Welcome to my blog / मेरे ब्लॉग में आपका स्वागत है ।

Sunday, 4 February 2018

दलित-क्रांति के कवि अण्णा भाऊ साठे


         दीपक प्रकाश देता है. मगर, इसके लिए उसे तिल-तिल जल कर मरना होता है; इसे बहुत कम लोग जानते हैं.यही बात महाराष्ट्र के दलित शाहिर अन्ना भाऊ साठे पर लागु होती है.अण्णाभाऊ पूरा नाम तुकाराम भाऊ साठे था. आपका जन्म 1 अग. 1920 को सांगली जिले के वाटेगाँव में हुआ था.इनके पिता का नाम भाऊराव और माता का नाम वालूबाई था.आपका विवाह जयवंती बाई से हुआ था. शुरू में आप बम्बई के घाटकोपर के चिराग नगर की एक चाल में रहा करते थे.
        आपका जन्म मांग जाति में हुआ था जिसे अंग्रेजों ने अपराधी जाति घोषित कर रखा था.हिन्दू वर्णाश्रम धर्म में मांग जाति के लोगों का कार्य गाँव की पहरेदारी करना होता है.उनके घरों की दीवारों पर तलवारे लटकती रहती है मगर, घर में खाने को नहीं रहता. अण्णा भाऊ भी इससे अलग नहीं थे.
           देश में उस समय अंग्रेजी राज्य के खिलाफ जबर्दस्त आन्दोलन हो रहे थे.अण्णाभाऊ ने सन 1947  के दौरान नाना पाटिल आदि क्रांतिकारियों के साथ अंग्रेजों के विरुध्द बगावत में डट कर भाग लिया था.उस समय अण्णाभाऊ कम्युनिस्ट पार्टी के साथ जुड़े थे.उनके जिम्मे पार्टी का प्रचार कार्य था.अण्णाभाऊ दलित-शोषितों के बीच एक लोकप्रिय जन-कवि के रूप में प्रसिध्द थे.वे विनोदी स्वभाव के थे.वे अपनी क्रांतिकारी शाहिरी के बीच जब विनोद की बातें करते तो पब्लिक में हँसी के फव्वारे छूटते थे.वे एक बड़े ही दिलचस्प कलमकार थे.उन्होंने अपनी कविता,कहानी और नाटकों से दलित-शोषितों को उनके अस्मिता की जुबान दी थी.
       उन्होंने 'लोकयुध्द' के साप्ताहिक रिपोर्टर के तौर पर भी काम किया था.अण्णाभाऊ के क्रन्तिकारी काव्य  की शोहरत रूस,जर्मनी,पोलेंड आदि देशो तक पहुंची थी.उनकी किताबों के वहां अनुवाद वहां हुए थे.इन मुल्कों में वे शोषितों के साहित्यकार के रूप में पहिचाने जाने लगे थे.उन्हें इन देशों से निमंत्रण आते थे.सन 1948  में उन्हें विश्व साहित्य परिषद् का निमंत्रण मिला था. मगर, भारत सरकार ने उन्हें इजाजत नहीं दी थी.
              डा. बाबा साहेब आम्बेडकर के अण्णाभाऊ बड़े प्रशंक थे.बाबा साहेब के निधन पर दलित-शोषितों के लिए अण्णाभाऊ ने शाहिरी की थी -
                          "जग बदल घालूनी घाव-सांगुनी गेले मला भीमराव.
                           गुलामगिरिच्या  चिखलात- रुतूनी  बसला  एरावत.
                           अंग   झाडुनी   निघ   बाहेरी-  घे   बिनीवरती  घाव." *
       नि:संदेह, डा. आम्बेडकर के कार्यों ने दलित समाज के लेखक, कवि और नाटककारों में सामाजिक जागरूकता के लिए काम करने की प्रेरणा दी थी.सन 1935 में जब उन्होंने धर्मान्तरण करने का एलान किया तो सामाजिक चेतना के इन कलमदारों ने उनके पैगाम को दलित झोपड़ियों तक पहुँचाया.मांगरुलकर,तातुबा,गणू नेर्लेकर,पेठकर,बाबाजी मलवनकर,नाना गिरजकर, अप्पा,यलप्पा,कराळकर और गुंड्या आदी जन-कवियों को दलित-क्रांति  का इतिहास लंबे अर्से तक याद रखेगा.सन 1959 में अण्णा भाऊ ने अपनी मशहूर किताब 'फकीरा' लिखी.यह ग्रन्थ सन 1910 में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत करने वाले मांग समाज के क्रांतिवीर फकीरा के संघर्ष पर था. इस पुस्तक को अण्णाभाऊ ने डा. आम्बेडकर को समर्पित किया था.
