है। जाति और मजहब की बेड़ियां तोड़ते हुए मायावती ने अपनी पकड़ समाज के हर वर्ग में बनाई है। वह उत्तर प्रदेश की पहली ऐसी नेता हैं, जिन्होंने नौकरशाहों को बताया कि वे मालिक नहीं, जनसेवक हैं। अब सर्वजन का नारा देकर उन्होंने बहुजन के मन में अपना पहला दलित प्रधानमंत्री देखने की इच्छा बढ़ा दी है। दलित आंदोलन और समाज अब मायावती में अपना चेहरा देख रहा है। भारतीय लोकतंत्र को समाज की सबसे पिछली कतार से निकली एक बहुजन महिला की उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए।


संपर्क

डॉ. अनीश कुमार

लेखक गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन करते हैं । जनसंदेश टाइम्स, सुबह सबेरे, जनवाणी, युवा शक्ति, अचूक संघर्ष समेत कई अखबारों में लगातार लेखन कार्य । इसके साथ विभिन्न ऑनलाइन पोर्टल जैसे SSRN, यूथ की आवाज, जनपथ, दलित दस्तक आदि पर भी विभिन्न लेख प्रकाशित ।

इसके साथ ‘द पर्सपेक्टिव अंतर्राष्ट्रीय जर्नल’ तथा हिन्दी विभाग, गुरु घासीदास (केंद्रीय) विश्वविद्यालय, बिलासपुर की संस्थागत त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका ‘स्वनिम’ के सह-संपादक का निर्वहन ।  

ईमेल anishaditya52@gmail.com तथा मोबाइल नंबर 9198955188 है ।

 

सतपुड़ा की पगडंडियाँ : सहजीविता और मानवीय संवेदनाओं की काव्यात्मक अभिव्यक्ति - डॉ. अनीश कुमार

              सतपुड़ा की पगडंडियाँ युवा कवि रमेश गोहे की सद्द: प्रकाशित पहला कविता संग्रह है । इन कविताओं से गुजरते हुए सहज ही महसूस किया जा सकता है कि यहाँ जो मैंहै, वह एक समाजहै । वह सभी कालों और सभ्यताओं के मनुष्यों का प्रतिनिधित्व करता है । बेशक वह कवि के समय की, हमारे अपने समय का, निवासी  है लेकिन उसे भरपूर अहसास है कि वह एक परंपरा में स्थित है, बल्कि उसी के हाथों निर्मित है । कवि इन कविताओं में स्वयं माजूद है । कविता प्रकाशित होने के पश्चात जब पाठक के सन्मुख आती है तो वह उसका आस्वादन करता है । मुख्यत: पाठक उस रचना में भाव ढूंढता है, कोई बिम्ब, कोई प्रतीक या कोई विचार उसे उद्वेलित करता है वह उस कविता में अपने आसपास के परिदृश्य की तलाश करता है । पाठक के मन की कोई बात यदि उस कविता में हो तो वह उसे पढ़कर प्रसन्न होता है । यदि कविता में उसके आक्रोश को अभिव्यक्ति मिलती है या उसे अपनी समस्याओं का समाधान नज़र आता है तो वह कविता उसकी प्रिय कविताओं में शामिल हो जाती है । रमेश गोहे की कवितायें कविता की इन परम्पराओं में अपने को फिट पाती हैं । जब कवि स्वयं लिखता है कि मेरी कविताओं को पढ़ना मेरे साथ चलने जैसा है । मेरे भोगे हुए यथार्थ के बहाने मेरी कविताओं को पढ़कर अपने मन की तहें खोलने जैसा है और कुछ हद तक मुझे समझने जैसा भी । मेरी कवितायें निश्चित रूप से मेरे जीवनानुभवों, आत्मसंघर्षों, संवेदनात्मक ज्ञान और सांसारिक सुख-दुख कि पीड़जन्य अनुभूतियों का दस्तावेज़ हैं ।

            रमेश गोहे की कविताओं की विषयवस्तु में विविध संवेदनात्मक अभिव्यक्ति है । यहां प्रकृति भी है और प्रेम भी, बम भी है और बारूद भी, गांव भी है और शहर भी । रमेश गोहे सतपुड़ा की पगडंडियां के माध्यम से सम्पूर्ण जंगल-गाथा कह देने में संकोच नहीं करते । ये कविताएं जमीन से जुड़कर मानवीय अस्मिता पर प्रहार करती नीतियों के प्रति आवाज उठाती हैं । कविताओं में सौंदर्य का बखान करने के लिए उन्हें किसी बाह्य रूपकों की आवश्यकता नहीं पड़ती बल्कि कवि अपनी परंपरा से जुड़ी चीजों में से ही रूपकों का निर्माण करता है । कविताएं रचाव व बचाव की प्रवृत्ति को आत्मसात करती हुई खत्म होती मानवीय संवेदनाएं और सहजीविता को पुनर्स्थापित करने की वकालत करती हैं । कवितायें मनुष्यता का ख्यान रखती हैं । जहां आज के समय में मनुष्य के अंदर स्वार्थ पूर्ति की भावना आ गई है वहीं कवि आगे आकर संवेदना को समझने का प्रयास कर रहा है -

मैं यहाँ ठीक हूँ !

आशा है तुम भी वहाँ ठीक होंगे !

चिट्ठियों में हम

न जाने क्या-क्या लिखते जाते हैं !

चिट्ठी लिखते समय

हम कितने स्वस्थ हो जाते हैं !

