भूख की आवाज
सुबह-सुबह ज्यादा भयावह होती है
उस भूख का इंतजार करना
और अधिक दुष्कर हो जाता है
देहरी के ऊपर बैठे बच्चों
की भूख की आवाज सुनकर
ऐसा लगता है कि
जैसे उसकी माँ ‘भूख’
का उत्सव मना रही हो
सुबह-सुबह उठकर जाएगी
वह किसी पन्तिपावन
ब्राह्मण के यहाँ
बर्तन साफ करेगी,
गंदे कपड़े व पखना साफ करेगी
अपनी नियति मानकर
नित्य की तरह
तब उसे कहीं मिलेगी रात्रि की
बची हुई
सूखी रोटियाँ
ये रोटियाँ वह कपड़े में छुपाते
हुए लाएगी
देहरी पर रखते ही
निढाल पड़े बच्चों की छीनाझपटी
देखकर किसी उत्सव से
कम नहीं लगता
शायद उसकी जिंदगी भी
इसी तरह एक उत्सव बन कर रह गई है
‘भूख
की’
शायद यह भूख
आज के मनुष्य की सबसे बड़ी पिपासा बन गई है ।
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