      अण्णाभाऊ वास्तव में, कलमकार थे.वे सिर्फ कवि ही नहीं थे,उन्होंने अपनी बात को लोगों तक पहुँचाने के लिए कई विधाओं का सहारा लिया था.उन्होंने 40  के ऊपर उपन्यास लिखे. 300 के आस-पास कहानियां  लिखी.उनके कई काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए.उन्होंने कई नाटक लिखे.यहाँ तक कि उन्होंने कई चित्र-पट कथाएं भी लिखी.उनकी रचनाओं का अनुवाद अंग्रेजी,फ्रेंच आदि कई विदेशी भाषाओँ में हुआ.इसके अलावा  हिंदी,गुजराती,बंगाली,तमिल,मलियाली,उड़िया आदि देशी भाषों में भी हुआ.अण्णाभाऊ को 'इंडो-सोवियत कल्चर सोसायटी' की और से  रूस आने का निमंत्रण मिला था.इस यात्रा का जिक्र उन्होंने अपने सफरनामा 'माझा रशियाचा प्रवास' में किया है.
         अण्णाभाऊ के कलम की शोहरत महाराष्ट्र के सिने-जगत में तो थी ही, हिंदी सिने-जगत भी इससे अछूता नहीं था.उनकी 10 से अधिक कहानियों पर फिल्मे बनी जिसमे 'फकीरा' भी है. याद रहे, अण्णाभाऊ ने इस फिल्म की न सिर्फ पट-कथा लिखी थी वरन, फिल्म के एक किरदार ' सावळया' का रोल भी किया था.
         मगर, ये सब अण्णाभाऊ साठे की जिंदगी की शोहरत का एक हिस्सा था. असल में ये कलम की शोहरत कभी उनके घर की माली हालत की हिस्सेदार नहीं बनी.वे गरीब परिस्थिति के तो थे ही,उनके दलित-कलमकार और जाति-गत स्वाभिमान ने कभी उन्हें अपनी जमीन से ऊपर उठने नहीं दिया. दूसरे, उंच-नीच की घृणा पर आधारित हिन्दू समाज-व्यवस्था में दलित कवि या लेखक का जीना बड़ा दूभर होता है.
         एक बार, उनके एक मित्र ने उनसे कहा कि अण्णा भाऊ, आपकी कई किताबों का अनुवाद विदेशों में हुआ है.मास्को में आपके अनुवादित किताबों के रकम की भारी रायल्टी वहां इकठ्ठा हुई होगी. आप उसे हासिल करके बड़ा-सा बंगला क्यों नहीं बनवा लेते और फिर वहां लिखने का कार्य जारी रख सकते हैं ? इस पर, पता है अण्णा भाऊ ने क्या जवाब दिया था ? उन्होंने कहा था कि बंगले में मजे से आराम कुर्सी पर बैठ कर लिखने से सिर्फ कल्पनाएँ सूझ सकती है.लेकिन, गरीबी का दर्द और पीड़ा भूखे पेट रह कर ही महसूस की जा सकती है ! उनके ये ख्याति-प्राप्त मित्र कलाकार विठ्ठलराव उपम थे. 
         अण्णाभाऊ की ख्याति के साथ-साथ उनके दुश्मन भी पैदा हुए थे.ब्राम्हण कम्युनिस्ट तो हाथ धोकर  कबके उनके पीछे पड़े थे.उनकी कविता, कहानी और नाटकों पर 'स्थापित राष्ट्रिय साहित्कारों' को खासी आपत्ति थी.उनके लिखे नाटकों के मंचन में भारी रूकावट पैदा हो रही थी. अंतत: अण्णाभाऊ को नाटकों से अपने को अलग करना पड़ा. यह उनके लिए बड़ा आघात था. आघात इतना बड़ा था कि वे उसे बर्दास्त नहीं कर पाए और उन्होंने अपने-आप को शराब के हवाले कर दिया.
         जिस शख्स के घर के सामने से शराबी जाने से डरता था, वह अब शराब का दास बन गया. धीरे-धीरे अण्णाभाऊ मौत के मुंह में समाने लगे.उनके प्रकाशकों ने उनके साथ दगा किया.उनके अपने रिश्तेदारों ने उनके पास जो भी था, उसे हजम कर लिया.और फिर, 18 जुलाई 1969  को यह लोक शाहिर सदा के लिए मौत के मुंह में समां गया.
         सोचता हूँ कि आखिर, ऐसे क्रन्तिकारी जन-कवि की मौत यूँ क्यों होती है ? जो  शख्स जन-चेतना की अलख जगाने अपनी जिन्दगी कुर्बान कर देता हो, सामाजिक-क्रांति की बात करते-करते सीने पर गोली खाने का माद्दा रखता हो,उसके खुद्दारी की इन्तहा इस कदर क्यों होती है ? मुझे लगता है कि विश्व-विद्यालयों में पढने वाले जिन बच्चों ने अण्णा भाऊ के संघर्ष पर पी.एच. डी. और डाक्टरेट किया है, आज नहीं तो कल जरुर वे इस पर गौर करेंगे.