            कवि सहजीविता की बात करता हैं । सपाटबयानी रमेश गोहे की विशेषता है । कविता प्राकृतिक और मानवीय राग का सुंदर चित्रण है ।

                        तुम अपनी बात कहो

मैं सुनता हूँ

तुम्हारी सालों की पीड़ा का दर्द कह दो मेरे कानो में ।

            कवि ने अपने समय और समाज के संवेदना को ध्यान में रखते हुए कविता का विषयवस्तु का चयन किया है । उनकी कविता मुक्ति के स्वप्न की कविता है । उनके यहाँ स्वप्न एक बार बार दुहराया जाने वाला का विषय है । रमेश गोहे की कविताओं का परिदृश्य काफी बहुमुखी और विविधतापूर्ण है। वस्तुत: हिन्दी कविता का संसार या क्षितिज बहुत फैलाव लिए हुए है। दरअसल कविता की भाषा कुछ तो कवि के पास सहज रूप में उपलब्ध होती है, कुछ अभ्यास से कवि अपनी भाषा के रूप में सुधार भी लाता है । रमेश गोहे ने भाषा का बावबोध एकदम सरल रखा है जिससे उसके शिल्प में दुरूहता नहीं आए । ऐसे समय में जब कविता का परिदृश्य साहित्य की राजनीति से संचालित हो रहा हो, कुछ जरूरी बातों को कहने के लिए खतरे उठाने ही होंगे । ऐसे में रमेश गोहे स्पष्ट लिखते हैं कि –

कुत्तों का आतंक है,

और बंदर

बच्चों को पेट से चिपटाए,

हाँफ-हाँफ कर दौड़ रहे हैं ।

किसानों के लिए भी कवि के अंदर उतनी ही संवेदना है जितना कि प्रेम को बचाने के लिए ।

अन्नदाता

जागो और देखो

धरती के साथ दु:शासन

खेल रहा है,

चीरहरण का खेल !

रचा जा रहा है कोई षडयंत्र ,

हल कि जगह चलाये जा रहे हैं बुल्डोजर । 

            आज कविता का संसार औसत का संसार है । कवि जिस जमीन में रहता है उस जमीन और परिवेश जिसे हम व्यापक अर्थों में लोक की संज्ञा देते हैं उसका सन्निवेश । और जिस लोक पर कविता लिखी जा रही हो उस लोक की संस्कृति, भाषा व सामाजिक संरचना का पूरा बोध होना चाहिए । यदि ऐसा नहीं है तो कविता में वास्तविकता भ्रमात्मक कल्पना के रूप में प्रवेश करती है और पाठक को मिथ्या तर्क देते हुए लोक की वास्तविक विसंगतियों से ध्यान भटका देती है । कवि के लोक को हम कवि “व्यक्तित्व” का सन्निवेश कह सकते हैं । कविता में कवि के व्यक्तित्व का प्रवेश ही कवि के लोक का प्रवेश है । इससे कविता में “यथार्थ” बचा रहता है और भ्रम की संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं । एक कविता देखिये -

गुब्बारे जो अपने देश की हवा से फूलकर

ऊंची उड़ान भरते हैं

सात आसमान पार करते हैं

पर वापस लौटकर नहीं आते कभी ।

            कविताओं में वैयक्तिकता भी प्रमुखता से ऊभर करके आई है । उनके प्राणों की विविध अनुभूतियां उनकी कविता में अनायास ही नहीं आ गई है लेकिन उसने गाथा में आलंबन अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण वैयक्तिकता ही प्रमुख रूप से उभर कर के आई है जिनमें उनके अश्रु, दुख, विरह और वेदना ने ही स्थान पाया है -

धरती जब चादर पीली ओढ़ लेती है

तब बनती है कविता

कविता बनती है

जब दर्द हद से गुजर जाता है

हाँ कविता तब नहीं बनती

जब इंसान की

संवेदना मर जाती है ।

            स्त्री की सामाजिक स्थिति के साथ-साथ आर्थिक स्थिति का सजीव वर्णन भी रमेश गोहे की कविताओं के माध्यम से हमें देखने को मिलता है । दरअसल आदिवासी लेखन जीवन का लेखन है यह कल्पना और मनोरंजन का क़िस्सा नहीं है और न ही आदिवासी औरतें नुमाईश की वस्तु है । किन्तु आज के समय में मीडिया के माध्यम से आदिवासी स्त्रियों को बाजार की नुमाइश की वस्तु बना दी गई है ।

सिर पर लकड़ी का गट्ठर लादकर

सुबह-सुबह जब एक के पीछे एक कतार में

निकलती हैं आदिवासी लड़कियां

तो मीडिया का आदमी

मुंह इंधारे फ्लैश चमकाकर

मिचमिचाती आँखों से खींचता है

उनकी अधनंगी तस्वीर

            जनजीवन को कविताओं में उकेरने वाले कवि रमेश गोहे शुक्ल प्रेम और प्रकृति के कवि हैं । वे सीधे सरल शब्दों में जादुई बातें कहने के ऐसे माहिर हैं, जो नदी, पहाड़, घाटी से लेकर जमीन से जुड़े हुए आदमीको अपनी कविता में समेट लेते हैं । वास्तव में वे सजग शिल्प के कवि हैं, जो बेहद महीनी से शब्दों को पिरोते हैं । उनकी काव्य भाषा, शिल्प और कहन कविताओं को सतपुड़ा के जंगलों से सीधे जोड़ती है । समाज में प्रेम को लेकर एक असंवेदांशीलता दिखाई देती है जिसे रमेश गोहे बेरंग होती दुनिया में प्रेम को घोल देना चाहते हैं ।  

                        पुरुष जो प्रेम से दूर होता है

प्रेम सिखाती हैं उसे स्त्रियाँ

पुरुष जो बेरंग होता है

रंग भरती हैं उसमें स्त्रियाँ  

            वास्तव में यदि कोई कवि होगा, उसके भीतर प्रेम होगा । प्रेम ही आदमी को कवि बनाता है । कवि की ज़रूरत इसलिए होती है कि जब हवाओं में घृणा भरी हो, वह प्रेम का संगीत बाँटता है । वह सुंदरता से प्रेम करना सिखाता है और बताता है, क्या सुंदर है, क्या नहीं । आधुनिकतावादी समय में प्रेम की भाषा ठीक वैसी नहीं हो सकती थी, जैसी क्लासिकल या रोमांटिक युग में थी । बदली जीवन स्थितियों में प्रेम का अनुभव अलग तरह का होगा, पर उसमें क्लासिक और रोमांटिक संस्कारों की गूँज न हो, यह संभव नहीं है । यदि प्रेम में अनुभव की सच्चाई के साथ एक कलात्मक गहराई मौजूद हो, इन संस्कारों की गूँज होगी ज़रूर ।


 


पुस्तक – सतपुड़ा पगडंडियाँ
कवि- रमेश गोहे
प्रकाशक- एविन्सपब पब्लिशिंग, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
वर्ष – दिसंबर 2022  
मूल्य – 199 

 

समीक्षक – डॉ. अनीश कुमार

कांशीराम और उनका बहुजनवाद : पुनर्पाठ - डॉ. अनीश कुमार

 