....................
साभार अमृत लाल के ब्लाग से 

स्वामी अछूतानन्द हरिहर : संक्षिप्त परिचय

स्वामी अछूतानन्द हरिहर, आदि-वंश  आन्दोलन के प्रणेता थे. उन्होंने उ.प्र. में इस सामाजिक-धार्मिक आन्दोलन की स्थापना की थी. उनका असली नाम हीरालाल था. अछुतानंद नाम तो उनके गुरु ने उन्हें प्रदान किया था.
        स्वामी जी जन्म 6 मई 1869 को उ.प्र. के फरुखाबाद जिले के सौरिख नामक छोटे-से गाँव में हुआ था. उनकी माता का नाम राम पियारी और पिता का नाम मोतीराम था. बालक हीरालाल के माता-पिता ने काफी समय पहले से ही सवर्ण हिन्दुओं की जातिगत-घृणा और कलह से तंग आ कर पैत्रिक गाँव छोड़ दिया था. वे जिला मैनपुरी के उमरी गाँव में आ बसे थे. बाद में हीरालाल के पिता जी ने आर्मी ज्वाइन कर लिया था. बालक हीरालाल बचपन से ही तीव्र बुद्धि के थे. उन्होंने 14 वर्ष की उम्र में स्कूल छोड़ दिया था. आपका ब्याह हिराबाई से हुआ था. संतान के नाम पर इनको चार पुत्रियाँ थी.
           शुरू में स्वामी जी ने आर्य समाजियों के साथ थे।   मगर, जल्दी ही हिन्दू आर्य-समाजियों से इनका भ्रम टूट गया. तब स्वामी जी ने जाति-पांति और छुआ-छूत के विरुद्ध स्वत्रंत रूप से आन्दोलन चलाया. उन्होंने गाँव-गाँव भ्रमण कर अपनी बात को लोगों के सामने रखा.
           स्वामी जी सन 1917 में दिल्ली आये. आपने अपने लोगों को जगाने के लिए यहाँ से आदि-हिन्दू नामक हिंदी मासिक पत्रिका का सम्पादन किया था.स्वामी अछुतानंद हरिहर के अनुसार आदि-हिन्दू जातियां अर्थात अनार्य इस भारत-भूमि के मूल निवासी थे.आर्यों जातियों ने यहाँ आकर छल-कपट से उनको दास बनाया और बाद में कई तरह की निर्योग्यताएं उन पर लाद दी. आर्य जातियों का यह षड्यंत्र यहीं तक सीमित नहीं रहा बल्कि, आगे चलकर अनार्य जातियों को पशुओं से भी बदतर जीवन जीने को बाध्य किया.
        स्वामी  अछूतानंद हरिहर ने दिल्ली में अछूत नेता वीररतन दास और जगतराम जाटिया के साथ मिल कर अखिल भारतीय स्तर पर अछूत महासभा का गठन किया. सन 1922 के दरम्यान दिल्ली में ही स्वामी जी ने अछूत जातियों का एक बड़ा सम्मेलन आयोजित कर उस में प्रिंस आफ वेल्स को आमंत्रित किया था. वहां आपने प्रिंस आफ वेल्स को अछूत जातियों के उत्थान से सम्बन्धित 17 बिन्दुओं का मेमोरेंडम दिया था. इस मेमोरेंडम के मांग की गई थी कि आदि-हिन्दू (दलित जातियों) के लिए पृथक चुनाव और प्रतिनिधित्व का प्रावधान हो. इसके साथ ही छुआ-छूत के उच्छेद के लिए कड़े नियम बनाये जाये. इन जातियों के शिक्षित बच्चों को नौकरी और व्यवसाय में प्राथमिकता मिले. बलात-श्रम पर पाबंदी लगे और गाँव के कोटवार इन जातियों के हो आदि आदि।
         सन 1927 में स्वामी जी ने एक पब्लिक मीटिंग में हिन्दू और मुसलमानों की तर्ज पर आदि हिन्दुओं(दलित जातियों) के लिए पृथक स्वत्रंता की मांग की थी. आपने कहा कि दलित जातियां इसकी सही हकदार है. 30 नव. 1930 को स्वामी जी ने सायमन कमीशन से मुलाकात की थी, जिसके सदस्य बाबा साहेब डा. आम्बेडकर थे.
डा. आम्बेडकर ने स्वामी जी को को गुरु माना है।  स्वामीजी को जब मालूम हुआ कि डा. आम्बेडकर, जो अछूत समाज के हैं और देश की दबी-कुचली जातियों के लिए कार्य कर रहे हैं तो उन्होंने डा. आम्बेडकर से मिलने की ठानी. सन 1928 में संपन्न 'आदि हिन्दू' महा सभा के एक अधिवेशन में उनकी पहली मुलाकात हुई थी. बाद में इन दोनों महापुरुषों ने देश के आजादी के साथ-साथ दबी-पिछड़ी जातियों के अधिकारों के लिए, जो उनके शोषकों को सुनाई दे , ऐसी आवाज बुलंद की.
      राउंड टेबल कन्फेरेंश के दौरान स्वामी अछूतानन्द हरिहर ने भारत में अछूतों के सर्व मान्य नेता के तौर पर डा. आम्बेडकर और राव बहादूर श्रीनिवासन को सपोर्ट के लिए देश के कई कोनों से टेलीग्राम कराये थे.यह स्वामी जी का प्रयास था की ब्रिटिश भारत में अछूतों को संसद और विधान सभाओं में प्रथक प्रधिनिधित्व और दलित जातियों वाले अधिसंख्यक सीटों पर दोहरे मत का अधिकार मिला था. किन्तु गाँधी जी के आमरण अनशन ने इन दोनों मांगों की मिटटी-पलीद कर दी. किसी तरह 24 सित. 1932  को पूना पेक्ट हुआ जिसके साक्षी स्वामी जी थे.
       स्वामी अछुतानंद हरिहर ने हिन्दू धर्म की काट के तौर पर 'आदि-हिन्दू धर्म'  इजाद किया था. आदि-हिन्दू धर्म की 7 मान्यताएं थी-1. इस देश के मूल निवासी होने से वे 'आदि-हिन्दू' हैं. आदि-हिन्दू  होने के नाते उनका कर्तव्य है कि वे अपनी इस मात्र- भूमि पर सत्य और न्याय का शासन स्थापित करे.2. आर्यों के आने  के पहले यहाँ के मूल-निवासियों की जो आस्था और मान्यताएं थी, वही उनका 'आदि-धर्म' है. 3. यह कि ईश्वर है और  ईश्वर सर्व शक्तिमान और सच्चा है. ईश्वर अवतार नहीं लेता. 4. सभी मनुष्य बराबर है और वे आपस में भाई-भाई है. वर्ण, जाति और वंश/कुल के आधार पर उन में किसी तरह के उंच-नीच का भेद गलत है. 5.क्रोध,मोह,लोभ और काम वासना से अलिप्त रहना मन का धर्म है. वेश्यागमन,जुआ, हिंसा और मद्य-पान से अलिप्त रहना शरीर का धर्म है.6. संत कबीर का कथन सत्य है कि सब ब्राहमण-ग्रन्थ झूठे, अन्यायी और उनके वर्ग हित को साधने वाले हैं. हिन्दुओं के धर्म-शास्त्र ही उनके अधोगति के कारण है और इसलिए वे ब्राह्मण देवताओं, ईश्वर के अवतारों, ब्रह्मनिक धार्मिक उपदेशों को त्यागने की शपथ लेते हैं.यह भी शपथ लेते हैं कि न तो वे कोई ब्राहमनिक-संस्कार करेंगे और न ही अपने किसी सामाजिक-धार्मिक संस्कार को संपन्न कराने ब्राह्मण पंडित को बुलाएँगे.7. वे अपने पूर्वजों के उच्च चरित्र और आदि-वंश के गर्व भरे इतिहास को प्रचार-प्रसार करेंगे.
      देश की शोषित-पीड़ित जातियों के लोग जो हिन्दुओं से भयाक्रांत थे और जिनके लिए अंग्रेजों से आजादी पाने का कोई अर्थ नहीं था, हिन्दुओं से अपनी आजादी के लिए संघर्षरत थे. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जो तब, बड़े जोर-शोर से आजादी का आन्दोलन चला रहा था, के कर्ता-धर्ताओं के  सामने स्वामी अछुतानंद हरिहर ने जमीदारी उन्मूलन की मांग रखी थी. स्वामीजी के पत्र के उत्तर में मोतीलाल नेहरू ने लिखा था- पहले आजादी के आन्दोलन में सहयोग करे. जमीदारी उन्मूलन के सम्बन्ध में स्वराज प्राप्त होने पर विचार किया जा सकता है.
        भारत के इस महान सपूत की मृत्यु  20  जुला. 1933 को 54 वर्ष की आयु में कानपूर के पास बेना झाबर में हुई थी. देश के कोने-कोने से आये दबे-कुचले लोगों ने उनकी शव-यात्रा में शरीक हो अपने नायक को नमन किया था.
....................
साभार अमृत लाल के ब्लाग से 