मान्यवर कांशीराम ने भारतीय समाज के वंचित तबको, गरीबों, दलितों को जीने की एक मुकम्मल राह दिखाई है । उनमें आत्मविश्वास की ललक पैदा की है । कांशीराम का उद्देश्य सर्व जनहिताय, सर्व जनसुखाय रहा । किन्तु वह वंचित समुदाय को बहुजन समाज नाम के पदबंध से संबोधित करते हैं । वह कई बार अपने भाषणों में कहते हैं कि समाज में जनसंख्या के हिसाब से वंचित समाज की संख्या अधिक है । इसीलिए इसे बहुजन समाज कहना ज्यादा समीचीन होगा । बहुजन समाज को वह भारतीय समाज की असली वारिस मानते हैं । कांशीराम उन लोगों में से थे जो अपना सुख आराम त्याग कर गरीबों की सेवा में अपना जीवन न्यौछावर कर देते हैं । उनके समकालीन तमाम ऐसे नेता थे जो ऐश-आराम करके जिंदगी व्यतीत कर रहे थे । किन्तु कांशीराम ने जिंदगी भर अविवाहित रहकर, बिना किसी लाभ के पद पर रहते हुए उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (BSP) और दलित समाज को संगठित व संचालित किया । सोशल इंजीनियरिंग का उन्होंने जो सफल मंत्र दिया वह भारतीय इतिहास में अद्वितीय है । वंचित तबके की सेवा के लिए अपनी सरकारी नौकरी को भी छोड़ दिया । उनकी यही कर्तव्यनिष्ठता बहुजन समाज को सामाजिक व राजनीतिक रूप से एक नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया । उन्हें बहुजन समाज की राजनीति का पितामह कहा जाता है ।

कांशीराम सामाजिक चेतना की अपेक्षा राजनीतिक चेतना को अधिक तवज्जो देते थे । उनका मानना था कि जिस समुदाय का राजनीतिक व्यवस्था में प्रतिनिधित्व नहीं है, वह समुदाय मर चुका है । ऐसा इसलिए कहते थे कि आप चाहे जितनी बड़ी नौकरी पा जाओ किसी न किसी नेता के शरण में ही काम करना पड़ता है । सभी विभागों के कोई न कोई मंत्री होता है । उन्ही के नीचे सबको काम करना होता है । इसलिए वे राजनीतिक चेतना को अधिक महत्वपूर्ण मानते थे । यही कारण है जब वह नौकरी से त्यागपत्र देने के बाद महाराष्ट्र की प्रमुख राजनीतिक पार्टी आरपीआई से जुड़े तो उन्हें वहाँ पर भी राजनीतिक चेतना का अभाव दिखाई दिया । कांशीराम : बहुजनों के नायककिताब में बद्रीनारायण लिखते हैं, ‘कांशीराम दलितों के लिए कुछ करना चाहते थे इसलिए वह दलित मूवमेंट को आगे बढ़ा रही आरपीआई से जुड़ गए । (आरपीआई के वर्तमान अध्यक्ष एनडीए सरकार के सहयोगी रामदास आठवले हैं ।) उन्होंने पाया कि दलितों की लड़ाई लड़ने वाले नेता अवसरवादी, लालची और स्वार्थी बन चुके हैं । एकता की बात तो करते हैं लेकिन एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करते रहते हैं । धीरे-धीरे वह उससे दूर होते गए । आगे चलकर 1984 में उन्होंने बीएसपी की स्थापना की । तब तक कांशीराम पूरी तरह से एक पूर्णकालिक राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता बन गए थे । उन्होंने तब कहा था कि अंबेडकर किताबें इकट्ठा करते थे लेकिन मैं लोगों को इकट्ठा करता हूं । उन्होंने तब मौजूदा पार्टियों में दलितों की जगह की पड़ताल की और बाद में अपनी अलग पार्टी खड़ा करने की जरूरत महसूस की । वो एक चिंतक भी थे और ज़मीनी कार्यकर्ता भी । बसपा की स्थापना के बाद वह पूरे देश में साइकिल यात्राएं की । यह उनका सार्थक प्रयास था ।

कांशीराम राजनीति के मूल मर्म को समझ गए थे । घूम-घूम कर वह वंचित समुदाय को राजनीतिक रूप से मजबूत होने का आह्वान करते थे । कांशीराम के समय भी बहुत सारे लोग नौकरियों में थे । आरक्षण लागू होने के बाद भी आरक्षित सीट पर बहुत से दलित समुदाय के लोग चुनकर आते थे लेकिन सब अपनी पेट पूजा में ही लगे रहते थे । आर्थिक रूप से मजबूत होने के बाद भी सामाजिक और राजनीतिक रूप से कमजोर थे । कांशीराम एक तरफ डॉ. अंबेडकर द्वारा दिखाये गए रास्ते पे बैक टू सोसायटी के लिए लोगों को प्रेरित करते थे । इसी उद्येश्य से वह बीएसपी से पहले बामसेफडीएस4 की स्थापना किए थे । उनका यह मिशन सफल भी हुआ । कांशीराम ने इसीलिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व को महत्ता देते थे । जब वह समाज के बीच जाते थे तो वह कम शब्दों में अपनी प्रभावशाली बातों से लोगों को समझाते थे । वह वोट की कीमत को समझते थे । वह लोगों को समझाते थे कि चाहे कोई गरीब हो या अमीर अभी के वोट कि कीमत एकसमान होती है । इसलिए अपना वोट सोच-समझकर देना चाहिए । जब वह राजनीति में कदम रखे थे तब कुछ शुरुआती वर्षों में जैसे सन् 1983-84 नारों का साल रहा । उनके कुछ नारे प्रसिद्ध हैं -

- वोट हमारा, राज तुम्हारा, नहीं चलेगा नहीं चलेगा ।

- जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी ।

- वोट से लेंगे CM/PM, आरक्षण से लेंगे SP/DM

धीरे-धीरे उनके नारों में तल्खी आने लगी । वह उन सभी चीजों का विरोध किया जो उनके राजनीतिक चेतना को प्राप्त करने के मार्ग में बाधक हो रहे थे । वह एक और नारा दिया तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार । यह नारा एक तरह से दलितों के लिए आह्वान था । ऊंची जाति के लोग हक्के-बक्के रह गए । बहनजी किताब में अजय बोस लिखते हैं, ‘एक बार कांशीराम मंच पर भाषण देने के लिए खड़े हुए । उन्होंने पहली लाइन में कहा, अगर श्रोताओं में ऊंची जाति के लोग हों तो अपने बचाव के लिए वे वहां से चले जाएं । इसके बाद कांशीराम के समर्थन में जोरदार नारेबाजी हुई । उनकी रैलियों से ऊंची जाति के लोग गायब होते चले गए । ब्राह्मण समुदाय कांशीराम से नाराज भी हुआ किन्तु धीरे-धीरे सामाजिक बुनावट समझ आने पर सब ठीक होता गया । अपने राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष के दौरान कांशीराम ने, उनके मुताबिक़ ब्राह्मणवाद से प्रभावित या उससे जुड़ी हर चीज़ का बेहद तीखे शब्दों में विरोध किया, फिर चाहे वे महात्मा गांधी हों, राजनीतिक दल, मीडिया या फिर ख़ुद दलित समाज के वे लोग जिन्हें कांशीराम चमचाकहते थे । उनके मुताबिक ये चमचेवे दलित नेता थे जो दलितों के स्वतंत्रता संघर्षमें दलित संगठनों का साथ देने के बजाय पहले कांग्रेस और बाद में भाजपा जैसे बड़े राजनीतिक दलों में मौक़े तलाशते रहे । कांशीराम चमचों से बचाने की सलाह दिया करते थे । ये चमचे जिस थाली में खाते थे उसी में छेद करते थे । किन्तु उनकी नजर में हर विरोध करने वाला व्यक्ति चमचा नहीं था । वह स्पष्ट कहते थे कि कार्यकर्ताओं को चमचा समझने की भूल तो नहीं ही करनी चाहिए ।

            कुछ (नेता) लोग कार्यकर्ताओं को चमचे समझने की भूल कर सकते हैं । यह भयंकर भूल होगी । कार्यकर्ता और चमचा धुर विरोधी होते हैं । कार्यकर्ता अत्यंत लाभकारी होता है, जबकि चमचा गुलाम होता है जो लोग आज्ञाकारी था और गुलाम में भेद नहीं कर सकते । वे कार्यकर्ता को भी चमचा समझने की भूल कर सकते हैं । चमचे का इस्तेमाल उसकी अपनी ही जाति के खिलाफ किया जाता है जबकि कार्यकर्ता का इस्तेमाल उसकी जाति की भलाई के लिए होता है और चमचे का इस्तेमाल उसकी अपनी ही जाति के सच्चे और खाली नेता को कमजोर करने के लिए होता है । जब कार्यकर्ता का इस्तेमाल उसकी जाति और की सच्ची और खरे नेता की मदद के लिए उसके हाथ मजबूत करने के लिए होता है और कार्यकर्ता में अंतर करने के लिए और भी कई तथ्य दिए जा सकते हैं । किंतु यहां हमारी दिलचस्पी केवल इस बात पर जोर देने में है कि एक कार्यकर्ता को समझ चमचा समझने की भूल तो नहीं है । नहीं चाहिए ।

            कांशीराम सिर्फ सत्ता पाने तक समाज या पार्टी को सीमित नहीं रखना नहीं चाहते थे । वह राजनीतिक सत्ता पाने के बाद सामाजिक परिवर्तन को भी उसी रूप में देखना चाहते थे । इन सभी संदर्भों को उनके विचारों के आलोक में देखें तो उनकी दूरदृष्टिता स्पष्ट दिखाई देती है । उनके प्रमुख विचार निम्नवत हैं - 

  • ·   हम सामाजिक न्याय नहीं चाहते हैं, हम सामाजिक परिवर्तन चाहते हैं । सामाजिक न्याय सत्ता में मौजूद व्यक्ति पर निर्भर करता है । मान लीजिए, एक समय में, कोई अच्छा नेता सत्ता में आता है और लोग सामाजिक न्याय प्राप्त करते हैं और खुश होते हैं लेकिन जब एक बुरा नेता सत्ता में आता है तो वह फिर से अन्याय में बदल जाता है । इसलिए, हम संपूर्ण सामाजिक परिवर्तन चाहते हैं ।
  • ·    जब तक हम राजनीति में सफल नहीं होंगे और हमारे हाथों में शक्ति नहीं होगी, तब तक सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन संभव नहीं है । राजनीतिक शक्ति सफलता की कुंजी है ।
  • ·     सत्ता पाने के लिए जन आंदोलन की जरूरत होती है, उस जन आंदोलन को वोटों में परिवर्तित करना, फिर वोटों को सीटों में बदलना, सीटों को सत्ता में परिवर्तित करना और अंतिम रूप से (सत्ता में) केंद्र में परिवर्तित करना । यह हमारे लिए मिशन और लक्ष्य है ।
  • ·     ऊंची जातियां हमसे पूछती हैं कि हम उन्हें पार्टी में शामिल क्यों नहीं करते, लेकिन मैं उनसे कहता हूं कि आप अन्य सभी दलों का नेतृत्व कर रहे हैं । यदि आप हमारी पार्टी में शामिल होंगे तो आप बदलाव को रोकेंगे । मुझे पार्टी में ऊंची जातियों को लेकर डर लगता है । वे यथास्थिति बनाए रखने की कोशिश करते हैं और हमेशा नेतृत्व संभालने की कोशिश करते हैं । यह सिस्टम को बदलने की प्रक्रिया को रोक देगा ।
  • ·     जब तक, जाति है, मैं अपने समुदाय के लाभ के लिए इसका उपयोग करूँगा । यदि आपको कोई समस्या है, तो जाति व्यवस्था को समाप्त करें ।
  • ·     जहाँ ब्राह्मणवाद एक सफलता है, कोई अन्य वादसफल नहीं हो सकता है, हमें मौलिक, संरचनात्मक, सामाजिक परिवर्तनों की आवश्यकता है ।
  • ·     बहुत लंबे समय से हम सिस्टम के दरवाजे खटखटा रहे हैं, न्याय मांग रहे हैं और न्याय नहीं पा रहे हैं, इन हथकड़ियों को तोड़ने का समय आ गया है ।
  • ·     हम तब तक नहीं रुकेंगे जब तक हम व्यवस्था के पीड़ितों को एकजुट नहीं करेंगे और हमारे देश में असमानता की भावना को खत्म नहीं करेंगे ।
  • ·       मैं, गांधी को शंकराचार्य और मनु (मनु स्मृति के) की श्रेणी में रखता हूं जो उन्होंने बड़ी चतुराई से 52% ओबीसी को किनारे रखने में कामयाब रहे ।
  • ·       जिस समुदाय का राजनीतिक व्यवस्था में प्रतिनिधित्व नहीं है, वह समुदाय मर चुका है ।