Thursday, 5 October 2017

नोबेल विजेता कैलाश सत्यार्थी जी का व्याख्यान

        आज दिनांक 05 अक्टूबर 2017 सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय, बारला, रायसेन, मध्य प्रदेश में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित माननीय कैलाश सत्यर्थी जी का आगमन हुआ । विश्वविद्यालय के विशेष आतिथ्य पर वह विशिष्ट व्याख्यान में शरीक हुए । व्याख्यान का विषय “वर्तमान परिप्रेक्ष्य में करुणा, दया और बालक” रखा गया था । अपने एक घंटे के व्याख्यान में उन्होने अपनी स्पष्टवादिता व करुणा का परिचय दिया । गौरतलब है कि कैलाश सत्यार्थी जी कन्याकुमारी से “भारत यात्रा” निकाल रहे हैं । उनका उद्द्येश्य भारतवासियों को बाल-यौन हिंसा, मानव तस्करी, महिला सुरक्षा, दैहिक शोषण, बाल श्रम जैसे समस्याओं से अवगत करना है । समय के साथ हम आधुनिक जरूर होते जा रहे हैं किन्तु उतनी ही सामाजिक बुराइयाँ भी हमारी पीछा करती हुई चली आ रही हैं । और इस तरीके कि घटनाओं को अंजाम देने वाला कोई और नहीं बल्कि हमारे ही बीच से कोई होता है । 