अपने जीवनकाल में उन्होंने बसपा को काफी सशक्त किया । जब बसपा ने चुनाव लड़ना शुरू कर दिया तो उन्होंने एक नोट, एक वोटनारा देकर नोट और वोट खींचे । धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता बढ़ी और समर्थक उन्हें सिक्कों में तौलने लगे । इस पैसे का इस्तेमाल उन्होंने चुनाव लड़ने के लिए किया । उन्होंने खुद तो कभी राजनीति नहीं की लेकिन उन्होंने हजारों लोगों को राजनीति में आने का मौका दिया । एक बिन्दु और ध्यान देने लायक है कि उनके परिवार में कोई भी सदस्य राजनीति में नहीं थे । न हीं उन्हें राजनीति विरासत में मिली थी । किन्तु अपनी मेहनत, चतुराई और कूट बुद्धि कि वजह से वह राजनीति के बड़े चेहरे बन गए । उनकी नीतियों को कई लोग बेहद महान मानते हैं । बाबा भीमराव अंबेडकर के बाद उन्होंने ही देश के दलितों को सही मायनों में एक करने का सपना सच कर दिखाया । सोशल इंजीनियरिंग का उन्होंने जो फंडा दिया उसका इस्तेमाल करके ही बीएसपी ने पिछले कई सालों तक यूपी में राज किया । उनकी कार्यशैली की वजह से ही एक समय बीएसपी और सपा में गठबंधन हो पाया था लेकिन राजनीतिक षडयंत्र की वजह से यह गठबंधन नहीं चल पाया । इसी चेतना ने दलित समुदाय हेतु समाज में नवीन प्रतीकों को भी स्थापित किया है, आज यह नवीन चेतना दलितों में सामुदायिक भावना, आत्मविश्वास तथा पहचान की शक्ति का संचार करने में सफल हुई है । सामाजिक आंदोलनों व दलित समुदाय में बढ़ती राजनीतिक चेतना तथा व्यापक जनाधार के कारण आज बसपा भारतीय राजनीति का केन्द्र बन चुकी हैं । बसपा व दलित आंदोलन को इस स्तर तक पहुंचाने में कांशीराम एवं मायावती के कार्यों को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता । क्योंकि उन्होंने डा. अम्बेडकर के वैचारिक आंदोलन को जमीन पर क्रियान्वित करने का काम किया ।

कांशीराम का समग्र मूल्यांकन सिर्फ इतने से भी किया जा सकता है कि वे केवल एक व्यक्ति के लिए कुछ नहीं किया । ये व्यक्ति वे ख़ुद थे । घर त्यागने से पहले परिवार के लिए वे एक चिट्ठी छोड़ गए थे । इसमें उन्होंने लिखा था, ‘अब कभी वापस नहीं लौटूंगा । और वे सच में नहीं लौटे । न घर बसाया और न ही कोई संपत्ति बनाई । परिवार के सदस्यों की मृत्यु पर भी वे घर नहीं गए । परिवार के लोग कभी लेने आए तो उन्होंने जाने से इनकार कर दिया । अपनी शपथ पर वह जीवन भर अडिग रहे ।

कांशीराम आजादी के बाद भारतीय दलितों की सबसे बड़ी आवाज बनकर उभरे । उनके न रहने के बाद से ही असमानता मिटाने वाले आंदोलन में कमी सी आई है । कांशीराम का बहुजन आंदोलन बनाम क्रांति- प्रतिक्रांति का दौर भारतीय राजनीति में विशेषतया उत्तर प्रदेश के सामाजिक तथा राजनैतिक परिदृश्य में 1990 का दशक सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन का दशक माना जायेगा क्योंकि इसी दशक में मण्डल आयोग की सिफारिशें लागू हुई और दलित-पिछड़ी जातियों को शासन-प्रशासन में भागीदारी हासिल हुई । इसी दशक में दलित राष्ट्रपति का मुद्दा भारतीय राजनीति में गर्म हुआ और इसी दशक में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का राजनीतिक ध्रुवीकरण अस्तित्व में आया ।

कांशीराम के केंद्र में हमेशा दलित समस्या रही । उनका मानना था कि अति-पिछड़ा वर्ग, गरीब मुसलमान और अन्य गरीब समुदायों को किस तरह से एक मंच पर लाया जाये यही कांशीराम का बहुजनवाद था और इसी की राजनीति कांशीराम कर रहे थे । इस काम में कांशीराम कामयाब भी रहे और अपनी बहुजनवाद की राजनीति के माध्यम से उत्तर प्रदेश की राजनीति को केंद्र में रखते हुये दो बड़े राजनीतिक दलों कांग्रेस और भाजपा को दो दशक से अधिक समय तक यानि 1993 से लेकर 2017 तक हाशिये पर धकेल दिया और इन दो दशकों की राजनीति की धुरी किसी न किसी प्रकार से बने रहे । कभी बसपा-भाजपा की गठबंधन सरकार के रूप में कभी पूर्ण बहुमत की सरकार के रूप में यह सब उनकी अपनी मर्जी के हिसाब से और उनकी शर्तों के आधार पर था ।

- डॉ. अनीश कुमार

सह-संपादक, द पर्सपेक्टिव अंतर्राष्ट्रीय जर्नल (www.tpijssh.com)

सह-संपादक, स्वनिम त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका, हिन्दी विभाग, गुरु घासीदास (केंद्रीय) विश्वविद्यालय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़ 


श्रद्धा या विश्वास किसी से पूंछकर नहीं की जाती !!! - डॉ. अनीश कुमार

             किसी व्यक्ति या मनुष्य का सबसे संवेदनशील पक्ष आस्था या विश्वास होता है । मानवीय संबंध इसी विश्वास या आस्था पर खड़े होते हैं । श्रद्धा रखना मानवीय गुणों में सर्वोच्च प्रवृत्ति होती है । हम श्रद्धा किसी पर भी रख सकते हैं । श्रद्धा होने के लिए जरूरी नहीं कि सामने वाले सजीव हो या निर्जीव । कभी-कभी हमारा सबसे पालतू कोई जानवर या पशु भी हमारे प्रति इतना श्रद्धावान हो जाता है कि वह हमसे परे हो ही नहीं सकता । यही श्रद्धा आगे चलकर आस्था का नाम ले लेती है । हालांकि श्रद्धा, विश्वास, आस्था, वफादारी लगभग पर्याय माने जाते हैं । आस्था मनुष्य का जिसके प्रति रखी जा रही है उसके प्रति कट्टरता का भी भावबोध कराती है । स्वार्थ और श्रद्धा मनुष्य को विरासत में मिली हुई होती है । मनुष्य स्वभावतः किसी न किसी के प्रति आस्थावान होता ही है । मनुष्य की एक आदत और भी है कि उसके साथ यदि किसी ने कुछ अच्छा व्यवहार या अच्छा साथ दिया तो मनुष्य उसके प्रति श्रद्धावान हो जाता है किन्तु वही यदि मनुष्य के प्रति थोड़ी सी भी गलत भावना रख दे तो वह उसका दुश्मन बनते देर नहीं लगाता । आज के समय में धर्म मनुष्य के सबसे निकट है । धर्म मूलतः मनुष्य को एक साथ और एक अच्छे मार्ग पर चलने के लिए निर्मित किया गया था ताकि समाज में एकसूत्रता बनी रहे । प्रत्येक धर्म को संचालित करने वाला कोई ईश्वर जरूर होता है । कहीं कहीं एकेश्वरवाद तो कहीं बहुदेववाद तो कहीं अनीश्वरवादी ईश्वर का स्वरूप दिखाई देता है । धर्म मनुष्य को सांस्कृतिक रूप से एक्य करते हेतु जरूरी भी है बसर्ते मनुष्य से ऊपर धर्म का अस्तित्व न हो । जहां मनुष्य के ऊपर धर्म का प्रभाव बढ़ने लगता है वहीं से कट्टरता पैदा होने लगती है ।

            धर्म मनुष्य को दयालु बनाता है । दुनिया लगभग सभी धर्म मनुष्य को एक अच्छे रास्ते पर ले जाने का ही ज़ोर देते हैं । एक बच्चा जब जन्म लेता है तो वह बिलकुल कोरे कागज की तरह होता है । वह जिस भी धर्म को मनाने वाले घर में पैदा होता है उसी के अनुरूप उसकी ट्रेनिंग बचपन से ही शुरू हो जाती है । कुछ परिवार अपने बच्चे को धार्मिक शिक्षा उतना ही देते हैं जितना कि उसके एक अच्छा मनुष्य बनने में सहायक हो । लेकिन आज के समय में ट्रेंड बदलता जा रहा है । परिवार व समाज कहीं धार्मिक रूप से कट्टर होते जा रहे हैं । कट्टरता का अर्थ यहाँ उस अर्थ से है कि जब हम किसी अच्छे काम प्रयोग दूसरे के ऊपर गलत अर्थ में किया जाये । इसका असर युवा पीढ़ी पर भी दिखाई देने लगा है । आज के समय में ईश्वर के प्रति आस्था सबसे ऊपर हो गई है । धीरे-धीरे मनुष्य आस्था के प्रति इतना कट्टर हो जाता है कि उसके बारे किसी भी प्रकार की गलत खबरें या उसकी आलोचना सुनना पसंद नहीं करता । धीरे-धीरे यही प्रवृत्ति हिंसा का रूप धारण कर लेती है । यह प्रवृत्ति आगे चलकर हमारे समाज के बीच से होकर वैश्विक स्तर पर पहुँच जाता है । जबकि यह भी सत्य है कि प्रकृति प्रदत्त ऐसा कोई भी वस्तु नहीं है जिसकी आलोचना नहीं की जा सकती । ऐसा प्राचीन समय में ब्रूनों जैसे कई उदाहरण हैं जो धार्मिक हिंसा के शिकार हुए किन्तु कालांतर में उनकी कही बात सत्य साबित हुई ।

            भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्षता की वकालत करता है । यही विशेषता भारत को दुनिया से अलग करता है । भारत में सभी धर्मों, संप्रदायों को समान अधिकार व महत्व दिया गया है । बावजूद इसके वर्तमान समय में देखें तो दूसरों के आस्था के साथ खिलवाड़ जमकर हो रहा है । समस्या तब ज्यादा भयावह हो जाती है जब मनुष्य दूसरों की आस्था के साथ खिलवाड़ करना शुरू करता है । इनमें सोशल मीडिया पर प्रसारित खबरें इस प्रकार के मुद्दों में आग में घी डालने का काम करती हैं । बरहाल मीडिया से ये हमेशा यह अपेक्षा की जाती रही है कि वह खबरों को या इन मुद्दों को निष्पक्ष भाव से कहेगा या दिखाएगा किन्तु स्थिति आज इसके उलट दिखाई देती है । ज़्यादातर मीडिया तो कारपोरेट घरानों या रईसों के अधीन काम कर रहे हैं, जो स्वतंत्र रूप से इस पर कार्य भी कर रहे हैं तो उन्हें आस्था के नाम पर डरा-धमकाकर चुप करा दिया जाता है ।

            अंत में एक बात समझने की कोशिश करनी चाहिए कि मनुष्य अपने आस्था या श्रद्धा के साथ इतना वफादार होता है तो दूसरे की आस्था अथवा श्रद्धा को ठेस क्यों पहुंचाता है । कई बार ऐसे पात्रों के प्रति हम श्रद्धा रखते हैं जो वास्तविक रूप में तथ्यरहित होता है । अब जाहिर है कि सभी के लिए वह श्रद्धा कि वस्तु नहीं होगी । कोई न कोई उसकी आलोचना करेगा ही । यहीं से समस्या शुरू होती है जब हम आलोचना को नहीं देखना चाहते जबकि आलोचना एक स्वस्थ विमर्श को जन्म देती है । मिथकीय इतिहास को लेकर ये सब सिर्फ हिंसा को जन्म दे रही हैं । वास्तविकता से इसका कितना संबंध है ये भी बुद्धिजीवी लोग भलीभाँति जानते हैं । कभी-कभी राजनीति भी इसमें मिलकर रोटियाँ सेंक लेती है । सरकारी तंत्र तो इसका पूरा फायदा उठाता ही है । यह हमेशा ध्यान रखने की कोशिश की जानी चाहिए कि हम जिस भी धर्म को मानते हैं या श्रद्धा रखते हैं वह हमारा अपना निजी मामला है । हमें किसी अन्य धर्म या पंथ में गैरज़रूरी हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए । वास्तव में धर्म हमें एक अच्छे रास्ते पर चलने की शिक्षा देता है जब तक कि हम धर्म को निजी तौर पर बिना किसी के नुकसान किए मानते हैं ।