           भारत सरकार और यूनिसेफ कि रिपोर्ट के अनुसार भारत में 53 प्रतिशत बच्चे बाल यौन अपराध के शिकार हैं । उन्होने कहा कि यदि आज के बाद बाल अपराध होना बंद हो जाये तो लंबित केसों के निपटारें में ही 10 से 40 साल लग जाएंगे । बाल अपराध कि स्थिति को समाज के लिए भद्दा मज़ाक बताते हुए उन्होने कहा कि 1992 के बाद से दुनिया में बाल मजदूरी कि संख्या 26 कारों से घटकर 15 करोड़ हुई है । लेकिन इसके बाद भी समाज में बाल यौन अपराध बढ़ रहा है ।
          ये हमारे समाज कि वर्तमान स्थिति है जिस पर हम सभी को मिलकर विचार करना चाहिए । कैलाश जी का कथन सभी को कुछ नया सोचने को मजबूर करता है । उन्होने कहा कि हमने नोबेल पुरस्कार को सम्पूर्ण देशवासियों को समर्पित कर दिया है । अब यह पुरस्कार सिर्फ मेरा न होकर सम्पूर्ण राष्ट्र का है इसलिए इन सभी सभी समस्याओं से लड़ने कि नैतिक जिम्मेवारी हम सभी हो गई है, तो आइए हम सभी इस समस्या को समाप्त करने में अपना योगदान दें । व्याख्यान के बाद सभी से संकल्प दिलवाए ।
          कैलाश सत्यार्थी जी का व्याख्यान सभी को सुनना चाहिए और ऐसी होने वाली समस्याओं को रोकने में मदद करनी चाहिए । भारत के स्वतंत्र हुए लगभग 70 वर्ष हो गए है किन्तु ऐसी समस्याएँ मुंह बाए खड़ी हैं । तो आइए साथ मिलकर जो जिस स्थिति में है और जहां है वहीं अपना सहयोग दे ।
जय भीम । । । हूल जोहार । । । जय संविधान

-         अनीश कुमार 

Monday, 2 October 2017

भूख का उत्सव

भूख की आवाज 

सुबह-सुबह ज्यादा भयावह होती है

उस भूख का इंतजार करना

और अधिक दुष्कर हो जाता है

देहरी के ऊपर बैठे बच्चों

की भूख की आवाज सुनकर

ऐसा लगता है कि

जैसे उसकी माँ भूख

का उत्सव मना रही हो

सुबह-सुबह उठकर जाएगी

वह किसी पन्तिपावन

ब्राह्मण के यहाँ

बर्तन साफ करेगी,

गंदे कपड़े व पखना साफ करेगी

अपनी नियति मानकर

नित्य की तरह

तब उसे कहीं मिलेगी रात्रि की बची हुई

सूखी रोटियाँ

ये रोटियाँ वह कपड़े में छुपाते हुए लाएगी

देहरी पर रखते ही

निढाल पड़े बच्चों की छीनाझपटी

देखकर किसी उत्सव से

कम नहीं लगता

शायद उसकी जिंदगी भी

इसी तरह एक उत्सव बन कर रह गई है भूख की

शायद यह भूख

आज के मनुष्य की सबसे बड़ी पिपासा बन गई है ।

दुनिया बदल गई--- कविता

दुनिया बदल गई--- कविता

काली रात के 
अतल गहराइयों में
टिमटिमाता छोटा सा दिया
उसके झुरमुट में
बेनाम शख्स
एक अदद रोटी के इंतजार में 
देहरी से सटकर बैठा है।
काली स्याह रात में 
कुत्तो की आवाज
भूख के आगे बौनी हो गई है।
आंख लगातार बंद होने का इंतजार कर रही है
तभी कुछ हलचल होती है
आंख तुरंत उसी ओर गई
शायद कोई रोटी लेकर 
सामने खड़ा था
वह शख्स जोर से उठ खड़ा हुआ
आवाज गायब थी
सामने कोई नहीं था
पेट लाचार था
आंखें बेबस थीं
सुबह हुई
दुनिया जैसे बदल गई
मौसम बदल गया
उसके सामने 
अब नहीं थी समस्या
खाने की 
क्योंकि आंखे बंद थी 
पेट शांत था 
वह अब इस दुनिया में 
नहीं था।।।

- अनीश कुमार