            वास्तव में श्रद्धा दिल से आती है जहां दिमाग की कोई आवश्यकता नहीं वहीं अंधविश्वास में दिल और दिमाग दोनों की ही आवश्यकता नहीं । कई बार श्रद्धा के अनुकूल व्यवहार न करने पर वह अंधश्रद्धा बन जाती है । श्रद्धा बंद आँखों से वहीं अंधविश्वास खुली आँखों से । श्रद्धा आस्था के कारण तो वहीं अंधविश्वास डर के कारण । श्रद्धा मे सर झुकता है और अंधविश्वास में बुद्धि । श्रद्धा मे आप स्वयं ही खुद को सौंप देते हो तो वहीं अंधविश्वास में आपको खुद को सौंपना पड़ता है । श्रद्धा मे आप स्वयं करते हो तो वहीं अंधविश्वास में आपको करना पड़ता है । वास्तव में हम सभी एक शिक्षित और समतावादी समाज निर्माण की कल्पना भी करते हैं और उसे बनाने की कोशिश भी करते हैं । हमें अपना योगदान अवश्य देना चाहिए । किसी के प्रति श्रद्धा रखकर अथवा किसी इष्ट के प्रति श्राद्धवान होकर हम अपनी उपस्थिति बेहतर तरीके से दे सकते हैं ।

- डॉ. अनीश कुमार

सह-संपादक, द पर्सपेक्टिव अंतर्राष्ट्रीय जर्नल (www.tpijssh.com)

सह-संपादक, स्वनिम त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका, हिन्दी विभाग, गुरु घासीदास (केंद्रीय) विश्वविद्यालय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़ 

 

Friday, 8 December 2023

केयर लिस्टेड पत्रिकाएँ : अकादमिक जगत में भ्रष्टाचार की नर्सरी

            भारत में प्रतिवर्ष लाखों पत्रिकाओं/जर्नल्स का सम्पादन होता है । इनमें कुछ मासिक, त्रैमासिक, छमाही व वार्षिक पत्रिकाएँ शामिल हैं । पत्रिकाओं के प्रकाशन के लिए आईएसएसएन नंबर जारी किया जाता है जो कि एक विदेशी संस्था द्वारा जारी किया जाता है । भारत में इसे निस्केयर के द्वारा संचालित किया जाता है । प्रिंट पत्रिका निकालने के लिए भारत सरकार द्वारा जारी आरएनआई नंबर होना अनिवार्य है वहीं ऑनलाइन के लिए सिर्फ आईएसएसएन काफी है । इन्टरनेट के आगमन के बाद वेब पत्रिकाओं की संख्या में बेतहाशा इजाफा हुआ है । पहले कुछ बड़े शहरों से ही अच्छी पत्रिकाएँ व जर्नल्स निकलते थे किन्तु इन्टरनेट ने इसे सुगम कर दिया । अब कोई भी कहीं से भी वेब पत्रिकाओं का सम्पादन कर सकता है । इससे पत्रिकाओं के सम्पादन में लगने वाले खर्चे को भी कम कर दिया । इन्टरनेट पर पहले सिर्फ अँग्रेजी में एक्सेस माजूद था किन्तु यूनिकोड के आने से हिन्दी भाषा की पत्रिकाओं व जर्नल्स भी अधिक मात्रा में निकलने लगीं । एक तरीके से यह भी कहा जा सकता है कि हिन्दी के विकास में नए पंख भी लग गए ।  


            भारत में विश्वविद्यालयों में होने वाले शोध कार्यों पर यूजीसी अपना नियंत्रण रखती है । समय समय पर निर्देश जारी करती रहती है । 2016 के पहले पीएचडी/एमफिल और पीडीएफ़ की थीसिस में शोध-पत्र की अनिवार्यता नहीं थी । इसके बाद यूजीसी ने पीएचडी थीसिस/एमफिल डिजर्टेशन के साथ दो शोध-पत्र और दो सेमिनार पत्र को लगाना अनिवार्य कर दिया है । ये शोध-पत्र किसी रेफर्ड आईएसएसएन नंबर की पत्रिका में छपना अनिवार्य होता था । यूजीसी ने 2018 में यूजीसी एप्रूव्ड लिस्ट नाम से पत्रिकाओं और जरनल्स की सूची जारी की थी । जिसमें यूजीसी का स्पष्ट आदेश था कि अब से विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति व पीएचडी/एमफिल थीसिस में यूजीसी एप्रूव्ड लिस्ट में शामिल पत्रिकाओं/जर्नल्स में ही प्रकाशित शोध पत्र ही सिर्फ मान्य किए जाएंगे । इसके बाद धड़ल्ले से सभी लोगों ने अपनी-अपनी पत्रिकाओं को इस कतार में शामिल करवाना शुरू कर दिया ।

            यूजीसी लिस्टेड पत्रिकाओं की सूची के बाद यूजीसी ने 2019 में यूजीसी ने CARE नाम से नई सूची जारी की है । यूजीसी के अनुसार अब इसमें शामिल पत्रिकाओं/जर्नल्स में ही प्रकाशित शोध-पत्र ही मान्य होंगे । इस समय ज़्यादातर संस्थागत पत्रिकाएँ ही इस लिस्ट में शामिल हैं । व्यक्तिगत पत्रिकाएँ या अन्य गैरसरकारी संस्थाओं द्वारा प्रकाशित पत्रिकाएँ लगभग न के बराबर शामिल हैं । इधर यूजीसी केयर पत्रिका नाम का शिगूफ़ा आने के बाद पत्रिका संपादित करने वालों की तो जैसे पर ही निकल आए । यूजीसी CARE के नाम पर इस समय कुछ पत्रिकाएँ व जर्नल्स शोधार्थियों से 2000 से 3000 रुपये वसूल रहे हैं । अक्सर देखा गया है कि इस लिस्ट में शामिल पत्रिकाओं का स्तर निम्नतर है । शोध जैसा कुछ भी नहीं दिखाई देता है । यूजीसी CARE लिस्ट सिर्फ एक कोटापूर्ति बन कर रह गई है । आए दिन यह भी शिकायतें मिलती हैं कि फला विश्वविद्यालय या महाविद्यालय में शोधार्थियों को यह बाध्य किया जा रहा है कि शोध-पत्र का प्रकाशन यूजीसी लिस्ट में शामिल पत्रिकाओं में करवाए । अब शोधार्थी के पास पैसे देने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है । बहरहाल यहाँ शोधार्थियों कि उदासीनता भी दिखाई देती है । जो अच्छे शोधार्थी होते हैं वह पहले से कुछ अच्छे जर्नल्स व पत्रिकाएँ हैं उनमें प्रकाशित करवा लेते हैं ।

            यूजीसी ने तमाम विरोधों के बावजूद पियर रिव्यूड पत्रिकाओं को भी नियुक्ति और पीएचडी थीसिस के मान्य तो कर दिया है लेकिन अभी कुछ संस्थाएं अपनी मनमानी से बाज नहीं आती । इससे गंभीर शोध प्रभावित हो रहा है । मनमाने तरीके से शोध-पत्रों का प्रकाशन हो रहा है । ऐसी कई यूजीसी एप्रूव्ड और यूजीसी केयर लिस्टेड पत्रिकाएँ देखता रहता हूँ जिनमें एक पेज या दो पेज शोध-पत्र प्रकाशित हुए हैं । कोई कोई जर्नल्स 1000 पेज के एक अंक निकाल दे रहे हैं । कई ऐसे पियर रिव्यूड जर्नल्स है जहां न कोई पब्लिश करने का फार्मेट है न ही कोई पैटर्न । कट-पेस्ट किया हुआ आर्टिकिल भी प्रकाशित किया जा रहा है । यह काम धड़ल्ले से हो रहा है । इस काम ने आज के समय में व्यवसाय का रूप ले लिया है । कोई एक अकादमिक संस्था खोल लीजिये उसके बरक्स कई 100 जर्नल्स शुरू कर दिया । आईएसएसएन नंबर देने वाली संस्था का कार्य भी इतना ढीला है कि लगभग सभी को आईएसएसएन नंबर मिल ही जाता है । सिर्फ दिखावे के लिए उसमें समीक्षक मण्डल, संपादकीय मण्डल को भर दिया जाता है । बाकी सभी काम मालिक का होता है । पैसा दीजिये एक हफ्ते अथवा 10 से 15 दिन में आर्टिकिल प्रकाशित हो जाता है । ज़्यादातर जर्नल्स में प्लेगजिरिज़्म चेक भी नहीं होता है । यह काम ऑनलाइन पत्रिकाओं व जर्नल्स में ज्यादा होता है । वह पैसे लेकर पीछे के अंकों में भी आर्टिकिल प्रकाशित कर देते हैं । यह व्यवसाय आजकल काफी धड़ल्ले से चल रहा है । घर बैठे लोग लाखों रुपये कमा रहे हैं । शोध के नाम पर सिर्फ कट-पेस्ट ही हो रहा है । इस प्रकार के जर्नल्स में प्रकाशित 10 पेज के आर्टिकिल को पढ़ने पर एक पंक्ति भी मौलिक नहीं दिखाई देती । ऐसे में हम गंभीर शोध की उम्मीद भी क्या ही कर सकते हैं । इस पत्र चिंता जताते हुए वरिष्ठ कथाकार डॉ. देवेंद्र कहते हैं कि नौकरियों के लिए केयर लिस्टेड पत्रिकाओं में प्रकाशन की अनिवार्य शर्तो ने रचनात्मकता के नाम पर हिन्दी विभागों को एक विशाल और बदबूदार कूड़ाघर बनाकर रख दिया है । इन केयर लिस्टेड पत्रिकाओं में आज तक एक भी ऐसा लेख नहीं छपा, जिसकी कोई अनुगूंज साहित्यिक गोष्ठियों में सुनाई दी हो ।

            अब आते हैं इम्पैक्ट फैक्टर पर । यूजीसी का निर्देश है कि थॉमसन रियुटर्स द्वारा प्रदान किए गए इम्पैक्ट फैक्टर ही जर्नल्स के लिए मान्य होंगे । लेकिन आजकल यह काम भी बड़े धड़ल्ले से चल पड़ा है । ऐसी कई गैर सरकारी संस्थाएं हैं जो इम्पैक्ट बांटने का काम करती हैं । एक साल के इम्पैक्ट लेने के लिए 5000 से 10000 रुपये तक वसूल रही हैं । इतना पैसा दीजिये मनचाहा इम्पैक्ट फैक्टर पाइये । 10 में से 8 इम्पैक्ट फैक्टर वाले जर्नल की भी कोई गंभीर शोध नहीं दिखाई देता है । 

            हिन्दी के क्षेत्र में इस तरह के गैर जिम्मेदराना तरीके से थोपा गया यह काम हिन्दी के लिए साथ अन्य सभी अनुशासनों के लिए भी नुकसानदायक साबित हो रहा है । हम हिन्दी की बात करें तो हिन्दी भाषा और साहित्य को लेकर ऐसी कई पत्रिकाएँ हैं जिनका अभी तक आईएसएसएन नंबर भी नहीं है किन्तु उनका स्तर काफी अच्छा है । ऐसे ही पत्रिकाएँ हिन्दी साहित्य की गंभीरता को बचाए रखी हैं । लेकिन यूजीसी के इस यूजीसी केयर लिस्ट ने गंभीर पत्रिकाओं के अरमानों पर भी पानी फेरता हुआ दिखाई दे रहा है । हिन्दी में हंस, कथादेश, उद्भावना, प्रतिमान, साखी जैसी पत्रिकाओं के लिए कोई जरूरी नहीं है कि वह यूजीसी लिस्ट में शामिल है या नहीं । उसकी गंभीरता अभी भी बनी हुई है ।

            अभी हाल में यूजीसी ने कोई नोटिस निकाला था कि संभवतः पीएचडी के दौरान दो शोध-पत्रों के प्रकाशन संबंधी अनिवार्यता पर पुनर्विचार हो रहा है । फिलहाल ऐसा होता है तो यह एक अच्छी पहल होगी । अभी भी विश्वविद्यालयों में शोध के क्षेत्र में सुधार व क्रियान्वयन की आवश्यकता है । विशेषकर हिन्दी क्षेत्र में । 

 (नोट- यह आलेख जनसंदेश टाइम्स और सुबह सबेरे अखबार में प्रकाशित हो चुका है । इसे जनपथ वेबसाइट पर भी पढ़ा जा सकता है । लिंक है - )